- छत्तीसगढ़ के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के आसपास के गांवों के निवासी बेदखली के डर से सहमे हुए हैं। अधिकारी जंगल का सर्वे कर रहे हैं और पुनर्वास के लिए जमीनें चिह्नित कर रहे हैं।
- आदिवासी समूहों ने वन अधिकार अधिनियम के उल्लंघन और ग्राम सभा की सहमति के अभाव का आरोप लगाया है।
- जनजातीय कार्य मंत्रालय ने राज्य सरकार को याद दिलाया कि सामुदायिक अधिकारों को मान्यता दिए बिना किसी को भी वहां से बेदखल नहीं किया जा सकता है।
- विशेषज्ञों के मुताबिक, वास्तविक संरक्षण सिर्फ स्थानीय समुदाय के विश्वास और भागीदारी से संभव है।
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद और धमतरी जिलों की सीमा पर फैले घने जंगलों में इन दिनों एक अजीब सी खामोशी छाई हुई है। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के आसपास के गांवों में एक के बाद एक ग्राम सभाएं हो रही हैं और हर सभा में बस एक ही सवाल गूंज रहा है, क्या हमें उन गांवों को छोड़ना पड़ेगा जहां हमारे परिवार कई पीढ़ियों से रहते आए हैं?
सत्रह ग्राम पंचायतों के निवासियों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों से वन विभाग के अधिकारी सर्वे कर रहे हैं, नक्शे बना रहे हैं और खेतों की नाप-जोख कर जमीन पर निशान लगा रहे हैं। ग्रामीणों को डर है कि ये सारी गतिविधियां बाघ संरक्षण के नाम पर पूरी की पूरी बस्तियों को वहां से हटाने की योजना का पहला कदम हो सकती हैं।
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने संरक्षित क्षेत्रों में से एक है। इसे 1984 में वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया था, लेकिन विवाद 2004 में तब शुरू हुआ जब इसे ‘टाइगर रिजर्व’ बनाने का प्रस्ताव रखा गया। तब से, वन विभाग और स्थानीय आदिवासी समुदायों के बीच अक्सर टकराव होता रहा है।
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के ग्राम सभा महासंघ के अध्यक्ष अर्जुन सिंह नायक ने बताया कि वन अधिकारियों ने ग्रामीणों के पारंपरिक अधिकारों पर रोक लगाना शुरू कर दिया है, खासकर जंगल के छोटे उत्पादों (लघु वनोपज) को इकट्ठा करने पर। उन्होंने आरोप लगाया कि वन रक्षकों ने कई आदिवासी महिलाओं पर मुख्य वन क्षेत्र से अवैध रूप से लकड़ी बीनने का झूठा आरोप लगाया और उन पर आपराधिक मामले भी दर्ज किए।
क्षेत्र में वन अधिकारों के लिए काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता बरखा ने कहा, “उस समय विभाग ने कोर जोन से बाहर जाने को तैयार ग्रामीणों के लिए मुआवजे और पुनर्वास पैकेज की पेशकश की थी। लेकिन ग्रामीणों ने इसे ठुकरा दिया। उनका कहना था कि पहले वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) 2006 के तहत उनके कानूनी अधिकारों को मान्यता दी जाए। उनके विरोध के बावजूद, 2009 में इस क्षेत्र को आधिकारिक तौर पर टाइगर रिजर्व घोषित कर दिया गया।”

लगभग 1,842 वर्ग किलोमीटर में फैला यह रिजर्व 851 वर्ग किलोमीटर के कोर एरिया और 991 वर्ग किलोमीटर के बफर जोन से मिलकर बना है। उदंती और सीतानदी नदियां अभ्यारण्य के पारिस्थितिकी तंत्र को पोषित करती हैं। यहां साल, सागौन और बांस के घने जंगल हैं, जहां भालू, तेंदुए, जंगली कुत्ते, सांभर हिरण, गौर के साथ साथ कई दुर्लभ पक्षी भी पाए जाते हैं।
2006 की वन्यजीव गणना के अनुसार, इस क्षेत्र में छह से आठ बाघ थे। लेकिन टाइगर रिजर्व घोषित होने के बाद, कई वर्षों तक बाघों का दिखना बंद हो गया। 2014 के सर्वे में चार बाघ, 2018 में एक और 2022 में एक बाघ देखे जाने की सूचना मिली थी। इसके बाद कुछ समय तक तो बाघ बिल्कुल भी नहीं दिखे।
लेकिन हाल ही में, कैमरा ट्रैप में बाघों के पंजों के ताजा निशान मिले हैं। अधिकारियों ने बाघों की इस वापसी को वन्यजीव संरक्षण की एक बड़ी सफलता बताया और कहा कि यह इस बात का संकेत है कि अभयारण्य की पारिस्थितिकी में सुधार हो रहा है। हालांकि, इसके तुरंत बाद ही रिजर्व के भीतर स्थित गांवों को स्थानांतरित करने की तैयारी शुरू हो गई।
