- महाराष्ट्र के पुणे जिले में सर्वाधिक बारिश वाले इलाके में पहाड़ों के पास बसे कुछ गांवों को फरवरी से ही सूखे जैसे हालातों का सामना करना पड़ता रहा है, क्योंकि पानी खड़ी ढलानों से बह जाता है।
- पुणे के वेल्हे तालुक (जिसे आधिकारिक तौर पर राजगढ़ के नाम से जाना जाता है) के निवासी सामुदायिक श्रम से पत्थर की संरचनाएं और खेत में तालाब बनाकर पानी रोक रहे हैं, जिससे वे धान के अलावा साल भर फल और सब्जियों से भी कमाई कर पा रहे हैं।
- हालांकि पानी के टैंकरों पर निर्भरता कम हो गई है, लेकिन इलाके में खेती के लिए खेती के लिए पर्याप्त पानी अभी भी सिर्फ उन्हीं लोगों को मिल रही है जो जोखिम उठाने की क्षमता रखते हैं।
जैसे ही सहयाद्रि पवर्तमाला पर सुबह की धुंध पर छंटती है, तो राजगढ़ किले की टेढ़ी-मेढ़ी आकृति दिखाई देने लगती है। आधार गांव गुंजावने से पर्वतारोही अपनी चढ़ाई शुरू कर रहे हैं। महाराष्ट्र के पुणे के पास स्थित कंक्रीट के जंगल से निकलकर आने वाले अधिकांश पर्यटकों के लिए यह दृश्य सुहावना लगता है। वे स्थानीय दुकानों से बोतलबंद पानी खरीदते हैं। वे शायद इस विडंबना से अनजान हैं कि उनके पैरों तले प्रचुरता के बीच भी पानी की किल्लत है।
महाराष्ट्र में पुणे जिले का सबसे छोटा तालुका वेल्हे में हर साल औसतन 2,500 मिमी से अधिक बारिश होती है। यह आंकड़ा जिले में सबसे ज्यादा है। फिर भी, फरवरी तक इसके 129 गांवों में से कई को हमेशा सूखे जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है। गर्मी के महीनों में तो पेयजल और खेती के लिए टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ता है। समस्या पानी की कमी नहीं है, बल्कि इस पहाड़ी, ऊबड़-खाबड़ इलाके में पानी का न टिक पाना है। बारिश का पानी तुरंत ढलानों से बह जाता है, मिट्टी को काटता है, कुछ देर के लिए कुओं और झरनों को भरता है और फिर गायब हो जाता है।
बहाव को धीमा करने की कला
राजगढ़ जाने के लिए आधार शिविर के पास गुंजवने के सरपंच और 32 साल से ग्राम पंचायत के अनुभवी सदस्य लक्ष्मण रसाल पहाड़ी नदी के किनारे गिरे बड़े-बड़े पत्थरों के ऊपर से चलते हैं। वह नदी के किनारे बने गैबियन स्ट्रक्चर यानी स्थानीय पत्थरों से बनाई गई दीवारों को दिखाते हैं। ये गुंजवने नदी के पानी का पूरा फायदा उठाने के लिए सोची-समझी “माइक्रोवाटरशेड” रणनीति का हिस्सा हैं।

