- झारखंड में निजी मदद और अनुदान से लगाए गए 50 मिनी सोलर ग्रिड अब धीरे-घीरे समुदायों को सौंपे जा रहे हैं। अब तक ऐसे छह ग्रिड पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित समूहों को सौंपे गए हैं।
- अक्सर यह माना जाता है कि बिजली उत्पादन के लिए हजारों एकड़ जमीन, बड़ी पूंजी और कुशल कर्मचारियों की जरूरत होती है। लेकिन, यह पहल सीधे तौर पर इस सोच को चुनौती देती है।
- मिनी ग्रिड से मिलने वाली थ्री-फेज सोलर बिजली की मदद से गुमला, लोहरदग्गा और सिमडेगा जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में कई छोटे-छोटे उद्योग धंधे फल-फूल रहे हैं और आमदनी का नया जरिया मिल रहा है।
झारखंड में पतराटोली गांव की अलमा एक्का और ज्योति मिंज के लिए यह किसी सपने के सच होने जैसा है। सामाजिक और आर्थिक बाधाओं को पीछे छोड़ने वाली दोनों महिलाएं रानी ऊर्जा मंडल महिला समिति से जुड़ी हैं। यह समिति गुमला जिले में स्थापित मिनी सोलर ग्रिड की सह-मालिक है। झारखंड संभवत: देश का पहला ऐसा राज्य है जहां ग्रामीण क्षेत्रों की आधी आबादी सौर ऊर्जा के कारोबार में अपना भविष्य तलाश रही है।
रानी ऊर्जा समिति में अलमा और ज्योति सहित 10 महिला सदस्य हैं। इस ग्रिड को मिले-जुले (ब्लेंडेड) निवेश और अनुदान के जरिए स्थापित करने वाले मिलिंडा सस्टेनेबल एनवॉयरनमेंट प्राइवेट लिमिटेड (एमएसईपीएल) और मिलिंडा चैरिटेबल ट्रस्ट (एमसीटी) ने अप्रैल 2025 से इसका प्रबंधन महिलाओं को सौंपा है। सैंतीस साल की अलमा और ज्योति क्लस्टर लेवल फेडरेशन (सीएलएफ) से भी जुड़ी हुई हैं जो आजीविका, डायन कुप्रथा के खिलाफ जागरूकता, लैंगिक समानता जैसे मुद्दों पर काम करता है।
साढ़े 32 केवीपी (किलोवॉट पीक) का यह मिनी ग्रिड 50 डिसमिल जमीन पर बना है। यहां बने एक कमरे में कई बैट्रियां, इनवर्टर, स्विच बोर्ड और बिजली पहुंचाने के दूसरे उपकरण लगे हैं। यहां से सिंगल फेज और थ्री फेज दोनों के जरिए बिजली पहुंचाने की व्यवस्था है।

महिलाओं के लिए नया बिज़नेस मॉडल
गुमला जिले में इस बदलाव की शुरुआत 2015-16 से हुई। एमएसईपीएल और एमसीटी ने भारत के आदिवासी बहुल आकांक्षी जिलों गुमला सहित पास के लोहरदग्गा और सिमडेगा जिलों में पिछले एक दशक में 50 सोलर मिनी ग्रिड स्थापित किए हैं। इनमें 47 ग्रिड गुमला, दो सिमडेगा और एक लोहरदग्गा में हैं।
अब एमएसईपीएल इनका प्रबंधन समुदायों को सौंपा रहा है। अब तक आठ ग्रिड में यह पहल लागू की गई है। छह ग्रिड का संचालन पूरी तरह महिलाएं कर रही हैं जबकि दो ग्रिड किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) चला रहे हैं जिसमें महिलाएं और पुरुष दोनों शामिल हैं।
समिति की सदस्य अलमा ने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “जब यह काम करने को कहा गया, तो शुरू में हमें कुछ भी समझ में नहीं आया। हमारे लिए यह काम बिल्कुल नया था, क्योंकि बिजली से जुड़े काम पुरुष ही करते हैं। फिर हमें प्रशिक्षण दिया गया और अब हम ग्रिड चला रही हैं।”
इस पहल के बारे में एमसीटी की जनरल मैनेजर शैली कैरकेट्टा मोंगाबे-हिंदी से कहती हैं, “महिलाएं सोलर मिनी ग्रिड को बिजनेस की तरह आगे बढ़ा रही हैं। यह उनके लिए नया काम और नया कौशल है। उन्हें इस बारे में समझाना जटिल था, क्योंकि इस क्षेत्र में हमेशा से पुरुषों का दबदबा रहा है।”
ग्रिड चलाने वाली महिलाएं मुख्य तौर पर तीन काम करती हैं: ग्रिड का रखरखाव और प्रबंधन यानी छोटी-मोटी खराबी आने पर खुद ठीक करना, नए कस्टमर को ग्रिड से जोड़ना और प्री-पेड मीटर को रिचार्ज करना जैसी कस्टमर केयर की सुविधाएं।
