- हल्दिया व साहिबगंज की तरह वाराणसी के रामनगर में भी राष्ट्रीय जलमार्ग-1 से परिवहन के लिए एक मल्टी मॉडल टर्मिनल (एमएमटी) का निर्माण किया गया है। हालांकि अबतक यहां से नियमित परिवहन शुरू नहीं हो पाया है।
- आईडब्ल्यूएआई के कार्गो पोर्टल के डेटा के एक विश्लेषण के अनुसार, वर्ष 2024-25 में वाराणसी एमएमटी से सिर्फ दो बार नौवहन हुआ। नवंबर 2018 से दिसंबर 2025 तक वाराणसी एमएमटी से सिर्फ 1057.88 मीट्रिक टन माल का परिवहन हुआ है।
- सरकार ने खुद यह स्वीकार किया है कि वापसी की यात्रा के लिए कार्गाे की गैरमौजूदगी, जहाज संचालन के लिए निजी क्षेत्र की कम भागीदारी जैसी चुनौतियां जल परिवहन को हतोत्साहित करती हैं।
पश्चिम बंगाल के हल्दिया व झारखंड के साहिबगंज की तरह उत्तर प्रदेश में वाराणसी के पास रामनगर में गंगा नदी के किनारे राष्ट्रीय जलमार्ग-1 के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में मल्टीमॉडल टर्मिनल का निर्माण किया गया है। साल 2016 में तत्कालीन जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी ने इसकी आधारशिला रखते समय दो जहाजों को हरी झंडी दिखाकर यहां से परिवहन के जल्द शुरू होने के संकेत दिए। उसके ठीक सवा दो साल बाद नवंबर 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में इस टर्मिनल का उदघाटन किया और इसे राष्ट्र को समर्पित किया।
प्रधानमंत्री मोदी ने तब कहा था, “अब पूर्वी उत्तर प्रदेश जलमार्ग से बंगाल की खाड़ी से जुड़ गया है। अंतर्देशीय जलमार्ग से समय एवं धन की बचत होगी और सड़कों पर भीड़ कम होगी, ईंधन की लागत कम होगी और वाहनों से होने वाला प्रदूषण कम होगा।”
हालांकि, तत्कालीन जहाजरानी मंत्री की इस घोषणा के करीब एक दशक व प्रधानमंत्री के ऐलान के सात साल से अधिक का वक्त गुजर जाने के बाद राष्ट्रीय जलमार्ग-1 से होकर परिवहन में कोई गुणात्मक बदलाव नहीं आया है। जल परिवहन में सभी महीनों में नदी की पर्याप्त गहराई एक बड़ी समस्या बनी हुई है।
वाराणसी एमएमटी के डीपीआर के अनुसार, यहां से वर्ष 2020 तक प्रतिवर्ष 3.35 मिलियन टन, 2025 तक प्रतिवर्ष 3.82 मिलियन टन, 2035 तक प्रतिवर्ष 10.12 मिलियन टन और 2045 तक प्रतिवर्ष 10.32 मिलियन टन परिवहन का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग विकास प्राधिकरण (आईडब्ल्यूएआई) अपने इन लक्ष्यों से काफी पीछे है।
आईडब्ल्यूएआई के वाराणसी में असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में तैनात संजीव कुमार से मोंगाबे हिंदी ने वाराणसी एमएमटी से लगने वाले फेरों की संख्या व परिचालन में आने वाली चुनौतियों से जुड़ा सवाल पूछा, जिसका उन्होंने कोई सीधा जवाब नहीं दिया। पिछले साल अगस्त में हुई इस बातचीत में उन्होंने कहा, “हमारे यहां से परिवहन हो रहा है, अभी 300 टन क्षमता का एक जहाज लोड हो रहा है, जो वाराणसी से फरक्का जाएगा।”

जलमार्गों पर रिसर्च करने वाली संस्था मंथन अध्ययन केंद्र द्वारा आईडब्ल्यूएआई के कार्गो पोर्टल के डेटा के एक विश्लेषण के अनुसार, वर्ष 2024-25 में वाराणसी एमएमटी से सिर्फ दो बार नौवहन हुआ। एक बार अप्रैल 2024 में वाराणसी एमएमटी से 119.88 मीट्रिक टन उर्वरक कोलकाता भेजा गया और दूसरी बार दिसंबर 2024 में 200 मीट्रिक टन कोयला कोलकाता से वाराणसी एमएमटी भेजा गया। मंथन अध्ययन केंद्र की एक गणना के अनुसार, नवंबर 2018 से दिसंबर 2025 तक वाराणसी एमएमटी से 1057.88 मीट्रिक टन का परिवहन हुआ है।
“सरकारी दावों से जमीनी स्थिति बिल्कुल अलग है और जो सवाल हमने उठाये हैं वे कायम हैं। वाराणसी एमएमटी से प्रतिवर्ष तीन मिलियन टन (3.35 मिलियन टन) कार्गो परिवहन का लक्ष्य रखा गया था, जो दूर-दूर तक संभव नहीं है। इतनी मात्रा में परिवहन के लिए पानी की जो गहराई व प्रवाह पूरे साल चाहिए, वह नहीं है,” मंथन अध्ययन केंद्र के संस्थापक संयोजक श्रीपद धर्माधिकारी ने मोंगाबे हिंदी से बातचीत में कहा।
