- तमिलनाडु के पिचावरम और मुथुपेट में स्थित मैंग्रोव की क्षमता का एक नया अध्ययन किया गया है। यह अध्ययन बताता है कि ये मैंग्रोव तूफानों, चक्रवातों और बाढ़ जैसी पर्यावरणीय आपदाओं से तट को बचाने में कितने सक्षम हैं।
- शोधकर्ताओं ने समुद्र-स्तर बढ़ने की तीन स्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह मॉडल तैयार किया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इन स्थितियों में मैंग्रोव क्षेत्र कितना बदल सकता है।
- विशेषज्ञों का कहना है कि मैंग्रोव वनों की कटाई पर मानवीय गतिविधियों के प्रभाव की निगरानी करना, संरक्षण के लिए आर्थिक साधनों, मौजूदा नीतियों और प्रशासन की प्रभावशीलता का विश्लेषण करना और मैंग्रोव की आनुवंशिक विविधता पर ध्यान देना बहुत जरूरी है।
तमिलनाडु के पिचावरम और मुथुपेट में मैंग्रोव सुनामी, चक्रवात, तटीय बाढ़ आदि जैसी बड़ी प्राकृतिक आपदाओं के खतरों की तीव्रता और बार-बार होने की संभावना को काफी हद तक कम कर देते हैं। इस बात की जानकारी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान – दिल्ली (IIT-दिल्ली) के स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी, टोक्यो यूनिवर्सिटी व जापान के इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल एनवायरमेंटल स्ट्रैटेजीज के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर किए गए एक हालिया अध्ययन में सामने आई है। इस अध्ययन में दक्षिणी राज्य में मैंग्रोव के कारण तटीय जोखिम को कम करने के प्रभाव का विश्लेषण किया गया है। साथ ही, चेतावनी दी गई है कि सदी के अंत तक समुद्र का स्तर बढ़ने से इन मैंग्रोव को भी बहुत नुकसान होगा।
दुनिया भर में मैंग्रोव जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं। ये भूमि पर स्थित वनों की तुलना में लगभग पांच गुना ज्यादा कार्बन सोख सकते हैं। अंतर ज्वारीय क्षेत्रों में उगने वाले ये होलोफाइटिक पौधे तटवर्ती क्षेत्रों के लिए पहली सुरक्षा दीवार की तरह काम करते हैं और विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं से उन्हें बचाते हैं।
प्रोग्रेस इन डिजास्टर साइंस में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, पिचावरम में मैंग्रोव की उपस्थिति से इस क्षेत्र का तटीय जोखिम का स्तर 3.47 से घटकर 2.80 और मुथुपेट का जोखिम स्तर 4.78 से घटकर 2.10 रह गया है। ये आंकड़े एक से पांच के पैमाने पर दिए गए हैं, जिसमें 5 का मतलब है ‘बहुत अधिक जोखिम’ और 1 का मतलब है ‘बहुत कम जोखिम’।
अध्ययन ने मौजूदा समय में उपलब्ध शोध रिपोर्ट्स की दो बड़ी कमियों पर ध्यान दिया– तटीय क्षेत्रों की कमजोरियों को कम करने में मैंग्रोव की भूमिका और समुद्र के बढ़ते स्तर का मैंग्रोव पर असर।

मैंग्रोव के शमन प्रभाव
तमिलनाडु के कुड्डालोर जिले में वेल्लार और कोलेरू नदियों के मुहाने के बीच स्थित पिचावरम, देश के सबसे बड़े मैंग्रोव वनों में से एक है। साल 2004 की हिंद महासागर की सुनामी के बाद पिचावरम इस बात का प्रमुख उदाहरण बन गया है कि मैंग्रोव वन किस तरह से प्राकृतिक आपदाओं के विनाशकारी परिणामों से लोगों और स्थानों की रक्षा करते हैं। सुनामी के तुरंत बाद, अन्नामलाई यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर एडवांस्ड स्टडी