- केरला के निलंबूर जंगलों में रहने वाली ‘चोलनाइकन’ जनजाति गुफाओं में रहने वाली एशिया की आखिरी जनजाति है। जलवायु परिवर्तन, जंगलों की कटाई और आधुनिकता के चलते यह जनजाति विलुप्ति की कगार पर है।
- करीब 250 से भी कम लोगों की आबादी वाला यह आदिवासी समूह पोषण की कमी, वन्यजीवों से मुठभेड़ और अपने प्राचीन पारिस्थितिक ज्ञान के लुप्त होने जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है।
- एआई-आधारित ‘अरण्य’ जैसी नई तकनीकों का उद्देश्य चोलनाइकन जनजाति की बची हुई आबादी को बचाने के लिए मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करना है।
केरला के निलंबूर जंगलों में ‘करुलाई’ की ओर जाने वाला हर रास्ता एक रहस्य की तरह खुलता है। हर जगह कोहरा और सन्नाटा पसरा हुआ है। सागौन और जंगली अंजीर के पेड़ों के नीचे सड़ी हुई पत्तियों की गंध बसी है, तो हवा में बारिश की नमी है। जंगल के किनारे एक छोटी सी चट्टानी गुफा में आग सुलग रही है। इस मद्धम रोशनी के चारों ओर बैठे पुरुष और महिलाएं जंगली रतालू भून रहे हैं। ये लोग ‘चोलनाइकन’ हैं, गुफाओं में रहने वाली एशिया की आखिरी बची हुई आबादी, जो दुनिया के सबसे छोटे आदिवासी समुदायों में से एक है।
2011 की जनगणना के अनुसार चोलनाइकन समुदाय की आबादी सिर्फ 124 थी, लेकिन स्थानीय आदिवासी विकास कार्यालय ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि अब इनकी संख्या बढ़कर तकरीबन 250 हो गई है। फिर भी यह संख्या 1960 के दशक के मुकाबले काफी कम है, जो उस समय लगभग 400 थी।
वे पीढ़ियों से इसी जंगल में रहते आए हैं। छोटे जानवरों का शिकार करते हैं और कंदमूल, शहद, फल व जंगली जड़ें इकट्ठा करके अपना गुजारा करते हैं। मंजेरी गांव के चोलनाइकन समुदाय के सी. विनोद कहते हैं, “किसी समय यह जंगल हमारी मां हुआ करता था।” विनोद अपने समुदाय में पीएचडी करने वाले पहले व्यक्ति हैं। उनका शोध अपने ही समुदाय की लुप्त होती संस्कृति और पहचान पर आधारित है। वह कहते हैं, “अब यह जंगल न तो हमारा पेट भर सकता है और न ही हमारी रक्षा कर सकता है। नदियां जल्दी सूख जाती हैं, पेड़ों पर फल समय पर नहीं आते और हाथी अब हमसे नहीं डरते हैं। यहां जिंदगी हर रोज एक संघर्ष बन गई है।”
एक लुप्त होती खाद्य संस्कृति
चोलनाइकन लोगों के लिए भोजन ही उनकी पहचान है। वे खेती नहीं करते, बल्कि जंगल से खाने की चीजें इकट्ठा करते हैं। एक समय था जब जंगल उन्हें सब कुछ देता था, कंदथिरी (डायोस्कोरिया प्रजाति), जंगली केले के फूल, मशरूम और जंगली शहद। ‘सेंटर फॉर इंडिजिनस फूड सिस्टम’ के एक अध्ययन में पाया गया कि उनके पारंपरिक भोजन में उन सस्ते चावल और दालों के मुकाबले कहीं ज्यादा पोषक तत्व थे, जिन पर वे आज निर्भर हैं।
लेकिन वर्षा के बदलते पैटर्न और बार-बार पड़ने वाले सूखे ने जंगली खाद्य पदार्थों की विविधता को कम कर दिया है। कुप्पमाला गांव के शिबू की हाल ही में रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई थी। शिबू की (34 वर्षीय) पत्नी चाथी ने कहा, “भूख कोई नई बात नहीं है। लेकिन दूसरों पर निर्भरता नई है। अब हमें राशन या सरकारी योजनाओं का इंतजार करना पड़ता है। हमने अपनी आत्मनिर्भरता खो दी है।”

विनोद ने कहा, “लोग अपना ज्ञान तब खोने लगते हैं जब वे उसका इस्तेमाल करना बंद कर देते हैं। हमारे बुजुर्ग सैकड़ों खाद्य पौधों की पहचान कर सकते हैं, लेकिन हमारे बच्चे सिर्फ चावल और चीनी के बारे में जानते हैं।”
