- कर्जत में हो रहा विकास क्षेत्र के आदिवासी समुदायों की जमीन और खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा बन रहा है।
- आदिवासी महिलाओं के छोटे-छोटे समूह अपने निजी जंगलों की रक्षा करने, उन्हें फिर से बहाल करने और उनका प्रबंधन करके इस खतरे से निपट रही हैं; ये जंगल उनकी आजीविका का आधार हैं और इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।
- आदिवासी महिलाओं का पारिस्थितिकी ज्ञान और बाजार की गहरी समझ उन्हें समुदाय की अगुवाई वाले भूमि और संसाधन प्रबंधन की अहम प्रेरक शक्ति बनाती है।
- ये लेखक के निजी विचार हैं।
जीजा दारवाड़ा हमें महाराष्ट्र के रायगढ़ ज़िले में मोगराज गांव के पीछे घने जंगल के एक हिस्से से होकर ले जाती हैं। वह एक ऊंचे पेड़ की फटी हुई छाल पर थपथपाती हैं। “यह ‘ऐन’ का पेड़ (Terminalia elliptica) है,” वह हमें बताती हैं, “हम इसका इस्तेमाल अपने घरों के कुछ हिस्सों के निर्माण के लिए करते हैं या फिर अपने मवेशियों के लिए बाड़ा बनाने के लिए भी इसका उपयोग होता है। हम आम तौर पर इसे 25-30 साल तक बढ़ने देते हैं।” वह लंबे पत्तों और मोटे तने वाले एक पौधे की ओर इशारा करती हैं, “यह ‘पेवगा’ (Cheilocostus speciosus) है। इसके पत्तों की बीच वाली नस में इसका अपना पानी होता है। जब हमें जंगल में प्यास लगती है, तो हम इसका तना तोड़कर उसे चबा सकते हैं।”
“अरे, इधर देखिए,” वह तब कहती हैं जब हम गीली पत्तियों की मोटी परत से ढके संकरे रास्ते से गुजर रहे होते हैं। “यह मोहा (Madhuca indica) है।” उस शानदार पेड़ को देखकर हम हैरान रह जाते हैं। “इस पौधे का हर हिस्सा काम आता है। हम इसके बीजों से तेल बनाते हैं। इसकी लकड़ी का इस्तेमाल हमारे घरों के फर्श को बनाने में किया जा सकता है, इसके फल (मोह डोडा) बहुत स्वादिष्ट होते हैं, इन्हें पकाकर चावल या भाकरी (रोटी) के साथ खाया जाता है और यहां तक कि इसके फूलों को भी खाया जाता है। और हां, इससे स्थानीय शराब भी बनाई जा सकती है।”
इस जंगल से लगभग 20 किलोमीटर दूर कर्जत नाम का फैलता कस्बा है, जहां हर साल हजारों पर्यटक आते हैं। महाराष्ट्र सरकार की ओर से विकसित की जा रही “तीसरी मुंबई” (दूसरी नवी मुंबई है) का हिस्सा बनने की कगार पर होने से, आने वाले सालों में कर्जत में रियल एस्टेट की कीमतों और आबादी दोनों में जबरदस्त उछाल आने की उम्मीद है।
यहां की आदिवासी महिलाएं अपनी आजीविका के साथ-साथ घरेलू और सांस्कृतिक जरूरतों के लिए भी जंगलों के छोटे-छोटे हिस्सों पर बहुत अधिक निर्भर हैं। फिर चाहे वह हिस्सा सार्वजनिक, निजी या सामूहिक ही क्यों ना हो। हालांकि, इस क्षेत्र में बाजार में और जमीन के इस्तेमाल में हो रहे परिवर्तन, आदिवासी महिलाओं को अपने निजी जंगलों को किसी भी कीमत पर बचाने और उन्हें फिर से संवारने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

इतिहास और यहां के जंगल
ठाकुर आदिवासी समुदाय के अधिकांश लोगों के पास पारंपरिक रूप से खेती और वन भूमि के छोटे-छोटे भूखंड रहे हैं, जिनका इस्तेमाल वे खेती करने और गैर-इमारती वनोपोज को इकट्ठा करने के लिए करते आए हैं। रायगढ़ जिले में भूमि शासन के जटिल इतिहास का इन वनों पर गहरा असर पड़ा है; औपनिवेशिक शासन के दौरान आदिवासी समुदायों को एक जगह बसाने के लिए जमीन के मालिकाना हक की कुछ अनोखी व्यवस्थाएं विकसित की गईं थीं। इसके अलावा, ‘महाराष्ट्र निजी वन (अधिग्रहण) अधिनियम’ के लागू होने के बाद से निजी जमीन मालिक चिंतित हैं। यह कानून 1975 में लागू हुआ था और इसके तहत राज्य सरकार को यह अधिकार मिल गया था कि वह निजी वनों का अधिग्रहण करके उन्हें सार्वजनिक वन भूमि में बदल सके।
