- नेपाल के ताप्लेजुङ ज़िले में 128 वन रक्षक (फॉरेस्ट गार्डियन) लाल पांडा के संरक्षण के लिए उनकी निगरानी के लिए तैनात हैं।
- नेपाल के 25 ज़िलों में फैले टेम्परेट बांस के जंगलों में लाल पांडा की संख्या 500 से 1,000 के बीच है।
- फ़ॉरेस्ट गार्डियन हर तीन महीने में रेड पांडा की जनगणना करते हैं, इसके व्यवहार और रहने की जगह के इस्तेमाल को ट्रैक करते हैं और अपने समुदायों में जागरूकता फैलाते हैं।
भारत की सीमा से लगी पूर्वी नेपाल की धुंध भरी पहाड़ियों में, 48 साल के किसान सूर्य भट्टराई, ताप्लेजुङ ज़िले में सुदाप कम्युनिटी फ़ॉरेस्ट की खड़ी ढलानों पर पेट्रोलिंग करते हैं। दूर-दराज़ के खतरनाक इलाके और जंगली जानवरों का सामना करते हुए, वह लाल पांडा को ट्रैक कर रहे हैं। लाल पांडा या रेड पांडा पूर्वी हिमालय की एक मुश्किल से मिलने वाली और खतरे में पड़ी प्रजाति है।
फील्ड डेटा कलेक्शन में माहिर भट्टराई जिले में तैनात 128 वन रक्षकों (फॉरेस्ट गार्डियन) में से एक हैं। उनके पास लाल पांडा के निशानों को डॉक्यूमेंट करने के लिए एक जीपीएस ट्रैकर, एक मोबाइल फोन, एक नोटबुक, एक पेन, एक मेज़रिंग टेप और एक वर्नियर स्केल होता है। जिले के वन रक्षकों में से 44 फॉरेस्ट गार्डियन पंचथर-इलम-तप्लेजंग (PIT) कॉरिडोर में काम करते हैं। यह 11,500 वर्ग किलोमीटर (4,440 वर्ग मील) का एक ज़रूरी हैबिटैट है, जहाँ नेपाल के रेड पांडा (ऐलुरस फुलगेन्स फुलगेन्स) की लगभग एक चौथाई आबादी रहती है। तप्लेजंग में, भट्टराई तय फॉरेस्ट ब्लॉक पर नज़र रखते हैं, और रेड पांडा के मल, पंजों के निशान या दूसरे निशान ढूंढने के लिए रास्तों पर घूमते हैं।
इस तरह की मॉनिटरिंग साल में चार बार (फरवरी, मई, अगस्त और नवंबर में) होती है। मॉनिटरिंग का समय रेड पांडा के जीवन चक्र के खास स्टेज, जैसे ब्रीडिंग और मेटिंग के मौसम के आसपास होता है। भट्टराई कहते हैं कि गर्मियों के महीनों में पेट्रोलिंग से इसके शिकार को रोकने में भी मदद मिलती है।
लाल पांडा की यह प्रजाति दुनिया भर में, भारत, भूटान, चीन और नेपाल में पाई जाती है और इन देशों में इनकी संख्या 10,000 से भी कम बची है। नेपाल के 25 ज़िलों में फैले टेम्परेट बांस के जंगलों में इनकी संख्या 500 से 1,000 के बीच है। यह शर्मीली और मुश्किल से मिलने वाली प्रजाति सड़कों और हाइड्रोपावर के लिए बांधों के निर्माण जैसे कामों से बहुत ज्यादा प्रभावित हुई है। तेज़ी से हो रहे विकास और इंसानी कामों से बांस के वो जंगल कम हो रहे हैं जिन पर वे निर्भर हैं।

गैर सरकारी संस्था ‘रेड पांडा नेटवर्क’ (RPN) ने साल 2010 में फ़ॉरेस्ट गार्डियन कार्यक्रम को सिर्फ़ 16 सदस्यों के साथ शुरू किया था। और अब यह कार्यक्रम नेपाल के सबसे बड़े नागरिकों के नेतृत्व वाले वाइल्डलाइफ़ मॉनिटरिंग प्रोग्राम में से एक बन गया है। फ़ॉरेस्ट गार्डियन हर तीन महीने में रेड पांडा की जनगणना करते हैं, इसके व्यवहार और रहने की जगह के इस्तेमाल को ट्रैक करते हैं और अपने समुदायों में जागरूकता फैलाते हैं, साथ ही शिकार के खिलाफ़ समर्थन जुटाते हैं। हर वन रक्षक को हर मॉनिटरिंग सेशन के लिए 3,000 नेपाली रुपये (लगभग $22) मिलते हैं।
