- राजस्थान में गांवों के लोग इस समय भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित जैसलमेर से राज्य की राजधानी जयपुर तक पैदल यात्रा कर रहे हैं। उनका उद्देश्य अपने पवित्र वनों (ओरण), चरागाहों और जल स्रोतों के कैचमेंट क्षेत्रों की रक्षा करना है।
- लोगों का कहना है कि राजस्व रिकॉर्ड में करीब 5.8 लाख हेक्टेयर ओरण को गलत तरीके से बंजर भूमि के रूप में दर्ज किया गया है।
- पश्चिमी राजस्थान में बड़े स्तर पर बन रहे सौर ऊर्जा पार्कों के कारण भूमि विवाद बढ़ रहे हैं, जो अब राज्य-स्तरीय विरोध प्रदर्शन का रूप ले चुके हैं।
इस साल 27 फरवरी की बात है। करीब 20 गायों का झुंड बिप्रासर तालाब से पानी पी रहा था, पास ही भेड़ों का एक झुंड चर रहा था। लगभग 13 ऊंट भी वहां आकर ठहर गए।
“हर दिन हजारों जानवर, पक्षी और लोग यहां प्यास बुझाने आते हैं। यह पानी दो साल पुराना है, क्योंकि पिछले साल बारिश कम हुई थी। जब बारिश कम भी होती है, तब भी बड़ा आगोर (कैचमेंट क्षेत्र) हमें यहां पानी जमा करने में मदद करता है,” लाल सिंह ने सामने फैली जमीन की ओर हाथ फैलाते हुए कहा, फिर उनकी आवाज धीमी हो गई। “अब इस कैचमेंट में 400 मेगावाट का सोलर पार्क बनाने का प्रस्ताव है। फिर ये सारे जानवर कहां जाएंगे? हम पानी के बिना कैसे जिएंगे?”
जैसलमेर जिले के रामगढ़ गांव में पले-बढ़े सिंह ने रेगिस्तानी पारिस्थितिकी की भाषा को करीब से समझा है, जहां लोग साल में औसतन सिर्फ 100 मिमी बारिश पर निर्भर रहते हैं, जो केवल आठ दिनों में होती है। यह इलाका देश में सबसे कम बारिश वाले क्षेत्रों में से एक है। तुलना के लिए, भारत में औसत सालाना बारिश करीब 1200 मिमी होती है।
यहां के लोग पारंपरिक ज्ञान का इस्तेमाल करते हुए इस कम पानी को तालाबों, उथले और गहरे कुओं और खड़ीन के जरिए इकट्ठा करते हैं, और ओरण (पवित्र वन) और गोचर (चरागाह) में उगने वाली घास और झाड़ियों पर पशुपालन करते हैं।
लेकिन अब इस क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहे बड़े सौर ऊर्जा और खनन परियोजनाएं इन सामुदायिक जमीनों पर कब्जा कर रही हैं। इससे पारंपरिक जीवन शैली पर खतरा मंडरा रहा है और पिछले पांच वर्षों में यह मुद्दा एक बड़े आंदोलन का रूप ले चुका है।

ओरण के लिए पैदल यात्रा
ओरण ऐसे पवित्र वन होते हैं जो स्थानीय देवी-देवताओं या शहीदों को समर्पित होते हैं। इन्हें स्थानीय समुदाय सख्त नियमों के तहत संरक्षित रखते हैं, जहां सीमित उपयोग की अनुमति होती है। यहां पशुओं को चरने दिया जाता है, लेकिन पेड़ों को काटना मना होता है। इसी वजह से ये रेगिस्तान के बीच एक तरह के नखलिस्तान (मरुधान) बन जाते हैं, जहां खेजड़ी (Prosopis cineraria) और रोहिड़ा (Tecomella undulata) जैसे देशी पेड़ पाए जाते हैं। साथ ही, यहां गंभीर रूप से संकटग्रस्त गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड), काराकल और डेजर्ट फॉक्स जैसे वन्यजीव भी रहते हैं।
21 जनवरी को करीब 100 ग्रामीणों ने जैसलमेर में भारत-पाकिस्तान सीमा के पास स्थित तनोट माता मंदिर से एक विरोध मार्च शुरू किया। उनका लक्ष्य मार्च के अंत तक लगभग 700 किमी की दूरी तय करके राज्य की राजधानी जयपुर पहुंचना है, ताकि सरकार पर ओरण, चरागाहों और जल स्रोतों के कैचमेंट क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए दबाव बनाया जा सके। रास्ते में जैसलमेर और जोधपुर जैसे शहरों में हजारों लोग इस यात्रा से जुड़ रहे हैं, जबकि रास्ते में पड़ने वाले गांव उन्हें रहने और खाने की व्यवस्था के साथ गर्मजोशी से स्वागत कर रहे हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों के कई नेताओं ने भी इस अभियान का समर्थन किया है और इस मुद्दे को विधानसभा में उठाया है।