चोलनाइकन भारत की सबसे अधिक अध्ययन की गई जनजातियों में से एक हैं, फिर भी नीति निर्माता उन्हें अभी तक ठीक से समझ नहीं पाए हैं। उनकी पुरानी कहानियों और मान्यताओं में प्रकृति की पूजा, बारीकी से किया गया निरीक्षण और अनुभव से मिली समझ का अनोखा मेल मिलता है। 2016 के एक शोध पत्र में खगोल भौतिक विज्ञानी मयंक एन. वाहिया ने उनके बारे में लिखा था, “ये लोग प्रकृति को बहुत गहराई से देखते हैं और उन्होंने दुनिया को समझने का अपना ही एक तार्किक तरीका विकसित किया है।”
वे तारों को देखकर समय का हिसाब रखते थे, मेंढकों की आवाज से बारिश का अनुमान लगाते थे और जानवरों के पैरों के निशानों को किसी खुली किताब की तरह पढ़ लेते थे। कल्कुलम के उचाकुलम गांव में रहने वाली 52 वर्षीय सरोजिनी कहती हैं, “अब आसमान और जंगल बदल गए हैं।” सरोजनी के पति करियान की मौत जंगल से उपज इकट्ठा करते समय एक हाथी द्वारा कुचलने से हुई थी। उन्होंने कहा, “अब तारे अलग तरह से चलते हैं, बारिश अनियमित होती है और जानवर अब पहले जैसा व्यवहार नहीं करते हैं।”
उनके ये शब्द उस पूरी आबादी के डर को बयां करते हैं, जिनका सदियों पुराना जीवन जीने का तरीका बदलती जलवायु के कारण अब बिखर रहा है।
बदलते जंगल के भरोसे जीवन
निलंबूर पश्चिमी घाट के उन इलाकों में है जहां पर्णपाती वन पाए जाते हैं। किसी समय यहां बांस, बेंत और खाने योग्य झाड़ियों की भरमार थी। लेकिन जलवायु परिवर्तन ने यहां के नाजुक संतुलन को बिगाड़ दिया है। अब गर्मियां लंबी होने लगी हैं। बारिश अनियमित है और जो जलधाराएं कभी जंगल को सींचती थीं, वे अब मार्च के आते आते सूख जाती हैं, और कई महीनों तक सूखी रहती हैं। इन बदलावों के कारण इंसानों और जंगली जानवरों के बीच टकराव बढ़ गया है। चोलनाइकन समुदाय के लिए अब जंगल में भोजन जुटाना भी मुश्किल होता जा रहा है।
मम्पाड़ स्थित एमईएस कॉलेज के ‘सेंटर फॉर कंजर्वेशन इकोलॉजी’ के के. एस. अनूप दास, जो अकसर इस समुदाय के साथ काम करते हैं, ने कहा, “अब मौसम का मिजाज इतना बिगड़ चुका है कि यह इनके लिए रोज का खतरा बन गया है। चोलनाइकन दोहरी मार झेल रहे हैं: एक तरफ उन जंगली जानवरों से खतरा है जो अपने सिकुड़ते आवासों के कारण बाहर निकल रहे हैं और दूसरी तरफ जलवायु की वे घटनाएं हैं जो उनके भोजन वाले पौधों और आवासों को नष्ट कर रही हैं।”

2023 के एक अध्ययन में पौधों की ऐसी 102 प्रजातियों को दर्ज किया गया, जिनका इस्तेमाल चोलनाइकन और उनसे जुड़ी ‘कट्टुनाइकन’ जनजाति पारंपरिक रूप से करती रही हैं। मिट्टी की नमी में बदलाव और आक्रामक प्रजातियों के प्रसार के कारण इनमें से कई प्रजातियां अब विलुप्त हो गई हैं। केरला वन अनुसंधान संस्थान के मुख्य वैज्ञानिक टी.वी. सजीव कहते हैं, “अचानक आने वाली बाढ़ की वजह से जमीन के अंदर ही कंद-मूल सड़ने लगे हैं। पास के बागानों से उड़कर आने वाले कीटनाशकों के कारण जंगल का पूरा तंत्र बिगड़ गया है। मधुमक्खियां भी अपने छत्ते छोड़ रही हैं। लैंटाना कैमारा और सेन्ना स्पेक्टेबिलिस जैसी आक्रामक खरपतवार तेजी से फैल रही हैं, देशी प्रजातियों कम होती जा रही हैं। इनकी वजह से जंगल में भोजन की उपलब्धता का संकट खड़ा हो गया है।”
