- कम बर्फबारी और सूखते जल स्रोतों के कारण जम्मू-कश्मीर में पशुपालकों को पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है और वे अपने पारंपरिक प्रवास को छोड़ पलायन के लिए मजबूर हो रहे हैं।
- पहाड़ी चरागाहों में छोटे कृत्रिम तालाबों के जरिए वर्षा जल संचयन के सामुदायिक प्रयास इस समस्या का एक संभावित समाधान साबित हुए हैं।
- 230 से भी ज्यादा पशुपालक परिवारों की मदद करने वाला अल्पाइन पॉन्ड प्रोजेक्ट जलवायु परिवर्तन से निपटने के एक बेहतरीन मॉडल के रूप में उभरा है। यह प्रोजेक्ट स्थानीय अनुभव और वैज्ञानिक सोच का एक सफल मेल है।
जैसे ही गर्मी का मौसम शुरू होता है, बकरवाल जनजाति के चरवाहे अब्दुल हामिद बजरान अपने 10 सदस्यों वाले परिवार और मवेशियों को लेकर मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले के लालमर्ग के हरे-भरे चारागाहों की ओर निकल पड़ते हैं। पीढ़ियों से यह प्रवास उनकी जीवनशैली का हिस्सा रहा है यानी सर्दियों में मैदानी इलाकों और गर्मियों में ऊंचे घास के मैदानों के बीच आने-जाने का एक पुराना सिलसिला।
लेकिन पिछले कुछ सालों में हालात बदल गए हैं। सर्दियों में अल्पाइन घास के मैदानों में बर्फ नहीं गिरती और जो नदियां कभी उनके चारागाहों से होकर बहती थीं, वे सूख गई हैं। पानी की कमी है, और घास की गुणवत्ता गिरती जा रही है। अब्दुल का परिवार अब अपने पूर्वजों की जीवनशैली को छोड़ने की बात करने लगा है। अब्दुल कहते हैं, “अब अगर एक बार और सूखा पड़ा, तो हमें वो फैसला लेना होगा, जिसे कोई भी खानाबदोश कभी नहीं चुनना चाहेगा। हमारा प्रवास कभी 140 दिनों का हुआ करता था, अब सिमटकर मुश्किल से 90 दिन का रह गया है।”
चारे की कमी के चलते अब्दुल के परिवार समेत कई चरवाहा परिवारों को गुजारा चलाने के लिए अपने मवेशी तक बेचने पड़े हैं। इससे एक नई समस्या खड़ी हो गई है: अब उनके पास इतने कम मवेशी हैं कि उनकी कमाई से पशुपालन का काम जारी रखना नामुमकिन हो गया है। अब्दुल ने कहा, “अपने मवेशियों को खिलाने के लिए मुझे 10 भेड़ें बेचनी पड़ीं, जो पिछले साल मेरी सालाना आय के आधे से भी ज्यादा थीं। मुझे नहीं लगता कि हम इस तरह और आगे गुजर-बसर कर पाएंगे।”
ऐसी ही कुछ कहानी गांदरबल जिले के बाबावायिल क्षेत्र में स्थित खुदमर्ग चारागाह में खानाबदोशों के एक अन्य समुदाय की भी है। जल स्रोत सूख जाने के कारण उन्हें अपना डेरा छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा और वे दूसरों लोगों के चारागाहों में चले गए। इससे समुदाय के बीच आपसी तनाव बढ़ गया और उस क्षेत्र की जमीन पर जरूरत से ज्यादा चराई होने लगी। गुर्जर जनजाति के मोहम्मद असलम कहते हैं, “इतना ही नहीं, मई के महीने में ओलावृष्टि भी बढ़ने लगी है। यह महीना भेड़ों के बच्चे पैदा करने का अहम समय होता है। मौसम की इन चरम घटनाओं से भारी नुकसान उठाना पड़ा है।”

