- नेपाल के पोखरा में रहने वाले पक्षी विज्ञानी हेमंत ढकाल यहां के नए अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास अपनी छत से रोज पक्षियों और विमानों के एक दूसरे के के व्यवहार का दस्तावेजीकरण करते हैं।
- पोखरा, जिसे नेपाल की पर्यटन राजधानी और गिद्ध राजधानी दोनों के रूप में जाना जाता है, नौ प्रकार के गिद्धों का घर है।
- इन गिद्धों के उड़ान मार्ग हवाई अड्डे के रनवे और पास की नदियों, चट्टानों और पूर्व कचरा स्थलों से होकर गुजरते हैं।
विश्व प्रसिद्ध अन्नपूर्णा पर्वतमाला की गोद में बसे नेपाल के पर्यटन शहर पोखरा में मई की एक सुबह, 40-वर्षीय हेमंत ढकाल यहां के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से कुछ 100 मीटर दूर स्थित अपने घर की छत पर बने चबूतरे पर चढ़ते हैं।
अपनी आँखों पर दूरबीन लगाए, पहले वह आसमान और फिर हवाई अड्डे के रनवे पर गिद्धों की तलाश में इधर-उधर देखते हैं। गिद्धों में भी उन्हें एक ख़ास तलाश है, पीले चेहरे, और पतले, धूसर-सफेद शरीर वाले गिद्ध की।
जैसे ही सूरज की किरणें रनवे पर पड़ती हैं, टर्बोप्रॉप विमानों के उतरने और उड़ान भरने की भनभनाहट और कभी-कभार सुनाई देने वाली कांव-कांव की आवाज़ घाटी में गूंजती है। लेकिन ये आवाज़ अचानक एक धमाके से रुक जाती है। “ये वो एयर गन है जिसे वे रनवे से गिद्धों को भगाने के लिए चलाते हैं,” ढकाल शांत भाव से कहते हैं। “वे फिर से गिद्धों को डरा रहे हैं।”

दूसरे शोधकर्ताओं के विपरीत, जिन्हें अपनी पसंद और शोध के पक्षियों और जानवरों के लिए दूर दराज़ के इलाकों में जाना पड़ता है, ढकाल को अपने काम के लिए बस कुछ सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। अपने स्नातक के छात्रों के मार्गदर्शन और परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताने के बाद के बचे समय में यह अनुभवी पक्षी विज्ञानी और संरक्षण कार्यकर्ता हवाई अड्डे के आसपास गिद्धों का अवलोकन करने में व्यस्त पाए जाते हैं।
पोखरा के माझरियातन इलाके में स्थित अपने घर पर मोंगाबे से बात करते हुए उन्होंने कहा, “इस जगह से मुझे यह देखने का मौका मिलता है कि पक्षी और हवाई अड्डा हर दिन एक दूसरे के साथ कैसे व्यवहार करते हैं।”
ढकाल का गृहनगर पोखरा, जिसे हाल ही में आधिकारिक तौर पर नेपाल की “पर्यटन राजधानी” घोषित किया गया है, अनौपचारिक रूप से देश की “गिद्ध राजधानी” भी है। इस घाटी के निवासी दक्षिण एशिया में पाई जाने वाली गिद्धों की सभी नौ प्रजातियों को देख सकते हैं, जिनमें सफेद पूंछ वाला गिद्ध (जिप्स बेंगालेंसिस) और पतली चोंच वाला गिद्ध (जिप्स टेनिरोस्ट्रिस) शामिल हैं। ये दोनों दोनों ही गंभीर रूप से लुप्तप्राय हैं। यहाँ लुप्तप्राय मिस्र का गिद्ध (नियोफ्रॉन पर्क्नोप्टेरस) भी है, वही पीले चेहरे वाला पक्षी जिसे ढकाल हवाई अड्डे के आसपास देखने की कोशिश करते हैं।
कई वर्षों से, संरक्षणवादियों ने इस क्षेत्र में गिद्धों के घोंसले बनाने की जगहों का दस्तावेजीकरण किया है और अन्य संकटग्रस्त पक्षियों जैसे कि लुप्तप्राय स्टेपी ईगल (एक्विला निपालेन्सिस), जो पोखरा से होकर गुजरते हैं, के प्रवासी मार्गों पर नज़र रखी है।

