- झारखंड में हाथियों की घटती संख्या के बीच इंसानों के साथ उनका संघर्ष बढ़ता जा रहा है। पिछले करीब दो महीनों में राज्य में मानव-हाथी संघर्ष में कम से कम 40 लोगों की जान गई है।
- यह शायद पहला मौका है जब इतने कम दिनों में इतने अधिक लोगों की मौत हुई है। इसकी वजह कम होते जंगल, चारा और पानी की कमी और हाथी के गलियारों के भीतर बढ़ते इंसानी हस्तक्षेप को माना जा रहा है।
- जानकार इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए विकास योजनाओं में हाथी को स्टेकहोल्डर बनाने और जन-भागीदारी बढ़ाने का सुझाव देते हैं।
पांच महीने की गर्भवती अंजू बुरूमा को छः और सात जनवरी की दरम्यानी रात हमेशा याद रहेगी। उस दिन पहली बार गांव में आए हाथी ने उनके पति मंगल बोबोंगा (23) की जान ले ली। इलाके के मशहूर फुटबॉल खिलाडी मंगल उस रात हाथी की पकड़ से खुद को छुड़ा नहीं पाए और घर से कुछ ही दूर उन्होंने दम तोड़ दिया।
अंजू की आंखों में आंसू सूख चुके हैं और चेहरा भावशून्य हो गया है। उन्हें बस अपने गर्भ में पहल रहे बच्चे की चिंता है। वह मोंगाबे-हिंदी से कहती हैं, “अब हमारा बच्चा अपने पिता को कभी नहीं देख पाएगा। मुझे पहले एक बेटा हुआ था, लेकिन कुछ साल पहले उसकी मौत हो गई थी। इसलिए, इस बार मंगल बहुत खुश था।”
मंगल के बड़े भाई कारजी बोबोंगा ने घटना के बारे में विस्तार से मोंगाबे-हिंदी को बताया। उस रात मंगल अपने चार दोस्तों के साथ घर से थोड़ी दूर पुआल से बने कुम्बा में सोया हुआ था। रात को कुत्तों के भौंकने की आवाज से इनकी नींद टूटी। हाथी को देखते ही पांचों ने भागने की कोशिश की। लेकिन मंगल को हाथी ने अपनी गिरफ्त में ले लिया।
वह कहते हैं, “हाथी ने उसे पटक-पटकर कर मार डाला। जब तक हमलोग पहुंच पाते, मंगल इस दुनिया से जा चुका था।”

अनसुलझी पहेली
एक से नौ जनवरी के बीच चाईबासा जिले में हाथी के हमले में 20 लोगों की जान चली गई। चाईबासा वन प्रमंडल के प्रभागीय वन अधिकारी आदित्य नारायण ने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “कोल्हन वन प्रमंडल में सात और चाईबासा वन प्रमंडल में 13 लोगों की मौत हुई है।” हालांकि, मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक मृतकों की संख्या 22 है।
उसी रात कुछ घंटे पहले बाड़ापसिया से कुछ किलोमीटर दूर बाबाड़िया गांव में सनातन मेरेल अपने परिवार के साथ घर के बाहर कुम्बा में सो रहे थे। यहां हाथी के हमले में सनातन, उनकी पत्नी और दो बच्चों की जान चली गई। सनातन का 13 साल का बेटा जयपाल मेरेल और उनकी बेटी सुशीला किसी तरह मौत को चकमा देने में कामयाब रहे।
जान बचाने वालों में तुरी पुरती का बेटा भी था जो पास में ही सो रहा था। पुरती ने मोंगाबे-हिंदी को बताया, “हाथी को देखते ही मेरा बेटा पेड़ पर चढ़ गया और उसकी जान बच पाई।”
इसी गांव के उली टोला में उस रात गुरुचरण लागुरी भी कुम्बा में अपने दो भतीजों के साथ सो रहे थे। जब वह गहरी नींद में थे, तो अचानक तेज आवाज से उनकी नींद टूटी। उन्होंने खुद को हाथी के सामने पाया और उनकी जान चली गई। उनकी पत्नी उनके साथ नहीं रहती थी और वह अपने पीछे पांच साल के बेटे मोहन सिंह लागुरी को छोड़ गए हैं।
उनका एक भतीजा हाथी को देखते ही भाग गया और दूसरा भतीजा किसी तरह अपनी जान बचा पाया। गुरुचरण के छोटे भाई डेबो लागुरी ने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “मेरे भतीजे गोमया ने जब हाथी को देखा, तो वह दीवार से इस तरह सट गया कि हाथी उसे सूंड में लपेट नहीं पाया। वह बच तो गया, लेकिन उसे बहुत चोट आई है।”

गुरुचरण की मां जेना कुई ने सुबकते हुए मोंगाबे हिंदी को बताया, “मेरा बेटा मां-मां चिल्ला रहा था। बोल रहा था कि मैं मर जाऊंगा। लेकिन हाथी के डर से हम लोग बाहर नहीं निकले और जब बाहर आए, तो उसकी आंतें बाहर निकली हुई थी।”