इन मरीन बायोलॉजी के शोधकर्ताओं ने अपने एक अध्ययन में तमिलनाडु के पारंगीपेट्टाई क्षेत्र के 25 किलोमीटर के लंबे तटीय इलाके में बसी 18 बस्तियों पर पड़ने वाले प्रभावों की जांच की। सबसे कम मृत्यु दर उन बस्तियों में देखी गई जो मैंग्रोव वनों के पीछे या ऊंचाई पर स्थित थे। इन बस्तियों में प्रति व्यक्ति संपत्ति की हानि भी सबसे कम दिखाई दी। यह आकड़ें सुनामी के प्रभावों को कम करने में मैंग्रोव वनस्पति के महत्वपूर्ण महत्व की और इशारा करते हैं।
इसी तरह की रिपोर्टें मुथुपेट क्षेत्र से भी आईं, जो तमिलनाडु के तिरुवरूर जिले में कावेरी नदी के डेल्टा के दक्षिणी सिरे पर स्थित है। साल 2018 में आए चक्रवात ‘गजा’ के दौरान मुथुपेट के मैंग्रोव वनों ने भारी नुकसान झेलते हुए वहां कई लोगों की जान बचाने में मदद की।
पिचावरम और मुथुपेट दोनों में कई मैंग्रोव प्रजातियां पाई जाती हैं। मुथुपेट क्षेत्र का 75% हिस्सा विविध मैंग्रोव वनस्पतियों का घर है और पिचावरम 12 विशिष्ट प्रजातियों के लिए एक अनुकूल वातावरण प्रदान करता है। पिचावरम में सबसे प्रमुख मैंग्रोव प्रजातियों में एविसेनिया मरीना, एविसेनिया ऑफिसिनेलिस, राइजोफोरा एपिकुलता और राइजोफोरा म्यूक्रोनाटा शामिल हैं। एविसेनिया मरीना मुथुपेट में भी सबसे आम है। मुथुपेट की अन्य मैंग्रोव प्रजातियों में एक्सोएकेरिया एगैलोचा, एकेंथस इलिसीफोलियस और एजिसरोस कॉर्निकुलैटम शामिल हैं। इस क्षेत्र में कई अन्य तरह के पौधे, जलीय जीव, पक्षी और स्थलीय प्रजातियां भी पाई जाती हैं।
आईआईटी-दिल्ली के स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी के फैकल्टी मेंबर और अध्ययन के लेखकों में से एक राजर्षि दासगुप्ता ने बताया कि यह रिसर्च जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (JICA) और तमिलनाडु वन विभाग के सहयोग से की गई है। दासगुप्ता कहते हैं, “पिचावरम और मुथुपेट मैंग्रोव पर आवश्यक भू-स्थानिक डेटा की उपलब्धता और सुनामी के प्रभावों को कम करने में उनकी अहम भूमिका को देखते हुए, टीम को लगा कि इन क्षेत्रों पर मॉडलिंग अध्ययन करने से भविष्य की सुरक्षा और संरक्षण रणनीतियां तैयार करने में मदद मिलेगी।”
टीम ने तटरेखा पर विभिन्न प्राकृतिक खतरों के जोखिम को मापने के लिए ओपन-सोर्स nVEST (इंटीग्रेटेड वैल्यूएशन ऑफ इकोसिस्टम सर्विसेज एंड ट्रेडऑफ्स) सॉफ्टवेयर मॉडल का उपयोग किया। ये उपकरण स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के नेचुरल कैपिटल प्रोजेक्ट ने तैयार किए हैं और प्राकृतिक संसाधनों के मूल्य को बेहतर ढंग से समझने के लिए सहयोगात्मक प्रयासों को प्रोत्साहित करते हैं।

दासगुप्ता बताते हैं, “InVEST प्रोजेक्ट पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को मापने के लिए उपकरण मुहैया कराती है; सरल शब्दों में कहें तो, वे फायदे जो हमें प्रकृति से प्राप्त होते हैं। इसे देखने का एक तरीका इन फायदों के लिए मूल्य निर्धारण जोड़ना है। उदाहरण के लिए, मैंग्रोव अपने आस-पास की हवा को शुद्ध करते हैं (प्रदूषकों को छानकर और फंसाकर) और ये सेवा पर्यावरणीय नुकसान की लागत को एक निश्चित सीमा तक कम करती हैं। हालांकि, इन पारिस्थितिकी तंत्रों के कुछ पहलू, जैसे पोषक तत्वों का चक्रण या प्राकृतिक आपदाओं से समुदायों की सुरक्षा का कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता क्योंकि ये अमूल्य हैं। इसलिए, हमने जैव भौतिकी और भूभौतिकीय आंकड़ों पर ध्यान दिया ताकि यह समझ सकें कि मैंग्रोव वाले और बिना मैंग्रोव वाले तटीय इलाकों में जोखिम और संभावित नुकसान में क्या फर्क होता है।”
