- नए अध्ययन के अनुसार पश्चिमी घाट इंसानों और ढोल (एशियाई जंगली कुत्तों) के सह-अस्तित्व के लिए अनुकूल भूभाग है।
- लेकिन पश्चिमी घाट में बढ़ता पर्यटन, उससे जुड़ा निर्माण और भूमि उपयोग में बदलाव इस सह-अस्तित्व की स्थिरता को कमजोर कर सकते हैं।
- तमिलनाडु के वालपराई जैसे कृषि-वन परिदृश्यों में ढोल पालतू पशुओं के बजाय सांभर और गौर जैसे जंगली खुर वाले जानवरों का शिकार करना पसंद करते हैं।
नए साक्ष्यों से पता चलता है कि पश्चिमी घाट इंसानों और ढोल (एशियाई जंगली कुत्तों) के सह-अस्तित्व को बनाए रखने के लिए एक उपयुक्त भूभाग है। लेकिन इस संबंध की स्थिरता पश्चिमी घाट में खेती, पर्यटन और बुनियादी ढांचे के विकास की सीमा पर निर्भर करती है।
वाइल्डलाइफ कंज़र्वेशन सोसायटी (WCS) और राष्ट्रीय जैविक विज्ञान केंद्र (एनसीबीएस) के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह समझने का प्रयास किया गया कि पश्चिमी घाट के चाय-प्रधान कृषि-वनों में ढोल, जिन्हें एशियाई जंगली कुत्ते भी कहा जाता है, मनुष्यों के साथ किस प्रकार स्थान साझा करते हैं। ढोल को IUCN द्वारा लुप्तप्राय प्रजातियों की सूची में शामिल किया गया है और पिछली एक शताब्दी में भारत में इनके आवास क्षेत्र का 60% भाग नष्ट हो गया है। हालांकि, ये पश्चिमी घाट के साथ-साथ मध्य और उत्तर-पूर्वी भारत के जंगलों में भी पाए जाते हैं।
इस अध्ययन के विषय के रूप में ढोल को इसलिए चुना गया क्योंकि एक शीर्ष शिकारी होने के बावजूद, “वित्तपोषण और प्रबंधन के प्रयास अक्सर लगभग पूरी तरह से संरक्षित क्षेत्रों (पीए) तक ही सीमित रहते हैं, और कुछ आकर्षक प्रजातियों की ओर ही अधिक केंद्रित रहते हैं,” अध्ययन में कहा गया है। ढोल जैसे बड़े मांसाहारी जीव मानव-प्रधान परिदृश्यों के साथ कैसे परस्पर क्रिया करते हैं, इसे समझना “मानव सुरक्षा और मांसाहारी जीवों के संरक्षण दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।”
भारत में वयस्क ढोल की संख्या केवल 1,000-2,000 ही बची है, जो इनके आवास क्षेत्रों के विखंडन और जंगलों की कटाई से प्रभावित हुई है। ढोल सामाजिक जीव हैं और अक्सर दो से 24 सदस्यों के झुंड में घूमते हैं, लेकिन मानव बस्तियों से दूर रहना पसंद करते हैं। पिछले शोधों से पता चलता है कि जनसांख्यिकीय और भौगोलिक अलगाव ने भारत में ढोल की आबादी को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
डब्ल्यूसीएस के इस अध्ययन में पाया गया कि तमिलनाडु के पश्चिमी घाट में स्थित वालपराई जिले में, हालांकि पालतू पशुओं वाले क्षेत्रों में भी ढोल पाए जाते हैं, फिर भी वे जंगली खुर वाले जानवरों का शिकार करना पसंद करते हैं। वालपराई में कॉफी, चाय, इलायची और अन्य फसलों की खेती वाले बड़े-बड़े कृषि-वन हैं, जिनके बीच-बीच में वन क्षेत्र भी मौजूद हैं।
अप्रैल और मई 2023 के बीच लिए गए मल के नमूनों का विश्लेषण करके, शोध में पता चला कि ढोलों द्वारा सबसे अधिक खाया जाने वाला जीव सांभर हिरण है, उसके बाद जंगली गौर का नंबर आता है। सेटेलाइट इमेज, कैमरा ट्रैप सर्वे और जमीनी सर्वे के माध्यम से किए गए इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि ढोलों के झुंड “अधिक प्रत्यक्ष दृश्यता वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता देते हैं, जो संभवतः उन्हें मानव जनित व्यवधानों से उनके झुंड की रक्षा करने में मदद करता है।”
अध्ययन में यह भी पाया कि मानव बस्तियों से दूर समतल क्षेत्रों में ढोलों द्वारा जगह का उपयोग अपेक्षाकृत अधिक था। समतल भूभाग में उपयोग की उच्च संभावना उनकी (शिकार करने की) रणनीति के कारण हो सकती है। “हालांकि, वालपराई में बढ़ते पर्यटन और उसके बाद होने वाले बुनियादी ढांचे के विकास, या कृषि के गहन होने से भविष्य में भूमि उपयोग में होने वाले परिवर्तन इस स्थिरता पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं,” अध्ययन में कहा गया।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 7 नवंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: एक ढोल की प्रतीकात्मक तस्वीर। तस्वीर – विनोथ चन्दर द्वारा विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY 2.0) के माध्यम से।