- भारतीय रेलवे ने कर्नाटका के होसपेटे से गोवा के वास्को डी गामा पोर्ट तक मौजूदा सिंगल रेलवे लाइन को डबल करने की योजना बनाई है। इससे कोयला ट्रांसपोर्ट का काम आसान हो जाएगा।
- आगामी लाइन का एक हिस्सा कर्नाटका के काली टाइगर रिजर्व, और गोवा में भगवान महावीर वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी और मोल्लेम नेशनल पार्क से होकर गुजरेगा।
- संरक्षण कार्यकर्ता रेलवे लाइन के इस विस्तार को रोकने, जंगली जानवरों के इस कॉरिडोर को सुरक्षित बनाए रखने, और गोवा के इन क्षेत्रों को टाइगर रिजर्व घोषित करने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।
केंद्र सरकार कोयले के परिवहन के लिए गोवा और कर्नाटका के बीच मौजूदा रेलवे लाइन को डबल करने की योजना पर तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन पश्चिमी घाट के दो वन्यजीव अभयारण्य से होकर गुजरने वाले 26 किलोमीटर लंबे हिस्से को लेकर संरक्षणवादी इस योजना का विरोध कर रहे हैं। इन अभयारण्य में बाघ पाए जाते हैं।
पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट में रेलवे ट्रैक कॉरिडोर के आस-पास बाघ, तेंदुए और अन्य जानवरों की मौजूदगी की बात से इस मुद्दे का और बल मिला है। यह आकलन भारतीय रेलवे की ओर से काम करने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) द्वारा अधिकृत भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) ने किया है।
आकलन में कहा गया, “पांच जगहों पर शावकों के साथ वयस्क बाघ भी कैमरे में कैद हुए हैं। कई जगहों पर सामान्य तेंदुए देखे गए। कई जगहों पर शावकों के साथ स्लोथ भालू (रीछ) भी नजर आए हैं।” इसके अलावा गौर, सांभर, माउस डीयर, नॉर्दर्न रेड मुंतजैक या बार्किंग डीयर और जंगली सूअर जैसे जंगली शाकाहारी जानवरों की भी “काफी संख्या में तस्वीरें” ली गई हैं।
वर्तमान सिंगल रेलवे लाइन कर्नाटका के होसपेटे से लेकर गोवा के वास्को डी गामा तक 345 किलोमीटर लंबी है।
प्रस्तावित डबल लाइन को इन दो क्षेत्रों के बीच कोयला ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर खोलने के लिए बनाया जा रहा है। इस लाइन का लगभग 26 किलोमीटर का हिस्सा कर्नाटका की सीमा पर कैसल रॉक से गोवा की सीमा पर स्थित कुलेम तक जाएगा। इसके अलावा, कर्नाटका के दांडेली वन्यजीव अभ्यारण्य (जो अंशी वन्यजीव अभ्यारण्य के साथ काली बाघ अभयारण्य का हिस्सा है) में लगभग 10 हेक्टेयर और गोवा के भगवान महावीर वन्यजीव अभयारण्य और मोलेम नेशनल पार्क में 120 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि को इस अतिरिक्त ट्रैक के लिए उपयोग में लाने का प्रस्ताव है।
मौजूदा सिंगल लाइन का निर्माण पहली बार 1890 में ब्रिटिश और पुर्तगालियों ने मिलकर किया था। इसके बाद, कर्नाटका और गोवा में रेल सेवाएं संचालित करने वाले ‘दक्षिण पश्चिम रेलवे’ ने 2011-12 में ट्रैक को डबल करने का प्रस्ताव रखा। रेलवे ने कहा, “सिंगल लाइन की क्षमता बढ़ाने के लिए ट्रैक को डबल करने की जरूरत है।” दूसरे ट्रैक को उसी कॉरिडोर में मौजूदा लाइन के समानांतर बिछाने का प्रस्ताव था। दक्षिण पश्चिम रेलवे के अनुसार, कर्नाटका के होसपेटे/बेल्लारी जैसे औद्योगिक क्षेत्रों को वास्को पोर्ट से जोड़ने वाली यह एकमात्र लाइन होगी।

प्रजातियों की बहुतायत