यह विवाद रातोंरात नहीं पनपा, बल्कि कई वर्षों से सुलग रहा है। राज्य भर में बाघों की घटती संख्या को लेकर चिंतित छत्तीसगढ़ सरकार ने 2018 से बाघों की आबादी फिर से बढ़ाने के लिए कई पहलें शुरू कीं। इसकी शुरुआत पहले उदंती-सीतानदी से हुई, फिर अचानकमार और उसके बाद गुरु घासीदास नेशनल पार्क में।
इन योजनाओं में बाघों को स्थानांतरित करने की परियोजनाएं शामिल थीं, जिनका उद्देश्य मध्य प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों से बाघों को छत्तीसगढ़ के जंगलों में लाकर उनकी आबादी को बढ़ाना था। इसके पीछे सोच यह थी कि इन कोशिशों से जंगल की जैव-विविधता बढ़ेगी और ईको-टूरिज्म को भी बढ़ावा मिलेगा।
हालांकि, पिछले दो सालों में ये योजनाएं विफल रही हैं और अब तक बाहर से कोई भी बाघ यहां नहीं लाया जा सका है।
बेदखली के साये में जीवन
कमार, गोंड और भुंजिया जनजाति के लोग पीढ़ियों से इन जंगलों में रहते आए हैं। आज वे अपने ही घर से निकाले जाने के डर में जी रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि वन विभाग वन्यजीव संरक्षण के बहाने उन्हें वहां से हटाने की कोशिश कर रहा है।
इलाके में लगातार ग्राम सभाओं की बैठकें हो रही हैं। गांव वालों का कहना है कि वे हमेशा से बाघों और अन्य जंगली जानवरों के साथ मिल-जुलकर (सह-अस्तित्व में) रहते आए हैं। उनका तर्क है कि उन्हें जबरन हटाना उनके संवैधानिक और पारंपरिक, दोनों तरह के अधिकारों का उल्लंघन है।
19 अगस्त 2025 को, 17 पंचायतों और आदिवासी संगठनों ने जनजातीय कार्य मंत्रालय को एक पत्र लिखा। इसमें उन्होंने राज्य के वन विभाग पर अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया और केंद्र सरकार से इस मामले में दखल देने की मांग की।
उन्होंने वन अधिकार अधिनियम की धारा 4(2) का हवाला दिया, जो ग्राम सभा की सहमति के बिना किसी भी प्रकार के विस्थापन को प्रतिबंधित करती है। धारा 4(5) में कहा गया है कि जब तक आदिवासियों और पारंपरिक वन-निवासियों के कानूनी अधिकारों की पहचान की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक उन्हें बेदखल नहीं किया जा सकता है। इसी तरह, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 38V(5) के अनुसार, विस्थापन की अनुमति तभी दी जा सकती है जब वैज्ञानिक रूप से यह साबित हो जाए कि उस क्षेत्र में इंसान और जंगली जानवर एक साथ (सह-अस्तित्व में) नहीं रह सकते हैं।

अधिकारों के उल्लंघन के आरोप
अपने पत्र में, आदिवासी समुदायों ने उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के अधिकारियों पर वन अधिकार अधिनियम (2006) और अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि टाइगर रिजर्व के अधिकारी धमकी और उत्पीड़न सहित गैरकानूनी तरीकों का इस्तेमाल करके ग्रामवासियों को जबरन बेदखल करने का प्रयास कर रहे हैं। 2020 से अधिकारी कोयबा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले सोरनामल गांव को मनमाने ढंग से बेदखली के नोटिस जारी कर रहे हैं। सोरनामल और आसपास के गांवों में भुंजिया, गोंड और कमर (एक पीवीटीजी समूह) समुदाय के लोग पीढ़ियों से सीतानदी-उदंती के इन जंगलों में रहते आए हैं।
पत्र में लिखा है कि टाइगर रिजर्व के अधिकारी जानबूझकर वन अधिकारों की अनदेखी और सैटेलाइट तस्वीरों का मनमाने ढंग से इस्तेमाल करते हुए गांवों को खाली कराने की कोशिश कर रहे हैं। उनका दावा है कि ये गांव 2009 के बाद सीतानदी-उदंती जंगलों के भीतर बसे थे। जबकि समुदायों ने इस दावे को सरासर झूठा बताया और कहा कि यह वन अधिकार अधिनियम और इसके तहत बनाए गए नियमों का उल्लंघन है।
सोरनामल गांव के कई परिवारों को तो वन अधिकार अधिनियम की धारा 4(2) और 4(5) के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना ही जबरन निकाला जा चुका है। इसी तरह, साहेबीन ग्राम पंचायत के अंतर्गत इछराडी और दशपुर गांवों में, कामार और गोंड समुदायों से संबंधित कई परिवारों को 2022 में सैटेलाइट तस्वीरों का गलत हवाला देकर जबरन बेदखल कर दिया गया था।