‘सेव ओरण (ओरण बचाओ)’ अभियान के तहत इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे संरक्षणवादी और कार्यकर्ता सुमेर सिंह भाटी कहते हैं, “यह यात्रा लोगों में जागरूकता बढ़ा रही है। हमें उम्मीद है कि राजस्थान के कोने-कोने से हजारों लोग जयपुर में हमारे साथ जुड़ेंगे। हम विकास के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन बड़े स्तर पर बन रहे सौर ऊर्जा प्रोजेक्ट, जिनके लिए हजारों हेक्टेयर जमीन चाहिए, हमारे जीवन और आजीविका के स्रोत छीन रहे हैं।”


उदाहरण के तौर पर, बांधा गांव में राज्य सरकार ने 1 गीगावाट के सौर ऊर्जा प्रोजेक्ट के लिए 2,397 हेक्टेयर जमीन आवंटित की है, जिससे पशुपालकों को अब चरागाह के विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं क्योंकि यह जमीन अब घेर दी गई है।
बांधा गांव के निवासी स्वरूप राम कहते हैं, “पहले हमारे पशु खुले में चर सकते थे, लेकिन अब जमीन सीमित हो गई है। इससे लोगों को अपने पशुओं की संख्या कम करनी पड़ रही है। रिकॉर्ड में हमारे चरागाह को बंजर भूमि दिखाया गया था, जिससे सरकार के लिए इसे कंपनियों को देना आसान हो गया।”
राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 ,और राजस्थान भूमि राजस्व अधिनियम, 1956 के तहत चरागाहों और जल स्रोतों के कैचमेंट क्षेत्रों का औद्योगिक या बुनियादी ढांचे के लिए उपयोग सीमित किया गया है, और बाद के न्यायालयों के फैसलों ने भी इस नियम को मजबूत किया है। लेकिन बंजर भूमि को आसानी से आवंटित किया जा सकता है, इसलिए स्थानीय लोग अपनी सामुदायिक जमीनों की सही पहचान और वर्गीकरण की मांग कर रहे हैं।
भाटी ने कहा, “हमारे अनुमान के मुताबिक जैसलमेर जिले में करीब 5.8 लाख (580,000) हेक्टेयर ओरण को सरकारी रिकॉर्ड में बंजर भूमि के रूप में दर्ज किया गया है। हमें इस गलत वर्गीकरण की जानकारी नहीं थी और चिंता की भी कोई खास वजह नहीं थी, क्योंकि रेगिस्तान में पहले औद्योगिक परियोजनाएं बहुत कम थीं और वे भी आमतौर पर कुछ एकड़ जमीन ही लेती थीं। लेकिन सोलर पार्क अलग हैं। ये हजारों हेक्टेयर में बनते हैं और अब बड़ी संख्या में आ रहे हैं।”
मोंगाबे-इंडिया ने ईमेल के जरिए राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RRVUNL), राजस्थान रिन्यूएबल एनर्जी कॉरपोरेशन लिमिटेड और जैसलमेर जिला कलेक्टर से संपर्क कर यह जानने की कोशिश की कि सोलर पार्कों के लिए जमीन आवंटित करते समय कौन-से सुरक्षा उपाय अपनाए जाते हैं। खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला था।
सौर ऊर्जा का बढ़ता विस्तार
साल में 325 से अधिक धूप वाले दिनों के कारण राजस्थान भारत का नवीकरणीय ऊर्जा केंद्र बनकर उभरा है। सौर ऊर्जा के मामले में यह राज्य देश में पहले स्थान पर है, जहां 22,860.73 मेगावाट की स्थापित क्षमता है। राजस्थान क्लीन एनर्जी इंटीग्रेटेड पॉलिसी का लक्ष्य 2029-30 तक 125 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित करना है, जिसमें 90 गीगावाट सौर ऊर्जा शामिल है। 2023 से 2025 के बीच 23 गीगावाट क्षमता वाले सोलर पार्कों के लिए करीब 44,247 हेक्टेयर जमीन आवंटित की गई।
इस तरह के विस्तार से पैदा हो रहे विवाद अब अदालतों तक भी पहुंच गए हैं। उदाहरण के लिए, नेदान गांव के निवासियों ने 2018 में एक मामला दायर किया था, जिसमें उन्होंने कहा कि अडानी समूह की 600 मेगावाट की हाइब्रिड सौर-पवन परियोजना के कारण ओरण तक पहुंच सीमित हो गई है। इस पर राजस्थान हाई कोर्ट ने कंपनी को दी गई जमीन का आवंटन रद्द कर दिया। एक अन्य मामले में, पिछले साल स्थानीय लोगों के कड़े विरोध के बाद अडानी समूह को बाइया गांव में सौर परियोजना के लिए ली गई 205.3 हेक्टेयर ओरण भूमि वापस करनी पड़ी।