डबल ट्रैक के प्रस्ताव को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से वन मंजूरी मिल चुकी है। हालांकि, राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड से 2019 में प्राप्त की गई मंजूरी को सर्वोच्च न्यायालय ने 2022 में रद्द कर दिया था। इसके बाद परियोजना को लागू करने वाली एजेंसी आरवीएनएल ने डब्ल्यूआईआई से पर्यावरण पर पड़ने वाले कुल प्रभाव का आकलन करवाया। इस आकलन में वन्यजीवों का निरीक्षण और उन पर पड़ने वाले प्रभाव के साथ-साथ नुकसान को कम करने के उपाय भी शामिल थे।
सबसे घने वन क्षेत्रों में से एक होने के कारण, यह हैरानी की बात नहीं है कि डब्ल्यूआईआई द्वारा किए गए जमीनी सर्वे ने अनजाने में ही आमचे मोलेम (मेरा मोलेम) अभियान से जुड़े वन्यजीव प्रेमियों की चिंताओं को और बढ़ा दिया। और साथ ही युवा पर्यावरण वैज्ञानिकों, कलाकारों और संरक्षणवादियों को डबल लाइन का विरोध करने वाली एक ताकत के रूप में भी एकजुट किया है।
डब्ल्यूआईआई के निष्कर्षों ने रेलवे ट्रैक के किनारे सरीसृपों और उभयचरों की प्रजातियों की प्रचुरता और विविधता को उल्लेख किया और बताया कि ट्रैक जैसी बाधाओं के कारण उनका विस्थापन हो रहा है और उन पर खतरा मंडरा रहा है। अध्ययन में मौजूदा ट्रैक कॉरिडोर में पक्षियों की 135 प्रजातियों के अलावा 34 सरीसृप और 27 उभयचर प्रजातियों को भी दर्ज किया गया है, जिनमें से कुछ आईयूसीएन रेड लिस्ट के अनुसार संकटग्रस्त हैं। डब्ल्यूआईआई के अध्ययन में अब तक अज्ञात रही कई वनस्पतियों की प्रजातियां भी सूचीबद्ध की गई हैं।
रिपोर्ट कहती है, “92% उभयचर और 62% सरीसृप प्रजातियां” पश्चिमी घाट के लिए स्थानिक हैं। क्योंकि वे अपने खास आवासों में रहती हैं, इसलिए उन्हें आवास के खंडित होने, विकास परियोजनाओं और जलवायु परिवर्तन के कारण खतरा है।”
इस रिपोर्ट में विशेष रूप से बताया गया है कि रेलवे ट्रैक के इस हिस्से में 23 जंगली स्तनधारी प्रजातियों की एक बड़ी संख्या मौजूद है। इनमें इंडियन क्रेस्टेड पोरक्यूपाइन’ (साही), छोटे और सामान्य ‘सिवेट’ और धारीदार गर्दन वाले नेवले जैसे छोटे जानवर शामिल हैं। साथ ही, गौर और सांभर जैसे बड़े जानवर भी बड़ी संख्या में (कैमरा ट्रैप में) देखे गए। इसके अलावा, यहां पांच बड़े और मध्यम आकार के मांसाहारी जीव भी पाए गए, जिनमें बाघ, तेंदुआ, स्लोथ भालू, ढोल और सुनहरे सियार शामिल हैं।
अध्ययन में माना गया कि जंगल में ट्रेन के शोर, कंपन और रोशनी से ज्यादा नुकसान नहीं हो रहा है, लेकिन अक्टूबर 2022 से मार्च 2024 के बीच ‘तिनईघाट’ से ‘कुलेम’ तक ट्रेन और वन्यजीवों की टक्कर से ‘341 मौतें’ दर्ज की गईं। इन मरने वाले जीवों में 76% उभयचर (जैसे मेंढक), 16% सरीसृप (सांप-छिपकली), 7.8% स्तनधारी और 0.2% पक्षी थे।
इसके बावजूद, आरवीएनएल की शर्तों का पालन करते हुए डब्ल्यूआईआई ने अपनी रिपोर्ट में 323 मिटिगेशन स्ट्रक्चर (ओवरपास, अंडरपास, लेवल क्रॉसिंग, पुलिया और सुरंगों) बनाने का सुझाव दिया, ताकि इन क्षेत्रों में जीवों की आवाजाही आसान हो सके और प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखा जा सके।
इनमें से,195 संरचनाएं मौजूदा ट्रैक पर और 128 सरंचनाएं तिनाइघाट से कुलेम तक के नए रेलवे ट्रैक पर प्रस्तावित हैं। रिपोर्ट में जानवरों को दुर्घटनाओं से बचाने के लिए पूरे ट्रैक के किनारे बाड़ लगाने और मालगाड़ियों की गति 30 किमी/घंटा और यात्री ट्रेनों की गति 40 किमी/घंटा रखने का भी सुझाव दिया गया। हालांकि, वन्यजीव संरक्षणवादियों ने इस बात पर चिंता जताई है कि उन घने जंगलों के लिए बचाव के उपायों पर विचार किया जा रहा है, जिन्हें वास्तव में बिना किसी छेड़छाड़ के अछूता छोड़ दिया जाना चाहिए था।