विनोद ने कहा, “एक समय था जब हर मौसम में भोजन मिलता था। अब कई महीने ऐसे होते हैं जब खाने को कुछ नहीं मिलता। हम वन अधिकारियों द्वारा लाए गए सरकारी राशन पर निर्भर रहते हैं।”
जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिए ‘अरण्य’
पीढ़ियों से चोलनाइकन समुदाय में हाथियों को पवित्र माना जाता रहा है। उन्हें जंगल के मुखिया के रूप में पूजा जाता था। लेकिन जलवायु परिवर्तन और आवास के नुकसान ने इस रिश्ते को तनावपूर्ण बना दिया है। पिछले 18 महीनों में, करुलई और वझिक्कडावु बस्तियों के पास हाथियों के साथ हुए टकराव में तीन चोलनाइकन मारे गए हैं।
इस समुदाय के साथ मिलकर काम करने वाले विभागीय वन अधिकारी रंजीत भास्करन कहते हैं, “हर मौत पूरे समुदाय को झकझोर देती है। जब 250 से भी कम लोग बचे हों, तो हर नुकसान विलुप्ति के और करीब आने जैसा लगता है।”
निलंबूर के दुर्गम रास्तों में हाथियों को दूर रखने के पारंपरिक उपाय जैसे खाई खोदना, बाड़ लगाना और पटाखे फोड़ना काफी हद तक बेअसर साबित हुए हैं। अब वैज्ञानिक ऐसे तकनीकी समाधानों का परीक्षण कर रहे हैं जिनका पर्यावरण पर कम असर पड़े। ऐसा ही एक नया अविष्कार ‘अरण्य’ नाम का चेतावनी देने वाला उपकरण है, जिसे कोच्चि के ‘द कोचीन कॉलेज’ के इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग के प्रमुख पॉलबर्ट थॉमस ने विकसित किया है।
थॉमस कहते हैं, “यह उपकरण खंभों पर लगाया जा सकता है और जंगल के अंदर बैटरी से चलने वाले वायरलेस नेटवर्क पर काम करता है। यह 50 मीटर के दायरे में हाथी, बाघ और भालू की मौजूदगी का पता लगा सकता है। हाथियों के लिए लाल बत्ती, बाघों के लिए पीली और भालुओं के लिए हरी बत्ती जलती है।”
उनके सहयोगी अनूप दास ने बताया, “हमारा मकसद जंगली जानवरों को भगाना नहीं है, बल्कि इंसानों और जानवरों के आने-जाने के रास्तों के बीच एक दूरी बनाए रखना है। हम जंगल के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना हादसों को रोकना चाहते हैं।”
यह केरला वन विभाग की ‘सह-अस्तित्व’ (साथ-साथ रहने) की व्यापक सोच के अनुकूल है। एक वरिष्ठ वन अधिकारी राजू फ्रांसिस कहते हैं, “अगर हम एक सुरक्षित दूरी बनाए रखें और हाथियों के व्यवहार को समझकर कदम उठाएं, तो यह दोनों के लिए फायदेमंद होगा।” लेकिन चोलनाइकन समुदाय के लोगों के लिए, जो आज भी चट्टानों के नीचे खुली जगहों पर सोते हैं, “सुरक्षित दूरी” की परिभाषा समझना थोड़ा मुश्किल है।
आधुनिकता की ओर खिंचाव
आधुनिकता चोलनायकन समुदाय तक पहुंच तो गई है, लेकिन यह बदलाव उनके लिए काफी उलझन भरा रहा है। अब करुलई और मंजीरी में कुछ बच्चे स्कूल जाने लगे हैं; विनोद खुद इस बात का उदाहरण हैं कि कैसे शिक्षा दो अलग-अलग दुनियाओं को जोड़ रही है। इसके बावजूद, समुदाय के ज्यादातर लोग शिक्षा को लेकर अब भी दुविधा में हैं। सरकार ने निलंबूर कस्बे के पास उनके लिए आवासीय कॉलोनियां बनाई हैं, लेकिन कई लोग बदलाव के अनुकूल न हो पाने के कारण जंगल में लौट जाते हैं। निलंबूर में राज्य सरकार की एकीकृत जनजातीय विकास परियोजना (आईटीडीपी) के परियोजना अधिकारी सी. इस्माइल ने कहा, “उनके मुताबिक घर बहुत गर्म और शोरगुल वाले हैं।”
बाज़ार के दखल की वजह से इनका शोषण भी हो रहा है। कुछ एजेंट इन आदिवासियों से शहद और जड़ी-बूटियां बहुत कम दामों पर खरीदते हैं और उन्हें ऊंचे मुनाफे पर बेचते हैं। चोलनायकन लोग पैसों के लेन-देन से ज्यादा वाकिफ नहीं हैं, इसलिए उन्हें इसका कोई खास फायदा नहीं मिल पाता है।