बढ़ती मुश्किलों और समुदाय के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए खानाबदोश समुदाय समाधान खोजने के लिए एकजुट हो गए। उन्होंने मध्य कश्मीर स्थित एक स्थानीय गैर सरकारी संगठन, हिमालयन पास्टोरल ट्रस्ट (एचपीटी) के साथ हाथ मिलाया, जो पशुपालकों की आजीविका की रक्षा के लिए काम कर रहा है। 2024 में, उन्होंने अल्पाइन पॉन्ड प्रोजेक्ट शुरू किया, जिसके जरिए ऊंचाई वाले चारागाहों में तालाब बनाकर बारीश के पानी को इकट्ठा किया जाता है। अपने पारंपरिक रास्तों पर मुख्य चारागाह क्षेत्रों की पहचान करके, इस समुदाय और गैर सरकारी संगठन ने जम्मू-कश्मीर के वन विभाग के सहयोग से कई छोटे कृत्रिम तालाब बनाए। उनका लक्ष्य सूखते हुए घास के मैदानों को फिर से हरा-भरा करना और उन पर निर्भर चरवाहों के लिए आशा की किरण जगाना है।
वर्षा जल संचयन स्वच्छ विकास में योगदान देता है। यह जल सुरक्षा को बढ़ावा देता है, प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम करता है और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना आर्थिक गतिविधियों को संभव बनाता है। बारीश के पानी को सहेजने और उसे दोबारा इस्तेमाल करने से जमीन के नीचे से पानी निकालने और महंगे टैंकरों पर निर्भरता कम हो जाती है। इससे उत्सर्जन और परिचालन लागत में कमी आती है। यह सतत विकास लक्ष्य 6 (स्वच्छ जल), 11 (टिकाऊ शहर) और 13 (जलवायु कार्रवाई) को हासिल करने में मदद करता है।
चरवाहों के जल-स्रोतों को पुनर्जीवित करना
कश्मीर हिमालय दक्षिण एशिया के सबसे बड़े मौसमी प्रवासों में से एक का केंद्र है। यहां लगभग छह लाख गुज्जर, बकरवाल, गद्दी, चोपन और अन्य चरवाहा समुदाय सैकड़ों किलोमीटर पैदल यात्रा करते हैं। वे अप्रैल-मई के महीने में अपने मवेशियों को लेकर कश्मीर और लद्दाख के ऊंचे पहाड़ी चारागाहों की ओर निकल पड़ते हैं और फिर सितंबर-अक्टूबर में वापस जम्मू के मैदानी इलाकों की ओर लौट आते हैं।
सदियों से, उनका यह प्रवास अनुकूल जलवायु, प्राकृतिक जल स्रोतों और घास की उपलब्धता पर निर्भर रहा है। ये अल्पाइन घास के मैदान न सिर्फ इन चरवाहों के जीवनयापन के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि बड़ी संख्या में जीव-जंतुओं और वनस्पतियों को भी सहारा देते हैं।

‘हिमालयन पास्टोरल ट्रस्ट’ के संस्थापक शाहिद सुलेमान बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में मई के महीने में बेमौसम बर्फबारी, सर्दियों में कम ठंड और बार-बार होने वाली ओलावृष्टि ने पशुपालन के चक्र को पूरी तरह बाधित कर दिया है। वह कहते हैं, “जब बर्फ देर से पड़ती है या बहुत जल्दी पिघल जाती है, तो चरवाहों को अपने रास्ते बदलने पड़ते हैं, प्रवास की अवधि छोटी करनी पड़ती है या चारागाहों को छोड़ना पड़ता है। जो झरने और नदियां पहले पानी का नियमित स्रोत थे, वे अब मौसम के बीच में ही सूख जाते हैं। परिवारों को पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इससे अक्सर अलग-अलग समुदायों के बीच आपसी तनाव भी पैदा हो जाता है।” सुलेमान कश्मीर यूनिवर्सिटी के भूगोल विभाग से जलवायु परिवर्तन और पशुपालन पर पीएचडी भी कर रहे हैं।