‘सेव ओरण’ समूह के नेता भोपाल सिंह कहते हैं, “सोलर पार्क स्थानीय लोगों के लिए रोजगार नहीं पैदा करते, सिवाय कुछ लोगों के जिन्हें सुरक्षा गार्ड या सोलर पैनल साफ करने के काम मिलते हैं। अगर सरकार सच में लोगों के हित के बारे में सोचती है, तो उसे छोटे, विकेंद्रीकृत सौर संयंत्रों को बढ़ावा देना चाहिए, जिनका मालिकाना हक समुदायों के पास हो।”
वे आगे कहते हैं, “बड़े सोलर पार्क और खनन परियोजनाएं केवल कुछ कारोबारियों को फायदा पहुंचाती हैं, जबकि गांवों के लोग या तो शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हो जाते हैं या कम मजदूरी वाले काम करने लगते हैं। इसके विपरीत, पशुपालन ने पीढ़ियों से इस कठिन इलाके में लोगों को जीवित रहने में मदद की है।”
20वीं पशुधन गणना 2019 के अनुसार, जैसलमेर जिले में करीब 24 लाख गाय, बकरी, भेड़ और ऊंट थे। लेकिन कार्यकर्ताओं का कहना है कि दर्ज चरागाह क्षेत्र इनके पालन-पोषण के लिए पर्याप्त नहीं है। राजस्थान टेनेंसी (सरकारी) नियम 1955 के अनुसार, एक तहसीलदार गांव की पंचायत से परामर्श करके प्रति पशु लगभग 0.12 हेक्टेयर जमीन चरागाह के रूप में निर्धारित कर सकता है।
कार्यकर्ता बलवंत सिंह जोधा ने कहा, “हमने 45 गांवों के पशुधन आंकड़ों के आधार पर आकलन किया है, जिससे पता चलता है कि रिकॉर्ड में दर्ज चरागाह क्षेत्र हमेशा आवश्यक क्षेत्र से कम है। हमने जैसलमेर जिला कलेक्टर को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि पूरे जिले के सभी गांवों में ऐसा ही आकलन किया जाए और उसी के अनुसार चरागाह भूमि तय की जाए।”
उन्होंने आगे कहा, “एक गाय रोजाना करीब 5 किलो सूखा चारा खाती है। अगर हम इसे बाजार से खरीदें, तो हर हफ्ते लगभग 2,800 रुपये खर्च होंगे। यही वजह है कि हर गांव में ओरण और गोचर होना बहुत जरूरी है।”
ओरण को वन का दर्जा
2005 में सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने ओरण की विस्तृत मैपिंग करने और उन्हें वन के रूप में वर्गीकृत करने की सिफारिश की थी। लेकिन ये सिफारिशें लागू नहीं हो सकीं। इसके बाद कई अंतरिम याचिकाओं के चलते दिसंबर 2024 में अदालत ने राजस्थान सरकार को इन सिफारिशों को लागू करने और एक विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्देश दिया, जो घासभूमि, चट्टानी इलाके और पथरीले रेगिस्तान जैसे विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों की पहचान कर उन्हें वन भूमि के रूप में मान्यता दे।
दिसंबर 2025 में राज्य सरकार द्वारा गठित समिति ने जैसलमेर जिले के तीन गांवों में 11,313 बीघा (2,977 हेक्टेयर) जमीन को ओरण के रूप में वर्गीकृत करने का प्रस्ताव दिया। हालांकि, कई अन्य गांवों का सर्वे अभी बाकी है।
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जैसलमेर के पर्यावरणविद और किसान पार्थ जगानी कहते हैं, “स्थानीय राजस्व अधिकारियों को अभी तक इस प्रक्रिया को शुरू करने के कोई आदेश नहीं मिले हैं, इसलिए ज्यादातर गांव अपनी पंचायतों में नए प्रस्ताव नहीं ला पा रहे हैं। जब तक यह मैपिंग पूरी नहीं हो जाती, तब तक किसी भी जमीन को व्यावसायिक गतिविधियों के लिए आवंटित या लीज पर नहीं देना चाहिए।”
मोंगाबे-इंडिया ने ओरण और चरागाह भूमि की जमीनी मैपिंग को लेकर प्रधान मुख्य वन संरक्षक और जैसलमेर जिला कलेक्टर से संपर्क किया है। उनके जवाब का इंतजार है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 19 मार्च 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: जैसलमेर जिले के रघवा गांव में भेड़ों के झुंड के साथ एक चरवाहा, जहां 2700 मेगावाट का सोलर पार्क प्रस्तावित है। तस्वीर: मनु मौदगिल।