“हमें पानी के बहाव की गति को कम करना चाहिए, तेजी से बह रहे पानी को रोकना चाहिए और ठहरे हुए पानी को जमीन में रिसने देना चाहिए,” रेनट्री फाउंडेशन के क्षेत्रीय अधिकारी प्रवीण सांगा शेट्टी जलग्रहण प्रबंधन की अवधारणा समझाते हुए कहते हैं। वे बताते हैं कि वेल्हे क्षेत्र की स्थानीय भू-रचना के कुछ हिस्से सघन और कठोर बेसाल्ट चट्टानों से बने हैं, जिसके चलते पानी का जमीन में गहराई तक जाना मुश्किल होता है। इसलिए यहां ध्यान गहराई में पानी पहुंचाने के बजाय सतही जल और मिट्टी की नमी को बनाए रखने पर केंद्रित किया जाता है।
यह समुदाय-आधारित कोशिश है। सरपंच, ग्राम सेवक (ग्राम पंचायत के सचिव और मुख्य कार्यकारी अधिकारी) तथा स्वैच्छिक ग्राम विकास समिति समुदाय को जलग्रहण गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रेरित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। हालांकि कुछ लोगों को मजदूरी के लिए भुगतान किया जाता है, लेकिन ज्यादातर काम श्रमदान पर निर्भर करता है। इस सामूहिक प्रयास और गैर-लाभकारी संस्थाओं के वित्तीय सहयोग से गांव के निवासियों ने एक पुराने जलसंचय टैंक को भी आबाद किया, जो कभी गाद से भर गया था। लगभग 1,100 की आबादी वाले गुंजवणे गांव में कुओं का जलस्तर बढ़ा है और इसका लाभ नीचे वाले क्षेत्रों तक भी पहुंचा है, ऐसा रासल कहते हैं। रेनट्री फाउंडेशन के अनुसार, टैंक के आसपास के कुओं में जलस्तर बारिश के मौसम में लगभग एक फुट और शुष्क मौसम में लगभग सात फुट ज्यादा पाया गया। गाद हटाने का काम वर्ष 2023 में किया गया था और जलस्तरों की तुलना साल 2022 और 2024 के बीच की गई।
रखरखाव से एक और लाभ हुआ है: गाद हटाने के दौरान पोषक तत्वों से भरपूर गाद निकलती है। इसे फेंकने के बजाय, गाद किसानों में बांट दी जाती है, जिससे बहकर आई ऊपरी मिट्टी खेतों में वापस आ जाती है।
हर बूंद के लिए योजना
अक्टूबर और नवंबर में हवा में कभी-कभी इंद्रायणी चावल की खुशबू आती है, जो महाराष्ट्र का खास खुशबूदार अनाज है और पुणे जिले में उपजता है। हालांकि, वेल्हे में चावल मुख्य फसल है, लेकिन यह बारिश पर निर्भर है। जिले में सबसे कम सिंचाई वाला इलाका होने के कारण, आय बढ़ाने के लिए दूसरी या तीसरी फसल उगाना भी मुश्किल था।

गुंजवने के पास बसे सखार गांव के मोहम्मद शेख काटे गए धान के करीने से रखे भूरे बंडलों के पास खड़े होकर कहते हैं, “सिर्फ चावल उगाना फायदेमंद नहीं है।” मई से नवंबर तक पारंपरिक चावल उगाने के दौरान उनकी पूंजी “फंस” जाती थी। अब, पानी बचाने वाली सिंचाई तकनीकों से वह सिर्फ चावल से आगे बढ़ गए हैं। अपने तीन एकड़ में, वह स्प्रिंकलर सिस्टम का इस्तेमाल करके 45 दिन के छोटे चक्र में चना और मेथी (मेथी) और धनिया जैसी पत्तेदार सब्जियां उगाते हैं।
लेकिन, शेख को पानी कहां से मिलता है?
