- भारतीय भेड़िए खुले मैदानों और इंसानी बस्तियों के आसपास रहने के आदी हैं। बहराइच की घटनाओं से पता चलता है कि ये भेड़िए इंसानी दिनचर्या को समझकर बच्चों को ‘आसान शिकार’ के रूप में पहचानने लगे हैं।
- शोध के अनुसार, यह केवल भूख या रेबीज़ का मामला नहीं है, बल्कि भेड़ियों में ‘सामाजिक प्रसारण’ के ज़रिए एक झुंड से दूसरे में फैला हुआ रणनीतिक शिकारी व्यवहार है।
- केवल जंगल बचाना या भेड़ियों को पकड़ना काफी नहीं है। भेड़िए कृषि क्षेत्रों को ही अपना प्राकृतिक आवास मानते हैं, इसलिए उनके संरक्षण के लिए एक नए मानवीय और व्यवहारिक दृष्टिकोण की जरूरत है।
- इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखकों के निजी हैं।
साल 2024 में मार्च से अक्टूबर के महीनों के दौरान, उत्तर प्रदेश के बहराइच ज़िले के कई गाँवों से जंगली जानवर के बच्चों पर हमले की ख़बरें सामने आईं। ये बच्चे अपने घरों के आँगनों और खेतों से एक अनजाने जंगली जानवर द्वारा उठाए जा रहे थे। हालाँकि, इन घटनाओं के लिए एक ऐसे जीव को ज़िम्मेदार ठहराया गया जिसे लोगों ने अब तक कम ही देखा या जाना था, भारतीय भेड़िया।
कई महीनों तक इन इलाकों में डर और उलझन फैली रही। जहाँ वन विभाग के अधिकारी जवाब खोज रहे थे, वहीं विशेषज्ञ अलग-अलग संभावनाओं पर विमर्श कर रहे थे। हालाँकि, स्पष्ट कारण किसी को नहीं पता थे और सिर्फ आशंकाएं जताई जा रही थीं। आखिरकार इस घटनाओं को छह भेड़ियों के एक विशिष्ट झुंड से जोड़ा गया। इन में से पाँच को वन विभाग द्वारा ड्रोन, थर्मल कैमरों और पिंजरों की सहायता से पकड़ा गया। पकड़ने के दौरान तनाव से एक भेड़िए की मौत भी हो गई। पकड़ने के बाद इन्हें गोरखपुर तथा लखनऊ के चिड़ियाघरों में भेजा गया। छठे और अंतिम भेड़िये को अक्टूबर में ग्रामीणों ने बकरी पर हमला करने के प्रयास के बाद पीट-पीटकर मार डाला। इन हमलों का अंत राज्य सरकार, वन विभाग और स्थानीय ग्रामीणों के साझा प्रयासों द्वारा हुआ, जिसे ‘ऑपरेशन भेड़िया’ अभियान का नाम दिया गया।
करीब एक साल बाद (सितंबर 2025 से), ये घटनाएँ दोबारा हो रही हैं किन्तु इस बार वन विभाग द्वारा भेड़ियों की हत्या जैसे कड़े कदम भी शामिल हैं। फिर भी इन हमलों के कारण से जुड़े प्रश्नों का जवाब अभी तक नहीं मिल पाया है।
इन घटनाओं और उनके पीछे के कारणों को समझने के लिए, प्रथम लेखक (देवव्रत सिंह) ने वरिष्ठ पशु चिकित्सक उत्कर्ष शुक्ला के साथ मिलकर, वर्ष 2024 के सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र बहराइच जनपद के महसी तहसील में ज़मीनी तफ़्तीश और शोध किया। यह शोध (अब तक अप्रकाशित) भेड़ियों के बारे में लंबे समय से चली आ रही धारणाओं को चुनौती देता है। शोध के परिणाम इस बात पर ज़ोर देते हैं कि भेड़िया-मानव संघर्ष की समस्या का विश्लेषण मुख्यतः भेड़ियों की बुद्धिमत्ता और मनुष्यों के प्रति उनके व्यवहार के आधार पर किया जाना चाहिए।
इस लेख में हम सुर्खियों में दिए गए परामर्शों एवं सामान्य वैज्ञानिक व्याख्याओं से आगे बढ़कर, इस त्रासदी के पीछे के व्यवहारिक पहलुओं को समझने की कोशिश करेंगे।
मानव परिदृश्यों से ढला है भारतीय भेड़िया
