- असम के दीपोर वेटलैंड में अनुपचारित सीवेज, शहरी अपवाह और ठोस कचरे के कारण हानिकारक शैवाल तेजी से फैल रहे हैं।
- वेटलैंड में शैवाल का बढ़ना जैव विविधता और स्थानीय समुदायों की आजीविका के लिए खतरा है।
- शोधकर्ता पूर्ण संरक्षण, पोषक तत्वों के प्रवाह को कम करने, आसपास के आवासों का संरक्षित करने और लगातार माइक्रोबियल निगरानी पर जोर दे रहे हैं।
गुवाहाटी के प्रमुख वर्षा जल संचयन बेसिन ‘दीपोर वेटलैंड’ की स्थिति शहरों से बहकर आने वाले गंदे पानी के कारण बिगड़ रही है। भूमि उपयोग में बदलाव और कचरे जैसी समस्याओं ने मिलकर यहां यूट्रोफिकेशन यानी पोषक तत्वों के अत्यधिक संचय की स्थिति पैदा कर दी है। इस कारण इस वेटलैंड में हानिकारक शैवाल पनप रहे हैं जिन्होंने इसकी जैव विविधता को खतरे में डाल दिया है और साथ ही स्थानीय समुदायों के जीवन को भी प्रभावित कर रहे हैं।
असम में दीपोर बील के नाम से जाने जाने वाली यह जगह जैव विविधता का एक हॉटस्पॉट और रामसर वेटलैंड साइट है। यहां 68 प्रकार की मछलियों के साथ साथ 234 से अधिक स्थानीय और प्रवासी पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें विश्व स्तर पर संकटग्रस्त 18 कशेरुकी जीव, विविध प्रकार के उभयचर, सरीसृप और अन्य जीव शामिल हैं। यह हाथियों के लिए एक गलियारे और चारागाह के रूप में काम करता है और भूजल पुनर्भरण का स्रोत भी है। लगभग 800 मछुआरे परिवार पूरी तरह से इसी वेटलैंड पर निर्भर है, जो उनकी आय में सालाना तकरीबन ₹11.6 करोड़ का योगदान देता है। लेकिन अब ये मछुआरे मछलियों की कम होती संख्या और कई प्रजातियों के विलुप्त होने की रिपोर्ट कर रहे हैं।
कोलकाता स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) की एक टीम ने नवंबर 2024 से फरवरी 2025 तक इस आर्द्रभूमि की निगरानी की और दो सामान्य विष उत्पन्न करने वाले सायनोबैक्टीरिया (नीले-हरे शैवाल)- प्लैंकटोथ्रिक्स और माइक्रोसिस्टिस के पनपने और उनके बनने के लिए जिम्मेदार पर्यावरणीय स्थितियों का अध्ययन किया।
दीपोर बील में जमीनी स्तर पर डेटा इकट्ठा करने और यहां के बदलते पारिस्थितिकी तंत्र का बारीकी से अवलोकन करने वाली राजकुमारी निकिता ने समझाया, “झीलों और तालाबों में रहने वाले जीवों को अक्सर अपने जीवनकाल में शैवाल के पनपने (एल्गल ब्लूम) का सामना करना पड़ता है। हालांकि शैवाल का खिलना एक प्राकृतिक घटना है, लेकिन मानव-जनित यूट्रोफिकेशन और जलवायु परिवर्तन के कारण अब ये दुनियाभर में और अधिक व लंबे समय तक बने रहने लगे हैं।” उन्होंने आगे बताया, “दरअसल शैवाल की जरूरत से ज्यादा उपस्थिति हाइपोक्सिया (ऑक्सीजन का निम्न स्तर) का कारण बनती है, जिससे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में ऑक्सीजन की कमी और सूरज की रोशनी बाधित हो सकती है। इसके अलावा ये ऐसे विषाक्त पदार्थों को छोड़ते हैं जो खाद्य श्रृंखला में जमा होकर नुकसान पहुंचा सकते हैं।”
शोधकर्ताओं ने ‘दीपोर बील इकोलॉजिकल टाइम सीरीज’ (डीबीईटीएस) निगरानी कार्यक्रम के छह स्टेशनों से नमूने लिए। साल 2022 में आईआईएसईआर-कोलकाता के ‘इंटीग्रेटिव टैक्सोनॉमी एंड माइक्रोबियल इकोलॉजी रिसर्च ग्रुप’ द्वारा स्थापित यह डीबीईटीएस कार्यक्रम वेटलैंड के स्वास्थ्य का अध्ययन करता है। साल 2025 में इसे मौसमी सर्वे से बदलकर एक मासिक निगरानी कार्यक्रम में तब्दील कर दिया गया। इस दौरान पानी की गुणवत्ता के प्रमुख मानकों को मापा गया, जिनमें सतह का तापमान, पीएच, घुलित ऑक्सीजन, कुल घुले हुए ठोस पदार्थ (टीडीएस), विद्युत चालकता और पारदर्शिता शामिल थी। साथ ही, इन आंकड़ों का मिलान सैटेलाइट से प्राप्त जानकारियों के साथ भी किया गया।

