- विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके कश्मीर के मुश्क बुडजी चावल की खुशबू वैज्ञानिको की मदद से फिर फैल रही है।
- वैज्ञानिकों ने मार्कर-असिस्टेड चयन का इस्तेमाल करके रोग-प्रतिरोधी मुश्क बुडजी चावल विकसित किया है। यह नई किस्म चावल की खासियत को बरकरार रखती है।
- किसान फिर से मुश्क बुडजी की खेती कर रहे हैं, लेकिन उन्हें मार्केटिंग और मिल जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
कभी कश्मीर के किसान खुशबूदार चावल मुश्क बुदजी की खूब खेती करते थे। लेकिन कई सालों तक बार-बार होने वाले ब्लास्ट रोग के कारण किसानों ने इस चावल की खेती छोड़ दी। इस रोग की वजह से इसकी खेती में जोखिम बढ़ गया था और फसल बहुत ज्यादा महंगी हो गई। लेकिन आज खेतों में हालात धीरे-धीरे बदल रहे हैं।
कश्मीर हिमालय में मुश्क बुडजी चावल की प्रीमियम पारंपरिक किस्म है। यह समुद्र तल से 1,600-1,800 मीटर की ऊंचाई पर उगता है और इसके दाने छोटे, मोटे, पारदर्शी और बहुत खुशबूदार होते हैं। इसे खास तौर पर वाजवान के लिए पसंदीदा चावल माना जाता है, जो घाटी की मशहूर पारंपरिक दावत है। 2023 में इस चावल की किस्म को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग भी मिला, जिससे इसकी प्रामाणिकता और क्षेत्रीय विरासत को संरक्षण मिला।
हालांकि, मुश्क बुडजी की खेती में चुनौतियां भी बढ़ती गई। यह ब्लास्ट रोग के प्रति बहुत ज्यादा संवेदनशील थी जो फंगल संक्रमण है और जमीन के ऊपर पौधे के सभी हिस्सों को संक्रमित कर सकता है। इससे पत्तियों, तनों और बालियों पर धब्बे पड़ जाते हैं और पूरी फसल खराब हो जाती है। इसके अलावा, मौसम के बदलते पैटर्न ने बीमारी के प्रकोप को और बढ़ा दिया। बीमारी इतनी गंभीर हो गई कि यह किस्म लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच गई।
मुश्क बुडजी चावल में राइस ब्लास्ट बीमारी का प्रकोप 1960 के दशक में शुरू हुआ था। 1980 के बाद से इसकी खेती कम होने लगी और 2000 में यह सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। SKAUST-कश्मीर में जेनेटिक्स और प्लांट ब्रीडिंग के प्रोफेसर आसिफ बशीर शिकारी कहते हैं, “हमने खास तौर पर इस समस्या को हल करने पर काम किया। SKUAST-कश्मीर ने 2007 में रिवाइवल कार्यक्रम शुरू किया। इसे दुर्लभ मामला माना जाता है जहां किसानों की एक पारंपरिक किस्म को जेनेटिक रूप से बेहतर बनाया गया और विलुप्त होने से बचाया गया।”

रोग प्रतिरोधी चावल का विकास
शोधकर्ताओं ने उन्नत, रोग प्रतिरोधी मुश्क बुडजी किस्म विकसित करने के लिए मार्कर-असिस्टेड चयन तकनीक का इस्तेमाल किया। इस प्रक्रिया में एक ही फसल की प्रजाति के अंदर रोग प्रतिरोध या बेहतर पोषण जैसे उपयोगी गुणों को चुनना और मूल जेनेटिक बैकग्राउंड को बदले बिना पारंपरिक ब्रीडिंग के जरिए उन्हें मिलाना संभव है। इस तरह, फसल अपनी पहचान और स्वाद बनाए रखती है। साथ ही ज्यादा स्वस्थ और मजबूत भी बनती है।