पत्र में यह भी दावा किया गया है कि अभयारण्य के उप निदेशक ने ग्राम सभाओं या सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन समितियों से सलाह लिए बिना या उन्हें सूचना दिए बिना, गुप्त रूप से बाघों के पुनर्वास की योजना को लागू करना शुरू कर दिया है।
इसके अलावा, पत्र में यह भी आऱोप लगाया गया कि ‘बाघों के आवास को तैयार करने’ के बहाने, अभयारण्य के अधिकारी नागेश, कार्लझर, देवझरमली, मोतीपानी, आमदा, कोयबा और उदंती जैसे गांवों के सामुदायिक वन संसाधन (सीएफआर) क्षेत्रों में बिना सहमति के पेड़ काट रहे हैं और नमक के टीले बना रहे हैं, जबकि इन जमीनों को कानूनी रूप से ग्राम पंचायतों की संपत्ति के रूप में मान्यता प्राप्त है।
इन शिकायतों के बाद, जनजातीय मामलों के मंत्रालय (एमओटीए) ने 26 सितंबर, 2025 को एक पत्र लिखकर राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा और सवाल किया कि ग्राम सभा की मंजूरी के बिना ये कार्रवाई क्यों और कैसे की जा रही है। मंत्रालय ने फिर से यह साफ किया कि स्थानीय समुदाय की स्पष्ट सहमति के बिना टाइगर रिजर्व के कोर एरिया से किसी को भी विस्थापित नहीं किया जा सकता है।
नाम न छापने की शर्त पर एक वन अधिकारी ने बताया कि मंत्रालय के हस्तक्षेप से प्रशासनिक हलकों में हलचल मच गई, है। इससे संकेत मिलता है कि केंद्र सरकार ने भी इस प्रक्रिया पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है।
राज्य सरकार ने अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, लेकिन वन विभाग के सूत्रों का दावा है कि सिर्फ सर्वे किए जा रहे हैं। कोई विस्थापन नहीं हुआ है। उनका तर्क है कि बाघों के लिए उपयुक्त आवास तैयार करना आवश्यक है और ऐसे वन क्षेत्रों की पहचान करना इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। हालांकि, ग्राम सभाएं संशय में हैं। उनका मानना है कि ये सर्वे बेदखली की दिशा में पहला कदम है।
उन्होंने कहा, “कुरुभाटा और बरगांव के ग्रामीणों के व्यक्तिगत वन अधिकार दावों को वन अधिकार अधिनियम के तहत उचित प्रक्रियाओं का पालन किए बिना खारिज किया जा रहा है। अधिकारियों ने सबूत के तौर पर सैटेलाइट तस्वीरें साझा की हैं और उसी आधार पर उप-मंडल स्तरीय समिति (डीएलसी) और जिला स्तरीय समिति (डीएलसी) मनमाने ढंग से दावों को खारिज कर रही हैं। परिणामस्वरूप, ग्रामीणों को उनके पैतृक घरों और खेतों से बेदखल किया जा रहा है। पिछले दो सालों से खेती पूरी तरह से प्रतिबंधित है, जिससे सैकड़ों परिवारों की आजीविका खतरे में है।”

गहरा जुड़ाव
उदंती-सीतानादी के आदिवासी इस बात पर जोर देते रहे हैं कि वे हमेशा से प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर रहते आए हैं। उनकी आजीविका, परंपराएं और संस्कृति जंगल से गहराई से जुड़ी हुई हैं। वन संरक्षण अधिनियम, 2006, उन्हें जंगलों में रहने, उनकी देखभाल करने और उनका इस्तेमाल करने का कानूनी अधिकार प्रदान करता है। लेकिन इस कानून को लागू करने की सुस्त रफ्तार की वजह से आज भी कई समुदायों को उनके इन अधिकारों की आधिकारिक पहचान नहीं मिल पाई है।
स्थानीय निवासी ईश्वर नेताम ने मोंगाबे इंडिया को बताया कि ग्राम सभा ने किसी भी प्रकार के विस्थापन को मंजूरी नहीं दी है और न ही निवासियों को पुनर्वास योजनाओं के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी मिली है। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रकार की जबरन बेदखली न सिर्फ अवैध होगी बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का भी उल्लंघन होगा, जो हर नागरिक को सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है।
