- नए शोध से पता चला है कि तमिलनाडु में पाई जाने वाली बिच्छू की प्रजाति चार्मस इंडिकस और श्रीलंका की चार्मस लेनियस असल में एक ही प्रजाति है। अब तक इन्हें अलग-अलग माना जाता था।
- इस अध्ययन के दौरान तमिलनाडु के सिरुमलाई से बिच्छू की एक बिल्कुल नई प्रजाति की भी पहचान की गई है, जिसे ‘चार्मस दक्षिणी’ नाम दिया गया है।
- ये निष्कर्ष बिच्छुओं के संरक्षण, उनके भौगोलिक फैलाव को समझने और चिकित्सा अनुसंधान में काफी मददगार साबित हो सकते हैं।
साल 1915 में, जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, तब एक अंग्रेजी वैज्ञानिक स्टेनली हर्स्ट ने कोयंबटूर में बिच्छू की एक नई प्रजाति ‘चार्मस इंडिकस’ (सी. इंडिकस) की पहचान की थी। उनकी यह पूरी खोज बिच्छू के महज एक छोटे और अविकसित नमूने पर आधारित थी। साल 1916 में प्रकाशित ब्रिटिश संग्रहालय की एक रिपोर्ट के पीले पड़ चुके पन्नों में भी एरेक्निडा वर्ग के अंतर्गत इस प्रजाति का विशेष उल्लेख मिलता है। इस प्रजाति को कोलकाता और कोलंबो से प्राप्त परजीवी घुनों के साथ संग्रहालय को भेंट किया गया था।
पुणे में इन-सर्च एनवायरनमेंटल सोसाइटी की स्कॉर्पियन सिस्टेमैटिक्स लैबोरेट्री (एसएसएल) के प्रमुख और प्रकृतिवादी शौरी सुलाखे ने बताया कि एक सदी से भी अधिक समय तक वैज्ञानिकों का यही मानना था कि सी. इंडिकस पूरे प्रायद्वीपीय भारत में पाया जाता है। लेकिन अब भारतीय शोधकर्ताओं ने फील्ड रिसर्च और डीएनए जांच के जरिए यह खुलासा किया है कि सी. इंडिकस की पहचान एक बड़ी गलतफहमी थी। असल में, यह वही प्रजाति है जिसे 1879 में जर्मनी के वैज्ञानिक फर्डिनेंड कार्च ने श्रीलंका में खोजा था और ’चार्मस लेनियस’ नाम दिया था। शोधकर्ताओं ने पाया कि इन दोनों की शारीरिक बनावट में कोई अंतर नहीं है। उनके डीएनए में भी बहुत कम अंतर पाया गया, जिससे यह साबित हो गया कि ये दोनों अलग नहीं, बल्कि एक ही प्रजाति हैं।
यह निष्कर्ष मई 2025 में डाइवर्सिटी जर्नल में प्रकाशित एक शोध पत्र का हिस्सा है। शोध दल में शौरी सुलाखे, भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई) के रिटायर्ड सीनियर वैज्ञानिक देशभूषण बस्तावड़े और शुभंकर देशपांडे के साथ आठ अन्य शोधकर्ता शामिल थे। यह महत्वपूर्ण शोध कार्य एसएसएल, स्विट्जरलैंड के नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम ऑफ जिनेवा और चेक गणराज्य की चार्ल्स यूनिवर्सिटी के बीच हुए आपसी सहयोग का परिणाम है।
भारत और श्रीलंका दोनों ही प्रमुख जैव विविधता के हॉटस्पॉट हैं, लेकिन वहां की कई स्थानिक प्रजातियों का बहुत कम अध्ययन किया गया है। चार्मस जीनस के बिच्छू इन दोनों देशों की स्थानिक प्रजाति हैं। उन्हें न केवल पहचानना मुश्किल है, बल्कि वे अपने प्राकृतिक आवास में भी बहुत कम दिखाई देते हैं और संग्रहालयों में भी उनके बहुत कम नमूने उपलब्ध हैं। लेकिन बिच्छुओं की एक प्रजाति को दूसरी प्रजाति से अलग पहचानना क्यों महत्वपूर्ण है? इस पर सुलाखे ने समझाया, “जब तक आप प्रजातियों की विविधता को नहीं समझते, तब तक उनके बचाव और संरक्षण के बारे में बात करना बहुत मुश्किल होगा। आपको प्रजातियों की जटिलताओं और उनकी आबादी, वे किस तरह के आवासों में रहते हैं और क्या उन आवासों को सुरक्षा की जरूरत है, यह समझने की आवश्यकता होती है।”