भारत में बीमारियों से बचाव के लिए मार्कर-असिस्टेड चयन तकनीक 2000 के दशक में शुरू हुई और फसलों की पहली उन्न्त किस्म 2007 में जारी की गई। इसका इस्तेमाल चावल, गेहूं और मक्का जैसी फसलों में किया गया। इसके नतीजों में बैक्टीरियल ब्लाइट जैसी बीमारियों से बचाने वाली चावल की किस्में (जैसे बेहतर बनाई गई PB-1 और बेहतर बनाई गई पूसा बासमती-1), बेहतर पोषण वाली मक्के की हाइब्रिड (विवेक QPM9) और डाउनी मिल्ड्यू से बचाने वाली बाजरे की हाइब्रिड (HHB-67-2) शामिल हैं। इन कोशिशों का मकसद पारंपरिक तरीकों की तुलना में ज्यादा तेजी से जलवायु के हिसाब से ढलने वाली और बेहतर गुणवत्ता वाली फसलें विकसित करना था।
शिकारी के अनुसार, SKUAST-कश्मीर के शोधकर्ताओं को मुश्क बुडजी की दो किस्में विकसित करने में 10 साल लगे। SKUA-485 किस्म में ब्लास्ट रोग से पौधे को बचाने वाले तीन जीन हैं। वहीं SKUA-528 किस्म में ऐसे दो जीन मौजूद हैं।
हालांकि चावल की इन नई किस्मों को खास तौर पर मौसम को सहने के लिए विकसित नहीं किया गया था, फिर भी उनमें ठंड सहने की क्षमता जैसी पारंपरिक मुश्क बुडजी की जरूरी खासियतें हैं। SKUAST-कश्मीर में जेनेटिक्स और प्लांट ब्रीडिंग के प्रोफेसर ज़हूर अहमद डार कहते हैं, “ये किस्में अपेक्षाकृत छोटी और मजबूत हैं, जिसका मतलब है कि वे तेज हवाओं या देर से होने वाली भारी बारिश के दौरान आसानी से गिरती नहीं हैं। ठंड सहने की क्षमता, जल्दी पकने और अनुकूलन वाले दूसरे गुणों के लिए जिम्मेदार जीन्स की मौजूदगी की पुष्टि जीनोम सीक्वेंसिंग के ज़रिए की गई।” जीनोम सीक्वेंसिंग में किसी पौधे के पूरे DNA कोड को पढ़ा जाता है, ताकि खासियतों के लिए जिम्मेदार जीन्स की पहचान की जा सके।
मुश्क बुडजी की बेहतर किस्म की सफलता दर का पता लगाने के लिए इसे अनंतनाग, शुमनाग, कुपवाड़ा और बीरवाह (बडगाम) सहित कई जिलों में किसानों के खेतों में आजमाया गया।”असामान्य रूप से गर्म और नमी वाले मौसम के दौरान बेहतर किस्म ने बीमारी से लड़ने की क्षमता के कारण बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। ये मौसम की ऐसी स्थिति है जिसमें पुरानी किस्म में ब्लास्ट बीमारी और बदतर हो जाती है। हमने कई जिलों में किसानों से मुलाकात की और उन्होंने बहुत अच्छी राय दी। शोध करने वाली टीम को उम्मीद है कि नई किस्म का रकबा बढ़ता रहेगा,” डार कहते हैं।

इस किस्म के विकास में कई चुनौतियां आईं, क्योंकि यह बहुत तकनीकी और मुश्किल काम था। शिकारी कहते हैं, “एक समय हमारी टीम को लाखों संकर पौधों का प्रबंधन करना पड़ा, खेतों में कई बार परीक्षण करने पड़े, DNA-आधारित लैब टेस्ट किए गए और पकाने की गुणवत्ता जांची गई। शुरुआत में, हमें प्रयोगशाला में सुविधाओं की कमी से जूझना पड़ा, लेकिन बाद में हमने भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिक विभाग से मिली वित्तीय सहायता और जम्मू-कश्मीर सरकार के होलिस्टिक एग्रीकल्चर डेवलपमेंट प्रोग्राम (HADP) के जरिए अपनी प्रयोगशाला में सुधार किया।”
जब उनसे यह पूछा गया कि क्या इस किस्म के बीज आसानी से उपलब्ध हैं और छोटे किसानों के बीच इनका इस्तेमाल बढ़ाने के लिए क्या जरूरी है, तो शोध टीम ने बताया कि इस सीजन में उन्होंने बेहतर मुश्क बुडजी के दो क्विंटल ब्रीडर बीज तैयार किए हैं। “हमने खुडवानी स्थित माउंटेन रिसर्च सेंटर फॉर फील्ड क्रॉप्स में फाउंडेशन बीज का उत्पादन और बढ़ाया है जो SKUAST-K के तहत अनुसंधान और विकास केंद्र है।