वह आगे कहते हैं, “ये प्रवासी परिवार तंबुओं या मिट्टी की झोपड़ियों में रहते हैं, घोड़ों पर सफर करते हैं और अपने साथ सिर्फ जरूरत का सामान रखते हैं। उनके पास अक्सर 100 लीटर पानी रखने की भी जगह नहीं होती। जब कोई झरना या नदी सूख जाती है, तो उन्हें अपने चारागाह छोड़ने या पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।”
जल शक्ति मंत्रालय की ओर से 2017-2018 में किए गए सर्वेक्षण के अनुसार, जम्मू और कश्मीर के लगभग 23% जल स्रोत सूख चुके हैं और उनकी मरम्मत संभव नहीं है। दर्ज किए गए कुल 9,765 जल निकायों में से, जिनमें अधिकतर तालाब हैं, 99% से अधिक ग्रामीण इलाकों में स्थित हैं। उपयोग में न आने वाले 2,036 तालाबों में से लगभग आधे सूख चुके हैं, जबकि बाकी या तो क्षतिग्रस्त हो गए हैं या उन पर निर्माण हो चुका है या फिर अब वे इस्तेमाल के लायक नहीं रह गए हैं।
इसके अलावा, अध्ययनों से पता चलता है कि जम्मू-कश्मीर के 6,553 गांवों में से 3,300 से ज्यादा गांवों के पास मीठे पानी के झरने (चश्मे) हैं। ये प्राकृतिक जल स्रोत कभी कई समुदायों के लिए पीने के पानी और सिंचाई का मुख्य जरिया थे। लेकिन पिछले 20 वर्षों में, इनमें से आधे से ज्यादा झरने या तो सूख गए हैं या उनका आकार बहुत छोटा हो गया है।
‘अल्पाइन पॉन्ड प्रोजेक्ट’ के तहत, हर तालाब कहां बनाया जाए, इसका फैसला चरवाहा समुदाय द्वारा तैयार किए गए उन नक्शों के आधार पर लिया जाता है जिनमें उनके पारंपरिक रास्तों, मौसमी प्रवास के तरीकों और पानी की भारी कमी वाले खास इलाकों की जानकारी होती है। उन चारागाहों में तालाब बनाकर, जहां घास तो भरपूर है लेकिन पानी की कमी के कारण जिनका उपयोग नहीं हो पाता, यह परियोजना उन मैदानों पर दबाव कम करने में मदद करती है जहां जरूरत से ज्यादा चराई हो रही है। इससे मवेशियों को पूरे इलाके में समान रूप से चराने में मदद मिलती है।
शाहिद कहते हैं, “इससे प्राकृतिक जल स्रोतों के पास होने वाली अत्यधिक चराई कम होती है और साथ ही चराई की चक्रिय पद्धतियों को बढ़ावा मिलता है। इससे वनस्पतियों को दोबारा उगने का समय मिल जाता है। इसके साथ ही, चरवाहों के साथ मिलकर सामुदायिक चराई योजनाएं बनाई जाती हैं, ताकि चारागाहों के लिए ‘आराम’ देने का समय तय किया जा सके, मवेशियों की आवाजाही को नियंत्रित किया जा सके और चराई के संसाधनों का टिकाऊ इस्तेमाल सुनिश्चित हो सके।”
इस पहल के तहत अब तक तीन पहाड़ी तालाब सफलतापूर्वक बनाए जा चुके हैं, दो गांदरबल जिले के त्रगबल और मोहनदमार्ग चारागाहों में और तीसरा बांदीपोरा जिले के लालमर्ग चारागाह में। इस सफलता को देखते हुए, अब बांदीपोरा जिले के लांगमर्ग और क्रुश चारागाहों के साथ-साथ गांदरबल जिले के हमवास और ग्रटवांतन चारागाहों में चार नए तालाब बनाने का प्रस्ताव है।

वह आगे कहते हैं, “प्रत्येक तालाब 80-90 परिवारों की जरूरतों को पूरा कर सकता है और यह सिर्फ 10 मिनट की बारिश में भर जाता है। 12,000 फीट की ऊंचाई पर, सूखे जैसी स्थिति में भी 30 दिनों में कम से कम दो बार बारिश तो हो ही जाती है।”
