- असम सरकार ने 9 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए असम फॉरेस्ट प्रोटेक्शन फोर्स (AFPF) के 1,600 जवानों को तैनात किया था।
- अब, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने असम सरकार के ऑर्डर पर रोक लगा दी है।
- इस मुद्दे ने तब ध्यान खींचा जब देश भर के रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स और पर्यावरण प्रेमियों के एक समूह ने केंद्रीय चुनाव आयोग और असम सरकार को खत लिखकर आदेश वापस लेने को कहा।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने असम सरकार के हाल के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें 9 अप्रैल को राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों में असम वन सुरक्षा बल (AFPF) के करीब 1,600 कर्मियों को तैनात करने के निर्देश दिए गए थे।
19 मार्च को, राज्य के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग के एक आदेश में वन कर्मियों को 3 अप्रैल से 10 अप्रैल के बीच चुनावों के दौरान राज्य पुलिस की मदद करने का निर्देश दिया गया था।
यह मुद्दा तब सुर्खियों में आया जब देश भर के रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स और पर्यावरण प्रेमियों के एक समूह ने केंद्रीय चुनाव आयोग और असम के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर इस आदेश को तुरंत वापस लेने की मांग की।
इन आलोचनाओं के बीच, दिल्ली के वकील गौरव कुमार बंसल ने 1 अप्रैल को एनजीटी के सामने एक याचिका दायर की और कहा कि यह आदेश 2024 के उच्चतम न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ है, जिसमें वन कर्मियों को चुनाव ड्यूटी में इस्तेमाल ना करने के लिए कहा गया था। इसमें यह भी कहा गया है कि वन कर्मियों को उनकी मुख्य ड्यूटी से हटाना बायोलॉजिकल डायवर्सिटी एक्ट, 2002 के खिलाफ है। 2 अप्रैल को इस मामले की सुनवाई के दौरान एनजीटी की पूर्वी जोन बेंच ने 19 मार्च के आदेश पर अगले आदेश तक रोक लगा दी थी।
आदेश का विरोध
असम सरकार के ऑर्डर का विरोध करते हुए, रिटायर्ड इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (IAS) और इंडियन फॉरेस्ट सर्विस (IFS) अधिकारियों और पर्यावरण प्रेमियों के एक समूह ने असम के मुख्य सचिव, असम के चीफ इलेक्शन ऑफिसर/कमिश्नर और असम सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग के स्पेशल चीफ सेक्रेटरी को एक लेटर भेजा।
साइन करने वालों ने बताया कि असम सरकार के निर्देश ने दो ऑर्डर का उल्लंघन किया है — एक सुप्रीम कोर्ट का और दूसरा इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया का।

इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया ने 2023 में, इंडियन फॉरेस्ट सर्विस (IFS) के लिस्टेड सीनियर अधिकारियों और वन विभाग के टेरिटोरियल स्टाफ को इलेक्शन ड्यूटी से छूट दी थी। 2024 में, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि “सभी राज्यों में वन कर्मियों के साथ-साथ वन विभाग की गाड़ियों को भी चुनाव की ड्यूटी में नहीं लिया जाएगा।”
मोंगाबे-इंडिया से बात करते हुए, केरलम की पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक प्रकृति श्रीवास्तव, जो इस आदेश का विरोध करने वालों में से एक थीं, ने कहा, “असम वन सुरक्षा बल के लोगों को तैनात करने का आदेश चौंकाने वाला है क्योंकि इससे पता चलता है कि वे संरक्षण को लेकर गंभीर नहीं हैं। जब मैं केरल में थी, तो कभी-कभी चुनावों के दौरान वन कर्मियों की ज़रूरत होती थी। जब कलेक्टर से आदेश आता तो हम कहते थे कि इस स्टाफ की ज़रूरत (फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के काम के लिए) है, तो आदेश निरस्त हो जाता था।” चुनाव आयोग और असम के मुख्य सचिव को भेजे गए लेटर के बारे में उन्होंने कहा, “स्पेशल सेक्रेटरी या मुख्य चुनाव अधिकारी ने हमारे पत्र का कोई जवाब नहीं दिया। अगर यह आदेश आखिरकार लागू होता है, तो यह बहुत बुरी मिसाल कायम करेगा।”
असम वन सुरक्षा बल को असम वन सुरक्षा बल अधिनियम 1986 के तहत बनाया गया था, ताकि असम के जंगलों, जंगल के उत्पादों और वन्यजीवों की सुरक्षा की जा सके। वर्तमान में इसकी तीन बटालियन हैं।
बैनर तस्वीर: 2019 में मॉनसून के बाद पोबितोरा वन्यजीव अभयारण्य को फिर से खोलने के दौरान एक वन अधिकारी एक सींग वाले बड़े गैंडे निगरानी करते हुए। (AP फ़ोटो/अनुपम नाथ)