- एक ड्रोन सर्वे से पता चला है कि पाक खाड़ी-मन्नार की खाड़ी में 200 से ज्यादा डुगोंग मौजूद हैं। यह भारत के पहले डुगोंग संरक्षण रिजर्व में इन दुर्लभ जीवों की बढ़ती संख्या की ओर इशारा करता है।
- स्थानीय मछुआरे जागरूकता कार्यक्रम, वित्तीय प्रोत्साहन और समुदाय-आधारित कल्याण योजनाओं के जरिए इस संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
- मछली पकड़ने वाले जाल में फंसना, आवास का नुकसान और सीमा पार अनियंत्रित शिकार डुगोंग के लिए बड़े खतरे हैं। इन खतरों को देखते हुए सख्त नियमों, सीमा पार सहयोग और सैटेलाइट के जरिए डुगोंग की गतिविधियों पर नजर रखने की जरूरत है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) द्वारा 2023-24 में किए गए एक ड्रोन सर्वे से पता चलता है कि पाक खाड़ी और मन्नार की खाड़ी के ‘डुगोंग संरक्षण रिजर्व’ में 200 से भी अधिक डुगोंग मौजूद हैं। डुगोंग एक बड़ा, शांत और शाकाहारी समुद्री जानवर होता है। इसे लोग समुद्री गाय भी कहते हैं। ये समुद्री स्तनधारी जीव क्षेत्रीय स्तर पर लुप्तप्राय माने जाते हैं, लेकिन इस क्षेत्र (जिसे सामूहिक रूप से पीबी-जीओएम क्षेत्र माना जाता है) में इनकी आबादी बढ़ रही है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान के मुताबिक, डुगोंग की आबादी में यह सुधार कई तरह के संरक्षण प्रयासों से संभव हुआ है। इनमें मछुआरों के लिए जागरूकता कार्यक्रम, उनके प्राकृतिक आवास की बहाली, सामुदायिक संपर्क और जाल में फंसे हुए डुगोंग को बचाने व वापस समुद्र में छोड़ने के लिए इनाम देने जैसी पहल शामिल हैं।
डब्ल्यूआईआई के नेशनल डुगोंग रिकवरी प्रोग्राम के मुख्य वैज्ञानिक जे. एंटनी जॉनसन ने बताया, “डब्ल्यूआईआई ने अभी तक पाक खाड़ी में किए गए इस नए सर्वे की रिपोर्ट जारी नहीं की है, लेकिन अनुमान यही है कि पाक खाड़ी और मन्नार की खाड़ी में 200 से ज्यादा स्वस्थ और वयस्क डुगोंग मौजूद हैं। ये दोनों इलाके आपस में जुड़े हुए हैं और इस अर्ध-प्रवासी जीव के लिए प्राकृतिक आवास प्रदान करते हैं।”
वहीं पांडिचेरी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और डब्ल्यूआईआई के पूर्व वैज्ञानिक के. शिवकुमार का अनुमान है कि पीबी-जीओएम क्षेत्र में डुगोंग की संख्या 300 के करीब है।
जमीनी स्तर पर डुगोंग के संरक्षण प्रयासों को मजबूती देने के लिए 2022 में, तमिलनाडु सरकार ने पाक खाड़ी के लगभग 500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को भारत का पहला ‘डुगोंग संरक्षण रिजर्व’ घोषित किया था।
पुदुक्कोट्टई जिले के वन रेंज अधिकारी मणि वेंकटेश कहते हैं, “इन प्रयासों की बदौलत, अब तट से सिर्फ 5 समुद्री मील की दूरी तक ही बॉटम ट्रॉलर्स चलाए जा सकते हैं। 2020 में पर्स सीन और शोर सीन जाल पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके अलावा, मशीनी नावों के लिए रोजाना पास लेना और गति सीमा का पालन करना अनिवार्य कर दिया गया है।”

समुद्री गायों के नाम से मशहूर डुगोंग (डुगोन) शाकाहारी समुद्री स्तनधारी जीव हैं। विकास के क्रम में यह एफ्रोथेरिया समूह का हिस्सा है, जिसका मतलब है कि ये हाथियों के निकट सम्बन्धी हैं। ‘ओमकार’ (OMKAR) फाउंडेशन के बालाजी वेधराजन ने इनके बारे में और अधिक जानकारी देते हुए कहा, “डुगोंग 70 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं और 14 महीने की गर्भधारण अवधि के बाद सिर्फ एक ही बच्चे को जन्म देते हैं। वे सामाजिक प्राणी हैं और लगभग दो साल तक अपने बच्चों की देखभाल करते हैं। ये एक-दूसरे से संपर्क करने के लिए स्पर्श, ध्वनि और संकेतों (दृष्टि) का इस्तेमाल करते हैं। इन्हें बचाना हमारी राष्ट्रीय और प्राकृतिक विरासत का हिस्सा है।”