इस पहल से फिलहाल 230 से अधिक पशुपालक परिवारों को लाभ मिल रहा है। इनमें से प्रत्येक परिवार में औसतन आठ से नौ सदस्य और लगभग 45 मवेशी हैं। इस परियोजना के प्रयासों को हिमालयन पास्टोरल ट्रस्ट के 12 सक्रिय स्वयंसेवकों और हर साल इन चारागाहों में आने वाले खानाबदोश समुदाय के सदस्यों की मदद मिल रही है। शाहिद ने बताया, “एक तालाब बनाने में लगभग ₹100,000 का खर्च आता है और अब तक इस काम के लिए ज्यादातर पैसा समुदाय के लोगों ने खुद अपनी इच्छा से चंदा देकर जुटाया है। इसके अलावा, हमें 48 चारागाहों से भी पानी की किल्लत की जानकारी मिली है और हमारी योजना अगले तीन सालों में वहां भी तालाब बनाने की है।”
उनका कहना है कि अगर पानी की कमी जारी रही तो भविष्य में बहुत से चरवाहा परिवार अपनी सदियों पुरानी प्रवास की परंपरा को छोड़ सकते हैं। उनके मुताबिक, “इससे हम सदियों पुराने पौधों, जड़ी-बूटियों और जैव विविधता के पारंपरिक ज्ञान को खोने का जोखिम उठा रहे हैं, जो हिमालयी चरवाहा संस्कृति का हिस्सा रहे हैं।”
विज्ञान, नीति और चरवाहा जीवन का भविष्य
कश्मीर यूनिवर्सिटी के जियोइंफॉर्मेटिक्स विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर इरफान रशीद बताते हैं कि ऊंचे पहाड़ी इलाकों के जल स्रोत मुख्य रूप से सर्दियों की बर्फबारी से भरते हैं। “हालांकि हमारे पास इन ऊंचाई वाले क्षेत्रों के विस्तृत आंकड़े कम हैं, लेकिन स्थानीय लोगों के अनुभव बताते हैं कि हिमपात की घटनाओं में काफी गिरावट आई है। पिछले 15 सालों में कश्मीर ने चार बार बिना बर्फ वाले ‘चिल्लई-कलां’ देखे हैं। चिल्लई-कलां कश्मीर की सबसे कड़ाके की ठंड के वो 40 (21 दिसंबर से 31 जनवरी) दिन होते हैं जब सबसे ज्यादा बर्फ गिरती है। यह इस बदलते रुझान का एक बड़ा संकेत है।”
वसंत ऋतु में जब बर्फ गिरती है, तो उसका कुछ हिस्सा पिघलकर बह जाता है, तो कुछ मिट्टी में रिसकर भूमिगत जल भंडारों को भर देता है। राशिद कहते हैं, “जैसे-जैसे बर्फबारी कम हो रही है, यह जल भंडार भी कम होता जा रहा, जिससे स्वाभाविक रूप से झरनों का बहाव और पानी की उपलब्धता पर असर पड़ता है। यह सीधे तौर पर उन चरवाहों और पहाड़ी समुदायों को भी प्रभावित करता है जो पीने के पानी और मवेशियों के लिए इन झरनों पर निर्भर हैं।”
सूखते जल स्रोतों की वजह से ये लोग नए चारागाहों की ओर जाने के लिए मजबूर हो रहे हैं। उन्होंने कहा, “ऐसी स्थिति में वन विभाग के साथ मिलकर किए गए सामुदायिक प्रयास ही आगे बढ़ने का सबसे कारगर रास्ता हैं। जब प्रभावित होने वाले लोग खुद वर्षा जल संचयन जैसे संरक्षण के कामों की जिम्मेदारी लेते हैं, तो उनके नतीजे लंबे समय तक बने रहते हैं। सरकारी कोशिशें अक्सर इसलिए नाकाम हो जाती हैं क्योंकि स्थानीय स्तर पर उनका रखरखाव नहीं हो पाता।”
ये प्रयास छोटे पैमाने पर किए जा रहे हैं और इनसे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र या वन्यजीवों को कोई नुकसान नहीं होगा। राशिद ने बताया, “इसके बजाय, ये जलवायु परिवर्तन के अनुकूल ढलने की एक सकारात्मक रणनीति के रूप में काम करते हैं। वैज्ञानिक ‘रिमोट सेंसिंग’ तकनीक का उपयोग करके चारागाहों के विस्तार और नक्शा बनाकर खराब क्षेत्रों की पहचान करने और यह समझने में मदद कर सकते हैं कि क्या पानी की किल्लत या अन्य जलवायु कारक इन बदलावों की मुख्य वजह हैं।”