ब्रीडर सीड पहला और आनुवंशिक रूप से सबसे ज्यादा शुद्ध बीज होता है, जिसे किसी किस्म को विकसित करने वाले वैज्ञानिक तैयार करते हैं। इसी से फाउंडेशन सीड बनाए जाते हैं, जिसे बाद में किसानों के लिए सर्टिफाइड बीज बनाने के लिए और आगे बढ़ाया जाता है।
इस बीच, 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन में SKUAST-कश्मीर के वैज्ञानिकों ने यह भी दिखाया कि मुश्क बुडजी की खास सुगंध का संबंध ऊंचाई और तापमान से बहुत ज्यादा है। घाटी की आठ जगहों से लिए गए चावल के नमूनों (लगभग 1,500 से 2,000 मीटर की ऊंचाई वाले) का विश्लेषण करने पर शोधकर्ताओं ने लगभग 35 सुगंधित यौगिक पहचाने, जिनसे मिलकर इसकी खास खुशबू तैयार होती हैं। SKUAST-कश्मीर में डिवीजन ऑफ फूड साइंस एंड टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर और अध्ययन के सह-लेखक सैयद जमीर हुसैन कहते हैं, “हमने पाया कि ज्यादा ऊंचाई पर उगाए गए चावल में उम्दा सुगंध होती है और मुख्य सुगंध यौगिक ठंडे क्षेत्रों में अधिक मात्रा में पाए गए। ऐसा खास तौर पर 2-एसीटाइल-1-पाइरोलिन (2-AP) में देखा गया जो सुगंधित चावल से अक्सर जुड़ा होता है। यह मुख्य रूप से ज्यादा ऊंचाई वाले क्षेत्रों जैसे बडगाम और कुपवाड़ा के नमूनों में पाया गया। यह संकेत देता है कि मुश्क बुडजी की सुगंध उसके आनुवंशिकी के साथ-साथ पर्यावरण (ऊंचाई और तापमान) से भी आकार लेती है।”
फिर से खेती
अनंतनाग जिले के सगाम गांव के किसान जफर अहमद भट के पास चावल की खेती के लिए 19 कनाल (0.96 हेक्टेयर) जमीन है। इसमें से वह 11 कनाल (0.56 हेक्टेयर) जमीन पर मुश्क बुडजी की उन्नत किस्म की खेती करते हैं। बाकी जमीन पर SR-4 (शालीमार चावल-4) और K39 जैसी चावल की दूसरी किस्में उगाते हैं।
“मेरा परिवार कई पीढ़ियों से चावल उगा रहा है। हमने आखिरी बार 1980 में पारंपरिक मुश्क बुडजी उगाया था, लेकिन बार-बार बीमारी फैलने से पैदावार कम हो गई, इसलिए हमने इसे उगाना बंद कर दिया,” वह कहते हैं।

भट्ट ने साल 2012 में पहली बार मुश्क बुडजी की बेहतर किस्म के बारे में सुना। SKUAST-कश्मीर के वैज्ञानिक उनके गांव आए और जागरूकता कार्यक्रम किया, जिसमें उन्होंने फसल की अहमियत और खेती के नए तौर-तरीकों के बारे में बताया। किसानों को आजमाने के लिए बेहतर मुश्क बुडजी के एक किलो बीज दिए गए। भट्ट याद करते हुए कहते हैं, “इस तरह मुश्क बुडजी के साथ मेरा सफर दोबारा शुरू हुआ।”
इसके नतीजे अच्छे रहे। फसल समय पर पक गई और किसी भी कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं किया गया। भट्ट ने एक कनाल (0.05 हेक्टेयर) खेत से 2.5 क्विंटल मुश्क बुडजी की फसल काटी, जबकि आम चावल की किस्मों से प्रति कनाल लगभग पांच क्विंटल पैदावार होती है। हालांकि, मुश्क बुडजी बहुत ज्यादा कीमत पर बिकता है। जहां सामान्य चावल की कीमत ₹3,200 प्रति क्विंटल थी, वहीं इस किस्म की कीमत ₹10,000 से 15,000 प्रति क्विंटल थी।
कुलगाम जिले से भी ऐसी ही कहानी सामने आई, जहां गुलाम रसूल नाम के एक किसान ने एक कनाल (0.05 हेक्टेयर) जमीन पर बेहतर गुणवत्ता वाला मुश्क बुडजी चावल उगा रहे हैं। अब वह इस फसल के लिए रकबा बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। वह कहते हैं, “पहले मुझे चिंता थी कि राइस ब्लास्ट बीमारी नई किस्म को भी नुकसान पहुंचाएगी। लेकिन जागरूकता कार्यक्रमों में हिस्सा लेने और खेती की नई तकनीकें सीखने के बाद मेरा आत्मविश्वास बढ़ा।”
