- जलवायु परिवर्तन अगले 50 सालों में जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में सालब पंजा (मार्श ऑर्किड) के लिए सही आवासों को कम कर सकता है। एक नए अध्ययन में यह नतीजा निकाला गया है।
- खतरे में पड़ी यह प्रजाति पहले से ही ज्यादा कटाई और आवास खराब होने से दबाव में हैं।
- शोधकर्ताओं का कहना है कि ज्यादा ऊंचाई वाले आवासों को बचाना और जंगल के बाहर मार्श ऑर्किड की खेती को बढ़ावा देना, स्थानीय तौर पर विलुप्त होने से रोकने के लिए बहुत जरूरी है।
हिमालय के अल्पाइन चरागाहों में मार्श ऑर्किड (डाक्टाइलोरहिज़ा हेटागीरिया) अपनी औषधीय उपयोगिता के लिए लंबे समय से बेशकीमती रहा है। इसके खास बैंगनी फूलों ने सदियों से संग्रहकर्ताओं और व्यापारियों को आकर्षित किया है। हालांकि, अंधाधुंध संग्रह और व्यापार की वजह से संकट झेल रही बेहद कीमती यह जड़ी-बूटी है अब ऐसा खतरा झेल रही है जिसे अक्सर अनदेखा किया जाता है। वह खतरा है जलवायु परिवर्तन।
कश्मीर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के एक नए अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि बढ़ते तापमान और बारिश के बदलते पैटर्न से अगले 50 सालों में ऑर्किड के पहले से ही सीमित आवास और कम हो सकते हैं। इससे स्थानीय तौर पर विलुप्त होने का खतरा बढ़ सकता है, भले ही आवास के लिए अनुमानित नुकसान मामूली दिखाई दे।
संकट में ऑर्किड
दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन, आवास का नुकसान और बहुत ज्यादा दोहन जैव-विविधता के प्रमुख खतरों में शामिल हैं। इन खतरों को पहाड़ी पर्यावरण के लिए खास तौर पर संवेदनशील माना जाता है। ऑर्किड पौधे बहुत ज्यादा खास और संवेदनशील समूह हैं, जो उन्हें आवास और पर्यावरण से जुड़ी व्यापक परिस्थितियों में बदलाव के प्रति बहुत ज्यादा संवेदनशील बनाते हैं।
कश्मीर विश्वविद्यालय में पारिस्थितिकी के प्रोफेसर मंजूर शाह कहते हैं, “यह संवेदनशीलता उनकी खास पारिस्थितिकी, विशिष्ट आवास पसंद और ऑर्किड माइकोराइजल फंगस के साथ जुड़ाव पर बहुत ज्यादा निर्भरता से होती है। यह फंगस पौधों की जड़ों में या उसके आस-पास रहता है।” “वे पौधों को पानी और पोषक तत्व अवशोषित करने में मदद करते हैं।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि कई ऑर्किड खास तरह के पोलिनेटर को पसंद करते हैं। जलवायु परिवर्तन से फेनोलॉजी में बदलाव के कारण पत्तियों का उगना, फूलना, फल लगना और पतझड़ जैसी सालाना घटनाएं पोलिनेटर की उपलब्धता के बीच फर्क पैदा कर सकते हैं।
शाह कहते हैं, “इस तरह ऑर्किड का मुश्किल जीवन चक्र, फंगस और पॉलिनेटर के साथ उनका मुश्किल रिश्ता उन्हें जलवायु परिवर्तन और इंसानी गतिविधियों के लिए खास तौर पर संवेदनशील बनाता है।” “इसके अलावा, ऑर्किड की घटती आबादी अक्सर पर्यावरण के खराब होने के बारे में पहले से चेतावनी देती है”

संकटग्रस्त हिमालयी औषधि पौधा
मार्श ऑर्किड हिमालय की मूल प्रजाति है। इसे इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) ने खतरे वाली सूची में रखा है।
यह बारहमासी जड़ी-बूटी 40 से 60 सेंटीमीटर लंबी होती है। यह मुख्य रूप से समुद्र तल से 2,500 से 5,000 मीटर की ऊंचाई पर कश्मीर और लद्दाख के खुले घास के ढलानों और अल्पाइन चरागाहों में संकीर्ण क्षेत्रों में पाई जाती है। इसके बैंगनी से गुलाबी-बैंगनी फूल घने कांटों में उगते हैं, जिससे यह आकर्षक और संग्रह के लिए आसान बन जाती है। इसी कारण इसका बहुत ज्यादा दोहन भी हो गया है।