हमला करने वाले हाथी का नौ जनवरी के बाद कुछ अता-पता नहीं चल पाया है। एक से नौ जनवरी के बीच कई लोगों ने उस हाथी को देखा और सुनी-सुनाई बातों के आधार पर यह कहा गया कि यह दंतैल हाथी था।
आदित्य नारायण कहते हैं कि इस आधार पर माना जा सकता है कि यह हाथी व्यस्क था और उसकी उम्र 25 साल के आसपास थी। उन्होंने कहा, “इस तरह की आक्रामकता से ऐसी संभावना बनती है कि वह अपने झुंड से बिछड़ गया हो।” वहीं, झारखंड के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) पारितोष उपाध्याय ने मोंगाबे-हिंदी को बताया कि इस हाथी को सिर्फ एक ही दिन देखा गया था।
पहले ऐसी खबरें आई थी कि यह हाथी मस्त अवधि में था। इस दौरान अकेला हाथी आक्रामक हो जाता है और हमला करने लगता है। उपाध्याय के मुताबिक यह अवधि एक महीने तक रहती है।
हाथी मित्र ग्रुप के एडमिन तापस कर्माकर मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं, “मस्त अवधि केवल एक निश्चित समय तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसके पहले और बाद की अवधि भी होती हैं, जिनमें हाथी असामान्य रूप से आक्रामक व्यवहार कर सकता है। संभव है कि यह हाथी मस्त से उबर रहा हो या उसमें प्रवेश करने वाला हो। इसलिए, फिलहाल इसे ‘गुस्सैल हाथी’ कहना जल्दबाजी होगी।
आदित्य नारायण इस तथ्य की ओर इशारा करते हैं कि इस हाथी की कोई तस्वीर या वीडियो वन विभाग के पास नहीं है। इसलिए विशेषज्ञ इसके आक्रामक व्यवहार की जांच-पड़ताल नहीं कर पाए हैं। वह इस व्यवहार को अनसुलझी पहेली की तरह देखते हैं, “अभी तक मस्त अवधि वाली बात साबित नहीं हो पाई है। फिलहाल वैज्ञानिक नजरिए से कुछ कहा नहीं जा सकता।”

झारखंड में लंबे समय से हाथियों पर काम करने वाले वन्यजीव जीवविज्ञानी दयाशंकर श्रीवास्तव भी मस्त वाली थ्योरी को नकारते हैं, “मस्त व्यस्क होने और मेटिंग की स्थिति में पहुंचने की निशानी है। मेरे अनुमान से इस हाथी की उम्र 20 साल से कम है। अगर व्यस्क है, तब भी सहवास के लिए उसे साथी हाथियों से प्रतिस्पर्धा करनी होती। इसलिए मस्त वाली स्थिति में दूसरे नर हाथी उसे खदेड़ देते।”
नए गांवों में हमला
बाड़ापसिया और बाबाड़िया ऐसे गांव हैं जहां हाथी पहली बार आया जिससे यह पहेली और उलझ गई। मंगल के बड़े भाई कारजी बोबोंगा ने मोंगाबे-हिंदी से बातचीत में इसकी पुष्टि की।
इकसठ साल के पुरती भी कारजी की बातों से सहमति जताते हैं। वह कहते हैं, “आसपास के इलाकों में हमने हाथी आने के बारे में सुना है, लेकिन हमारे गांव में ऐसा पहली बार हुआ।”
गांव के ही उग्रसेन गोप मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं, “यह हाथी मनोहरपुर की तरफ से आया था और वहां पहले ही दो लोगों को मार चुका था।”
आदित्य नारायण को भी इस हाथी में अचानक (रेंडम) वाला व्यवहार दिखता है। वह कहते हैं, “इन हमलों में जो सामने आया उसकी जान चली गई। इससे उसके व्यवहार के बारे मं पता चलता है। जहां मौत हुई है, वह रेंडम है। ऐसा व्यवहार हाथियों मे नहीं देखा जाता, क्योंकि वे अपने पारंपरिक गलियारों में ही विचरण करते हैं। इस हाथी को कोल्हन से सारंडा की तरफ जाना था। लेकिन इसने बार-बार अपना रास्ता बदला और इससे निगरानी मुश्किल हो गई।”
कर्माकर इसे अलग नजरिए से देखते हैं, “जिन इलाकों में ये घटनाएं हुई हैं, वहां जंगल काफी हद तक डिस्टर्ब हो चुके हैं। कभी ओडिशा के सिमलीपाल से झारखंड के सारंडा तक एक सतत हाथी गलियारा था, जो अब कई टुकड़ों में बंट चुका है। इसी विखंडन के कारण हाथी भटककर गांवों की ओर पहुंच रहा है। जिन घरों को नुकसान पहुंचा है, वे या तो जंगल के भीतर हैं या उसके बेहद करीब बसे हैं।

श्रीवास्तव कहते हैं, “शुरू में इस हाथी को पकड़ने के लिए सक्रियता से कोशिश की गई। इससे यह हाथी आक्रामक हो गया और अपने बचाव के लिए नए गांवों में पहुंच गया। अगर ऐसी कोशिशें नहीं होती, तो शायद जान-माल का नुकसान इतना ज्यादा नहीं होता।”
आक्रामक होते हाथी
ऐसा भी नहीं है कि झारखंड में पहली बार हाथी के हमलों में जान-माल का व्यापक नुकसान हुआ है। 16 दिसंबर को हाथियों के हमलों में रामगढ़ और रांची जिलों में दो महिलाओं समेत पांच लोगों की मौत हो गई थी। इसकी शुरुआती वजह हाथी के पास जाकर उसकी तस्वीरें लेना और रील बनाना रहा। फरवरी के पहले हफ्ते में बोकारो में हाथियों के हमलों में दो परिवारों के पांच लोगों की जान चली गई।
भारतीय वन्यजीव संस्थान की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस सदी की शुरुआत से 2023 तक राज्य में 225 हाथियों की जान गई। इस दौरान 1,340 लोगों की भी मौत हुई और राज्य के 480 गांवों में मानव-हाथी संघर्ष देखा गया।
श्रीवास्तव राज्य में मानव-हाथी संघर्ष बढ़ने के पीछे की बड़ी वजहें बताते हैं, “हाथी अपने पारंपरिक गलियारा से आवाजाही करते हैं। अब इन गलियारों में मानवीय गतिविधियों बहुत ज्यादा बढ़ गई हैं। सड़कें बना दी हैं। इसलिए वह बार-बार इंसानी बस्तियों में पहुंच रहा है और नुकसान बढ़ता जा रहा है।”
श्रीवास्तव की बातों की पुष्टि डब्ल्यूडब्ल्यूआई की 2025 में आई रिपोर्ट से भी होती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में हाथियों की अधिकतम संख्या 217 है जबकि 2017 में यह तादाद 679 थी। यानी हाथियों की संख्या घटने के बावजूद हाथी-मानव संघर्ष बढ़ा है, क्योंकि 2019-20 से 2023-25 तक राज्य में ऐसी घटनाओं में 474 लोगों क जान गई थी।
रिपोर्ट कहती है, “इंसानी गतिविधियों ने हाथियों के आवास को काफी हद तक बदल दिया है, जिससे ये हाथी बंटे हुए आवासों में सीमित हो गए हैं, जो सिर्फ खेत और मानव बस्तियों से जुड़ी हैं। इससे उनकी खाने और पानी की जरूरतें पूरी नहीं हो पाती है। इस वजह से जंगल के इलाकों के बाहर काफी ज्यादा (89.2%) इंसानी मौतें देखी गई हैं।”
इस स्थिति से उबरने के लिए झारखंड सरकार हाथी गलियारों को दुरुस्त करने पर काम कर रही है। झारखंड के अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (कैम्पा) रवि रंजन ने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “हमने 75 गलियारों की पहचान की है। इन गलियारों को प्राथमिकता के आधार पर बाधारहित बनाया जाएगा, ताकि हाथी गांवों में नहीं घुसे।”
वहीं उपाध्याय कहते हैं कि गलियारों को सुरक्षित बनाने के साथ-साथ हाथियों को रेडियो कॉलर से लैस करने पर भी काम हो रहा है। साथ ही, जंगल में उनके लायक वनस्पतियों को बढ़ाया जाएगा, ताकि वह गांवों में नहीं घुसे।
कर्माकर के मुताबिक आज समस्या यह भी है कि हाथियों को लेकर इंसानों का व्यवहार शत्रुता भरा होता जा रहा है। इस सोच को बदलने के लिए जरूरी है कि स्कूली पाठ्यक्रमों में वन्यजीवन प्रबंधन और सह-अस्तित्व की शिक्षा को शामिल किया जाए।”
श्रीवास्तव हाथियों द्वारा तैयार अनाज खाने के खतरनाक प्रवृत्ति की तरफ भी इशारा करते हैं। वह कहते हैं, “अनाज हाथी के खान-पान का हिस्सा नहीं है। इस जीव का पसंदीदा आहार घास-फूस है। अगर जंगल में इन्हें भरपूर चारा नहीं मिलेगा, तो आज जो हाथी गांवों की ओर से जा रहे हैं, वे भविष्य में दाल मिल या धान मिल पर भी धावा बोल सकते हैं और तब स्थिति बहुत खतरनाक होगी।”
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उनका मानना है कि इस समस्या से पार पाने के लिए हमें प्लानिंग में हाथियों को स्टेकहोल्डर मानना होगा और उनकी जरूरतों को ध्यान में रखकर विकास की योजनाएं बनानी होगीं। साथ ही, इसमें केंद्र सरकार को भी सहयोग करना होगा, क्योंकि हाथी झारखंड के साथ-साथ बंगाल, छत्तीसगढ़ और ओडिशा तक विचरण करते हैं।
तस्वीर- झारखंड में हाथियों की प्रतिनिधि तस्वीर। भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक 2000 से 2023 तक झारखंड के 480 गांवों में मानव-हाथी संघर्ष देखा गया। तस्वीर – दया शंकर श्रीवास्तव/मोंगाबे