इस क्षेत्र के महत्व को देखते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने 2022 में केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) के सुझाव से सहमति जताते हुए कहा था कि आरवीएनएल को एक “व्यवहार्य विकल्प” अपनाना चाहिए और होसपेटे/बेल्लारी औद्योगिक जिलों को जोड़ने के लिए भारत के पूर्वी तट पर आंध्र प्रदेश के कृष्णापटनम बंदरगाह से कर्नाटका के तोरानागल्लू जंक्शन तक जाने वाली तीसरी लाइन का इस्तेमाल करना चाहिए। न्यायालय ने सीईसी की 2021 की रिपोर्ट से सहमति जताते हुए कहा था कि इस प्रोजेक्ट का कोई औचित्य नहीं है, क्योंकिः घाट वाला यह हिस्सा 1:37 की खड़ी चढ़ाई के कारण अकुशल है; यहां चढ़ाई करने के लिए ट्रेन में आगे तीन और पीछे दो इंजनों की जरूरत पड़ती है; 92% यातायात एक तरफा है, जिसमें मुख्य रूप से गोवा बंदरगाह से कर्नाटका तक आयातित कोयला ले जाया जाता है; वापसी में 80% ट्रेनें (रैक) खाली लौटती हैं; कोयले और ट्रैफिक के जो अनुमान दिखाए गए हैं, वे जंगल को होने वाले नुकसान को सही ठहराने के लिए काफी नहीं हैं; कोंकण रेलवे और राजमार्ग जैसे विकल्प पहले से ही मौजूद हैं।
आरवीएनएल ने अदालत के सामने तर्क दिया है कि “कर्नाटका के औद्योगिक क्षेत्रों से गोवा बंदरगाह के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाना दक्षिण भारत के आर्थिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है; 1890 के बाद से इस पटरी पर एक भी बाघ की मौत की सूचना नहीं मिली है; वे ट्रैक पर जानवरों के लिए पर्याप्त क्रॉसिंग बनाएंगे; रेल मंत्रालय ने पहले ही अन्य सभी विकल्पों की जांच कर ली है; और वे पर्यावरण को होने वाले नुकसान को सीमित रखेंगे और उसकी भरपाई के लिए वृक्षारोपण किया जाएगा।”
साल 2025 में मंत्रालय के सामने दिए गए नए आवेदनों में आरवीएनएल/एसडब्ल्यूआर ने एक बार फिर इस परियोजना के आर्थिक पहलू पर जोर दिया। आरवीएनएल के मुख्य परियोजना प्रबंधक रमेश कांबली ने हलफनामे में दावा किया कि “इस परियोजना में नुकसान के मुकाबले फायदे का अनुपात लगभग 436 गुना है।”

तीन राज्यों का टाइगर कॉरिडोर
इस प्रस्तावित लाइन ने एक ‘टाइगर कॉरिडोर’ और ‘कोयला कॉरिडोर’ के बीच बहस छेड़ दी है। संरक्षित जंगलों में डबल ट्रैकिंग को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में यही मुद्दा सबसे अहम रहने की संभावना है।
‘अमचे मोलेम’ की मुख्य सदस्य और वन्यजीव वैज्ञानिक मलाइका चावला ने मोंगाबे इंडिया को बताया, “पूरा क्षेत्र मूल रूप से महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटका को जोड़ने वाला एक ट्राई-जंक्शन टाइगर कॉरिडोर है। यहां तक कि पिछली केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी 2021) की रिपोर्ट, जिसने डबल रेलवे लाइन की जांच की थी, ने भी इस तथ्य के आधार पर राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की मंजूरी को रद्द करने की सिफारिश की थी कि यह एक कनेक्टेड टाइगर कॉरिडोर है।” इस सीईसी को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने नियुक्ति किया था।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने भी महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटका के संरक्षित क्षेत्रों से होकर गुजरने वाले कॉरिडोर को सूचीबद्ध किया है।