कश्मीर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता जावेद एम. दाद कहते हैं, “जहां तक अलग-अलग दबावों की बात है, तो बहुत ज़्यादा चराई, लगातार कटाई, आवास का खराब होना और लोगों में कम जानकारी जैसे बड़े खतरों की वजह से इसकी आबादी कम हुई है।” उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के असर से इस पर संकट बढ़ने की आशंका है। “इसीलिए हमने अपना शोध मार्श ऑर्किड पर फोकस किया है।”
जलवायु परिवर्तन का असर
पिछले साल फोलिया ओकोलॉजिका जर्नल में छपे अध्ययन में डैड और उनके साथियों ने भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में ऑर्किड के वितरण पर संभावित असर का अध्ययन किया। इसके लिए उन्होंने इकोलॉजिकल नीश मॉडल का इस्तेमाल किया। इकोलॉजिकल नीश वे खास हालात होते हैं जिनकी किसी प्रजाति को जिंदा रहने और प्रजनन के लिए जरूरत होती है। इनमें तापमान, मिट्टी, नमी, ऊंचाई, रोशनी और दूसरे जीवों के साथ संबंध शामिल है।
शोधकर्ताओं ने अगले 50 सालों के लिए यह आकलन किया कि आवास कितने सही हैं। इसे दो रिप्रेजेंटेटिव कंसंट्रेशन पाथवे (आरसीपी): 4.5 और 8.5 के तहत किया गया। आरसीपी ऐसे परिदृश्य हैं जिनका इस्तेमाल वैज्ञानिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के अलग-अलग स्तर के आधार पर भविष्य में जलवायु परिवर्तन का पता लगाने के लिए करते हैं।

“सटीकता में सुधार के लिए, हमने एक ही मॉडल पर निर्भर रहने के बजाय चार वैश्विक जलवायु मॉडलों के नतीजों को आपस में मिलाया।”
विश्लेषण से पता चला कि पूरे इलाके में डाक्टाइलोरहिजा हेटागीरिया का फैलाव बारिश से बहुत ज्यादा जुड़ा हुआ था। अभी, लगभग 790 वर्ग किलोमीटर में इसके अच्छे आवास हैं। इनमें कश्मीर (274.1 वर्ग किमी), जम्मू (210.5 वर्ग किमी) और लद्दाख (305.6 वर्ग किमी) शामिल है।
लेकिन, भविष्य में मौसम की स्थिति को देखते हुए इन इलाकों के सिकुड़ जाने की आशंका है। RCP 4.5 के तहत, बहुत ज़्यादा संभावित आवास में 2050 तक 4.2% और 2070 तक 5.4% की कमी आने का अनुमान है। बहुत ज्यादा RCP 8.5 में यह कमी 2050 तक 18.1% और 2070 तक 8.7% होगी।
अध्ययन में कहा गया है, “उष्णकटिबंधीय और समशीतोष्ण इलाकों में यह कमी ज्यादा स्पष्ट दिखाई दे सकती है, जबकि ठंडे और सूखे इलाकों में इस प्रजाति को नए ज्यादा संभावित आवास मिल सकते हैं।” “हालांकि डी. हैटागीरिया के लिए ज्यादा संभावित आवास में कमी मामूली प्रतीत होती है, क्योंकि इसके लिए ज्यादा खास आवास जरूरी हैं और यह स्वाभाविक रूप से धीरे बढ़ता है। यह मामूली कमी इसे स्थानीय रूप से विलुप्त होने के जोखिम को बढ़ा सकती है।”
संरक्षण का मतलब और मॉडलिंग की सीमाएं
इन नतीजों के आधार पर, शोधकर्ता कश्मीर हिमालय में ऊंचाई वाले पारिस्थितिकी तंत्र में इन-सीटू संरक्षण का सुझाव देते हैं, क्योंकि भविष्य में इनके लिए सही आवास कम हो सकते हैं। इन-सीटू संरक्षण का मतलब है किसी प्रजाति को उसके स्वाभाविक आवास में बचाना।
अध्ययन के लेखक इरफान राशिद कहते हैं, “पीर पंजाल और जांस्कर रेंज जहां रहने की जगह की जरूरत स्थिर रहने या बेहतर होने की संभावना है, एक्स-सीटू उपायों में मदद कर सकते हैं।” “यह भी जरूरी है कि चराई, अधिक इस्तेमाल, गैर-कानूनी व्यापार और लगातार कटाई जैसे मौजूदा खतरों से निपटा जाए और प्रजनन के उचित तरीकों का इस्तेमाल करके खेती को बढ़ावा दिया जाए।”
स्वतंत्र विशेषज्ञ अध्ययन का स्वागत तो करते हैं, लेकिन खास मॉडल की सीमाओं के बारे में आगाह करत हैं।
शाह कहते हैं कि यह खास ऑर्किड प्रजाति पर जरूरी अध्ययन तो है, लेकिन खास मॉडल की अपनी सीमाएं होती हैं। वे कहते हैं, “वे ऑर्किड के लिए जरूरी पॉलिनेटर और माइकोराइजल फंगस जैसे जैविक संबंधों को पूरी तरह से पकड़ नहीं सकते।” “अध्ययन में आवास पर इंसानों के दबाव को भी माना गया है, लेकिन इन कारकों को मॉडल में बेहतर तरीके से शामिल किया जा सकता था, ताकि पूर्वानुमान ज्यादा विश्वसनीय बन सकें।”
लद्दाख में ऊंचाई पर उगने वाले वाले पौधों पर बहुत काम करने वाले वनस्पति विज्ञानी बिलाल मीर इस बात पर जोर देते हैं कि इस अध्ययन की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि इसने समशीतोष्ण और उष्णकटिबंधीय हिमालयी क्षेत्रों से लेकर ठंडे और सूखे लद्दाख तक के अलग-अलग क्षेत्रीय प्रतिक्रियाओं को दिखाया है, जो सीधे इसके संरक्षण से जुड़े हैं।
वे आगे कहते हैं, “हालांकि, इस अध्ययन में जिन मॉडल को इस्तेमाल किया गया, वे असल आबादी के बने रहने के बजाय जलवायु के हिसाब से सही होने को दिखाता है।” “इसमें माइकोराइजल पर निर्भरता, बीज के प्रसार की सीमाएं, जमीन के इस्तेमाल में बदलाव/कटाई के दबाव को शामिल नहीं किया गया है और इसमें अल्पाइन के सूक्ष्म आवास के लिए सिर्फ जलवायु डेटा का इस्तेमाल किया गया है।”

मीर कहते हैं कि बारिश के बदलते पैटर्न और तापमान में बढ़ोतरी से हिमालय के अल्पाइन घास के मैदानों में पहले से ही बदलाव हो रहे हैं। इससे बर्फ की परतें घट रही है, पेड़ों और बर्फ की रेखाओं और पहाड़ की चोटियों तक में बदलाव आ रहा है और बड़े होने के मौसम में बदलाव की वजह से इन पौधों में फूल आने, पॉलिनेशन और उनके बीजारोपण पर असर पड़ रहा है।
वे कहते हैं, “गर्म परिस्थितियां कम ऊंचाई वाली वनस्पतियों को अल्पाइन घास के चारागाह में प्रवेश करने में मदद करती है। दूसरी तरफ, कम बर्फबारी और अधिक बारिश से कमजोर मिट्टी को नाजुक बना देती है और इससे ठंड के अनुकूल पौधों पर दबाव बढ़ता है।” “ये बदलाव अल्पाइन ऑर्किड के रहने की अच्छी जगह को पहाड़ों की चोटी की ओर संकुचित देते हैं, जिससे उनकी आबादी कम होने और स्थानीय तौर पर खत्म होने का खतरा बढ़ जाता है।”
प्रजाति को बचाना
वैज्ञानिकों का कहना है कि ऑर्किड संरक्षण के लिए पहला कदम ऑर्किड की जैव-विविधता का पूरा दस्तावेजीकरण करना है। इसके बाद उनके जीवविज्ञान और पारिस्थितिकी संबध की गहराई से वैज्ञानिक समझ जरूरी है। शाह कहते हैं, “इस तरह की जानकारी आगे के संरक्षण उपायों के लिए मज़बूत आधार देगी।” “IUCN के क्षेत्रीय दिशानिर्देशों के हिसाब से उनके लिए खतरे के सही स्तर और संरक्षण की स्थिति का अंदाजा लगाना भी जरूरी है।”
मीर समुदाय-आधारित खेती और एक्स-सीटू प्रोपेगेशन पर जोर देते हैं, जिसमें खास अल्पाइन आवास की सख्त सुरक्षा शामिल है। यह जंगल की आबादी पर दबाव कम करने के लिए संरक्षण के सबसे असरदार तरीकों में से एक है।
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मीर कहते हैं, “हालांकि भारत की जैव-विविधता और जंगल की नीतियां सिद्धांत में मजबूत लगती हैं, लेकिन वे जलवायु-संवेदनशील प्रजातियों के लिए काफी नहीं हैं, क्योंकि वे अपनी प्रबंधन रणनीति में जलवायु पूर्वानुमान, आवास में बदलाव या प्रजातियों की खास संवेदनशीलता को शायद ही शामिल करते हैं।” “कानूनी सुरक्षा के बावजूद कई ऑर्किड संवेदनशील बने हुए हैं, क्योंकि लंबे समय तक आबादी की निगरानी, खतरे में पड़े औषधीय पौधों के लिए खास कार्ययोजना और गैर-कानूनी कटाई के खिलाफ जमीनी स्तर पर कार्रवाई में अभी भी काफी कमियां हैं। ऐसा खास तौर पर दूर-दराज के हिमालयी इलाकों में देखा जाता है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 9 फरवरी, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: मार्श ऑर्किड के बैंगनी फूलों की घनी बालियों से ऊंचाई वाले इलाकों के नजारों में चार चांद लग जाते हैं। तस्वीर – जावेद एम डैड।