भारतीय भेड़िया (Canis lupus pallipes), जिसे हाल ही में अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने ‘संकटग्रस्त (Vulnerable)’ श्रेणी में रखा है, बाघ और तेंदुए की तरह घने जंगलों का नहीं बल्कि खुले, मैदानी और झाड़ीदार परिवेश का निवासी है। भारत में भेड़िए सदियों से खेतों, चारागाहों और गाँवों के आसपास मानव-प्रधान परिदृश्यों में भी रहते हैं।
कई मायनों में इस प्रजाति का विकास, इंसानों की संगत से ही आकार लेता है। इनकी सबसे बड़ी विशेषता इनकी अनुकूलन क्षमता है। वे इंसानी गतिविधियों, दिनचर्या और व्यवहार को ध्यानपूर्वक समझ सकते हैं। संरक्षण के दृष्टिकोण से यह एक जटिल चुनौती प्रस्तुत करता है।
बहराइच में यही अनुकूलन क्षमता घातक साबित हुई। वहाँ के भेड़िए लंबे समय तक मनुष्यों के साथ शांतिपूर्ण ढंग से रहते आए रहे थे। वे कभी-कभार मवेशियों या मृत पशुओं को ज़रूर आहार बनाते, लेकिन सामान्यतः अनदेखा ही किए जाते रहे। लम्बे समय से चली आ रही मानव-उपस्थिति के प्रति इस अनुकूलन ने आगे चलकर गंभीर संघर्ष की भूमिका तैयार की।

मानव को ‘शिकार’ के रूप में देखना और सीखना
बहराइच हमलों में एक सामान्य किन्तु भयावह पैटर्न दिखा। आधिकारिक अभिलेखों के अनुसार, जिनकी पुष्टि बाद में अध्ययन के दौरान भी की गई, 2024 की घटनाओं में अधिकांश पीड़ित दो से 10 वर्ष के बच्चे थे, जो अक्सर अकेले खेल रहे होते या खुले में आराम कर रहे होते थे। अधिकतर हमले संध्याकाल से भोर के बीच एवं वयस्कों की अनुपस्थिति में हुए, हालांकि कुछ घटनाएँ दिन के समय और बड़ों की मौजूदगी में भी घटित हुईं। गौरतलब है कि यही पैटर्न 2025 की घटनाओं में भी लगभग दोहराया जाता दिखा।
शोध के दौरान ग्रामीणों ने बताया कि 2024 में भेड़िए बस्तियों के पास बिना किसी डर के घूमते दिखाई देने लगे थे। फील्ड जाँच में कई ऐसे मामलों की पुष्टि हुई जहाँ भेड़िए कच्चे घरों में घुसकर सो रहे बच्चों को उठा ले गए। चार मामलों में घर के भीतर ही पंजों और नाखूनों के निशान पाए गए, विशेष रूप से उसी स्थान पर जहाँ हमला हुआ था। यह संकेत देता है कि यह व्यवहार न तो तेज भूख से प्रेरित था और न ही बीमारी से, बल्कि भेड़ियों का मानव परिवेश से परिचित होने (habituation) और उसे सीखने-समझने का परिणाम था, जहाँ वे बच्चों को आसान और सुलभ शिकार के रूप में देखने लगे थे।

ऐसी घटनाएँ भारत, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में, पहले भी सामने आ चुकी हैं। साल 1996 में प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और जौनपुर ज़िलों में लगभग 42 बच्चों की मृत्यु हुई थी। इन घटनाओं में भी निरंतर कम उम्र के बच्चों को निशाना बनाया गया। साल 1997 के एक शोध में यह संभावना जताई गई कि इन हमलों के लिए एक ही भेड़िया जिम्मेदार था, जो लगभग हर चौथे या पाँचवें दिन एक बच्चे को मारता था। हालाँकि उस अध्ययन के निष्कर्ष पूर्णतः निर्णायक नहीं थे, फिर भी उसने यह स्पष्ट किया कि सीखा हुआ नरभक्षी व्यवहार (learned man-eating behaviour) किस तरह भेड़ियों में लंबे समय तक बना रह सकता है। यह बताता है कि ऐसी घटनाओं के असली कारणों को समझने के लिए लंबे समय तक और कई पहलुओं से अध्ययन करना ज़रूरी है, जिसमें सभी मामलों से जुड़े दस्तावेज़ और सबूत पूरी तरह उपलब्ध हों।
सामान्य स्पष्टीकरणों से आगे