डबल लाइन को लेकर पहले ही कर्नाटका में काली टाइगर रिजर्व के उप वन संरक्षक और निदेशक की ओर से आपत्ति दर्ज कराई जा चुकी हैं। पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वेबसाइट पर अपलोड मिनट के अनुसार, जब अगस्त 2025 में कर्नाटका राज्य वन्यजीव बोर्ड के सामने वन्यजीव मंजूरी का मामला आया था, तब उन्होंने प्रोजेक्ट की सिफारिश नहीं की थी।
मिनट्स में कहा गया है कि काली टाइगर रिजर्व में 5,413 पेड़ काटे जाने का प्रस्ताव है। यह क्षेत्र पहले से ही भूस्खलन की चपेट में है और यहां की मौजूदा रेलवे लाइन वन्यजीवों की मौत का कारण बन रही है।
बैठक में परियोजना की निगरानी और डब्ल्यूआईआई द्वारा सुझाए गए शमन उपायों की जांच के लिए एक तकनीकी समिति गठित करने का आधिकारिक निर्णय लिया गया।
इस परियोजना के प्रभाव का विश्लेषण करने वाली दो अन्य रिपोर्ट (भारतीय विज्ञान संस्थान का 2017-18 का अध्ययन और सर्वोच्च न्यायालय की 2021 की सीईसी रिपोर्ट) में भी इस क्षेत्र की संवेदनशीलता पर चिंता जताई गई है।
दुनिया के आठवें हॉटस्पॉट के रूप में सूचीबद्ध, पश्चिमी घाट की यह पर्वत श्रृंखला भारत के दक्षिण पश्चिम हिस्सों में गुजरात से केरल तक छह राज्यों से होकर 1600 किमी तक फैली हुई है। यहां तीन प्रकार के वन (घने सदाबहार, अर्ध-सदाबहार और नम पर्णपाती) पाए जाते है और यह एक माना हुआ पारिस्थितिक और जैविक रूप से संवेदनशील हॉटस्पॉट है।

इस बात का सबूत, इसके किनारे स्थित 12 टाइगर रिजर्व, 20 नेशनल पार्क और 68 वन्यजीव अभयारण्य हैं, जो इसे “देश का सबसे बड़ा और एक दूसरे से जुड़ा हुआ संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क” बनाते हैं। यहां एशियाई हाथियों की 30%, भारत के जंगली बाघों की 33% और तेंदुओं की लगभग 26% आबादी रहती है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान के संचयी पर्यावरण प्रभाव आकलन में कहा गया है, “पश्चिमी घाट में बाघों की आबादी अन्य इलाकों की तुलना में एक-दूसरे से अधिक जुड़ी हुई है। लेकिन बागानों, कृषि और बुनियादी ढांचे के विकास जैसी कई मानवीय गतिविधियों से यह कनेक्टिविटी खतरे में है। इसलिए, बाघों और संबंधित प्रजातियों के लंबे समय तक संरक्षण के लिए इस भू-दृश्य की निरंतरता को बनाए रखना बेहद जरूरी है।”
बाघ संरक्षण प्राधिकरण की आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट के 2022 के आदेश के अनुसार, एनटीसीए ने कर्नाटका के काली बाघ अभयारण्य में पटरियों को डबल करने को नुकसानदायक बताते हुए परियोजना पर पहले ही सवाल उठा दिए थे। उस समय एनटीसीए ने इस बात की जांच नहीं की थी कि गोवा की तरफ इसका असर क्या होगा। गोवा के संरक्षित वनों को बड़ी बिल्लियों का जाना माना रास्ता (कॉरिडोर) माना जाता है, लेकिन गोवा में कोई भी टाइगर रिजर्व नहीं है।
विकास गतिविधियों के कारण वनों में अतिक्रमण होने के बावजूद, हाथी और बाघ दोनों ही राज्य में नियमित रूप से दिखाई देते हैं। सितंबर में, महाराष्ट्र के डोडारमार्ग पहाड़ी श्रृंखला में स्थित तिलारी कंजर्वेशन रिजर्व से भटककर आए एक जंगली हाथी ने उत्तरी गोवा के मोपा हवाई अड्डे से कुछ किलोमीटर दूर खेतों में नुकसान किया था।
बाघों की स्थिति पर 2022 की रिपोर्ट में बाघों की आबादी में गिरावट दर्ज की गई है। साल 2018 में बाघों की अनुमानित संख्या 981 थी, जो घटकर 824 रह गई है। यह गिरावट पूरे पश्चिमी घाट क्षेत्र में लगे कैमरा में ट्रैप हुई हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, “अंशी-डांडेली क्षेत्र (पूर्वी भाग) में बाघों की संख्या में वृद्धि हुई है, लेकिन गोवा और कर्नाटका के सीमावर्ती क्षेत्रों (मोलेम-म्हादेई-अंशी डांडेली परिसर) में इनकी संख्या में गिरावट आई है।”

टाइगर रिजर्व के लिए लड़ाई
इस बीच, रेलवे और संरक्षणवादियों के बीच चल रहे इस संघर्ष में, एक पूरी तरह से अलग लेकिन सुप्रीम कोर्ट में चल रहा कानूनी मामला गोवा के मोलेम में डबल-ट्रैकिंग की लड़ाई को लेकर लोगों की राय और बाघ संरक्षण प्राधिकरण के प्रभाव को भी प्रभावित कर सकता है।
यह मामला पर्यावरणविदों और गोवा सरकार के बीच गोवा के पांच वन्यजीव अभयारण्यों (745 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र) को टाइगर रिजर्व अधिसूचित करने की संभावना को लेकर है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एक केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने गोवा का दौरा किया और नवंबर 2025 अपनी रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की। समिति में अपनी रिपोर्ट में एक चरणबद्ध तरीके से गोवा में टाइगर रिज़र्व बनाने का सुझाव दिया।
टाइगर रिजर्व बनाने का एक अभियान तब जोर पकड़ गया जब 2020 में गोवा के एक जंगल में कथित तौर पर एक मादा बाघ और उसके तीन शावक कथित तौर पर जहर खाने की वजह से मारे पाए गए। इस घटना ने पूरे देश में हंगामा मचा दिया और बॉम्बे उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की गई।
साल 2023 में, उच्च न्यायालय ने गोवा सरकार को राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की टाइगर रिजर्व संबंधी सिफारिशों पर कार्रवाई करने का निर्देश दिया। इस फैसले को गोवा सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है।
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राज्य सरकार टाइगर रिजर्व बनाने के विचार का विरोध कर रही है। उसने अदालत को सूचित किया कि टाइगर रिजर्व बनने से 1,00,000 से ज्यादा लोग विस्थापित हो जाएंगे और वन अधिकारों से संबंधित 10,000 नए दावे सामने आएंगे। अगर राज्य का 20% क्षेत्र टाइगर रिजर्व के अंतर्गत आया, तो 3,700 वर्ग किमी जैसे छोटे राज्य में पुनर्वास असंभव हो जाएगा।
हालांकि इस मामले में याचिका दायर करने वाले एनजीओ ‘गोवा फाउंडेशन’ ने सीईसी को बताया कि गोवा सरकार विस्थापन के आंकड़े बढ़ा-चढ़ा कर बता रही है और प्रस्तावित टाइगर रिजर्व क्षेत्र पहले से ही अधिसूचित वन्यजीव अभयारण्य हैं, जहां राज्य के अधिकारी खुद से पुनर्वास प्रक्रिया में ढिलाई बरत रहे हैं।
चावला कहते हैं, “दरअसल, रेलवे की इस डबल ट्रैक परियोजना को वास्को से लेकर होसपेटे तक, पूरी तरह से एक साथ देखे जाने की जरूरत है। अभी जमीनी स्तर पर कई तरह से विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। गोवा में कोयले से होने वाला प्रदूषण 2016 से ही विरोध का एक प्रमुख मुद्दा रहा है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 17 अक्टूबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: पश्चिमी घाट में एक बाघ। भारतीय वन्यजीव संस्थान के एक अध्ययन में ट्रैक कॉरिडोर पर बाघों सहित पांच बड़े से मध्यम आकार के मांसाहारी जीवों को दर्ज किया गया है। तस्वीर- कल्याण वर्मा, विकिमीडिया कॉमन्स, (CC BY-SA 4.0)