“साथ ही उस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कार्गो मालिकों से जितनी मांग चाहिए वह भी नहीं है। दूसरे यातायात विकल्पों से जलमार्ग की तुलना में जल्दी माल पहुंच जाएगा तो उसमें कोई फायदा माल परिवहन करने वालों को नजर नहीं आएगा,” उन्होंने आगे बताया।
वे कहते हैं, “नेविगेशन चैनल बनाने के लिए जो खर्च होगा वह कम नहीं होगा और फिर बाढ़ के दिनों में या कम पानी के दिनों में उस चैनल को बनाए रखना मुश्किल होगा। सरकार जल परिवहन को प्रोत्साहित करने के लिए सब्सिडी दे रही है। मुझे लगता है कि परियोजना का आकलन ठोस आधार पर होना चाहिए।” नेविगेशन चैनल (नौवहन मार्ग) बड़े जहाजों के आने-जाने का मार्ग होता है, जिसमें एक निश्चित न्यूनतम गहराई और चौड़ाई के साथ जल प्रवाह की आवश्यकता होती है, ताकि जलयान फंसे नहीं और वे अपने रास्ते पर आगे बढते रहें।

धर्माधिकारी ने मोंगाबे हिंदी से बातचीत में जो चिंताएं रेखांकित की, उसकी पुष्टि सरकारी दस्तावेजों व संसद में दिए गए जवाब से भी होती है। एक सरकारी वक्तव्य के अनुसार, जलमार्ग-1 पर कोलकाता से पटना के बीच ट्रांजिट का समय सात दिन, पटना से वाराणसी के बीच पांच दिन और कोलकाता से वाराणसी के बीच 14 दिन तय किया गया है।
दिसंबर 2025 को लोकसभा में कुछ सांसदों के सवाल के जवाब में सरकार ने बताया कि हल्दिया से वाराणसी तक राष्ट्रीय जलमार्ग-1 पर कम से कम दो से 2.3 मीटर गहराई और 45 मीटर बॉटम चौड़ाई बनाए रखने के लिए 10 स्ट्रेच पर नौवहन मार्ग तैयार करने के लिए ठेके दिए गए हैं। इस जवाब में पत्तन, पोत एवं जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने अंतर्देशीय जल परिवहन को आगे बढ़ाने में मौजूद प्राकृतिक और मानव सम्बन्धी दिक्कतों का जिक्र किया।
उन्होंने बताया कि नदियों में पानी का बहाव, मानसून व सूखे मौसम के बीच काफी अधिक मौसमी बदलाव, नेविगेशन लॉक के बिना ऊपरी स्ट्रेच या इलाकों में बांध-बैराज और सिंचाई परियोजनाएं होना कुछ नदी सम्बन्धी परेशानियां हैं। वहीं, जलमार्ग के साथ वापसी यात्रा में कार्गाे की गैर मौजूदगी, जलमार्गाें के किनारे कम औद्योगिकीकरण, पहले व आखिरी माइल कनेक्टविटी के कारण कुल लागत अधिक होना, और वेसल्स या जहाज और टर्मिनल के संचालन में निजी क्षेत्र की कम भागीदारी भी ऐसे कारण हैं जो इस परिवहन को आगे बढ़ने से रोकते हैं।
जल परिवहन को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार के उपाय
यह स्पष्ट है कि जलमार्ग-1 के जरिए परिवहन सरकार के द्वारा तय लक्ष्य से काफी पीछे है। जल परिवहन के लिए कार्गो मालिकों को आकर्षित करने के लिए सरकार समय-समय पर नए कदम उठाती है। इसी क्रम में केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय द्वारा दिसंबर 2024 में 95.42 करोड़ रुपए की जलवाहक स्कीम लांच गई। इस स्कीम का उद्देश्य लॉजिस्टिक लागत कम करते हुए कार्गो स्वामियों को रेल व रोड परिवहन से जल परिवहन की ओर आकर्षित करना है। इसके तहत उन्हें इन्सेंटिंव देकर प्रोत्साहित किया जाएगा। राष्ट्रीय जलमार्ग-1, 2 एवं 16 पर 300 किमी से अधिक की दूरी के लिए जल परिवहन के विकल्प को चुनने वाले कार्गाे मालिकों को परिचालन व्यय का 35% प्रतिपूर्ति (reimbursement) के रूप में देने का प्रावधान है। इसके अलावा कार्गो मालिकों, कंपनियों व जहाज ऑपरेटरों के साथ स्टेक होल्डर मीटिंग का भी आयोजन किया जाता है।