लेकिन अब, 216 मिलियन अमेरिकी डॉलर की लागत से बने पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का 2.5 किलोमीटर (1.6 मील) लंबा रनवे इन पक्षियों के उड़ान मार्ग को काटता है। नदियों और चट्टानों से दूर स्थित पुराने घरेलू हवाई अड्डे से उलट, यह नया अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बिजयपुर नदी और एक पुराने कूड़े के ढ़ेर जैसे प्रमुख गिद्ध स्थलों के करीब है। ढकाल कहते हैं, “हालांकि, पुराने हवाई अड्डे में भी कुछ समस्याएं थीं, लेकिन नए हवाई अड्डे ने उन समस्याओं को और भी उजागर कर दिया है।”
ढकाल के नेतृत्व में हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि इस हवाई अड्डे के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन में गिद्धों जैसे बड़े, “उच्च जोखिम वाले” पक्षियों से संबंधित चुनौतियों को अनदेखा किया गया था। मोंगाबे द्वारा समीक्षा की गई रिपोर्ट के एक संस्करण में केवल मिस्र के गिद्ध का उल्लेख है और गिद्धों की अन्य प्रजातियों को छोड़ दिया गया है।
इस अध्ययन में हवाई अड्डों के पास पक्षियों की उपस्थिति, उनके आकार, उनके समूह में उड़ने की प्रवृत्ति, भोजन की खोज के तरीके और हवा में उनके आवागमन के तरीकों का आकलन करके हवाई जहाजों और पक्षियों के बीच टक्कर के जोखिम का अध्ययन किया गया है। अध्ययन में मिस्र के गिद्ध, सफेद पूंछ वाले गिद्ध, पतली चोंच वाले गिद्ध, हिमालयी गिद्ध (जिप्स हिमालयेंसिस), ग्रिफॉन गिद्ध (जिप्स फुलवस) और लाल सिर वाले गिद्ध (सारकोजिप्स कैल्वस) सहित कई प्रजातियों में टक्कर का “महत्वपूर्ण” जोखिम पाया गया।

इस नए हवाई अड्डे के खुलने के एक महीने से भी कम समय के बाद, 16 जनवरी, 2023 की सुबह एक विमान लैंडिंग के दौरान एक स्टेपी ईगल से टकरा गया। हालाँकि, इस घटना में विमान को ज़्यादा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन पक्षी की मौत हो गई। घटना के प्रत्यक्षदर्शी और ऑनलाइन तस्वीरें साझा करने वाले एक फोटोग्राफर के अनुसार, हवाई अड्डे के अधिकारियों ने तुरंत रनवे से पक्षी के अवशेष हटा दिए। यह घटना हवाई अड्डे के पास यति एयरलाइंस के एक विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने के एक दिन बाद हुई, जिसमें सवार सभी 72 लोगों की मौत हो गई थी। जांच में पता चला कि पिछली दुर्घटना मानवीय त्रुटि के कारण हुई थी, न कि पक्षी के टकराने के कारण जैसा कि शुरू में आशंका थी।
उद्घाटन के तुरंत बाद हुई इन दो घटनाओं ने नए हवाई अड्डे की आलोचना को और तेज़ कर दिया। ये आलोचनाएं इसके योजना और निर्माण के शुरुआती चरणों से ही पनप रही थीं। पक्षियों के टकराने की आशंका के अलावा, यह हवाई अड्डा भू-राजनीतिक विवाद का भी केंद्र बन गया है। यह हवाई अड्डा नेपाल के उत्तरी पड़ोसी चीन से वित्तपोषण और इंजीनियरिंग के ज़रिए बनाया गया है। और यहां “सुरक्षा चिंताओं” का हवाला देते हुए नेपाल के दक्षिणी पड़ोसी भारत के शहरों से सीधी उड़ानों को मंज़ूरी नहीं दी जा रही है। ऐसे में इस हवाई अड्डे ने भारत की नाराजगी मोल ले ली है।
इस हवाई अड्डे के लिए चीनी एयरलाइंस भी नए रूट शुरू करने में धीमी रही हैं। इसका कारण यात्रियों की कम मांग और व्यावसायिक व्यवहार्यता की कमी बताया जा रहा है। नतीजतन, आधिकारिक उद्घाटन के बाद से हवाई अड्डा लगभग निष्क्रिय पड़ा है, जिससे स्थानीय पर्यटन संचालक और निवासी, जो लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी की मांग कर रहे थे, खासे निराश हैं।