महाराष्ट्र में भूमि स्वामित्व और शासन के शोधकर्ता राजीव खेडकर बताते हैं कि इस तरह के कानूनों का इन वनों पर क्या प्रभाव पड़ा: “महाराष्ट्र के कई अन्य जिलों की तरह रायगढ़ जिले में वन विभाग की तुलना में ज्यादा वन क्षेत्र निजी वनों के रूप में था। 1975 में अधिग्रहण कानून पारित होने के बाद सरकार ने जमीन अधिग्रहित करनी शुरू कर दी, भले ही उनके पास बहुत छोटे-छोटे क्षेत्र ही क्यों न हों।” इसका असर निजी वन भूमि के उपयोग पर पड़ा। खेडकर आगे कहते हैं, “लोगों को डर लगने लगा कि अगर उनकी जमीन पर पेड़ होंगे तो वह अधिग्रहित कर ली जाएगी। इसलिए कई लोगों ने अपनी जमीन पर लगे पेड़ों को काट दिया। इस कानून के बाद पेड़ों को काटने के बाद उन्हें फिर से बढ़ने देने की अवधि भी घट गई, पहले यह लगभग 20–25 साल होती थी, जो घटकर लगभग पांच साल रह गई। लोगों में हमेशा यह आशंका बनी रहती है कि अगर वे जंगल को वैसे ही रहने देंगे, तो वन विभाग उसे अधिग्रहित कर लेगा।”
इसका असर कई छोटे किसानों की आजीविका पर भी पड़ा। पहले, जब पेड़ों को 20-30 साल तक बढ़ने दिया जाता था, तो वे अच्छी तरह से बड़े हो जाते थे और उन्हें लकड़ी के तौर पर बेचा जा सकता था। लेकिन, अब जब यह चक्र छोटा हो गया है, तो पेड़ सिर्फ इतने ही बड़े हो पाते हैं कि उन्हें जलावन के तौर पर बेचा जा सके, जिससे आमदनी काफी कम हो जाती है।
अब पर्यटन और रियल एस्टेट उद्योगों के बढ़ते दबाव, मौसम से जुड़ी गड़बड़ियों और जलवायु परिवर्तन के कारण फसल खराब होने से यहां के आदिवासी समुदायों की वन भूमि पर निर्भरता और अधिक मुश्किल बन गई है। ऐतिहासिक रूप से व्यापारियों ने आदिवासियों की बाजार संबंधी जागरूकता की कमी का फायदा उठाया है, उनके पास मौजूद संसाधनों का दोहन किया, लेकिन बदले में उन्हें बहुत कम कीमत मिली। इस क्षेत्र में पिछले 35 सालों से काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अनिल हरपुडे कहते हैं, “कई आदिवासी छोटे किसान इस बहुत ज्यादा मांग वाले इलाके में बड़े बुनियादी ढांचा और पर्यटन परियोजनाएं चला रही कंपनियों को अपनी जमीन बेचने लगे।” वे बताते हैं कि कई लोगों ने अलग-अलग वन कानूनों से पैदा हुई जटिलताओं के कारण अपनी जमीन खो दी या फिर ठेकेदारों, साहूकारों और भूमि दलालों ने छोटे-छोटे कर्ज के बदले उनकी जमीन अपने कब्जे में ले ली।
रायगढ़ में आदिवासी समुदायों के बीच बढ़ती भूमि असुरक्षा से पार पाने के लिए स्थानीय संगठन, व्यक्ति और शोधकर्ता कई सालों से सामुदायिक बहाली और आजीविका सृजन की कोशिशों में मदद कर रहे हैं। इसका मकसद एक साथ लोगों के लिए आजीविका के अवसर पैदा करना, वन आवरण को बनाए रखना और भूमि की उत्पादकता को बढ़ाना है। खेडकर बताते हैं, “हम लोगों को ऐसे पेड़ उगाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं जो बिना काटे ही आय दे सकें।”

वन-आधारित आजीविका को टिकाऊ बनाए रखना
कर्जत के जांभुलवाड़ी गांव में रहने वाली जीजा दरवाडा आदिवासी महिला उपजीविका सुरक्षा समिति की नेताओं में से एक हैं। यह स्थानीय सामुदायिक संगठन (CBO) है, जो कर्जत के कुछ गांवों की आदिवासी महिलाओं की मदद करता है। यह संगठन खाद्य सुरक्षा, भूमि और आजीविका से जुड़े मुद्दों पर काम करता है। जीजा कर्जत की उन कई आदिवासी महिलाओं (ठाकुर समुदाय से) में से एक हैं जो निजी वन भूमि की मालिक या सह-मालिक हैं। इन निजी वन भूमि मालिकों के पास एक से लेकर 20 एकड़ तक भूमि है और सामूहिक रूप से वे 60 से अधिक प्रकार के पेड़ों और पौधों को उगाती और संरक्षित करती हैं।