वह आगे कहते हैं, “उथले उष्णकटिबंधीय पानी में पाए जाने वाले डुगोंग के संरक्षण के लिए अर्ध-बंद पाक खाड़ी क्षेत्र सबसे उपयुक्त जगह है। इन्हें आईयूसीएन की रेड लिस्ट में खतरे वाली प्रजाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है।”
इस क्षेत्र में मछली पकड़ना एक प्रमुख आजीविका है, जिससे लाखों मछुआरे जुड़े हुए हैं। इसलिए यहां सख्त संरक्षण उपाय लागू कर पाना संभव नहीं है। वेधराजन के अनुसार, अकेले पीबी-जीओएम क्षेत्र के मल्लिपट्टिनम, कोट्टाइपट्टिनम, सेतुबावचथिरम और अन्य मछली पकड़ने वाले केंद्रों से ही लगभग 840 मोटर वाली नावें और 6,914 फाइबर नावें चलती हैं। इस स्थिति में डुगोंग और कछुओं जैसे समुद्री जीवों को उन मछुआरों के साथ मिलकर (सह-अस्तित्व) रहना होगा, जो अपनी आजीविका के लिए समुद्र पर निर्भर हैं।
संरक्षण में मछुआरों की भागीदारी
डुगोंग्स विलुप्त होने के कागार पर हैं। एक समय में इनका बहुत ज्यादा शिकार किया जाता था, क्योंकि मछुआरे इसके मांस को बहुत ही स्वादिष्ट मानते थे। तमिल में स्थानीय रूप से ‘आवुरिया’ कहे जाने वाले इस मांस को कुछ दशक पहले तक बाजारों में खुलेआम बेचा जाता था। प्रोफेसर शिवकुमार बताते हैं, “ऐसे उदाहरण भी मिले हैं जब एक ही हफ्ते में लगभग 100 डुगोंग मार दिए गए थे (एक वयस्क डुगोंग का वजन 300 से 400 किलो तक होता है)। रिकॉर्ड के अनुसार, 1983-1984 के दौरान कीलकरई और पेरियापट्टिनम गांवों के बीच करीब 250 डुगोंग का अवैध शिकार किया गया था।” वह आगे कहते हैं, “लेकिन बढ़ती जागरूकता और विभिन्न हितधारकों द्वारा लागू किए गए संरक्षण उपायों के कारण अब शिकार पर काफी हद तक नियंत्रण पा लिया गया है।”

आज, मछुआरे जाल में फंसे डुगोंगों को बचाने और उन्हें वापस समुद्र में छोड़ने में सबसे आगे रहते हैं। 2024-25 में, तमिलनाडु वन विभाग ने थंजावुर और पुदुक्कोट्टई जिलों के तटीय गांवों में डुगोंग संरक्षण का संदेश फैलाने के लिए लगभग 80 जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए थे।
स्वयंसेवी संस्था ‘अरुम्बुगल’ ने भी इसी दौरान रिजर्व की सीमा से सटे आदिरामपट्टिनम-अम्मापट्टिनम तटीय इलाके की 55 में से लगभग 50 मछुआरा बस्तियों में इस तरह के कार्यक्रम आयोजित कर उन्हें जागरूक किया था। अरुम्बुगल ट्रस्ट के संस्थापक आर. मथिवनन कहते हैं, “मछुआरों की सोच में एक बड़ा बदलाव आया है। पहले, वे इन कार्यक्रमों में भाग लेने से कतराते थे। लेकिन अब, वे न सिर्फ सरंक्षण रणनीतियों को अपना रहे हैं, बल्कि उन्हें लागू करने के लिए भी उत्सुक हैं।”
मछुआरों के लिए डुगोंग संरक्षण उनकी आजीविका की सुरक्षा का हिस्सा बनता जा रहा है। पी.आर. पट्टिनम के एक मछुआरे शेख दाऊद ने बताया, “हर बस्ती के स्थानीय नाव मछुआरा संघों ने इस जिम्मेदारी को समझा और डुगोंग संरक्षण के अभियान को अपना लिया है। हमें बताया गया है कि डुगोंग एक प्रमुख (कीस्टोन) प्रजाति है, जो समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को फलने-फूलने में मदद करती है। इसलिए, हम समुद्री घास के बड़े मैदानों, कोरल और मैंग्रोव वाले इलाकों से दूर रहते हैं, ताकि डुगोंग, कछुओं और अपने खुद के भविष्य के लिए इस पर्यावरण को सुरक्षित रख सकें।”