वह बताते हैं कि चावल की पारंपरिक किस्मों की रोपाई करते समय पौधों के बीच सिर्फ तीन से चार सेंटीमीटर की दूरी रखी जाती है, जिससे पौधों को एक-दूसरे से छाया मिलती है और सूरज की रोशनी कम मिलती है। मुश्क बुडजी की उन्नत किस्म के लिए, किसान पौधों के बीच लगभग एक वर्ग फुट की दूरी रखते हैं। इससे पौधों को सूरज की ज्यादा रोशनी मिलती है और मिट्टी में गर्मी बनी रहती है, जिससे फसल की सेहत बेहतर होती है और चावल में लगने वाली राइस्ट ब्लास्ट बीमारी से बचाव होता है।
गुलाम रसूल नतीजों से खुश होकर अब पांच कनाल (0.25 हेक्टेयर) जमीन पर मुश्क बुडजी लगाने की योजना बना रहे हैं। वह कहते हैं, “इस नई किस्म ने मुझे खेती करने और बाजार में बेचने का भरोसा दिया है।”

मोंगाबे-इंडिया द्वारा देखे गए आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, पिछले तीन सालों में बीज उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी हुई है। खेती का रकबा 2022-23 में लगभग 250 हेक्टेयर से बढ़कर 2025 तक अनुमानित 1,000 हेक्टेयर हो गया है। वहीं इसी अवधि में उत्पादन लगभग 600 टन से बढ़कर 2,500 टन तक पहुंचने का अनुमान है।
इन सफलताओं के बावजूद, किसानों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। मार्केटिंग अभी भी कमजोर है और मांग अधिकतर स्थानीय कस्टमर से ही आ रही है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मांग अभी भी कम है। भट्ट का दावा है, “पिछले साल, कृषि विभाग ने HADP कार्यक्रम के तहत लगभग हर जिले में मुश्क बुडजी के बीज बांटे थे, जिससे पैदावार कई गुना बढ़ गई। लेकिन कम कस्टमर की वजह से, लगभग 20% किसानों के पास अभी भी स्टॉक पड़ा हुआ है।”
एक और बड़ी समस्या चावल मिल की है। “स्थानीय मिलों में प्रोसेसिंग के दौरान अक्सर लगभग 20% चावल टूट जाते हैं। इसके उलट, इलाके के बाहर से लाया गया बासमती चावल आमतौर पर साबुत होता है। ये कुछ चुनौतियां हैं जिनका हम सामना कर रहे हैं,” वह कहते हैं।
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इन समस्याओं को दूर करने के लिए, SKAUST-K और जम्मू और कश्मीर कृषि विभाग ने कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के साथ मिलकर मुश्क बुडजी चावल को जापान और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में निर्यात करने के अवसरों की तलाश शुरू कर दी है।
“चावल को नई दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला 2025 में दिखाया गया, जहां इंटरनेशनल शेफ ने इसकी गुणवत्ता और दुनिया भर में खान-पान के लिए इसके सही होने की तारीफ की। आसिफ शिकारी कहते हैं, “इस पहल का मकसद कश्मीर से बाहर नए बाजार तलाशना और किसानों के लिए बेहतर और ज्यादा स्थिर आय पक्का करना है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 19 दिसंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: मुश्क बुडजी चावल की तैयार किस्म को इकट्ठा करते हुए किसान। यह किस्म पहले ब्लास्ट बीमारी के कारण लगभग खत्म हो गई थी और अब SKUAST-कश्मीर की कोशिशों से किसान इसे फिर उपजा रहे हैं। तस्वीर: हिरा आज़मत।