प्रदूषण के कारण बढ़ रहे हैं शैवाल
आईआईएसईआर कोलकाता के जलवायु और पर्यावरण अध्ययन केंद्र के पुण्यश्लोक भादुड़ी ने बताया, “अध्ययन के सबसे स्पष्ट निष्कर्षों में से एक यह है कि नाइट्रेट, फॉस्फेट, अमोनियम और सिलिकेट जैसे पोषक तत्वों का प्रदूषण शैवाल के पनपने में निर्णायक भूमिका निभाता है। ये पोषक तत्व मुख्य रूप से बिना उपचारित सीवेज, कृषि अपवाह और ठोस कचरे से आते हैं, जो बशिष्ठ और कालमनी नदियों (जो इस वेटलैंड के पानी के मुख्य स्रोत हैं) और स्थानीय मानसूनी बहाव के साथ वेटलैंड में पहुंचते हैं।”
अध्ययन में पाया गया कि सतह के पानी का तापमान नवंबर के मुकाबले फरवरी में लगभग 2 से 3 डिग्री सेल्सियस तक कम हो गया था (नवंबर में 23-25°C और फरवरी में 20-22°C)। नवंबर में पानी ज्यादा क्षारीय था। तो वहीं फरवरी में घुलित ऑक्सीजन का स्तर बढ़ गया, जो ठंडे पानी की अधिक ऑक्सीजन धारण करने की क्षमता को दर्शाता है। फरवरी में कुल घुले हुए ठोस पदार्थों और विद्युत चालकता की मात्रा काफी अधिक पाई गई। यह घुले हुए लवणों और प्रदूषकों में वृद्धि का संकेत देता है।
निष्कर्षों से पता चलता है कि हानिकारक शैवाल के पनपने में तेजी से बदलाव आया, जिसने महज चार महीनों के भीतर वेटलैंड के जलीय समुदायों पर कब्जा कर लिया और उनका पूरा स्वरूप बदल दिया। नवंबर में, गर्म और क्षारीय पानी में पनपने वाले ‘प्लांक्टोथ्रिक्स’ शैवाल का बोलबाला था। उस दौरान साइनोबैक्टीरिया का प्रभाव अधिक था और प्रजातियों की विविधता (टैक्सोनॉमिक डायवर्सिटी) काफी कम थी।
फरवरी तक, जैसे ही तापमान गिरा और पोषक तत्वों का स्तर बढ़ा, ‘प्लांक्टोथ्रिक्स’ की संख्या कम हो गई और उसकी जगह हरे शैवाल (क्लोरेला), डायटम (नेविकुला और ऑलाकोसेरा) और यूग्लेनोइड्स (यूग्लेना और फैकस) के अधिक विविध समूह ने ले ली।
भादुड़ी ने कहा, “छोटी स्थानीय मछलियां अपने भोजन और रहने की जगह के लिए इन शैवाल के समुदायों पर निर्भर रहती हैं। अगर शैवाल के इस तंत्र में कोई भी बदलाव आता है, तो इन मछलियों के लिए खाने का संकट खड़ा हो जाएगा, जबकि ये मछलियां स्थानीय मछुआरों के लिए बहुत जरूरी हैं। शैवाल के अचानक बढ़ने से पानी में ऑक्सीजन की मात्रा तेजी से गिर सकती है, जिससे मछलियां और पानी के दूसरे जीव मर सकते हैं।”
उन्होंने आगे बताया, “आंकड़ों के अध्ययन से पता चला है कि ‘प्लैंक्टोथ्रिक्स’ का बढ़ना पानी के पीएच और उसमें पहुंचने वाली रोशनी पर निर्भर करता है। वहीं, ‘माइक्रोसिस्टिस’ तब तेजी से फैलती हैं जब पानी में नाइट्रेट और सिलिकेट जैसे रसायनों की मात्रा ज्यादा होती है। इसका सीधा मतलब है कि प्रदूषण या पानी की रासायनिक संरचना में होने वाला मामूली सा बदलाव भी यह तय कर सकता है कि कौन से हानिकारक सायनोबैक्टीरिया आर्द्रभूमि पर हावी होंगे।”