पतराटोली वाला ग्रिड मिले-जुले निवेश और अनुदान का एक उदाहरण है। यहां सौर ऊर्जा बनाने के लिए एमएसईपीएल ने करीब चालीस लाख रुपए निवेश किए हैं। ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन के लिए डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्स ने लगभग 40 लाख रुपए का अनुदान दिया है। एमएसईपीएल और समिति के बीच हुए 15 साल के समझौते के मुताबिक कंपनी आठ से दस रुपए प्रति यूनिट की दर से समिति को बिजली बेचती है और समिति इसे आगे 20 से 22 रुपए प्रति यूनिट में बेचती है। फिलहाल ग्रिड से 47 कस्टमर को सेवाएं मिल रही है जिसे बढ़ाकर 100 तक किया जा सकता है।

एमएसईपीएल में फाइनेंस और ऑपरेशन के प्रमुख प्रणव भारती साह ने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “मिले-जुले फाइनेंस मॉडल को इस तरह तैयार किया गया है कि निजी पूंजी का प्रवाह भी हो सके। जब हम लंबी अवधि की साझेदारी करते हैं, तो महिलाओं में यह भरोसा होता है कि कंपनी उनके साथ अगले 10-15 सालों तक रहेगी और उनकी क्षमता बढती रहेगी।”
वैसे पालकोट प्रखंड के बिलिंगबिरा रोड के किनारे मिनी सोलर ग्रिड को डेढ़ साल पहले सबसे पहले महिला समूह को सौंपा गया था। यहां समूह की एक सदस्य माधुरी देवी ने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “मैं पहले स्वयं सहायता समूह से जुड़ी रही हूं, लेकिन इतना बड़ा प्लांट पहले कभी नहीं चलाया था।”
केरकट्टा इस बदलाव को बड़े फलक पर देखती हैं, “जहां महिलाएं ग्रिड चला रही हैं, वहां जोर इस बात पर है कि आधी आबादी को किस तरह मदद की जाए। महिलाएं अब यह सोच रही हैं कि आमदनी बढ़ाने के लिए कौन-से छोटे-छोटे बिजनेस किए जा सकते हैं।”
कौशल विकास और चुनौतियां
हालांकि, इन महिलाओं के लिए ग्रिड चलाना इतना आसान भी नहीं रहा, क्योंकि उन पर तिहरी जिम्मेदारी है। ग्रिड चलाने वाली महिलाएं पहले से ही सीएलएफ, एफपीओ या एसएचजी से जुड़ी हुई हैं। इसके साथ उन्हें घर का भी काम करना पड़ता है।
दो छोटे बच्चों की मां ज्योति ने अपनी चुनौतीपूर्ण दिनचर्या मोंगाबे-हिंदी से साझा की, “सुबह पांच बजे उठकर घर के काम निपटाती हूं और फिर बच्चों को स्कूल भेजती हूं। इस दौरान ग्राहकों की समस्याएं सुलझानी होती हैं सुबह दस बजे तक ग्रिड आती हूं और पांच बजे तक यहां रहती हूं। इस दौरान अपने संगठन का भी काम करना पड़ता है। शाम में गृहस्थी भी संभालनी पड़ती है।”
इस स्थिति में महिलाओं को ग्रिड चलाने के लिए तैयार करने में ट्रस्ट को दो तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। एक तो महिलाओं को सोलर मिनी ग्रिड से जुड़ी तकनीकी बातों की जानकारी नहीं थी। दूसरा, उन्हें मार्केटिंग नहीं आती थी।
इन बाधाओं से पार पाने के लिए महिलाओं को तकनीकी प्रशिक्षण दिया गया और मार्केटिंग के गुर सिखाए गए। इसके सकारात्मक पक्ष के बारे में केरकट्टा कहती हैं, “अब महिलाओं को सोलर बिजली, मिनी ग्रिड के बारे में जानकारी हो रही है। वे इसे अवसर की तरह देख रही हैं और दूसरी महिलाओं के लिए उदाहरण बन रही हैं।”
वहीं, साह कहते हैं, “हमें मिनी ग्रिड चलाने और इस बिजनेस मॉडल को आगे बढ़ाने का 10 साल का अनुभव था। हमने अपनी इस महारत को प्रशिक्षण से जोड़ा है।”
प्रशिक्षण के बाद जब महिलाएं कस्टमर बनाने बाजार में गईं, तो यहां उन्हें ताने सुनने पड़े। अलमा शुरुआत में आई चुनौतियों के बारे में कहती हैं, “जब हम पहली बार मार्केटिंग करने गए, तो लोग हम पर हंसे थे। वे कहते थे कि महिलाओं से यह काम नहीं हो पाएगा। जब एक वेल्डिंग वाले ने हमसे बिजली लेकर अपना धंधा जमा लिया, तब व्यापारियों का भरोसा बढ़ा। अब लोग खुद बिजली खरीदने आते हैं।”

माधुरी देवी भी इससे सहमति जताती हैं, “शुरु में ऐसा लगा कि सोलर बिजली बेचना नामुमिकन है, क्योंकि छोटे व्यापारियों को लगता था इससे घर में सिर्फ बल्ब जल सकता है। उन्हें नहीं पता था कि इससे काम-धंधा भी किया जा सकता है।”
केरकट्टा मिनी ग्रिड के पीछे की सोच पर कहती हैं, “हमारा मानना है कि सौर ऊर्जा विकास का जरिया है और झारखंड जैसे राज्यों में इससे खेती और उद्योग-धंधे बढ़ाए जा सकते हैं।
थ्री-फेज से फलते-फूलते बिजनेस
इन ग्रिड की खासियत यह है कि इनसे सिंगल फेज के साथ ही थ्री फेज में भी सोलर बिजली मिलती है। तीन एचपी से ज्यादा किसी भी मोटर को चलाने के लिए थ्री-फेज बिजली की जरूरत होती है। हालांकि, सरकारी बिजली लगभग सभी जगह पहुंच गई है, लेकिन अनियमित आपूर्ति, वोल्टेज की समस्या और कनेक्शन लेने में दिक्कत की वजह से लोग अपना काम धंधा शुरू करने से कतराते थे। लेकिन, अब सोलर बिजली से चलने वाले छोटे-छोटे उद्योग धंधे खूब पनप रहे हैं।
ट्रस्ट के प्रोग्राम ऑफिसर संदीप यादव सरकारी बिजली से जुड़ी चुनौतियों पर मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं, “थ्री फेज की सरकारी बिजली का कनेक्शन लेने में कम से कम एक लाख रुपए खर्च होते हैं और यह पक्का नहीं होता कि 24 घंटे बिजली मिलेगी। बारिश या वज्रपात होने पर कई दिनों तक बिजली गुल रहती है। वहीं, मिनी ग्रिड से सात हजार रुपए देकर थ्री फेज कनेक्शन लिया जा सकता है।”
पतराटोली में ही पेट्रोल पंप संचालक मुकेश कुमार गुप्ता शुरुआत से ही मिनी ग्रिड के ग्राहक हैं। उन्होंने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “पहले जनरेटर पर हर महीने आने वाला खर्च 10 हजार रुपए तक था। सोलर से यह घटकर चार हजार रुपए तक आ गया है। सरकारी बिजली के बरक्स सोलर में गड़बड़ी होने पर तुरंत मरम्मत होती है।”
ट्रस्ट के प्रोग्राम मैनेजर सुदीप्त डे कहते हैं, “तेल मिल, वेल्डिंग, आटा चक्की, राइस हलर, फोटो कॉपी की दुकानें, पेट्रोल पंप, मोबाइल रिपेयर की दुकानें, किराना स्टोर, पल्वराइज़र, चाउमीन बनाने की यूनिट, दर्रा प्रोसेसिंग, पोल्ट्री फार्म, डेयरी, हल्दी प्रोसेसिंग, करंज और मूंगफली छीलने वाली यूनिट जैसे एंटरप्राइज हमारे सोलर मिनी ग्रिड से जुड़े हुए हैं। यही नहीं स्कूल, नर्सिंग होम, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, केवीके, पंचायत भवन, सीएससी सेंटर और बैंक जैसे कुछ सरकारी संस्थानों ने भी हमारा कनेक्शन लिया है।”
उदाहरण के तौर पर गुमला जिले के गुनिया गांव को लिया जा सकता है जहां गरीब महिलाएं सोलर बिजली से तेल मिल चला रही हैं। झारखंड में ऐसी 15 मिलें हैं। इनसे बनने वाले वाले तेल को रायडीह प्रखंड के सिलम गांव में वैल्यू एडिशन करके दीप सखी ब्रांड के नाम से बाजार में बेचा जाता है।
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गुनिया में यह काम कर रही तीन महिलाओं में से एक गंगोत्री उरांव कहती हैं, “जब हमलोग प्लांट से नहीं जुड़े थे, तेल-साबुन खरीदने के लिए भी बार-बार सोचना पड़ता था। अब घर-परिवार चलाने में हमें दिक्कत नहीं होती है। बच्चे भी अच्छे स्कूल में जा रहे हैं।”
इन महिलाओं पर भी घर और खेत के साथ-साथ मिल चलाने की जिम्मेदारी है। इन्हें भी शुरुआत में समाज के ताने झेलने पड़े। उरांव कहती हैं, “शुरू में जब हम घर से आते थे, तो रास्ते में बैठे हुए लोग उपहास करते थे कि ये महिलाएं कैसे मिल चला पाएंगी। लेकिन यही उपहास हमारी ताकत बना और हमने ठान लिया कि जितनी भी चुनौती आए, हमलोग पीछे नहीं हटेंगे।”
इसी मिल की एक और संचालक अंजू उरांव घर के अंदर आए बदलाव पर कहती हैं, “जबसे हमने काम शुरू किया है, तब से घर के अंदर पुरुषों के व्यवहार में भी बदलाव आया है। पहले वे हमारी बात नहीं सुनते थे। अब हम जब कमा रहे हैं, तो घर के कामों में हमारी मदद कर रहे हैं।”
तस्वीरः गुमला जिले के सिलम गांव में वैल्यू एडिशन करके दीप सखी ब्रैंड से तेल की पैकेजिंग की जाती है और फिर उसे बाजार में बेचा जाता है। तस्वीर – विमल राय\मोंगाबे।