आरपीएन के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अंग फुरी शेरपा के अनुसार यह कार्यक्रम नेपाल में समुदाय द्वारा प्रबंधित किए जाने वाले अन्नपूर्णा कंज़र्वेशन एरिया से प्रेरित है और इसमें फ़ॉरेस्ट गार्डियन आरपीएन और स्थानीय समुदाय के बीच पुल का काम करते हैं। “हमारी सबसे बड़ी चुनौती लोकल कम्युनिटी के साथ भरोसा बनाना है। फ़ॉरेस्ट गार्डियन हमारे लोकल एंबेसडर के तौर पर काम करते हैं,” उन्होंने मोंगाबे को बताया।
ज्यादातर गरीब और आर्थिक रूप से पिछड़े समुदाय से आने वाले ये फॉरेस्ट गार्डियन आमतौर पर मिडिल स्कूल तक पढ़े होते हैं, अपने घरों के पास के जंगलों में गश्त करते हैं। शेरपा के अनुसार, यह ज़मीनी निगरानी आरपीएन की कंज़र्वेशन स्ट्रेटेजी की रीढ़ है।
फॉरेस्ट गार्डियन रेड पांडा के दिखने और GPS मैपिंग से लेकर कैमरा ट्रैप फ़ुटेज और पेट्रोल लॉग तक का डेटा नियमित तौर पर इकट्ठा करते हैं। इस डेटा का इस्तेमाल कंज़र्वेशन स्ट्रेटेजी और पॉलिसी ब्रीफ़ बनाने के लिए किया जाता है। शेरपा कहते हैं, “इन कोशिशों से खास हैबिटैट ज़ोन पहचानने, शिकार रोकने के उपायों को गाइड करने और लोकल लैंड-यूज़ प्लानिंग के लिए जानकारी देने में मदद मिली है।” अमेरिका और यूरोप के चिड़ियाघर इस कार्यक्रम को सपोर्ट करते हैं, उन्होंने आगे बताया। “वे प्रोफ़ेशनल फ़ॉरेस्ट स्टीवर्ड और हमारे लोकल कंज़र्वेशन एंबेसडर हैं जो रेड पांडा की आबादी और हैबिटैट पर नज़र रखते हैं, साथ ही अपनी कम्युनिटी में जागरूकता भी बढ़ाते हैं,” वे कहते हैं।

बीजिंग में चाइनीज़ एकेडमी ऑफ़ साइंसेज़ के इंस्टीट्यूट ऑफ़ ज़ूलॉजी में पोस्टडॉक्टरल रिसर्च कर रहे वाइल्डलाइफ़ रिसर्चर अर्जुन थापा कहते हैं, “रेड पांडा की निगरानी में स्थानीय सिटिज़न साइंटिस्ट को शामिल करने का आइडिया तारीफ़ के काबिल है।” “लेकिन यह समझना भी उतना ही ज़रूरी है कि वे जो डेटा इकट्ठा करते हैं, उसका इस्तेमाल कैसे किया जाता है, चाहे वह पॉलिसी बनाने में मदद करे, कंज़र्वेशन के ठोस नतीजे दे या स्थानीय समुदाय को फ़ायदा पहुँचाए।”
थापा आगाह करते हैं कि सिर्फ़ डेटा इकट्ठा करना काफ़ी नहीं है। “हमें जानकारी को अच्छी तरह से मान्य और विश्लेषित करने की ज़रूरत है। इसके बिना, सबूतों के आधार पर फ़ैसले लेना या सही मैनेजमेंट दखल देना मुश्किल है।”
उन्होंने मौजूदा मॉनिटरिंग तरीकों के असर पर भी सवाल उठाए। वे कहते हैं, “रेड पांडा लगातार एक ही रास्ते पर नहीं चलते हैं।” “इसलिए, हर तीन महीने में मॉनिटरिंग के लिए तयशुदा रास्तों का इस्तेमाल करने से उनके मूवमेंट या रहने की जगह के इस्तेमाल की सही तस्वीर नहीं मिल सकती है।”
साल 2016 में किये गए एक राष्ट्रीय सर्वे से पता चला है कि नेपाल में रेड पांडा के रहने की 70% जगहें सुरक्षित इलाकों से बाहर हैं। नेशनल पार्कों के उलट, इन जंगलों पर कम नजर रखी जाती है और शिकार और कब्ज़े का खतरा ज़्यादा होता है।