इसी शोध पत्र में शोधकर्ताओं ने तमिलनाडु के सिरुमलाई से एक नई प्रजाति ‘चार्मस दक्षिणी’ का भी वर्णन किया है। उन्होंने सी. सिंहगढ़ेंसिस नाम के बिच्छू की एक और प्रजाति के लिए नियोटाइप (एक नमूना जो संदर्भ के रूप में काम आता है) भी ढूंढा, क्योंकि इसका होलोटाइप (मूल नमूना) भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के संग्रह से खो गया था।
यह पहली बार है जब भारत के बिच्छुओं की प्रजातियों के बीच संबंधों को समझने के लिए अल्ट्रा कंजर्व्ड एलिमेंट्स (यूसीई) डेटा का उपयोग किया गया है। यूसीई डीएनए के वे छोटे हिस्से होते हैं, जो विकास के क्रम में एक-दूसरे से बहुत अलग जीवों (जैसे पक्षी और मनुष्य) में भी एक जैसे पाए जाते हैं और लाखों वर्षों के विकास के बाद भी नहीं बदलते।
अंधेरे में बिच्छुओं की तलाश
इस अध्ययन के लिए तमिलनाडु, केरला, कर्नाटका और महाराष्ट्र में चार से पांच साल तक फील्डवर्क किया गया। सुलाखे ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि चार्मस एक ऐसी प्रजाति है जो बहुत कम दिखाई देती है। उन्होंने कहा, “मैदान में चार्मस को ढूंढना एक बड़ी चुनौती थी। बारिश और तापमान जैसी पर्यावरणीय स्थितियों से जुड़े कई कारक उनकी गतिविधियों को प्रभावित करते हैं।”
कोयंबटूर में लगभग हार मान लेने के बाद फील्डवर्क की चौथी रात को सफलता मिली। टीम शहर के पश्चिमी पहाड़ी हिस्से ‘अनाईकट्टी’ की तलहटी में उन्हें खोज रही थी, लेकिन बिच्छू शहर के पूर्वी हिस्से में स्थित घास के मैदानों में मिले। बिच्छुओं के रात में सक्रिय होने के स्वभाव के कारण, उन्हें देर शाम से लेकर सुबह तड़के तक इकट्ठा किया जाता, लेकिन इसमें जंगलों में हाथियों से सामना होने जैसे खतरे भी शामिल थे।
टीम ने अल्ट्रावायलेट टॉर्च की मदद से बिच्छुओं की खोज की और उन्हें चिमटी से पकड़ा। इसके बाद बिच्छुओं को मारकर उनके नमूनों को इथेनॉल में सुरक्षित रखा गया। जहां संभव हो सका, टीम ने चार्मस की अन्य प्रजातियों के 6 से 10 नमूने इकट्ठे किए, लेकिन सी. इंडिकस के उन्हें सिर्फ दो से तीन नमूने ही मिल पाए। इसके बाद रूपात्मक (मॉर्फोलॉजिकल) विश्लेषण के दौरान, उन्होंने नमूनों के कई अलग-अलग माप लिए। फिर आणविक विश्लेषण किया गया, जिसमें शोधकर्ताओं ने ऊतकों से डीएनए निकाला। इस डीएनए की दो तरह की तकनीकों – पारंपरिक सैंगर सीक्वेंसिंग और नेक्स्ट-जेनरेशन सीक्वेंसिंग – से जांच की गई।
नमूनों को आगे की जांच के लिए जेनेवा भेजने के लिए टीम को भारत के सख्त जैव विविधता नियमों और लंबी अनुमति प्रक्रिया से गुजरना पड़ा, जिसमें लगभग एक साल का समय लग गया। इसके लिए भारत और स्विट्जरलैंड की सरकारों के बीच एक औपचारिक समझौते की आवश्यकता थी।
असली सफलता तब मिली जब कोयंबटूर से मिले सी. इंडिकस के डीएनए नतीजों की जांच पूरी हुई। वे श्रीलंका के सी. लेनियस से बिल्कुल मेल खा रहे थे। सुलाखे उस पल को याद करते हुए बताते हैं, “नतीजे देखकर मैं अपनी कुर्सी से उछल पड़ा। मुझे लगा कि शायद सीक्वेंसिंग में कोई गलती हुई है।” पूरी तरह आश्वस्त होने के लिए उन्होंने सारा डेटा फिर से चेक किया और प्रवर्धन के लिए कुछ और ऊतक के नमूने भेजे।