पूचपारा बस्ती की मीनाक्षी कहती हैं, “बाहरी लोगों के साथ भी हम चीजों की अदला-बदली करना ही पसंद करते हैं। हर बुधवार को वन विभाग की मंज़ूरी से व्यापारी हमारी बस्ती में आते हैं। वे हमसे शहद और जंगल की दूसरी चीज़ें लेते हैं और बदले में हमें अनाज, कपड़े और जरूरत का दूसरा सामान दे जाते हैं।”

राष्ट्रीय स्तर पर मिली सुर्खियां
सितंबर 2024 में, इस क्षेत्र से कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने चोलनाइकन के एक छोटे से गांव का दौरा किया था। किसी बड़े राष्ट्रीय नेता का वहां जाना सचमुच एक बड़ा कदम था। उन्होंने जंगल में घंटों पैदल चलकर बुजुर्गों से मुलाकात की और उनकी भूख और हाथियों के हमलों की कहानियों को सुना।
उनके साथ गए एक वन अधिकारी ने याद करते हुए बताया, “प्रियंका बिना सुरक्षाकर्मियों के आईं और उनके साथ बैठीं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। लेकिन इस मुलाकात के बाद भी जमीनी तौर पर ज्यादा कुछ नहीं बदला।”
फिल्म मेकर उन्नीकृष्णन अवला, जिन्होंने 10 साल तक इस जनजाति पर रिसर्च की है, अब उनकी कहानी पर ‘थंथपेरू’ (विरासत) नामक फिल्म बना रहे हैं। इस फिल्म की शूटिंग उन्हीं असली गुफाओं में की गई है जहां ये लोग रहते हैं। फिल्म जलवायु परिवर्तन और सरकारी अनदेखी के बीच उनके अस्तित्व के संघर्ष को दर्शाती है।
अवला ने कहा, “यह कोई लोककथा या अतीत की यादें नहीं हैं, बल्कि यह उनके धीरे-धीरे खत्म होने की एक दास्तां है। चोलनाइकन जनजाति इसलिए विलुप्त नहीं हो रही हैं कि वे आदिम हैं, बल्कि वे इसलिए विलुप्त हो रहे हैं क्योंकि जिस जंगल ने उन्हें जीवन दिया है, वह मर रहा है।”
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टी.वी. सजीव कहते हैं, “इस जनजाति के पास प्रकृति और पर्यावरण का अनमोल ज्ञान है। वे जैव-विविधता के चलते-फिरते खजाने हैं और जानते हैं कि बदलते मौसम के साथ तालमेल कैसे बिठाया जाता है। अगर उनकी भाषा और परंपराएं खत्म हो गईं, तो हम वह सारा ज्ञान हमेशा के लिए खो देंगे।”
जैसे ही निलंबूर के जंगलों में शाम ढलती है, पूरा जंगल झींगुरों और कीट-पतंगों की आवाज़ से गूंजने लगता है। सागौन के पेड़ों के बीच धुंध छाने लगी है और गीली मिट्टी की सोंधी महक अभी भी हवा में घुली हुई है। करुलई की ढलान पर एक गुफा के पास चोलनाइकन लोगों का एक छोटा सा समूह सोने की तैयारी कर रहा है, जहां उनकी जलाई आग अब भी हल्की-हल्की टिमटिमा रही है। तभी घाटी की गहराई से एक हाथी की चिंघाड़ गूंजती है।
चोलनाइकन समुदाय का भविष्य अब उन चीजों पर टिका है जो उनके बस में नहीं हैं, जैसे बदलता मौसम, सरकारी नीतियां और वह आधुनिक दुनिया जिसे शायद यह पता भी नहीं है कि उनका कोई वजूद भी है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 25 नवंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: बांस इकट्ठा करती हुई कुछ चोलनाइकन महिलाएं। 2023 के एक अध्ययन में चोलनाइकन और कट्टुनाइकन समुदायों द्वारा परंपरागत रूप से इस्तेमाल की जाने वाली 102 पौधों की प्रजातियों का उल्लेख किया गया है, जिनमें से कई मिट्टी की नमी में बदलाव और आक्रामक प्रजातियों के प्रसार के कारण विलुप्त हो गई हैं। तस्वीर- अजीब कोमाची।