तब से, फॉरेस्ट गार्डियन मॉडल ठीक वहीं केंद्रित किया गया है जहाँ रेड पांडा को सबसे ज्यादा खतरा है। शेरपा कहते हैं, “पहले, साल में 10 तक शिकार की घटनाएँ होती थीं। पिछले पाँच या छः सालों में, हमारे प्रोजेक्ट एरिया में शिकार का एक भी मामला नहीं आया है।”
स्थानीय लोगों की जंगलों पर निर्भरता कम करने के लिए, आरपीएन उन्हें होमस्टे मैनेजमेंट, नेचर गाइड और इकोटूरिज्म की ट्रेनिंग देता है। यह खास तौर पर महिलाओं के लिए गलीचा बुनाई, क्रोशिया बनाने और बिछुआ फाइबर प्रोसेसिंग जैसे आजीविका बढ़ाने वाले कार्यक्रमों को भी सपोर्ट करता है।
ताप्लेजुङ के फुरुम्बु गांव में औरतें सिलाई मशीनों के पीछे बैठकर बिच्छू बूटी के रेशे से बैग और रूमाल बनाती हैं। चालीस साल की चंद्र कुमारी लिंबू ने एक स्थानीय संस्था ‘हिमाली कंज़र्वेशन फोरम’ से ट्रेनिंग ली है, और अब वह इन्हें काठमांडू के स्थानीय स्कूलों और सोवेनियर की दुकानों में बेचती हैं। इस जगह ने, अपने दूसरे साल में, 16 औरतों को काम पर रखा है। लिंबू कहती हैं, “हमें उत्पादों की मार्केटिंग इस तरह करनी है कि लोग इसके बारे में जानें।”

आरपीएन जो अभी 13 रेड पांडा जिलों में काम करता है, नेपाल के दूसरे जिलों में भी इस कंज़र्वेशन मॉडल को अपनाने की प्लानिंग कर रहा है।
भारत में पश्चिम बंगाल के सिंगालीला नेशनल पार्क, जो भारत में रेड पांडा का एक प्रमुख हैबिटैट है, की सीमा से लगे इलाम में कई परिवार इको-टूरिस्ट के लिए होमस्टे चलाते हैं। इन होमस्टे में कई सैलानी इस जंगल में मुश्किल से मिलने वाले जानवर की एक झलक पाने आते हैं। PIT कॉरिडोर में लगभग 15 होमस्टे चलते हैं, जो साल में विदेशी टूरिस्ट के आठ ग्रुप, लगभग 50 सैलानियों, को ठहराते हैं। शेरपा कहते हैं, “हमारा बिज़नेस विंग इस कार्यक्रम को मैनेज करता है और मुनाफे का कुछ हिस्सा कंज़र्वेशन के लिए साझा करता है। हमारा लक्ष्य एक अलग आजीविका देकर लोगों की जंगलों पर निर्भरता को कम करना है।”
स्थानीय समुदायों की बढ़ती भागीदारी और बचाव कार्यों के अच्छे नतीजों के बावजूद भी रेड पांडा के लिए खतरा अभी भी बहुत ज़्यादा है।
इनके रहने की जगह का खत्म होना और उनका विखंडन रेड पांडा की संख्या में कमी की मुख्य वजहें हैं। शेरपा कहते हैं, “उनके ज़िंदा रहने के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक नेपाल के बीच की पहाड़ियों में तेज़ी से और बेतरतीब ढंग से सड़कें बनाना है।” “ये सड़कें अक्सर बिना किसी साइंटिफिक असेसमेंट के, लाल पांडा के मुख्य आवास क्षेत्र से होकर गुजरती हैं, जिससे वे जंगल बिखर जाते हैं जिन पर रेड पांडा निर्भर रहते हैं।”
आरपीएन ने इलामज़िले में लाल पांडा के हैबिटैट को ठीक करने के लिए एक बड़ा प्लान शुरू किया है। इसके लिए इस संस्था को हाल ही में पांच साल के प्रोजेक्ट के लिए $2.5 मिलियन की ग्रांट मिली है। इस ग्रांट का मकसद इलाम में 500 हेक्टेयर (1,235 एकड़) जंगल को ठीक करना है, जो सिंगालीला से जुड़ता है। शेरपा कहते हैं, “इससे नेपाल और भारत में लाल पांडा के बीच जेनेटिक एक्सचेंज हो पाएगा और इस प्रजाति की मज़बूती बेहतर होगी।” “इसके बिना, इनब्रीडिंग एक गंभीर खतरा बन जाता है। अगर ग्रुप में कोई महामारी फैलती है, तो बीमारी एक बड़ी आबादी को खत्म कर सकती है।”