वहीं दूसरी ओर भ्रष्टाचार के आरोपों ने इस विवाद को और बढ़ा दिया है। परियोजना की खरीद प्रक्रिया की संसदीय जांच में पारदर्शिता की कमियों का पता चला, जिससे यह संदेह पैदा हुआ कि इसके निर्माण के दौरान करीब 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर – हवाई अड्डे की कुल लागत का लगभग आधा – तक का गबन किया गया होगा।

हालाँकि, अंतराष्ट्रीय उड़ाने कम होने के बावजूद, घरेलू उड़ानें, मुख्य रूप से राजधानी काठमांडू से आने-जाने वाली उड़ानें, पूरी तरह से जारी हैं। ढकाल का कहना है कि हवाई अड्डे पर उड़ानों की अधिकता भी पक्षियों के टकराने के खतरे को बढ़ाती है। व्यस्त मौसम में सुबह से लेकर देर दोपहर तक लगभग हर आधे घंटे में एक विमान उड़ान भरता है या उतरता है।
पक्षी कभी-कभी रनवे पर ही आराम करते हैं। ढकाल कहते हैं, “सर्दियों में, काली डामर अधिक गर्मी सोख लेती है, जिससे मिस्र के गिद्ध और अन्य पक्षी आकर्षित होते हैं और उस पर धूप सेंकते हैं। इससे पक्षियों के टकराने का वास्तविक खतरा पैदा हो जाता है।”
गिद्धों और लंबे पंखों वाले अन्य बड़े पक्षियों के लिए, घाटी के तल से उठने वाली गर्म हवा, विशेषकर सर्दियों के दौरान, उड़ने में कारगर होती हैं। वही गर्म हवा जो गिद्धों को घंटों तक उड़ने में सक्षम बनाती हैं, अब उन्हें आने वाले विमानों के खतरनाक रूप से करीब ला रही हैं।
जब 2023 के पहले दिन हवाई अड्डे का औपचारिक उद्घाटन हुआ, तो इसके पास मौज़ूद एक कचरा के बड़े ढेर को संभावित चुनौतियों में से एक के रूप में पहचाना गया था। यह कचरा गिद्धों, चीलों और चीलों जैसे बड़े शिकारी पक्षियों को आकर्षित करता था, जो फेंके गए मांस और कचरे की गंध से प्रभावित होते थे। हालांकि, बाद में इस कचरा स्थल को स्थानांतरित कर दिया गया। लेकिन हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में यह दर्ज किया गया है कि गिद्ध अभी भी इस पुरानी जगह पर आते रहते हैं। गिद्धों का यह व्यवहार संभवतः भोजन की उपलब्धता और जंगलों, चट्टानों और नदियों जैसे घोंसला बनाने वाले आवासों की निकटता के कारण है।
स्थानीय पक्षीविज्ञानी कहते हैं कि इन चुनौतियों के बावजूद, अधिकारी शुरू में विशेषज्ञों की सहायता लेने में हिचकिचा रहे थे। जनवरी 2017 में निर्माण शुरू होने के पहले से इस हवाई अड्डे पर गिद्धों की निगरानी कर रहे ढकाल कहते हैं, “शुरुआती दिनों में, हवाई अड्डे के अधिकारी मेरे काम को लेकर सकारात्मक नहीं थे। वे मुझे एक ऐसे पक्षी विशेषज्ञ के रूप में जानते थे जो लंबे लेंस से रनवे पर हर गतिविधि की तस्वीर खींचता है।”
हालांकि, ढकाल और पोखरा बर्ड सोसाइटी की उनकी टीम द्वारा हवाई अड्डे के अधिकारियों के लिए पक्षियों की पहचान पर प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन करने के बाद, उनका रवैया बदल गया, वे कहते हैं।
“इन दिनों हवाई अड्डे के अंदर और आसपास पक्षियों की आवाजाही काफी कम हो गई है,” हवाई अड्डे के एक अधिकारी कृष्णा रायमाझी कहते हैं। “हम पक्षियों को भगाने के लिए एयर गन का इस्तेमाल करते हैं ताकि वे रनवे के पास न आएं।”
उन्होंने आगे बताया कि ढकाल और उनकी टीम द्वारा दिए गए प्रशिक्षण के बाद, अधिकारी अब पक्षी वैज्ञानिकों से मिली किताबों के आधार पर पक्षियों की पहचान कर सकते हैं और उनके व्यवहार का अनुमान लगा सकते हैं।