जिला पंचायत (जिला स्तर पर निर्वाचित निकाय) सदस्य लोकेश्वरी नेताम ने कहा, “हम आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से इन जंगलों में रहते आए हैं। हमारे पूर्वज भी यहीं रहते थे। पुराने समय में बाघ हमारे साथ स्वाभाविक रूप से सह-अस्तित्व में थे। वन विभाग की लापरवाही के कारण ही उनकी संख्या कम हुई है। अब वे बाहर से बाघ लाकर हमें हमारी पुश्तैनी जमीन से विस्थापित करना चाहते हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “हर आदिवासी समुदाय अपनी टोटेम परंपरा के जरिए जंगलों और वन्यजीवों की रक्षा करता है। मिसाल के तौर पर, मेरे नेताम समुदाय में सोनकुट्टा (जंगली कुत्ता) और कछुआ हमारे टोटेम हैं। सोरी समुदाय बाघ को पवित्र पशु मानता है। प्रत्येक जनजाति और गोत्र का अपना टोटेम होता है, जो जल, भूमि, वायु या कोई पेड़ हो सकता है। ये केवल प्रतीक नहीं हैं; ये प्रकृति की रक्षा और पोषण करने के हमारे पवित्र कर्तव्य के सूचक हैं। प्रकृति का संरक्षण हमारे खून में है।”
पारिस्थितिकी से परे संरक्षण
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के उप निदेशक वरुण जैन ने मोंगाबे इंडिया को बताया कि हालिया अभियानों के दौरान किसी भी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज गांव को विस्थापित नहीं किया गया है। सिर्फ अवैध रूप से कब्जा करने वालों को वहां से हटाया गया था। उन्होंने दावा किया, “इनमें से कुछ लोग ओडिशा और जगदलपुर से आए थे और बिना अनुमति के वन भूमि पर कब्जा जमाए हुए थे।”
जैन ने कहा, “सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि 2012 के बाद, कई लोग वन क्षेत्रों को साफ करके अपनी बस्तियों का विस्तार करते रहे हैं। हमने उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के भीतर लगभग 70% अवैध अतिक्रमणों को हटा दिया है। अब तक आठ प्रमुख बस्तियों को खाली कराया जा चुका है। कुछ बड़े अतिक्रमण तो ऐसे थे जहां लगभग 200 हेक्टेयर वन भूमि पर 70 से 80 घर बने हुए थे, उन्हें हटा दिया गया है। जिन लोगों को हटाया गया, उन्हें ‘वन अधिकार अधिनियम’ के तहत असली वन-निवासी के रूप में मान्यता नहीं मिली थी। इसके अलावा, दो राजस्व गांवों ने अपनी मर्जी से रिजर्व से बाहर जाने पर सहमति जताई है और उनके पुनर्वास की प्रक्रिया चल रही है।”
विशेषज्ञों का कहना है कि यह मुद्दा सिर्फ पर्यावरण और जीवजंतुओं से जुड़ा नहीं है, बल्कि सामाजिक, नैतिक और मानवीय भी है। स्थानीय समुदायों की भागीदारी और विश्वास के बिना कोई भी संरक्षण प्रयास सफल नहीं हो सकता। जब लोगों को निर्णय लेने की प्रक्रिया से बाहर रखा जाता है, तो वे न सिर्फ विरोध करते हैं, बल्कि संरक्षण की अवधारणा से ही खुद को अलग करने लगते हैं।
छत्तीसगढ़ के वन अधिकार मंच के संयोजक विजेंद्र अजनाबी ने बताया कि वन विभाग और आदिवासी समुदायों के हित शुरू से ही परस्पर विरोधी रहे हैं, यही कारण है कि यह विवाद इतने सालों से चला आ रहा है।
उन्होंने कहा, “वन विभाग के अधिकांश कानून ब्रिटिश काल के हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य वनों का दोहन और मुनाफा कमाना था। इसके विपरीत, पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में लागू वन अधिकार अधिनियम और पीईएसए अधिनियम आदिवासी लोगों के अधिकारों की रक्षा की बात करते हैं। इससे दोनों कानूनों में साफतौर पर टकराव बना रहता है।”
उन्होंने आगे कहा, “भारत में संरक्षण का इतिहास दिखाता है कि जहां भी स्थानीय समुदायों को साथ लेकर काम किया गया, वहां नतीजे लंबे समय तक टिकने वाले और बेहतर रहे। लेकिन जहां भी संरक्षण को ‘ऊपर से थोपे गए सरकारी मॉडल’ की तरह लागू किया गया, वहां विवाद और टकराव और गहरे ही हुए हैं।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 12 नवंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर- वन अधिकार अधिनियम के कथित उल्लंघन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते स्थानीय समुदाय के लोग। तस्वीर: स्पेशल अरेंजमेट