उनकी जमीन पर खोदे गए एक कृत्रिम तालाब में लगभग 400,000-500,000 (4-5 लाख) लीटर बारिश का पानी जमा होता है। यह तालाब बैडमिंटन कोर्ट से थोड़ा बड़ा है। रेनट्री फाउंडेशन ने खेत में बने इन तालाबों को बनाने, प्लास्टिक लाइनिंग और उनके रखरखाव के लिए तकनीकी मदद और लगभग ₹75,000 दिए।
उपाध्यक्ष (संचालन) स्वानंद दामले कहते हैं कि इस गैर-लाभकारी संस्था ने वेल्हे के नौ गांवों में वाटरशेड से जुड़े कामों पर करीब 45 लाख रुपए खर्च किए हैं। ग्राम विकास समितियों (वीडीसी) के जरिए उन्होंने स्थानीय स्तर पर पानी की चुनौतियों का पता लगाया और उन किसानों की पहचान की जिन्हें मदद की जरूरत थी। उन्होंने 73 खेतों में तालाब खोदे और नदी से गाद निकालने, परकोलेशन टैंक से गाद निकालने, खेत में तालाब बनाने, पानी के बजट के बारे में जागरूकता जैसे दूसरे काम भी किए। तालाब के आकार के हिसाब से, किसान जमीन खोदने और मजदूरी पर करीब 30,000 रुपए खर्च करते हैं। दामले बताते हैं कि फाउंडेशन किसानों को स्थानीय हालात के हिसाब से फसलें चुनने और घरेलू और खेती, दोनों तरह के इस्तेमाल के लिए पानी का बजट बनाने का प्रशिक्षण भी देता है।

आम और भैंस
जो किसान निवेश कर सकते हैं, उनके लिए खेत में तालाब उनके पुराने सपनों को पूरा करने का मौका देते हैं।
साखर में किसान संदीप रेनुसे पहाड़ियों की ओर देखती अपनी एक एकड़ ज़मीन पर खड़े हैं। सालों तक उनके पिता का सपना था कि वे हापुस (अल्फांसो) और केसर आम उगाएं। इन पेड़ों को शुरुआती कुछ सालों में बहुत अधिक पानी की जरूरत होती है, जिसे पहले सूखे मौसम में पूरा कर पाना असंभव था। मजदूरों की एक टीम के साथ समन्वय कर पांच लाख लीटर क्षमता वाला खेत तालाब खुदवाने के बाद अब संदीप ड्रिप सिंचाई के जरिए आम के 70 पेड़ों को सफलतापूर्वक सींच रहे हैं।
आम, जामुन, कटहल, पत्तेदार सब्जियां जैसी बागवानी वेल्हे में आमदनी बढ़ाने का स्वाभाविक साधन रहा है, लेकिन पानी नहीं मिलने से ऐसा कर पाना संभव नहीं हो पाता है।
अगर आप पुणे में दूध खरीदते हैं, तो हो सकता है कि वह लावही गांव के पास नाके से गुजरा हो, जहां पशुपालक हर सुबह अपना दूध बेचते हैं। 17 भैंसों के मालिक अनंत रेणुसे के लिए पानी साफ-सफाई और सेहत का मामला है। जब पानी की कमी होती है और टैंकर ही एकमात्र विकल्प होता है, तो भैंस को हर आठ दिन में सिर्फ एक बार नहलाया जा सकता है, जिससे उसकी सेहत पर असर पड़ता है। अपने कुओं और खेत के तालाब से मिली आत्मनिर्भरता के साथ, वह अब सूखे मौसम में अपनी भैंसों को हर दो से तीन दिन में नहला सकते हैं।
लेकिन, सुरक्षा का यह स्तर अभी हर किसी के लिए उपलब्ध नहीं है। अपनी बकरियों को संभालते हुए युवा किसान नाजिम शेख अपने खेत को देखते हैं, जिसमें दिसंबर की शुरुआत में ही नमी कम होने लगती है। उनके लिए, खेत में तालाब बनाने के लिए शुरुआती निवेश और जमीन की जरूरत इस समाधान को अब भी दूर की कौड़ी बना देती है।
लवही के मुख्य चौक में इंद्रायणी चावल के खेत और एक मंदिर के पास बैठे लोगों के एक समूह का कहना है कि भीषण गर्मियों के दौरान 5,000 लीटर के पानी के निजी टैंकर के लिए 1,000 खर्च खर्च करना आम बात है, खासकर उन परिवारों के लिए जिन्हें पानी की ज्यादा जरूरत होती है।

वेल्हे का विरोधाभास