वहीं, राष्ट्रीय जलमार्ग-1 पर फेयरवे रखरखाव के लिए 1,312.79 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। सरकार द्वारा संसद में एक सवाल के जवाब में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, जलमार्ग-1 के विभिन्न स्ट्रेच में ड्रेजिंग के लिए 767.52 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। गाजीपुर से वाराणसी स्ट्रेच में ड्रेजिंग की प्रक्रिया शुरू की गई है और वर्ष 2025 से 2028 के दौरान इसे पूरा किया जाएगा। उपरोक्त व्यय राशि 767.52 करोड़ रुपए में ड्रेजिंग के खर्च का ब्यौरा शामिल नहीं है।
संसद की परिवहन संबंधी स्थायी समिति की चिंताएं
संसद की परिवहन, पर्यटन एवं संस्कृति संबंधी स्थायी समिति (स्टैंडिंग कमेटी) ने अपनी रिपोर्ट में जलमार्ग विकास प्रोजेक्ट (राष्ट्रीय जलमार्ग-1) से संबद्ध खंड में कहा है कि समिति पूंजी निवेश और रखरखाव व्यय में एक असंतुलन देखती है, जो समिति की राय में बुनियादी ढांचे के विकास की रणनीति में एक गंभीर चिंता को दर्शाता है। समिति ने कहा है कि जबकि परियोजना ने वाराणसी, साहिबगंज और हल्दिया में मल्टीमॉडल टर्मिनल बनाने में प्रगति दिखायी है, तब प्रमाण बताते हैं कि कार्यान्वयन चुनौतियां बनी हुई हैं। कुछ निविदाएं अनुमानित मूल्यों से काफी अधिक बोलियों के कारण रद्द कर दी गई हैं।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में जलमार्ग में नेविगेशन या नौगम्यता सुनिश्चित करने के लिए नियमित ड्रेजिंग और चैनलों का रखरखाव आवश्यक है तो उसके लिए 267 करोड़ रुपए का वर्तमान आंवटन अपर्याप्त लगता है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में अधिक रणनीतिक दृष्टिकोण की सिफारिश की है। समिति ने वित्त पोषण रणनीति पर भी विचार का सुझाव दिया। समिति ने कहा है कि वास्तविक निजी निवेश कम है और एक व्यापक अंतर्देशीय जलमार्ग निवेश फ्रेमवर्क स्थापित किया जाना चाहिए, जो विशेष तौर पर वैल्यू चेन के कई सेगमेंट में निजी पूंजी निवेश को आकर्षित करने के लिए डिजाइन किया गया हो। उल्लेखनीय है कि निजी सेक्टर की भागीदारी व निविदा वाले बिंदु का मोंगाबे हिंदी ने जलमार्ग कड़ी की अपनी पूर्व की रिपोर्ट में प्रमुखता से उल्लेख किया था।

वाराणसी-प्रयागराज स्ट्रेच की उपयोगिता सीमित
सरकार ने भले ही जलमार्ग-1 का विस्तार हल्दिया से वाराणसी के बजाय हल्दिया से प्रयागराज तक कर दिया हो लेकिन वाराणसी से प्रयागराज तक का हिस्सा (230 किमी लंबा) परिवहन के लिए तुलनात्मक रूप से कम प्राथमिकता वाला क्षेत्र है।
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आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने जब 2018 में 5369.18 करोड़ रुपए लागत के जलमार्ग विकास प्रोजेक्ट को स्वीकृति दी थी, उसमें हल्दिया से वाराणसी तक के हिस्से का जिक्र था। आईडब्ल्यूएआई के प्रयागराज में डिप्टी डायरेक्टर ब्रजेश कुमार ने मोंगाबे हिंदी को बताया, “हमारा मुख्य इन्फ्रास्ट्रक्चर वाराणसी में ही है, यहां (प्रयागराज में) सरस्वती घाट पर छोटा फ्लोटिंग जेटी है।” उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि सामान्य दिनों में परिवहन के लिए पानी की पर्याप्त मात्रा नहीं होती है। अप्रैल 2022 में राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में जहाजरानी मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा, “राष्ट्रीय जलमार्ग-1 के प्रयागराज से वाराणसी स्ट्रेच में केवल छः महीने तक ही नौवहन के लायक पानी रहता है। लीन पीरियड के दौरान विभिन्न उथले, कठोर परतों एवं पीपा पुल के निर्माण से इस स्ट्रेच पर नौवहन करना मुश्किल हो जाता है।”
यह रिपोर्ट देश के विभिन्न राष्ट्रीय जलमार्गों पर मोंगाबे हिंदी की सीरीज का पांचवा और अंतिम भाग है। इस सीरीज का पहला, दूसरा, तीसरा, और चौथा भाग यहां पढ़ें।
बैनर तस्वीरः यमुना नदी स्थित सरस्वती घाट। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे