- आईआईटी खड़गपुर के शोध के अनुसार भारत के जंगल और कृषि भूमि दीर्घकालिक नमी की कमी यानी ‘पारिस्थितिक सूखे’ की चपेट में हैं।
- अध्ययन में हिमालय, पूर्वोत्तर भारत, पूर्वी सिंधु-गंगा मैदान, मध्य भारत और दक्षिणी अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पारिस्थितिक सूखे में वृद्धि पाई गई है।
- शोध के मुताबिक मौसम संबंधी शुष्कता (23%) और महासागरों के गर्म होने (18%) का पारिस्थितिक सूखे में बड़ा योगदान है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर के शोधकर्ताओं की एक टीम ने चेतावनी दी है कि भारत के जंगल और कृषि भूमि ‘पारिस्थितिक सूखे’ नामक स्थिति का सामना कर रहे हैं। यह स्थिति दीर्घकालिक नमी की कमी को दर्शाती है और पूरे पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुंचाती है।
इस शोधपत्र में बताया गया है कि बदलते ग्रीष्मकालीन मॉनसून और मानवीय हस्तक्षेपों के कारण भारत में ‘पारिस्थितिक सूखा’ किस प्रकार बढ़ रहा है। कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट में प्रकाशित इस शोधपत्र के लेखक आईआईटी खड़गपुर की कोरल प्रयोगशाला के राहुल कश्यप, जयनारायणन कुट्टीप्पुरथ और विकास कुमार पटेल हैं।
इस अध्ययन के लेखकों में से एक, कुट्टीप्पुरथ ने बताया कि यह अध्ययन भारत के गर्मियों वाले मॉनसून के दौरान पारिस्थितिक सूखे के संबंध में वायुमंडल, भूमि और महासागर प्रणालियों के बीच जटिल संबंधों की पड़ताल करता है। “यह हिमालय, पूर्वोत्तर भारत, पूर्वी सिंधु-गंगा मैदान (आईजीपी), मध्य भारत और दक्षिणी अर्ध-शुष्क भारत जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में पारिस्थितिक सूखे में वृद्धि को दर्शाता है। इन क्षेत्रों में मौसम संबंधी, भूमि वाष्पीकरण और वायुमंडलीय शुष्कता में भी वृद्धि देखी जा रही है,” उन्होंने आगे बताया। शोधपत्र में आगे कहा गया है कि ये ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें वनस्पति के लिए पर्याप्त नमी और अनुकूलतम तापमान मौजूद है, फिर भी वे अब पारिस्थितिक सूखे की चपेट में हैं।
“भारत में पारिस्थितिक रूप से नाजुक प्राचीन जंगलों और कृषि भूमि में पारिस्थितिक सूखा बढ़ रहा है, जिससे वनस्पति का स्वास्थ्य खराब हो रहा है,” शोधपत्र में बताया गया। साल 2000-2019 के मशीन लर्निंग और रिमोट सेंसिंग डेटा का उपयोग करते हुए, शोधकर्ताओं ने पाया कि मौसम संबंधी शुष्कता का पारिस्थितिक सूखे में लगभग 23% और महासागरों के गर्म होने का लगभग 18% योगदान है।
“हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि मौसम संबंधी शुष्कता और महासागरों का तापमान बढ़ना पारिस्थितिक सूखे के मुख्य कारण हैं, और महासागरों का तापमान बढ़ना नमी और तापमान में बदलाव के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से सूखे को प्रभावित करता है,” कुट्टीप्पुरथ ने मोंगाबे-इंडिया को बताया। “मानवजनित दबावों के अलावा, मॉनसून प्रणाली के पश्चिम की ओर खिसकने से पूर्वी और दक्षिणी भारत में सूखे की स्थिति और भी गंभीर हो गई है।”
इस शोधपत्र के अनुसार, “भारत में बढ़ते पारिस्थितिक सूखे के कारण नमी से भरपूर मॉनसून के मौसम में प्राचीन जंगलों और गहन कृषि भूमि में पत्तियां सूख कर गिरने लगी हैं,” इससे जंगलों के कार्बन सिंक कमजोर हो रहे हैं और फसलों की पैदावार कम हो रही है।
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“ये बदलाव पारिस्थितिक-जल संतुलन और भूमि-वायुमंडल प्रतिक्रियाओं को बिगाड़ कर कृषि, वनों और सामाजिक-आर्थिक स्थिरता को खतरे में डालते हैं, जिससे क्षेत्रीय जलवायु भी प्रभावित होती है,” कुट्टीप्पुरथ ने कहा। “यह अध्ययन जलवायु परिवर्तन के तहत पर्यावरणीय स्थिरता और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कार्बन-जल चक्रों की बेहतर निगरानी, टिकाऊ भूमि प्रबंधन और अनुकूल नीतियों की आवश्यकता पर बल देता है।”
“जलवायु नीतियों में पारिस्थितिक सूखे को शामिल करने और जलवायु परिवर्तन अनुकूलन एवं शमन की विभिन्न रणनीतियों में इसे उचित महत्व देने का यह सही समय है,” अध्ययन के लेखकों ने निष्कर्ष के रूप में कहा।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 4 नवंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: कम और असामयिक बारिश से बाजरे की फसल को नुकसान पहुंचता है। तस्वीर- विंसी लोपेज/मोंगाबे