रिसर्च टीम ने स्थलाकृतिक विशेषताएं, भूमि क्षेत्र, पानी की गहराई, लहरों का पूर्वानुमान, भौगोलिक बनावट, प्राकृतिक आवासों, जनसंख्या, प्रशासनिक सीमाएं, समुद्र के तल से जुड़ी जानकारियां और समुद्र स्तर में बढ़ोतरी जैसे डेटा का इस्तेमाल किया। फिर समुद्रतट को 100 मीटर के टुकड़ों में बांटकर प्रत्येक हिस्से में मैंग्रोव के सुरक्षात्मक प्रभाव का अध्ययन किया।
परिणाम बताते हैं कि पिचावरम में मैंग्रोव के होने से तट का जोखिम मुख्य रूप से ‘बहुत कम’ से ‘मध्यम’ स्तर तक बना रहता है। लेकिन अगर मैंग्रोव नहीं होंगे, तो पूरी तटरेखा ‘उच्च’ जोखिम वाले क्षेत्र में आ जाएगी। मुथुपेट में भी कुछ ऐसी ही स्थिति है। मैंग्रोव के साथ यह क्षेत्र ज्यादातर ‘उच्च’ जोखिम में आता है, लेकिन मैंग्रोव न होने पर इसका 60% से ज्यादा तटीय क्षेत्र ‘बहुत उच्च’ जोखिम क्षेत्र बन जाएगा।
इसके अलावा, टीम ने समुद्र के तीन अलग-अलग स्तर बढ़ने की स्थितियों — कम, मध्यम और अधिक — के लिए जलभराव के मॉडलिंग अध्ययन भी किए। सबसे खराब स्थिति में (जहां समुद्र का स्तर 1.27 मीटर बढ़ता है) लगभग 58% पिचावरम और 48% मुथुपेट जलमग्न हो जाएगा। इससे इन मैंग्रोव क्षेत्रों में क्रमशः 0.39 और 2.28 टेराग्राम कार्बन भंडारण का नुकसान होगा।
दासगुप्ता कहते हैं, “100 मीटर के रिज़ॉल्यूशन वाला तटरेखा नक्शा तैयार करके, उन क्षेत्रों को सीमांकित किया गया, जहां संभावित नुकसान का जोखिम बहुत अधिक है। इन इलाकों को निषिद्ध क्षेत्र (नो-गो जोन) घोषित कर तात्कालिक सुरक्षा दी जा सकती है। साथ ही, राज्य सरकार नए मैंग्रोव लगाकर भविष्य के जोखिमों को कम करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठा सकती है। ये नक्शे इसके लिए रणनीतिक दिशा प्रदान कर सकते हैं।”

आगे की रिसर्च के लिए एक रोडमैप
दासगुप्ता बताते हैं, अध्ययन में प्राकृतिक आपदाओं को कम करने में मैंग्रोव की भूमिका और उसके सामने आने वाले खतरों के बारे में कुछ जरूरी और महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है। यह तटरेखा को एक स्थिर रूप से देखता है, जो एक कमी है। उन्होंने कहा, “तटरेखाएं कटाव और जमाव की प्रक्रिया से बनती हैं, लेकिन इस अध्ययन के लिए हमने मौजूदा स्थिति को एक स्नैपशॉट माना है।”
टोक्यो यूनिवर्सिटी की ग्रेजुएट स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर एंड लाइफ साइंसेज की इकोसिस्टम स्टडीज विभाग की प्रोफेसर शिजुका हाशिमोतो (जो इस अध्ययन के सह-लेखक भी हैं) और दासगुप्ता कहते हैं कि भविष्य के शोध में तटरेखा में होने वाले बदलाव और उसकी गतिशील प्रकृति को शामिल किया जाना चाहिए ताकि समझ और गहरी हो सके।
हाशिमोतो साझा करते हैं, “प्रमुख क्षेत्र जहां आगे रिसर्च की जरूरत है, उनमें जलीय कृषि और शहरीकरण जैसे उद्देश्यों के लिए मैंग्रोव वनों की कटाई पर मानवीय गतिविधियों के प्रभावों की निरंतर निगरानी और विश्लेषण व संरक्षण के लिए वित्तीय तंत्र सहित वर्तमान नीतियों और शासन की प्रभावशीलता और सीमाओं का विश्लेषण शामिल है।”
अन्नामलाई यूनिवर्सिटी के मानद प्रोफेसर और आईयूसीएन मैंग्रोव विशेषज्ञ समूह के सदस्य, कथैरेसन (जो इस अध्ययन का हिस्सा नहीं हैं) बताते हैं कि यह शोध ऐसे महत्वपूर्ण समय में आया है जब दक्षिण भारत के मैंग्रोव पर हमें तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। मई 2024 में, अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने पारिस्थितिकी तंत्र के लिए पहला विश्वव्यापी आकलन “ग्लोबल रेड लिस्ट ऑफ मैंग्रोव ईकोसिस्टम” प्रकाशित किया था। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया के 50% मैंग्रोव संकट में हैं और दक्षिण भारत के मैंग्रोव को गंभीर रूप से संकटग्रस्त घोषित किया गया।
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रेड लिस्ट असेसमेंट ऑफ मैंग्रोव ऑफ साउथ इंडिया एंड श्रीलंका एंड मालदीव के सह-लेखक कथैरेसन बताते हैं, “मैंग्रोव को जीवित रहने के लिए कुछ मात्रा में मीठे पानी की जरूरत होती है और दक्षिण भारत के अधिकांश मैंग्रोव कावेरी डेल्टा में स्थित हैं। इस क्षेत्र में मीठे पानी के कम प्रवाह के कारण, मिट्टी में नमक की मात्रा बढ़ रही है और यह उच्च लवणता इन मैंग्रोव के पतन का एक महत्वपूर्ण कारक है।”
उन्होंने आगे कहा, तमिलनाडु वन विभाग, स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर पानी को बाहर निकालने और लवणता को कम करने के लिए कृत्रिम रूप से बनी नहरों का उपयोग कर रहा है, जिससे इस चिंता का समाधान हो रहा है। इसके अलावा, जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (जेआईसीए) की सहायता से मैंग्रोव बहाली परियोजनाएं भी चलाई जा रही हैं। कथैरेसन तमिलनाडु के जैव विविधता संरक्षण और जलवायु परिवर्तन प्रतिक्रिया परियोजना में मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र विशेषज्ञ भी हैं।

कथैरेसन इस बात पर जोर देते हैं कि चल रहे उपायों के अलावा, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए मैंग्रोव को बचाने का सबसे जरूरी तरीका जैव विविधता पर ध्यान देना है। वह कहते हैं, “मैंग्रोव वृक्षारोपण की पहल अक्सर राइज़ोफोरा और एविसेनिया जैसी कुछ प्रजातियों पर केंद्रित होती है क्योंकि वे तेजी से बढ़ती हैं। इससे जैव विविधता का नुकसान होता है। मैंग्रोव संरक्षण में जैव विविधता और आनुवंशिक विविधता को ध्यान में रखना चाहिए ताकि हम आगे आने वाली चुनौतियों से तटों को बचा सकें।” उन्होंने तमिलनाडु के लिए ब्रुगुइरा जिम्नोरिजा, एविसेनिया ऑफिसिनैलिस, एक्सोकेरिया एगैलोचा और एजेसिएरस कॉर्निकुलेटम जैसी अन्य सख्त प्रजातियों का सुझाव दिया। वह आगे कहते हैं, “इसके अलावा, सोनेराटिया एपेटाला, जाइलोकार्पस ग्रैनेटम, कैंडेलिया कैंडेल और लुमनिट्ज़ेरा रेसमोसा जैसी दुर्लभ प्रजातियों पर भी विचार किया जा सकता है, और वन विभाग इस संबंध में (दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण के लिए) महत्वपूर्ण प्रयास कर रहा है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 31 मार्च 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर- तमिलनाडु में पिचावरम के मैंग्रोव वन के अंदर का नजारा। तस्वीर: सतदीप गिल, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0)