पिछले साल अगस्त में, इलाम ज़िले के पुवामाझुवा गांव को देश का पहला कम्युनिटी-बेस्ड कंज़र्वेशन एरिया घोषित किया गया था, जिससे इस स्पीशीज़ के लिए उम्मीद जगी है।

इस जानवर को दूसरे खतरों का भी सामना करना पड़ता है, इसमें खुले घूमने वाले कुत्तों के हमले शामिल हैं। ये हमले खासकर ताप्लेजुङ में पाथिभारा मंदिर के पास होते हैं जहाँ यहाँ पूजी जाने वाली हिंदू देवी को खुश करने के लिए बकरों की बलि दी जाती है। हिमाली कंज़र्वेशन फ़ोरम के प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर रमेश राय कहते हैं, “पतझड़ और वसंत में तीर्थयात्रा के मौसम में, कुत्तों को भक्तों द्वारा फेंका गया बकरे का मांस खाने को मिलता है। जब उन्हें ऑफ़-सीज़न में मांस नहीं मिलता है, तो वे पेड़ों से नीचे उतरते लाल पांडा पर हमला कर सकते हैं।” उन्होंने आगे कहा कि कुत्ते रेबीज़ और कैनाइन डिस्टेंपर जैसी बीमारियाँ भी फैलाते हैं।
पाथिभारा इलाके के 47 साल के फॉरेस्ट गार्डियन धन कुमार सेम्बू, राय से सहमत हैं। वे कहते हैं, “आवारा और शिकारी कुत्ते रेड पांडा के लिए खतरा हैं। लेकिन वैक्सीनेशन कैंपेन ने इसे कुछ हद तक नियंत्रित करने में मदद की है।”
वाइल्डलाइफ रिसर्चर्स ने यह रिकॉर्ड किया है कि रेड पांडा अपने मांसाहारी पूर्वजों से कैसे विकसित होकर अब ज़्यादातर शाकाहारी खाना खाने लगा है। यह बांस के पत्ते खाता है, और शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्रजाति ने अपने रहने की जगह में हुए बदलावों के हिसाब से खुद को ढाल लिया होगा।

शेरपा कहते हैं, “उनके दांत और पाचन तंत्र अभी भी मांस खाने वालों जैसे ही हैं, लेकिन समय के साथ, शायद शिकार की कमी के कारण, उन्होंने बांस से बने खाने को अपना लिया।” “क्योंकि बांस में कैलोरी कम होती है, इसलिए लाल पांडा को इसे ज़्यादा मात्रा में खाना पड़ता है और दिन में ज़्यादातर सुस्त रहकर अपनी ऊर्जा बचानी पड़ती है।”
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जब पेड़ पर रहने वाला यह जीव धूप सेंक रहा होता है, तो भट्टराई जैसे फॉरेस्ट गार्डियन, जिन्हें 2023 में एक नेपाली नॉन-प्रॉफिट संस्था ने उनके काम के लिए ग्रीन एंबेसडर अवॉर्ड दिया था, उन्हें बचाने के लिए खराब मौसम का सामना करते हैं।
हाल ही में पेट्रोलिंग के दौरान, भट्टराई को तेज़ हवाओं और अचानक बारिश का सामना करना पड़ा। वे कहते हैं, “मैं लगभग उड़ ही गया था।” लेकिन वे चलते रहते हैं क्योंकि रेड पांडा को अभी भी रखवाली की ज़रूरत है। वे कहते हैं, “मुझे एक जिम्मेदारी महसूस होती है।” “हमें जंगली जानवरों को अगली पीढ़ी के लिए जंगल में ही छोड़ देना चाहिए — सिर्फ़ फोटो में नहीं।”
यह खबर मोंगाबे टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी ग्लोबल वेबसाइट पर 4 जुलाई, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: माबू, इलाम के बतासे जंगल इलाके में देखा गया लाल पांडा। तस्वीर – सोनम ताशी लामा/रेड पांडा नेटवर्क के माध्यम से।