- छत्तीसगढ़ के बस्तर की गुफाएं लाखों वर्षों से लगभग बिना बदले हुए प्राकृतिक हालात में बनी हुई हैं। कांगेर घाटी में हाल ही में खोजी गई ‘ग्रीन गुफा’ की दीवारों पर दिखने वाली हरी सूक्ष्म परतें एक अत्यंत नाजुक पारिस्थितिक तंत्र की ओर संकेत करती हैं।
- ग्रीन गुफा को पर्यटन के लिए खोलने के सरकारी फैसले ने संरक्षण और विकास के बीच बहस को तेज कर दिया है। पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि निर्माण और नियमित मानवीय प्रवेश से गुफा का संतुलन प्रभावित हो सकता है।
- ग्रीन गुफा को लेकर उठे सवाल अब अदालत तक पहुंच गए हैं। फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि इस ग्रीन गुफा को पर्यटन स्थल बनाया जाए या एक संवेदनशील प्राकृतिक धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा जाए।
छत्तीसगढ़ के बस्तर का इलाका अपनी घनी हरियाली, नदियों, जलप्रपातों और आदिवासी जीवनशैली के लिए जाना जाता है। लेकिन इस इलाके की सबसे अनोखी पहचान ज़मीन के नीचे छिपी गुफाओं की दुनिया है। यहां की गुफाएं अंधेरी हैं, कहीं बड़ी तो कहीं संकरी हैं और खामोश भी। अंदर कदम रखते ही मोबाइल की रोशनी बेकार लगने लगती है, आवाज़ें दब जाती हैं और यह एहसास होने लगता है कि इंसान यहां लाखों बरस देर से आया हुआ मेहमान है।
वैज्ञानिक मानते हैं कि लाखों सालों से बस्तर की चूना-पत्थर की गुफाएं ऐसे ही बनी हुई हैं। न मौसम की हलचल, न बाहरी दुनिया की भागदौड़। अंदर का तापमान, नमी और हवा का बहाव लगभग वैसा ही रहा है, जैसा तब था जब यहां इंसान का नामोनिशान भी नहीं था। इसी स्थिरता ने यहां ऐसे जीवों और सूक्ष्मजीवों को जगह दी, जो सिर्फ़ अंधेरे और खामोशी में ही ज़िंदा रह सकते हैं।
कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के भीतर हाल ही में पहचानी गई ‘ग्रीन गुफा’ भी ऐसी ही एक जगह है। इसकी दीवारों पर दिखने वाली हरी परतें पहली नज़र में सुंदर लगती हैं, लेकिन वैज्ञानिकों के लिए वे सिर्फ़ रंग नहीं हैं, वे इस बात का संकेत हैं कि गुफा के भीतर कोई बेहद नाज़ुक जीवन तंत्र मौजूद है। इन दिनों यह ग्रीन गुफा चर्चा में है। लेकिन इसका कारण केवल इसकी वैज्ञानिक विशिष्टता नहीं, बल्कि इसे पर्यटन के लिए खोलने का सरकारी फैसला है। इस फैसले के बाद संरक्षण, विकास और पर्यटन की अवधारणा पर बहस शुरु हो गई है और मामला अदालत तक जा पहुंचा है।
कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के भीतर ‘ग्रीन गुफा’ एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक घटना के रूप में देखी गई। प्रारंभिक अवलोकनों में विशाल कमरानुमा गुफा की दीवारों और सतहों पर हरे रंग की सूक्ष्म परतें पाई गईं, जिन्हें विशेषज्ञ संभावित माइक्रोबियल मैट्स मान रहे हैं। ऐसी परतें अक्सर फोटोसिंथेटिक या कीमो-सिंथेटिक सूक्ष्मजीवों से बनी होती हैं, जो अत्यंत सीमित और स्थिर परिस्थितियों में विकसित होती हैं।


वैज्ञानिक दृष्टि से ये ग्रीन गुफाएं पृथ्वी के सबसे नाजुक पारिस्थितिक तंत्रों में गिनी जाती हैं। इनमें विकसित जैविक समुदाय हजारों से लाखों वर्षों में बनते हैं और प्रकाश, तापमान, नमी या वायु प्रवाह में मामूली बदलाव से भी असंतुलित हो सकते हैं। यही कारण है कि दुनिया के कई हिस्सों में ऐसी गुफाओं को पर्यटन से पूरी तरह बाहर रखा गया है।
लेकिन कांगेर घाटी में ग्रीन गुफा की खोज के साथ ही यहां आने वाले पर्यटकों का तांता लग गया। राज्य के वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा, “लाइकेन की हरियाली से सजी यह गुफा दृश्य और जैव विविधता दोनों में अद्वितीय है। वन विभाग द्वारा जल्द ही इसे पर्यटकों के लिए खोलने की तैयारी से बस्तर पर्यटन को नई पहचान मिलेगी। यह खोज न केवल बस्तर की विरासत को समृद्ध करती है, बल्कि वैश्विक धरोहर की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।”
छत्तीसगढ़ के वन विभाग ने इसे पर्यटन मानचित्र पर लाने की योजना घोषित कर दी। दिसंबर 2025 में कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में आयोजित एक बैठक में गुफा के प्रवेश द्वार, सीढ़ियों और पाथवे के निर्माण का प्रस्तुतीकरण किया गया। इसके तुरंत बाद वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा इसे शीघ्र पर्यटकों के लिए खोलने और प्रचार-प्रसार के निर्देश दिए गए।
सरकारी अधिकारियों का तर्क था कि गुफा में अनियंत्रित मानवीय गतिविधियाँ हो रही हैं, लोग दीवारों पर नाम खोद रहे हैं, जिससे विरासत को नुकसान पहुँचता है। इसलिए नियंत्रित संरचनाएँ बनाकर गुफा को ‘संरक्षित’ किया जाएगा।

आनन-फानन में इस ग्रीन गुफा के मुहाने और उसके आसपास निर्माण का काम शुरु कर दिया गया। जनवरी के अंत तक इसे पर्यटकों के लिए खोलने की तैयारी हो गई। वन विभाग ने अपनी बैठकों में इसे पूरे राज्य भर में प्रचारित-प्रसारित करने का फैसला किया। लेकिन गुफा-विज्ञान और संरक्षण जीवविज्ञान के विशेषज्ञ इस फैसले के खिलाफ खड़े हो गए।
बस्तर की गुफाएं: समय, पानी और जीवन की कहानी
असल में बस्तर क्षेत्र में फैली चूना-पत्थर की गुफाएं केवल प्राकृतिक आश्चर्य नहीं हैं, बल्कि वे समय, पानी और जीवन के बीच लाखों वर्षों तक चली एक धीमी, निरंतर प्रक्रिया का परिणाम हैं। कोटमसर, दंडक, कैलाश, मादर कोंटा और हरि जैसी गुफाएं भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे पुरानी भूवैज्ञानिक संरचनाओं में गिनी जाती हैं। भूवैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, इनमें से कई गुफाएं इंद्रावती समूह की उन चूना-पत्थर संरचनाओं से जुड़ी हैं, जिनकी आयु लगभग 57 से 80 करोड़ वर्ष मानी जाती है।
वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि इन गुफाओं का निर्माण किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि एक अत्यंत धीमी और जटिल प्रक्रिया है। लंबे समय तक पानी, कार्बन डाइऑक्साइड और चूना-पत्थर के बीच हुई रासायनिक अंतःक्रिया ने इन संरचनाओं को धीरे-धीरे घुलाया और पुनर्गठित किया। इसी प्रक्रिया ने भूमिगत सुरंगों, विशाल कक्षों और जलमार्गों को जन्म दिया, जो समय के साथ गुफाओं का रूप लेते गए। यह परिवर्तन इतने लंबे कालखंड में हुआ कि मानवीय समयबोध में इसकी कल्पना करना भी कठिन है।
इसी भूवैज्ञानिक स्थिरता ने गुफाओं के भीतर एक अलग ही संसार को विकसित होने दिया। सतह के वातावरण से लगभग कटे हुए इन स्थानों में तापमान, नमी, वायु प्रवाह और प्रकाश की स्थिति लंबे समय तक लगभग अपरिवर्तित रहती है। यही कारण है कि गुफाएं एक विशिष्ट माइक्रोक्लाइमेट प्रदान करती हैं, ऐसा सूक्ष्म वातावरण, जिसमें जीवन के कुछ अत्यंत विशिष्ट रूप ही टिक पाते हैं।
कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में स्थित कोटमसर गुफा इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। लगभग 1,500 मीटर लंबी और 45 मीटर गहरी इस गुफा में कई विशाल कक्ष, संकरे मार्ग और भूमिगत जलधाराएं हैं। यहां बिना आंखों वाली मछलियां, ट्रोग्लोबाइट कीट और विशेष प्रकार के सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं, जो पूरी तरह अंधकार में जीवन के लिए अनुकूलित हैं। इन जीवों की शारीरिक संरचना और व्यवहार इस बात का प्रमाण है कि वे केवल गुफा के स्थिर वातावरण में ही जीवित रह सकते हैं।

वैज्ञानिक कोटमसर गुफा को एक प्राकृतिक प्रयोगशाला मानते हैं, जहां भू-रासायनिक और जैविक प्रक्रियाएं बिना बाहरी हस्तक्षेप के घटित होती रही हैं। यही कारण है कि यह गुफा न केवल भारत में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गुफा-जीवविज्ञान और माइक्रोबियल अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसी गुफाओं की यह स्थिरता जितनी अनोखी है, उतनी ही नाज़ुक भी। जब गुफाओं में लगातार मानव गतिविधियां शुरू होती हैं, तो गुफा के भीतर का माइक्रोक्लाइमेट धीरे-धीरे बदलने लगता है। मनुष्यों की उपस्थिति से तापमान और नमी में हल्का-सा इज़ाफ़ा होता है, हवा में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है और धूल-कण भीतर तक पहुंचने लगते हैं।
ये बदलाव तुरंत बड़े नुकसान की तरह दिखाई नहीं देते। कई वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, गुफाओं के पारिस्थितिक तंत्र में मानव हस्तक्षेप का असर अक्सर वर्षों या दशकों बाद स्पष्ट होता है। इस दौरान जैविक संतुलन धीरे-धीरे बिगड़ता रहता है, और जब उसके संकेत साफ़ दिखने लगते हैं, तब तक नुकसान इतनी गहराई तक पहुंच चुका होता है कि उसे पलटना लगभग असंभव हो जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, गुफा-विशिष्ट जीव सामान्य पर्यावरणीय उतार-चढ़ाव के लिए अनुकूलित नहीं होते। तापमान, नमी या प्रकाश में मामूली परिवर्तन भी उनके जीवन-चक्र को बाधित कर सकता है। यही वजह है कि दुनिया के कई हिस्सों में इस तरह की संवेदनशील गुफाओं को पर्यटन गतिविधियों से पूरी तरह बाहर रखा गया है, या वहां बेहद सख़्त प्रवेश नियम लागू किए गए हैं।
ग्रीन गुफा के संदर्भ में भी पर्यावरण प्रेमियों की चिंता इसी अनुभव पर आधारित है। उनका कहना है कि जिस प्रकार की हरी सूक्ष्म परतें, संभावित माइक्रोबियल मैट्स, यहां देखी गई हैं, वे अत्यंत स्थिर और सीमित परिस्थितियों में ही विकसित होती हैं। प्रकाश, नमी या वायु प्रवाह में मामूली बदलाव भी इनके अस्तित्व को खतरे में डाल सकता है। ऐसे में किसी भी प्रकार का निर्माण या नियमित मानवीय प्रवेश गुफा के पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
अदालत का हस्तक्षेप और नीति के सवाल
ऐसे वैज्ञानिक दावों के बीच जब कांगेर घाटी में खोजी गई नई ‘ग्रीन गुफा’ को पर्यटकों के लिए खोले जाने का सरकारी फैसला सामने आया तो पर्यावरण प्रेमियों ने इस पर आपत्ति जताई और मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट तक जा पहुंचा।
हालांकि छत्तीसगढ़ के प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्यजीव, अरुण पांडेय का कहना है कि इस तरह का असर उन गुफाओं में होता है, जो बेहद संवेदनशील होती हैं। छत्तीसगढ़ की ग्रीन गुफा इससे अलग है। अरुण पांडेय का कहना है कि कांगेर घाटी की गुफाओं और प्राकृतिक धरोहरों के कारण ही कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान को यूनेस्कों के विश्व धरोहर स्थलों की अस्थायी सूची में शामिल किया गया है। साथ ही यहां की कई गुफाएँ भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण द्वारा जियो-हेरिटेज साइट घोषित की जा चुकी हैं।

अरुण पांडेय ने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “पिछले 40 सालों से हम पर्यटकों को कांगेर घाटी की दूसरी गुफाओं को दिखा रहे हैं। लेकिन पर्यटन से इस गुफा पर कोई असर पड़ा हो, ऐसा अब तक नहीं हुआ। पिछले साल 24 सितंबर को कांगेर घाटी नेशनल पार्क के निदेशक ने जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया से ग्रीन गुफा और झूमर गुफा को पर्यटकों के लिए खोले जाने को लेकर राय मांगी थी और उनकी राय के बाद ही ग्रीन गुफा को पर्यटकों के लिए खोलने का फ़ैसला किया गया। ”
लेकिन इस मामले में राज्य सरकार के ख़िलाफ़ जनहित याचिका दायर करने वाले पर्यावरण प्रेमी नितिन सिंघवी का कहना है कि गुफाओं के संदर्भ में नियंत्रित पहुँच अक्सर पहुँच के विस्तार का पहला चरण साबित होती है। एक बार जब सीढ़ियाँ, पाथवे और साइनेज बन जाते हैं, तो पर्यटकों की संख्या बढ़ती है, प्रकाश व्यवस्था जोड़ी जाती है और अंततः गुफा का माइक्रोक्लाइमेट बदलने लगता है। यह प्रक्रिया धीरे चलती है, लेकिन इसके प्रभाव स्थायी होते हैं। ग्रीन गुफा के मामले में यही आशंका सामने आई, जिसके कारण इस योजना के खिलाफ उन्होंने जनहित याचिका दायर की।
नितिन सिंघवी ने मोंगाबे हिंदी से कहा, “प्रस्तावित निर्माण और पर्यटन गतिविधियां संरक्षण नहीं, बल्कि एक अत्यंत नाजुक पारिस्थितिक तंत्र को जोखिम में डालने जैसा है। इको-टूरिज़्म को अक्सर बिना पर्याप्त वैज्ञानिक मूल्यांकन के सतत विकास का पर्याय मान लिया जाता है। दुनिया भर में गुफाओं, प्रवाल भित्तियों और वर्षावनों के उदाहरण बताते हैं कि अत्यधिक या गलत ढंग से प्रबंधित पर्यटन ने कई पारिस्थितिक प्रणालियों को अपूरणीय क्षति पहुँचाई है। कुछ प्राकृतिक तंत्र मानव उपस्थिति के लिए नहीं बने होते और उनका संरक्षण ‘न पहुँचने’ में ही निहित होता है।”

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान इस गुफा को लेकर भारत सरकार की प्रतिष्ठित संस्था बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान, लखनऊ के निदेशक महेश जी. ठक्कर की अनुशंसा भी प्रस्तुत की गई, जिसमें कहा गया था कि सभी निर्माण और पर्यटन गतिविधियाँ तुरंत रोकी जाएं, जब तक बहु-विषयक वैज्ञानिक अध्ययन पूरे न हो जाएं। स्पेलियोलॉजी, जियोमाइक्रोबायोलॉजी, पारिस्थितिकी, भूविज्ञान और संरक्षण विज्ञान के विशेषज्ञों द्वारा समग्र पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिक प्रभाव आकलन किया जाए।
उन्होंने अपनी अनुशंसा में कहा कि सार्वजनिक प्रवेश पर विचार करने से पहले कड़े संरक्षण प्रोटोकॉल और प्रवेश नियम बनाए जाएं। यदि कभी पर्यटन की अनुमति दी जाए, तो वह अत्यंत सीमित, नियंत्रित और विज्ञान-आधारित हो, जिसमें संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए। ठक्कर की राय थी कि ग्रीन गुफा को केवल पर्यटन स्थल के रूप में देखने के बजाय सबसे पहले एक वैज्ञानिक और पारिस्थितिक संपदा के रूप में देखा जाना चाहिए।
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इस सुनवाई के बाद अदालत ने राज्य सरकार से शपथ पत्र मांगा और सरकार को आदेश दिया कि राज्य गुफाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करता रहेगा और साथ ही सामान्य जनता की पहुंच को भी विनियमित एवं प्रतिबंधित करेगा, ताकि गुफाओं के पारिस्थितिक, भूवैज्ञानिक तथा विरासत मूल्य को किसी प्रकार की क्षति न पहुँचे।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के अधिवक्ता जितेंद्र कुमार कहते हैं, “देश में 1,500 से अधिक ज्ञात चूना-पत्थर की गुफाएं हैं, लेकिन इनके लिए कोई समर्पित राष्ट्रीय संरक्षण नीति नहीं है। गुफाएं अक्सर वन्यजीव संरक्षण, आर्द्रभूमि प्रबंधन और सांस्कृतिक विरासत कानूनों के बीच नीतिगत शून्य में फंस जाती हैं। ग्रीन गुफा इस शून्य का प्रतीक बनकर उभरी है।”
लेकिन राज्य सरकार का तर्क है कि संरक्षण के साथ अगर पर्यटन किया जाए तो गुफाओं को कोई नुकसान नहीं होगा। राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्यजीव, अरुण पांडेय कहते हैं, “कल्पना करें कि हड़प्पा और मोहेंजो दड़ो जैसी जगहों को छोड़ दिया जाता तो हम अपनी सभ्यता के बारे में कितना जान पाते? क्या इन गुफाओं को ध्वस्त होने दें या आवारा घूमने वाले लोगों को इसे नष्ट करने दें? हम चाहते हैं कि नई पीढ़ी अपनी धरोहरों को देखे, समझे, जाने और शोध के लिए आगे आए।”
फिलहाल सबकी निगाहें अदालत पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि ‘ग्रीन गुफा’ विकास की दौड़ में एक और पर्यटन स्थल बनेगी या विज्ञान, समय और प्रकृति की साझा विरासत के रूप में संरक्षित रहेगी।
बैनर तस्वीरः कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के भीतर ‘ग्रीन गुफा’ एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक घटना के रूप में देखी गई। प्रारंभिक अवलोकनों में विशाल कमरानुमा गुफा की दीवारों और सतहों पर हरे रंग की सूक्ष्म परतें पाई गईं, जिन्हें विशेषज्ञ संभावित माइक्रोबियल मैट्स मान रहे हैं। तस्वीर- डीपीआर छत्तीसगढ़