- बंदीपुर टाइगर रिज़र्व में गौर के खाने के लिए बहुत कम घास बची है। इसका असर पूरी खाद्य श्रृंखला पर पड़ सकता है।
- दशकों पहले यहां पेड़ों के नीचे अच्छे घास के मैदान थे, जिससे गौर को सही तरह से खाना मिलता था।
- वर्तमान में इनमें से ज्यादातर घास के मैदानों पर हमलावर प्रजातियों (इनवेसिव) ने कब्ज़ा कर लिया है।
कर्नाटका के बंदीपुर टाइगर रिज़र्व में, 2022 की टाइगर सेंसस रिपोर्ट के मुताबिक, देश भर के करीब 3,600 बाघों में से 150 बाघों की एक अच्छी आबादी है। हालांकि, बाघों के जीवित रहने के लिए जंगलों में घास की बहुत बड़ी भूमिका होती है। सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री (SACON) के सीनियर साइंटिस्ट टी. रमेश कहते हैं, “टाइगर का ज़िंदा रहना, सांभर हिरण और गौर जैसे बड़े शरीर वाली शिकार की प्रजातियों के ज़िंदा रहने से बहुत हद तक जुड़ा हुआ है।”
रमेश की नेतृत्व में किए गए एक शोध में बंदीपुर में गौर या इंडियन बाइसन (बॉस गौरस) की रहने की जगह और मौसम के हिसाब से इस प्रजाति की जनसंख्या, रहने की जगह का चुनाव, और संरक्षण की ज़रूरतों की जांच की गई। रमेश बताते हैं, “गौर मिला-जुला खाना खाता है। यह पेड़ों से पत्तियां भी और साथ ही जमीन की घास भी चरता है। दशकों पहले, बंदीपुर में पेड़ों के नीचे अच्छे घास के मैदान थे, जिससे गौर को सही तरह से खाना मिलता था। वर्तमान में इनमें से ज्यादातर घास के मैदानों पर हमलावर प्रजातियों (इनवेसिव) ने कब्ज़ा कर लिया है, जिससे गौर के खाने के लिए घास बहुत कम बची है। इससे उन्हें इंसानों और जंगली जानवरों दोनों के बीच के इलाकों में जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।” इस कारण से उन इलाकों में वन्यजीव और मानवों के बीच संघर्ष की स्थिति बन जाती है।
शोधकर्ताओं ने जनवरी से दिसंबर 2023 तक बड़े पैमाने पर फील्ड सर्वे और हैबिटैट एनालिसिस किए। इस स्टडी का मकसद उन कारकों की पहचान करना था जो किसी भी जगह को गौर के रहने के लिए अनुकूल बनाते हैं और जिनसे इस बड़े जानवर के प्रबंधन की प्रक्रिया को बेहतर बनाया जा सके।
इस शोध की मुख्य लेखिका, सुभद्रा बारिक, मोंगाबे इंडिया को बताती हैं कि बंदीपुर में गौर के लिए रहने की सही जगह में काफी कमी आई है। ऐसी सही जगहों का हिस्सा कुल क्षेत्र का सिर्फ़ 43% ही पाया गया है। शोधपत्र के अनुसार, “रहने की सही जगहें अलग-अलग पैमाने पर अलग-अलग थीं, जो 11.23% से 43.83% तक थीं, जिसमें माइक्रो स्केल पर ड्राई सीजन मॉडल में सबसे कम और मैक्रो स्केल पर वेट सीज़न मॉडल में सबसे ज़्यादा सही थीं।” बारिक का कहना है कि यह चिंता की बात है, क्योंकि यह पूरा क्षेत्र कभी घास से भरपूर था और खुर वाले जानवरों के लिए बहुत अच्छा था। भले ही गौर पूरे पार्क में फैले हुए हैं, इसके बावजूद उनकी संख्या उन इलाकों में ज्यादा है जहाँ चारे की गुणवत्ता बेहतर है। रहने की जगह के सही होने की क्षमता मुख्य रूप से झाड़ियों की संख्या, पानी के गड्ढों के घनत्व, पेड़ों की विविधता, जगह की अलग-अलग तरह की बनावट, ऊबड़-खाबड़पन, ऊंचाई, बारिश, और इंसानी बस्तियों और सड़कों से नज़दीकी से प्रभावित थी।
“हमने पाया कि सड़क किनारे की साफ़-सफ़ाई एक भूमिका निभाती है। पर्यटन और जंगल की आग को रोकने के मकसद तैयार की गई इन जगहों पर घास ज़्यादा उगती है, जिससे गौर और हिरण जैसे दूसरे शाकाहारी जानवर आकर्षित होते हैं,” बारिक बताती हैं। स्टडी में यह भी पाया गया कि पेड़ों की विविधता और ज़मीन पर उगने वाली घास और झाड़ियां गौर के लिए बहुत ज़रूरी हैं, खासकर बारिश के मौसम में जब चरने के मौके और झाड़ियां बहुत ज़्यादा होती हैं। लैंटाना जैसे ज़्यादा फैलने वाले पौधों की किस्में गौर के रहने की जगह पर काफ़ी असर डालती हैं, लेकिन बारिश का मौसम घास और पेड़-पौधों को बढ़ावा देकर इन जगहों को बेहतर बनाता है।
बारिक का कहना है कि इन नतीजों से संरक्षित क्षेत्रों के बेहतर प्रबंधन की जरूरत का पता चलता है। इसके लिए गौर के रहने की कम गुणवत्ता वाली जगहों वाले घास के मैदानों को ठीक करना होगा; सूखे मौसम में पानी के गड्ढों को व्यवस्थित करके उनसे जुड़े घास के मैदानों और दलदली इलाकों को बनाए रखना होगा; और पूरे पार्क में सड़क के किनारे वाले घास के मैदानों की देखरेख बढ़ानी होगी ताकि घास वाले इलाकों का फैलाव बराबर हो।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 8 अक्टूबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: बंदीपुर टाइगर रिज़र्व में गौर का झुंड। इंडियन बाइसन या गौर एक मिक्स फीडर हैं जो पेड़ों से पत्तियां और जमीन की घास कहते हैं। तस्वीर – टी. रमेश