फाइटोप्लांकटन के अलावा, शोधकर्ताओं ने झील में बैक्टीरिया, कवक और अन्य सूक्ष्म जीवों का भी अध्ययन किया। डीएनए सीक्वेंसिंग तकनीक से जांच करने पर पता चला कि वेटलैंड के अलग-अलग हिस्सों में बैक्टीरिया के समुदाय एक-दूसरे से भिन्न थे। ऊपरी धारा वाले साफ हिस्सों में बर्कोल्डेरियासी और कोमोनैडेसी जैसे बैक्टीरिया अधिक मात्रा में थे। इसके विपरीत, अधिक प्रदूषित हिस्सों में बीमारी फैलाने वाले बैक्टीरिया जैसे ‘एरोमोनाडेसी’ और ‘एंटरोबैक्टीरियासी’ की भरमार पाई गई। कवक विशेष रूप से एस्कोमायकोटा और बेसिडियोमायकोटा, हर जगह प्रमुखता से मौजूद थे, जो कार्बनिक पदार्थों को गलाने और सड़ाने में उनकी भूमिका को दर्शाते हैं। रोटिफर, आर्थ्रोपॉड और प्रोटिस्टा जैसे सूक्ष्म जीवों की संख्या भी शैवाल के पनपने की स्थितियों के साथ घटती-बढ़ती रही। इससे पता चलता है कि यह समस्या पूरी खाद्य श्रृंखला को कैसे प्रभावित करती है।
सूक्ष्मजीवों में होने वाले ये बदलाव इकोलॉजिकल फिंगरप्रिंट की तरह काम करते हैं जो वेटलैंड के अलग-अलग हिस्सों में प्रदूषण की मात्रा को दर्शाते हैं।
भादुड़ी ने कहा, “जिन जगहों पर हानिकारक शैवाल पाए गए, वहां पानी की गुणवत्ता गिर रही थी। इसका मुख्य कारण आसपास की नदियों और नालों से बहकर आने वाले पोषक तत्वों की अधिकता है। इन सीवेज से भरी नदियों का जैविक उपचार करने से डीपोर बील में पानी की गुणवत्ता बहाल करने में मदद मिल सकती है। संरक्षण के नजरिए से, यहां के स्थानीय जीवों की विविधता को बनाए रखने और दीपोर बील के रामसर साइट के दर्जे को बरकरार रखने के लिए यह बेहद जरूरी है।”
अध्ययन में तीन मुख्य रणनीतियों की सिफारिश की गई। पहला, सीवेज, कृषि अपवाह और ठोस कचरे का अधिक प्रभावी ढंग से प्रबंधन करके पोषक तत्वों के प्रवेश को कम करना; दूसरा, पारिस्थितिक लचीलापन बनाए रखने के लिए वेटलैंड के अंदर और आसपास के आवासों का संरक्षण करना और तीसरा, हानिकारक शैवाल के पनपने का पहले से अंदाजा लगाने और उन्हें कम करने के लिए फाइटोप्लांकटन और सूक्ष्मजीवों की लंबे समय तक निगरानी जारी रखना।
निकिता ने आगे कहा, “वेटलैंड की फील्ड-आधारित निगरानी के साथ-साथ एनवायर्नमेंटल डीएनए (eDNA) को एक जैविक निगरानी उपकरण के रूप में इस्तेमाल करना काफी फायदेमंद हो सकता है। इसके अलावा, स्थानीय समुदायों को इसमें शामिल करना, विशेष रूप से मछुआरों को जागरूक करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनके पास पहले से ही पारंपरिक ज्ञान मौजूद है।”

संरक्षण के लिए जोनल मास्टर प्लान
आईआईएसईआर कोलकाता के ये निष्कर्ष एक बहुत ही महत्वपूर्ण समय पर आए हैं। यह वह समय है जब पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने दीपोर बील वन्यजीव अभयारण्य के चारों ओर 38.84 वर्ग किमी क्षेत्र को कवर करने वाले 5 किमी के ‘इको-सेंसिटिव जोन’ (ESZ) घोषित करने के लिए एक मसौदा अधिसूचना जारी की है। यह अधिसूचना उन्हीं समस्याओं की ओर इशारा करती है जिन्हें इस अध्ययन में हानिकारक शैवाल पनपने और पारिस्थितिक अस्थिरता का मुख्य कारण माना गया है। साथ ही, यह अधिसूचना असम सरकार को दो साल के भीतर एक ‘जोनल मास्टर प्लान’ तैयार करने का निर्देश देती है, ताकि विकास से जुड़े फैसलों में पर्यावरण की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जा सके।
प्रस्तावित उपायों में वन, कृषि भूमि और खाली जगहों को औद्योगिक या व्यावसायिक उपयोग में बदलने से बचाना, खराब हो चुके क्षेत्रों को बहाल करना, वेटलैंड को पानी पहुंचाने वाले जलग्रहण क्षेत्रों की रक्षा करना और बिना उपचारित गंदे पानी के बहाव पर रोक लगाना शामिल है। अधिसूचना में कचरा प्रबंधन, प्रदूषण नियंत्रण और पर्यटन के लिए भी सख्त नियम तय किए गए हैं। वहीं, पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाने के लिए वर्षा जल संचयन, जैविक खेती, अक्षय ऊर्जा के उपयोग और पर्यावरणीय जागरूकता जैसे सकारात्मक कार्यों को प्रोत्साहित किया गया है।