पास के मेरावाने और फांशी गांवों में मजबूत ग्रामीण आजीविका पर काम करने वाले BAIF डेवलपमेंट रिसर्च फाउंडेशन ने सोलर-पावर्ड सिंचाई सिस्टम लगाया है जो नदी से लगभग 1.5 किलोमीटर दूर खेतों तक पानी लाता है। BAIF के एग्रीकल्चर फील्ड ऑफिसर आकाश सालुंके बताते हैं कि बराबर बंटवारा पक्का करने के लिए स्थानीय ऑपरेटर इसके इस्तेमाल को नियंत्रित करता है। यह पुरानी गैर-लाभकारी संस्था स्कूलों में बर्षा जल संचयन डिवाइस का भी पायलट ट्रायल कर रही है, ताकि उन इलाकों में बोरवेल को रिचार्ज किया जा सके जहां ऐसा संभव है।
हर मौसम में कुओं के पानी के स्तर की निगरानी करने से कुछ बदलाव दिख सकते हैं, लेकिन रेनट्री फाउंडेशन के दामले का कहना है कि जलग्रहण क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर असर को मापने में 15 साल लगेंगे। 2018 में काम शुरू करने वाले यह संगठन वाटरशेड से हुए बदलावों का पता लगाने के लिए मिडलाइन सर्वे की योजना बना रहा है। उनका कहना है कि मकसद यह है कि समुदाय वाटरशेड संरचना पर चर्चा, निगरानी और गाद निकालने का काम पूरी तरह से अपने हाथ में ले ले।
इस बीच, जलवायु परिवर्तन अनिश्चितता को और बढ़ा देता है। साल 2025 में सितंबर की असामान्य रूप से भारी बारिश ने धान की फसल को नुकसान पहुंचाया, जबकि भीषण गर्मी ने आमों को सड़ा दिया। इससे यह स्पष्ट होता है कि फसल विविधीकरण करने वाले किसान भी असुरक्षित बने हुए हैं।
क्षेत्रीय अधिकारी आसपास की पहाड़ियों पर यूकेलिप्टस के फैलाव की ओर भी संकेत करते हैं, जिसे स्थानीय रूप से नीलगिरी कहा जाता है। ये तेजी से बढ़ने वाले, बाहरी प्रजाति के पेड़ बड़ी मात्रा में पानी सोखते हैं, जिससे स्थानीय जल संरचनाओं पर और दबाव बढ़ जाता है।
एडवांस्ड सेंटर फॉर वॉटर रिसोर्स डेवलपमेंट एंड मैनेजमेंट (ACWADAM) के संस्थापक हिमांशु कुलकर्णी कहते हैं कि स्थानीय भूगोल और हालात के हिसाब से जल संरक्षण की प्लानिंग करना बहुत जरूरी है। वे चेतावनी देते हैं, “लेकिन गन्ने जैसी ज्यादा पानी वाली फसलों की तरफ जाने से यह कोशिश बेकार चली जाएगी।”
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वेल्हे की कहानी में व्यवस्थागत विडंबना है। कुलकर्णी बताते हैं कि पुणे जिले में देश में सबसे अधिक बांध घनत्व वाले क्षेत्रों में से एक है और वेल्हे पश्चिमी घाट के सामान्य बांध जलग्रहण क्षेत्र के भीतर स्थित है। ऐसे जलग्रहण क्षेत्रों का पानी सिंचाई वाले क्षेत्रों, शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों की ओर मोड़ दिया जाता है, जबकि खुद ये गांव अक्सर उपेक्षित रह जाते हैं। कुलकर्णी की दलील है कि ऐसे क्षेत्रों को उन पारिस्थितिकी सेवाओं के लिए मुआवजा मिलना चाहिए, जो वे उपलब्ध कराते हैं।
2025 तक, सरकार की जल जीवन स्कीम ने गुंजावने और लाव्ही जैसे गांवों में लगभग 97% परिवारों तक नल से जल पहुंचा दिया था। वेल्हे में ग्रामीण जलापूर्ति उप-खंड के अनुसार टैंकर की मांग में तेजी से कम हुई है। लेकिन लगाए गए नलों में पानी अभी भी स्थानीय वॉटरशेड की स्थिति पर निर्भर करता है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 5 फरवरी, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: वेल्हे के लावही गांव में इंद्रायणी धान का खेत। हालांकि इस तालुका में पुणे जिले में सबसे ज्यादा बारिश होती है, लेकिन कुछ गांवों में पहले से ही फरवरी तक पानी की किल्लत हो जाती है, क्योंकि बारिश का पानी इस इलाके की ढलानों और ऊबड़-खाबड़ ज़मीन से तेजी से बह जाता है। तस्वीर – कार्तिक चंद्रमौली/मोंगाबे।