रायमाझी ने मोंगाबे को बताया कि हवाई अड्डे पर पूर्णकालिक पक्षी वैज्ञानिक की व्यवस्था न होने के कारण, उपलब्ध संसाधनों से ही काम चलाया जाता है। लेकिन ढकाल के नेतृत्व में किए गए अध्ययन के अनुसार, ये संसाधन पक्षियों और विमानों दोनों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

“यह समस्या व्यवस्थागत है,” वे तर्क देते हैं। “सबसे पहले, हमें नगर पालिका और हवाई अड्डे दोनों से कचरे के बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता है, साथ ही पक्षियों की आवाजाही को समझने के लिए बेहतर डेटा की भी। हवाई अड्डे के अधिकारियों के लिए सबसे अच्छा उपाय यह होगा कि वे सितंबर से जनवरी तक सुबह 10 बजे से दोपहर 12 बजे के बीच हवाई अड्डे को बंद कर दें, क्योंकि इन अवधियों के दौरान पक्षियों की गतिविधि चरम पर होती है।”
लेकिन ढकाल का कहना है कि चूंकि यह व्यावहारिक समाधान नहीं हो सकता, इसलिए हवाई अड्डे के अधिकारी गिद्धों को भगाने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल कर सकते हैं। उन्होंने आगे कहा कि अन्य अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों ने जोखिम भरे क्षेत्रों से जंगली पक्षियों को भगाने के लिए प्रशिक्षित शिकारी पक्षियों का इस्तेमाल किया है।

“पक्षियों और हवाई जहाजों के बीच घातक टक्कर का खतरा बहुत गंभीर है, लेकिन हवाई अड्डे के निचले स्तर के कर्मचारी इसे अपने वरिष्ठों तक पहुंचाने में असमर्थ रहे हैं,” ढकाल ने गंभीर स्वर में कहा। “हम आशा करते हैं कि सरकार भविष्य में ऐसी त्रासदी को रोकने के लिए जल्द ही कार्रवाई करेगी।”
संरक्षण और विकास के बीच चल रही बहस में सबसे आगे खड़े होकर, ढकाल कहते हैं कि वे अपने उद्देश्य के प्रति पहले की तरह ही समर्पित हैं। वे पक्षियों के दिखाई देने, उनके घोंसला बनाने के व्यवहार और गिद्धों तथा विमानों के बीच होने वाली बातचीत का रिकॉर्ड रखना जारी रखते हैं। वे अपने निष्कर्षों को पक्षी संरक्षण संगठनों और सरकारी अधिकारियों के साथ साझा करते हैं, इस उम्मीद में कि इससे कार्रवाई को बढ़ावा मिलेगा।
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उनका काम नेपाल में दशकों से चल रहे गिद्ध संरक्षण प्रयासों पर आधारित है। 1990 के दशक में डाइक्लोफेनाक के व्यापक उपयोग के कारण गिद्धों की आबादी में भारी गिरावट आई थी। डाइक्लोफेनाक एक पशु चिकित्सा औषधि है जो पशुओं के शवों को खाने वाले गिद्धों के लिए घातक साबित हुई थी। इस दवा की बिक्री पर प्रतिबंध लगने और पक्षियों के लिए समुदाय द्वारा संचालित सुरक्षित चारागाह क्षेत्रों की स्थापना के बाद, उनकी आबादी धीरे-धीरे बढ़ने लगी, जो संरक्षण की एक नाजुक सफलता की कहानी बन गई है।
लेकिन अब, ढकाल कहते हैं, वे सारी उपलब्धियाँ खो सकती हैं। “अब बात सिर्फ डाइक्लोफेनाक की नहीं है। यह अनियोजित बुनियादी ढाँचा है जो पक्षियों के लिए अनुकूल नहीं है।”
इन सब के बावजूद, ढकाल अपनी छत पर दूरबीन लिए बैठे रहते हैं।
यह खबर मोंगाबे टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी ग्लोबल वेबसाइट पर 16 जुलाई, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: पक्षी विज्ञानी हेमंत ढकाल और उनकी बेटी अपने घर से पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के रनवे को देखते हुए। तस्वीर – अभय राज जोशी/मोंगाबे द्वारा।