फिर भी चुनौतियां बनी हुई हैं। समुद्री जीवविज्ञानी वेधराजन समझाते हैं, “डुगोंग के जाल में फंसने की सबसे अधिक संभावना सुबह 3 बजे से 6 बजे के बीच होती है, जब वे सबसे ज्यादा सक्रिय होते हैं।” उन्होंने आगे बताया, “अग्नियार और अम्बूलियार नदियों से आने वाली गाद के कारण पाक खाड़ी का पानी मटमैला रहता है, जिससे पानी के भीतर साफ दिखाई नहीं देता। इसके अलावा, बहुत ज्यादा मछली पकड़े जाने की वजह से डुगोंग का जीवन और भी मुश्किल हो गया है।” बचाव प्रयासों को समय के साथ तेज करने की जरुरत है। तंजावुर के जिला वन अधिकारी आनंद कुमार कहते हैं, “फंसे हुए डुगोंग को बचाने के लिए सिर्फ 9 से 14 मिनट का ही समय होता है। उन्हें बचाने के लिए उनके सिर के पास के जाल को काटकर उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला जाता है।”
शिवकुमार के अनुसार, पिछले दो दशकों में लगभग 20 डुगोंग को बचाकर सुरक्षित रूप से समुद्र में छोड़ा गया है। हाल ही में किए गए बचाव कार्यों की बात करें, तो 2023 में दो डुगोंग बचाए गए, जबकि नवंबर 2024, जनवरी 2025 और फरवरी 2025 में एक-एक डुगोंग को सुरक्षित समुद्र में छोड़ा गया।
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मछुआरों के लिए प्रति बचाव कार्य प्रोत्साहन राशि को ₹10,000 से बढ़ाकर ₹50,000 कर दिया गया है। इनाम की इस पहल ने संरक्षण के प्रयासों को और मजबूत किया है।
पाक खाड़ी में भारत के सबसे बड़े समुद्री घास के मैदान हैं, लेकिन लगातार आने वाले चक्रवातों ने इन्हें नुकसान पहुंचाया है। पिछले दो सालों में, तमिलनाडु वन विभाग ने ड्रोन तकनीक (एकॉस्टिक मैपिंग) का इस्तेमाल करके समुद्री घास को फिर से उगाने का काम किया है। पेरावुरानी के पास वल्लवनपट्टिनम से लगभग 100 वर्ग मीटर की 10 जगहों की पहचान की गई, जहां मछुआरा समुदाय के प्रशिक्षित गोताखोरों ने चार मीटर की गहराई पर 52 टहनियों वाले बांस और जूट के फ्रेम लगाए। कुमार कहते हैं, “इस आवास बहाली के काम पर ₹10 लाख खर्च किए गए। इसके लिए तमिलनाडु बायोडायवर्सिटी कंजर्वेशन एंड ग्रीनिंग प्रोजेक्ट फॉर क्लाइमेट चेंज रिस्पॉन्स (टीबीजीपीसीआर) के तहत 2023-24 और 2024-25 में धनराशि आवंटित की गई थी।”

सामुदायिक संपर्क इस अभियान का एक और मुख्य स्तंभ है। वन विभाग और ओमकार फाउंडेशन ने 14 बस्तियों और मछली उतारने के नौ केंद्रों में सोलर लाइटें लगाई हैं, जिससे सुरक्षा में सुधार हुआ है और केरोसिन पर निर्भरता कम हुई है। ओमकार फाउंडेशन एक ‘डुगोंग स्कॉलरशिप प्रोग्राम’ भी चलाता है, जिसके तहत मछुआरों के अनाथ बच्चों को सालाना ₹18,000 की सहायता दी जाती है। यह पहल संरक्षण के काम को सीधे तौर पर समुदाय के कल्याण से जोड़ती है।
प्रगति के बावजूद चुनौतियां
विशेषज्ञों का कहना है, हालांकि काफी प्रगति हुई है, लेकिन संरक्षण के क्षेत्रों में अभी और बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। सबसे जरूरी है डुगोंग के खतरों को कम करना, ट्रॉल नेट पर प्रतिबंध लगाकर उन्हें मछली पकड़ने के जालों में फंसने से रोकना और मशीनीकृत नावों के लिए गति सीमा को सख्ती से लागू करना, क्योंकि इन नावों के प्रोपेलर (पंखे) में फंसने से डुगोंग मारे जाते हैं।
नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन की वैज्ञानिक (महासागर और तट) एलरिका डिसूजा कहती हैं, “भारतीय समुद्री क्षेत्र (जिसमें पीबी-जीओएम, कच्छ की खाड़ी और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं) में समुद्री स्तनधारी अपने अनिश्चित अस्तित्व के अंतिम बचे हुए क्षेत्रों में ही जी रहे हैं। यहां जाल में फंसने, अत्यधिक मछली पकड़ने और अवैध शिकार के दुर्लभ मामले जैसे स्थानीय खतरों को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए, अभी बहुत काम किए जाने की जरूरत है।” वर्तमान में एलिका इस बात का अध्ययन कर रही हैं कि मानवीय गतिविधियों के कारण डुगोंग के व्यवहार में कैसे बदलाव आता है।