उत्तर कश्मीर के वन संरक्षक इरफान अली शाह इन पारंपरिक जल स्रोतों के खत्म होने की वजह जलवायु परिवर्तन को मानते हैं। वह कहते हैं, “इसके कारण, चरवाहा समुदायों को अपने उन पुश्तैनी चारागाहों को छोड़ने पर मजबूर होना पड़ रहा है, जिसे वे अपने पूर्वजों के समय इस्तेमाल करते आ रहे हैं। अब वे अनजान चारागाहों की ओर जा रहे हैं, जिन्हें अक्सर भूतिया चरागाह या घोस्ट पाश्चर्स कहा जाता है। ये नए इलाके जोखिम भरे हैं, यहां की वनस्पतियां अज्ञात हैं और यहां तक कि मवेशियों में बीमारियों के मामले भी सामने आए हैं।”
इन चुनौतियों से निपटने के लिए, वन विभाग उप-अल्पाइन और अल्पाइन क्षेत्रों में जल स्रोतों की गणना कर रहा है। इसका मकसद सभी जल स्रोतों का मानचित्रण और उनकी स्थिति का आकलन करना है, साथ ही उनके आकार, जल भंडारण की क्षमता, उन पर हुए अतिक्रमण और उनकी उपयोगिता जैसी जानकारियां भी दर्ज करना है। यह डेटा इन महत्वपूर्ण जल स्रोतों का पुनरुद्धार और नई नीतियां बनाने में मददगार होगा। वह कहते हैं, “सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये जल स्रोत खानाबदोश और आदिवासी समुदायों, विशेष रूप से चरवाहों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। वे अपने मौसमी प्रवास के दौरान पीने के पानी और अपने मवेशियों की जरूरतों के लिए इन पर ही पूरी तरह निर्भर होते हैं।”
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इरफान अली शाह ने बताया, “भले ही हम सामुदायिक प्रयासों को आर्थिक सहायता नहीं दे पा रहे हैं, लेकिन हम उन्हें समर्थन और पहुंच प्रदान कर रहे हैं। ये तालाब समुदायों और वन विभाग दोनों के लिए मददगार हैं।” उन्होंने आगे कहा, “यह पहल छोटे स्तर पर लोगों द्वारा खुद चलाई जा रही है, जबकि सरकारी गणना एक बड़े और व्यवस्थित स्तर पर किया जा रहा प्रयास है। इसके साथ ही, वन विभाग चरवाहों के लिए बारिश से बचने के आश्रय और मवेशियों के लिए शेड बनवाकर, साथ ही प्रवास के दौरान इस्तेमाल होने वाले उनके पारंपरिक बैरकों की मरम्मत करवाकर भी उनकी मदद कर रहा है।”
शाह के मुताबिक, ऐसे ऊंचे पहाड़ी इलाकों में मुख्य चुनौती पैसे और रसद की होती है, क्योंकि काम करने का मौसम छोटा होता है और इलाका दुर्गम होता है। उन्होंने कहा, “लेकिन यह याद रखना बहुत जरूरी है कि जंगल और आदिवासी एक-दूसरे पर निर्भर हैं। पारिस्थितिकी तंत्र के फलने-फूलने के लिए दोनों का सह-अस्तित्व आवश्यक है। उनका साझा अस्तित्व यह दर्शाता है कि कैसे लोग और प्रकृति मिलकर ऊंचे चारागाहों और जीवन के एक प्राचीन तरीके को जीवित रखने के लिए अनुकूलन कर सकते हैं।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 21 नवंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर- अल्पाइन तालाब परियोजना के तहत, गांदरबल जिले के त्रागबल और मोहंदमार्ग चारागाहों में तीन तालाब बनाए गए हैं, और एक तालाब बांदीपोरा जिले के लालमार्ग चारागाह में बनाया गया है। इसके अलावा, कश्मीर के अन्य क्षेत्रों में चार नए तालाब प्रस्तावित हैं। तस्वीर: शाहिद सुलेमान।