जब 2024 में बहराइच में भेड़ियों के हमलों की खबरें सामने आईं, तो इनके पीछे विभिन्न कारण गिनाए गए। कभी इन्हें रेबीज़ से जोड़ा गया, तो कभी भेड़िये और कुत्ते के समागम से पैदा हुए ‘हाइब्रिड’ जानवरों के असामान्य व्यवहार से। हालांकि, न तो आनुवंशिक विश्लेषण पूरे किए गए और न ही विस्तृत पशु-चिकित्सकीय परीक्षण। इसके विपरीत, इस अध्ययन से हमलों का जो स्वरूप सामने आया, वह किसी रेबीज़-ग्रस्त या हाइब्रिड जानवरों के व्यवहार से मेल नहीं खाता। पीड़ितों का चुनाव तथा हमलों का समय और तरीका यह संकेत देते हैं कि ये विचारपूर्वक किए गए हमले थे और शिकार के चयन को लेकर ये भेड़िए रणनीतिक निर्णय ले रहे थे |
रेबीज़ से ग्रस्त या संकर (wolf-dog hybrid) जानवर आमतौर पर बेखौफ और अनियमित रूप से आक्रामक व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। इसके विपरीत, बहराइच के हमलों में जानवर ने वयस्क मनुष्यों से डर और उनसे बचाव की एक गणनात्मक समझ दिखाई। वे प्रायः अंधेरे और शांत समय का चयन करते, चुपचाप घरों या आंगनों में प्रवेश करते, चारपाइयों और घरेलू सामानों के बीच से चुपचाप झुकते-बचते हुए आगे बढ़ते, और इस तरह से वार करते कि पीड़ित की आवाज़ न निकले। शवों को आंशिक रूप से खाया जाना और हमलों का सीमित, नियंत्रित स्वरूप भी सामान्य भेड़ियों के विशिष्ट शिकारी व्यवहार की ओर इशारा करता है, न कि रेबीज़ या हाइब्रिड जानवरों की अराजक आक्रामकता की ओर।

कुछ विशेषज्ञों ने घाघरा नदी की बाढ़, प्राकृतिक आवास का नष्ट होना, प्राकृतिक शिकार की कमी या जलवायु परिवर्तन जैसे पारिस्थितिक कारणों को भी ज़िम्मेदार ठहराया। लेकिन घाघरा में हर साल बाढ़ आती है, फिर भी इस तरह की घटनाएँ विशेष रूप से 2024 और पुनः 2025 में ही दर्ज की गईं। हमले महसी तहसील में हो रहे थे, जो कि घाघरा के तट पर स्थित है। बाढ़ के प्रभाव से भेड़ियों को इस क्षेत्र से दूर जाना चाहिए था, न कि उसके भीतर। इसके अलावा, भारतीय भेड़िया एक ‘सिनैंथ्रोपिक’ (synanthropic), यानी की मनुष्यों के साथ विकसित हुई और मनुष्य-संबंधी संसाधनों पर फलने-फूलने वाली प्रजाति है, जो लंबे समय से कृषि और मानव-प्रधान परिदृश्यों में रहकर अनुकूलित हुई है। खेत-खलिहान और चरागाहों का भेड़िये का आम आवास होने के कारण “कुदरती आवास की कमी” की टिप्पणी अधूरी प्रतीत होती है।
सदियों से मनुष्यों के समीप रहने और उनकी तीव्र बुद्धि, देखकर समझने और सीखने की क्षमता, और उनकी सामाजिक संरचना के कारण, वे मानव व्यवहार को समझते हैं। अन्य बड़े मांसाहारियों के विपरीत, भेड़ियों में नरभक्षी व्यवहार केवल चोट या भूख के कारण नहीं, बल्कि सीख और सामाजिक प्रसारण (social transmission) के माध्यम से भी विकसित हो सकता है। जब एक या दो भेड़िये किसी “आसान” शिकार स्रोत को पहचान लेते हैं (भले ही वो आमतौर पर अप्राकृतिक हो), तो यह व्यवहार सामाजिक प्रसारण से पूरे झुंड में फैल सकता है।
पिछले साल 2025 में हमलों का दुबारा होना (इस बार कैसरगंज तहसील में) इस धारणा को और मजबूती देता है। 2024 में घटनाएँ केवल तथाकथित ज़िम्मेदार भेड़ियों को हटाए जाने से नहीं रुकी थीं, बल्कि इसलिए भी कि ग्रामीण निवासी अत्यधिक सतर्क हो गए थे। वे बच्चों को घरों के भीतर रखते, आस-पास रोशनी करते और निगरानी रखते। समय के साथ जब यह सतर्कता कम हुई और नए किशोर अवस्था के भेड़ियों तथा नवगठित झुंडों ने क्षेत्र में प्रवेश किया, तो यह सीखा हुआ नरभक्षी व्यवहार संभवतः फिर उभर आया।
भेड़िया संरक्षण में अपूर्ण कड़ी
इन बातों से यह समझ आता है कि यदि नरभक्षी व्यवहार अन्य भेड़ियों में भी फैल चुका हो, तो केवल कुछ भेड़ियों को हटाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। हमें यह समझना होगा कि भेड़िये मनुष्यों के प्रति अभ्यस्त (habituated) कैसे होते हैं। इसलिए प्रबंधन नीतियों का उद्देश्य केवल भेड़ियों की संख्या नियंत्रित करना नहीं, बल्कि उनमें मानव के प्रति प्राकृतिक भय बनाए रखने और स्थानीय समुदाय को इस पेचीदा जीव के प्रति जागरूक करने पर होना चाहिए।
साथ ही, केवल वन्यजीव गलियारों (wildlife corridors) के संरक्षण या पुनर्स्थापन, आवास संरक्षण, शिकार प्रजातियों की वृद्धि या घासभूमि का पुनरुद्धार (grassland restoration) जैसी रणनीतियाँ, भारतीय भेड़िए जैसी अत्यधिक अनुकूलनशील और इंसानी परिवेश में रहने वाली प्रजाति के संरक्षण के लिए अपर्याप्त हैं। भेड़िए के लिए कृषि और ग्रामीण परिदृश्य अंजान नहीं, बल्कि उसका सामान्य परिवेश हैं, ठीक उसी तरह जैसे बाघों और तेंदुओं के लिए घने जंगल। ऐसी प्रजाति के संदर्भ में “प्राकृतिक” या “अर्ध-प्राकृतिक” आवास की अवधारणा शुद्ध रूप से लागू नहीं होती। इसलिए, केवल आवास संरक्षण या पुनर्स्थापन को ही संरक्षण का केंद्र मानना अधूरा साबित होगा।
हमारा तर्क यह है कि सामान्य पारिस्थितिक और व्यवहारिक शोध-कामों का विस्तार आवश्यक है। भारत में भेड़ियों पर किए गए अधिकांश शोध उनके आवास, शिकार और संख्या जैसे पारिस्थितिक पहलुओं तक सीमित रहे हैं। केवल भेड़िया अपने आवास को किस तरह उपयोग करता है, या उसकी संख्या कितनी है के बजाय, हमें भेड़िए की सबसे अहम विशेषताओं – उसकी बुद्धिमत्ता, व्यवहार, सीखने की क्षमता, अनुकूलनशीलता, निर्णय-प्रक्रिया और व्यक्तित्व को समझने पर भी ज़ोर देना होगा। यही समझ भारतीय भेड़िए के साथ वास्तविक और टिकाऊ सह-अस्तित्व (coexistence) की नींव रख सकती है।
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संरक्षण-सम्बंधित विमर्शों में ऐसे दृष्टिकोणों को अक्सर सीमित ध्यान ही मिल पाता है। वन्यजीवों की रक्षा का तर्क जहाँ वास्तविक जैवविविधता संरक्षण चिंताओं से उपजता है, वहीं यह कई बार मानव-घाती हमलों की जटिल प्रकृति और प्रभावित समुदायों के वास्तविक अनुभवों को समझने में असफल भी रह जाता है।
भेड़ियों के साथ रहने वाले लोगों का दृष्टिकोण समझना
शोध के दौरान पीड़ितों के परिवारों, चरवाहों और बुज़ुर्गों ने अपने अनुभवों का विवरण दिया। प्रभावित नकवा गाँव के प्रधान शोभाराम जायसवाल ने बताया, “भेड़िए हमेशा से यहाँ रहे हैं, लेकिन उन्होंने कभी बच्चों पर हमला नहीं किया। वे कभी-कभार पशु ले जाते थे, पर ऐसी घटनाएँ पहले नहीं हुईं।”
‘भेड़िए’ नाम के जीव को मीडिया और प्रशासन ने मानव-भक्षी के रूप में पहली बार स्थानीय समुदाय के सामने प्रस्तुत किया था। शोध में सामने आया कि आसपास रहने वाले लोग ‘भेड़हा’ (स्थानीय नाम) और ‘भेड़िया’ (औपचारिक हिंदी शब्द) के बीच स्पष्ट अंतर करते है, जबकि यह एक ही जीव के दो अलग नाम हैं। उनके लिए ‘भेड़हा’ एक जाना-पहचाना, डरपोक जानवर था, जो कभी-कभार पालतू मवेशियों पर हमला करता था, लेकिन मनुष्यों से दूरी बनाए रखता था। इसके विपरीत, बच्चों पर हमला करने वाले ‘भेड़िया’ को लोग एक अलग और नई प्रजाति मानने लगे, जिससे उन्हें डरने की आवश्यकता थी। इस भ्रम ने भेड़ियों के प्रति भय और आक्रोश को बढ़ाया।
जब तक इन मानवीय पहलुओं को नहीं समझा जाएगा, तब तक इंसान और वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व वास्तव में संभव नहीं हो पाएगा।

सहानुभूति से सह-अस्तित्व तक
बहराइच का मामला एक महत्वपूर्ण सबक देता है कि कैसे कोई प्रजाति जो हज़ारों सालों से इंसानों के साथ रहती आई है, कैसे डर का कारण भी बन सकती है। लुप्तप्राय भारतीय भेड़िए के संरक्षण के लिए सामुदाय आधारित संरक्षण (Community-based Conservation) नीतियाँ आवश्यक हैं जो सह-अस्तित्व को बढ़ावा दें और बनाए रखें, जैसे कि
- भेड़िए के व्यवहार और जोखिम संकेत, जैसे 30 मीटर के भीतर भेड़िए का बार-बार दिखना, मानव के पास आना, बिन-उकसाये आक्रामकता, की पहचान हेतु सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रम।
- भेड़िए के पदचिन्ह, मल और व्यवहार को कुत्तों, सियारों और लकड़बग्घों से अलग करने के लिए लक्षित प्रशिक्षण।
- निगरानी और जागरूकता अभियानों में वित्तीय प्रोत्साहनों (दैनिक वेतन, छात्रवृत्ति, दीर्घकालिक रोजगार) के साथ सार्वजनिक भागीदारी।
- ग्रामीण विकास नीतियों में भेड़िया संरक्षण को स्थान देना और स्थानीय समुदायों की प्रबंधन निर्णयों में सीधी भागीदारी।
- भेड़िया-संरक्षण के ज़रिये रोज़गार के अवसर प्रदान करना।
- पशुधन हानि और मानव चोट/हानि के लिए तात्कालिक मुआवजा (48 घंटे के भीतर)।
आगे की राह
भेड़िए सदियों से मनुष्यों के साथ रहते आए हैं, कभी प्रतिद्वंद्वी की तरह, तो कभी पड़ोसी के रूप में। बहराइच की घटना मानव और वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व की जटिलता को दर्शाती है। बहराइच का मामला बखूबी याद दिलाता है कि संरक्षण केवल वन्यजीवों के प्रति सहानुभूति तक सीमित नहीं होना चाहिए। मानव-वन्यजीव संघर्ष की जड़ों को समझना तथा समस्या को संयोग मानकर खारिज करने के बजाय उसे स्वीकार करना – यही लोगों और भेड़ियों के बीच संतुलन दोबारा स्थापित करने की पहली कड़ी है।
लेखकों के बारे में:
देवव्रत सिंह एक संरक्षण जीवविज्ञानी हैं। उनका कार्य मुख्य रूप से मांसाहारी जीवों की पारिस्थितिकी में मानव-जनित पहलुओं के अध्ययन, नदी पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण, जलवायु प्रतिरोधकता, सह-अस्तित्व ढांचे, जैव विविधता नीति और स्थानीय हितधारकों तथा समुदायों के सहयोग से विज्ञान आधारित समाधानों को लागू करने पर केंद्रित है।
ईमेल: devvrat.sfc10@gmail.com
रोहित आर.एस. झा देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान में वरिष्ठ पारिस्थितिकीविद् (senior ecologist) हैं। उनके पास विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों में वन्यजीव अनुसंधान और संरक्षण का 10 वर्षों से अधिक का अनुभव है, जिसमें गैर-सरकारी और सरकारी संस्थान दोनों शामिल हैं।
ईमेल: jha.rs.rohit@gmail.com
बैनर तस्वीर- वेलावदार नेशनल पार्क गुजरात में विचरण करता भेड़िया। प्रतिकात्मक तस्वीर। फोटो-धवल वर्गीया/विकिमीडिया कॉमन्स