वह आगे कहती हैं, “डुगोंग अर्ध-खानाबदोश स्वभाव के होते हैं और समुद्री घास की उपलब्धता की तलाश में 100 मील से ज्यादा की यात्रा करते हैं। उनके इस अर्ध-प्रवासी पैटर्न का अभी विस्तार से अध्ययन किया जाना बाकी है। यह डुगोंग संरक्षण के क्षेत्र में एक अनछुआ पहलू है।”
जॉनसन के मुताबिक, इस कमी को दूर करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। “हम पहले से जानते हैं कि डुगोंग मानसून से पहले के मौसम में पाक खाड़ी को पसंद करते हैं और मानसून के बाद मन्नार की खाड़ी में चले जाते हैं। उहोंने कहा, “पीबी-जीओएम क्षेत्र में डुगोंग की निगरानी के लिए एक टेलीमेट्री-आधारित सैटेलाइट ट्रैकिंग पर काम चल रहा है। यह तकनीक इन शांत समुद्री स्तनधारियों के अर्ध-प्रवासी पैटर्न का अध्ययन करने में बहुत मदद करेगी, जिनकी आबादी इस क्षेत्र में धीरे-धीरे फिर बढ़ रही है।”

भले ही भारत के पीबी-जीओएम क्षेत्र में 200 डुगोंग मौजूद हैं, लेकिन उन्हें बचाने के प्रयासों को और मजबूत करने के लिए भारत और श्रीलंका की सरकारों के बीच आपसी सहयोग बहुत जरूरी है। क्योंकि डुगोंग भारत से तैरकर श्रीलंका के जाफना और मन्नार तटों तक भी प्रवास करते हैं।
श्रीलंका की तरफ अभी भी डुगोंग का अवैध शिकार बड़े पैमाने पर और बिना किसी रोक-टोक के जारी है। ऐसी स्थिति में, अगर दोनों देशों की सरकारें और अन्य संस्थाएं मिलकर काम करें, तो हिंद महासागर क्षेत्र में इस प्रजाति को बचाने में बहुत बड़ी मदद मिल सकती है।
वेधराजन कहते हैं, “श्रीलंका के उत्तर-पश्चिमी मछुआरा समुदायों में डुगोंग संरक्षण और जागरूकता को लेकर जमीनी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किए गए हैं। वहां मांस के लिए इनका शिकार अब भी आम है, जो दोनों देशों के बीच के समुद्री रास्ते (पीबी-जीओएम) में डुगोंग के अस्तित्व के लिए एक बड़ा खतरा बना हुआ है। श्रीलंका में जमीनी स्थिति वैसी ही है जैसी दो दशक पहले थी।”
कोलंबो में स्थित भारतीय उच्चायोग के निमंत्रण पर हाल ही में श्रीलंका की यात्रा के दौरान, वेधराजन ने दोनों देशों को शामिल करके डुगोंग संरक्षण के लिए उपाय और प्रोटोकॉल स्थापित करने के लिए श्रीलंका के स्थानीय गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), भारतीय उच्चायोग, तटीय संरक्षण और तटीय संसाधन प्रबंधन विभाग और आईयूसीएन श्रीलंका के साथ चर्चा की थी।
वह कहते हैं, “बायोडायवर्सिटी एजुकेशन एंड रिसर्च (BEAR) समेत कोलंबो के दो एनजीओ के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। इनका उद्देश्य जानकारी साझा करना, क्षमता निर्माण और समुद्री घास की बहाली और मैपिंग जैसी तकनीकी जानकारी का आदान-प्रदान करना है। अगला तार्किक कदम दोनों देशों के सभी संबंधित पक्षों को शामिल करते हुए एक विचार विमर्श कार्यशाला का आयोजन करना होगा, जिसके लिए दोनों देशों की ओर से आर्थिक सहायता और सरकारी सहयोग की आवश्यकता है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 16 सितंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर- डुगोंग की प्रतिकात्मक तस्वीर, मेट्रो टोरंटो ज़ू टोरंटो कनाडा, विकिमीडिया कॉमन्स (पब्लिक डोमेन)