भारत भर में कई एरेक्निडा और सरीसृपों की प्रजातियों की पहचान करने वाले जीवविज्ञानी जीशान ए. मिर्ज़ा ने इस अध्ययन के निष्कर्षों का समर्थन किया है। एक ईमेल साक्षात्कार में उन्होंने कहा, “बिच्छू बाहरी बनावट में काफी हद तक एक जैसे दिखते हैं, जिससे फील्ड में उनकी सटीक प्रजाति पहचानना बहुत मुश्किल होता है। यहां तक कि बारीकी से निरीक्षण करने पर भी शोधकर्ता भ्रमित हो जाते हैं। लेकिन इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी।”
उन्होंने आगे कहा कि भारत में अकशेरुकी जीवों, खासकर एरेक्निडा पर किए गए ज्यादातर अध्ययन केवल उनकी शारीरिक बनावट पर आधारित होते हैं, जो कि चिंताजनक है। उनके अनुसार, यह शोध एक संतुलित तरीका अपनाता है।

संरक्षण, जैव-भूगोल और विष-विज्ञान अनुसंधान में मददगार
अध्ययन के परिणाम बहुत व्यापक और महत्वपूर्ण हैं। ये भारत और श्रीलंका के बीच भौगोलिक संबंधों और विकासवादी अनुकूलन को समझने के साथ-साथ, उनके संरक्षण और चिकित्सा अनुसंधान में भी मदद कर सकते हैं। सुलाखे ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि शोध के नजरिए से भारत के पश्चिमी घाट और श्रीलंका को एक ही जैव-भौगोलिक क्षेत्र माना जाता है, जहां पिछले कुछ लाख वर्षों में समुद्र के स्तर में गिरावट के दौरान प्रजातियों का आवागमन और मेल-जोल बढ़ा। दोनों ही देशों में सी. लेनियस की उपस्थिति इन भूभागों के बीच प्रजातियों के आवागमन के सिद्धांत का समर्थन करती है। और यह अध्ययन भविष्य में ऐसी धारणाओं की जांच के लिए एक आधार भी प्रदान करता है।
अध्ययन भारत में बिच्छुओं की प्रजातियों की पहचान के लिए वर्गीकरण को और अधिक स्पष्ट बनाता है, जो उनके संरक्षण कार्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। दक्षिण एशिया में इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईसीयूएन) के विशेषज्ञ समूह के सदस्य सुलाखे ने बताया कि अभी तक दुनिया भर में बिच्छुओं की स्थिति का सही आकलन नहीं हो पाया है, क्योंकि उनके वर्गीकरण का काम अब भी अधूरा है। वह कहते हैं कि एक बार जब आपके पास सभी प्रजातियों का वर्गीकरण सूचकांक हो जाता है, तब आप प्रत्येक प्रजाति, उसकी संख्या, आवास प्रकार और उनके संरक्षण की जरूरतों पर सही ढंग से काम कर सकते हैं। टीम ने चार्मस प्रजाति के बिच्छुओं का डीएनए डेटा अमेरिकी सरकार के जेनबैंक डेटाबेस में जमा कर दिया है। साथ ही, बिच्छुओं के नमूने बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी को सौंप दिए गए हैं, ताकि भविष्य के शोधकर्ता इनका अध्ययन कर सकें।
बिच्छू जहरीले जीव होते हैं और अक्सर लोग इनसे डरते हैं, लेकिन चिकित्सा अनुसंधान में इनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। कैंसर और ऑटोइम्यून बीमारियों के इलाज के लिए बिच्छू के विष के इस्तेमाल पर लगातार शोध चल रहा है। सुलाखे का कहना है कि विष की सही पहचान करने और उससे दवाइयां बनाने के लिए प्रजाति की सटीक पहचान जरूरी है।