हालांकि, शहरी योजनाकार उर्मी बुरागोहेन का तर्क है कि वर्तमान प्रस्तावित सीमा प्रदूषण के असली स्रोतों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है। उन्होंने समझाया, “यह अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि सीवेज/वर्षा जल के नालों और अपशिष्ट प्रभावित क्षेत्रों के पास स्थित स्टेशनों में साइनोबैक्टीरिया की संख्या काफी ज्यादा है और वहां ऐसी प्रजातियां बढ़ रही हैं जो हानिकारक शैवाल पैदा करती हैं। इसके विपरीत, इस तरह के जल प्रवाहों से दूर स्थित जगहों पर इनकी संख्या कम है और जलीय जीवन अधिक स्थिर है। यह भौगोलिक पैटर्न संकेत देता है कि इको-सेंसिटिव जोन (ईएसजेड) के दायरे में सिर्फ मुख्य जल निकाय (झील) को ही नहीं, बल्कि प्रदूषण के उन स्रोतों और रास्तों (नालों/नदियों) को भी शामिल किया जाना चाहिए, जहां से गंदगी आती है।”
बुरागोहेन ने इस बात की ओर इशारा किया कि मौजूदा ईएसजेड की रूपरेखा उन जल-संग्रहण क्षेत्रों और वर्षा जल गलियारों को शामिल करने में विफल रही है, जो दीपोर बील में पानी पहुंचाते हैं उन्होंने कहा, “इसमें बशिष्ठ-वाहिनी/भरलु तंत्र को छोड़ दिया गया है, जो पमोही नहर और मोरा भरलु के माध्यम से सीवेज से भरे वर्षा जल को वेटलैंड में ले जाते हैं। साथ ही, इसमें बोरागांव स्थित पुराने कचरे के ढेर को भी शामिल नहीं किया गया है, जहां से निकलने वाला जहरीला रिसाव वेटलैंड के लिए लगातार खतरा बना हुआ है।”
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उन्होंने आगे कहा, “बोरागांव/पूर्वी-बोरागांव के अपशिष्ट क्षेत्रों, कचरे से रिसने वाले जहरीले पानी के तालाबों और नालों को ईएसजेड के दायरे में लाया जाना चाहिए और इसे ‘पुनर्स्थापन एवं आपदा-निवारण उप-क्षेत्र’ के रूप में नामित किया जाना चाहिए। वेटलैंड के खुले पानी और दलदली इलाकों के चारों ओर एक न्यूनतम बफर बनाने से पास की बस्तियों से आने वाले प्रदूषक तत्वों के बहाव को कम करने में मदद मिलेगी। साथ ही, खानाजान (ब्रह्मपुत्र की ओर जाने वाला निकास मार्ग) और बील में पानी के रुकने के समय को नियंत्रित करने वाले निचले जलभराव वाले क्षेत्रों पर नियंत्रण रखने से संरक्षण को और भी मजबूत मिलेगी।”
भादुड़ी ने अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा, “अगर ‘क्षेत्रीय मास्टर प्लान’ में वैज्ञानिक तथ्यों को शामिल किया जाए, तो दीपोर बील को बचाने की कोशिशें केवल कागजी नहीं रहेंगी, बल्कि असल में असरदार साबित होंगी। इससे शहर के विकास और इस महत्वपूर्ण वेटलैंड की सुरक्षा के बीच एक सही संतुलन बनाया जा सकेगा।” उन्होंने आगे कहा, “दीपर बील से मिलने वाले सबक क्षेत्रीय और वैश्विक दोनों स्तरों पर नदियों के किनारे स्थित वेटलैंड के प्रबंधन में मार्गदर्शन कर सकते हैं। यहां तक कि यह दुनिया भर की ‘रामसर साइट्स’ में पनपने वाले हानिकारक शैवाल की निगरानी के लिए एक वैश्विक ढांचा तैयार करने में भी योगदान दे सकता है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 29 सितंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर इमेज: दीपोर बील गुवाहाटी का प्रमुख वर्षा जल संग्रहण बेसिन है और अनियंत्रित शहरी जल अपवाह के कारण दबाव का सामना कर रहा है। तस्वीर- आर्नी, फ्लिकर (CC BY 2.0)।