यह अध्ययन भारत में प्रजातियों के अध्ययन के लिए एक नया मानक भी तय कर सकता है। मिर्ज़ा ने कहा, “भारत में होने वाले ज्यादातर शोधों में मॉलिक्यूलर डेटा की कमी होती है, लेकिन यह शोध पत्र ऐसा डेटा पेश करता है जो वैश्विक मानकों के अनुरूप है। इससे दुनिया भर में बिच्छुओं के क्रमिक विकास के इतिहास (फाइलोजेनी) को समझने में जो बड़ी कमी थी, उसे भरने में मदद मिली है।”

अधूरी कड़ियां और भविष्य का शोध
सुलाखे के मुताबिक, इस अध्ययन में अभी भी कुछ कमियां हैं। पहली बात यह कि चार्मस की सभी प्रजातियों को अल्ट्रा कंजर्व्ड एलिमेंट्स (यूसीई) डेटासेट में शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि कुछ नमूने सीक्वेंसिंग के लिए भेजे जाने के बाद इकट्ठा किए गए थे। इसके अलावा, जैव विविधता नियमों के कारण टीम श्रीलंका से सी. लेनियस के नए नमूने नहीं ला सकी, इसलिए उन्हें इस प्रजाति की जानकारी के लिए जेनबैंक के पुराने डेटा पर निर्भर रहना पड़ा। साथ ही, उत्तरी पश्चिमी घाट में मिलने वाली सी. सिंहगढ़ेंसिस प्रजाति की अलग-अलग आबादी के बारे में यह निष्कर्ष निकालने के लिए और अधिक अध्ययन की आवश्यकता है कि क्या वे सभी एक ही प्रजाति हैं। मिर्ज़ा ने कहा कि वे इस अध्ययन में एक डेटेड वंशावली देखना पसंद करते। यह वंशावली समय के साथ विकास दिखाने वाला ऐसा चार्ट है जो यह दर्शाता कि चार्मस अपने निकटतम संबंधी से कब अलग हुआ और प्रत्येक चार्मस प्रजाति एक दूसरे से कब अलग हुई। इससे विभाजन के कारण बनने वाली पिछली भूवैज्ञानिक और जलवायु घटनाओं का अध्ययन किया जा सकता है। हालांकि, उन्होंने आगे कहा कि इससे परिणामों में कोई खास बदलाव नहीं आएगा।
इस शोध को आगे बढ़ाने के लिए शोधकर्ता भविष्य में चार्मस बिच्छू की संपूर्ण जीनोमिक सीक्वेंसिंग करने की योजना बना रहे हैं। इसकी मदद से वे यह पता लगा पाएंगे कि बिच्छू की ये प्रजातियां कब बनीं और उनका धरती की भौगोलिक हलचलों से क्या संबंध रहा है। सुलाखे ने बताया कि टीम विभिन्न बिच्छू परिवारों और वंशों को कवर करते हुए यूसीई-आधारित अध्ययन करने की भी योजना बना रही है।
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मिर्ज़ा को उम्मीद है कि भारत में बिच्छुओं के अन्य समूहों पर भी ऐसे अध्ययन होंगे। लेकिन यूसीई सीक्वेंसिंग’ तकनीक फिलहाल काफी महंगी है और आसानी से उपलब्ध नहीं है। उन्हें उम्मीद है कि भविष्य में जीनोम सीक्वेंसिंग की लागत कम होगी, जिससे प्रजातियों और उनके फैलाव को समझना और भी आसान हो जाएगा। सुलाखे का मानना है कि इस अध्ययन ने भारत में भविष्य के बिच्छू वैज्ञानिकों के लिए नई प्रजातियों की खोज का रास्ता खोल दिया है, क्योंकि अब वे उनकी टीम द्वारा जेनबैंक में जमा किए गए डेटा का उपयोग कर सकते हैं।
बिच्छुओं के मामले में, जो दिखता है वह हमेशा सच नहीं होता (यानी उनकी दिखावट धोखा दे सकती है)। फिलहाल, इस नए अध्ययन ने एक जैसे दिखने वाले बिच्छुओं से जुड़े 110 साल पुराने रहस्य को सुलझा लिया है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 17 नवंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: कोयंबटूर से मिला चार्मस लेनियस का एक नमूना। यह वही स्थान है जहां चार्मस इंडिकस की पहली बार पहचान हुई थी। सी. इंडिकस’ को अब सी. लेनियस का ही हिस्सा मान लिया गया है। तस्वीर- शौरी सुलाखे