साल 2024 में नीलगिरि स्थित गैर-लाभकारी संस्था कीस्टोन फाउंडेशन के सहयोग से कर्जत के आसपास महिलाओं की अगुवाई वाले सामुदायिक संगठनों ने अपने निजी वनों में 45 अलग-अलग देशी प्रजातियों के 15,000 से ज्यादा बीज और पौधे लगाए। उन्होंने बीज संग्रह, नर्सरी के रखरखाव और उसे संवारने से जुड़े प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यशालाओं में भी भाग लिया, ताकि वे खुद छोटी नर्सरियां शुरू कर सकें और इस कोशिश को आगे बढ़ा सकें। रोपाई के अलावा, महिलाओं ने अपने खेतों के चारों ओर जैव-बाड़ भी लगाई, जिसमें पिरकुट (कैक्टस की प्रजाति), निर्गुड़ी (Vitex negundo), अडूसा (Justicia adhatoda), नींबू और करोंदा (Carissa sp.) की कलमें लगाई गईं। मुंबई और अन्य बड़े बाजारों में पत्तियां और सब्जियां बेचने जाने वाली महिलाओं को कपड़े के थैले भी बांटे गए, ताकि सामान ले जाने में आसानी हो सके।
“हम इन पेड़ों और पौधों की कई पत्तियां इकट्ठा करते हैं और उन्हें मुंबई के दादर बाजार में बेच देते हैं,” जीजा कहती हैं। “त्योहारों के मौसम में इन पत्तियों को बेचकर हमें अच्छी आमदनी होती है। इनमें से कई पत्तियों का इस्तेमाल मंदिरों में प्रसाद परोसने के लिए पत्तल बनाने में या माला और पूजा में अर्पण करने के लिए भी किया जाता है।”
सह-लेखिका यामिनी खेड़कर की अगुवाई में किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि महिलाएं दो से ढाई महीने की मांग वाली अवधि में कूदा (Holarrhena pubescens) के पत्ते बेचकर लगभग ₹45,000 (या उससे ज्यादा) कमाती हैं। पलाश (Butea monosperma) के पत्ते बेचकर भी इतनी ही रकम हासिल की जा सकती है। इन पत्तों का इस्तेमाल फूलों, मालाओं या पान को लपेटने के लिए और घरों व पूजास्थलों में थालियों के रूप में किया जाता है।

वन भूमि के लिए आदिवासी महिलाओं का संघर्ष
महिलाओं की जंगलों पर निर्भरता अधिक है; वे अपनी आय के लिए पत्तियां और सब्ज़ियां इकट्ठा करती हैं, जिससे वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन पाती हैं। पुरुष अक्सर मजदूरी और खेती-बाड़ी का काम करते हैं। पारंपरिक पारिस्थितिकी ज्ञान और बाजार की बेहतर समझ होने से, ये महिलाएं इन निजी जंगलों की ज्यादा देखभाल कर पाती हैं।
आदिवासियों को सशक्त बनाने के लिए काम करने वाले स्थानीय संगठन और CBO भी आदिवासी महिलाओं को उनके नेतृत्व कौशल को मजबूत करने, पंचायत जैसी स्थानीय शासन प्रणालियों को समझने और बिजली, भोजन, सड़क और स्वच्छता से जुड़ी सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने में मदद कर रहे हैं। मोगराज, ताडवाड़ी और जांभुलवाड़ी जैसे गांवों में महिलाएं अपने खुद के “बैंक” स्थापित कर एक-दूसरे की मददगार बन रही हैं।
पत्ते इकट्ठा करके और जंगली चीजें खोजकर अपना गुजारा करने में अलग तरह की चुनौतियां हैं। उन्हें अक्सर सांपों और जंगली जानवरों का सामना करना पड़ता है और उन्हें मच्छर व दूसरे कीड़े भी काट लेते हैं। गिरने से चोट लगना भी सामान्य है। जांभुलवाड़ी और आस-पास के गांवों की ठाकुर महिलाओं के साथ बातचीत के दौरान जीजा बताती हैं, “जांभुल के फल (Syzygium cumini) इकट्ठा करना सबसे मुश्किल काम है; इसी में सबसे ज्यादा हादसे होते हैं।” “आम का पेड़ खुरदुरा होता है और उस पर चढ़ना आसान होता है, लेकिन जांभुल का तना बहुत चिकना होता है। इसलिए, जांभुल पर चढ़ते समय हम (सुरक्षा के लिए) एक जाल बांधने की कोशिश करते हैं। करवंदा की झाड़ी के साथ भी ऐसी ही दिक्कत आती है।” महिलाओं ने यह भी बताया कि उन पर अक्सर विवादित इलाकों या ऐसी जमीन पर “अवैध रूप से घुसने” का आरोप लगाया जाता है, जो हाल के सालों में गैर-आदिवासियों को बेच दी गई है।
जमीन के उपयोग में बदलाव, घटते वन आवरण और बढ़ते दबाव व इस्तेमाल के कारण पारंपरिक वैद्यों को औषधीय पौधों की खोज के लिए अब जंगल के बहुत भीतर तक जाना पड़ता है। कई बुजुर्ग महिलाओं ने अपने वनों में कुछ पौधों की प्रजातियों में कमी देखी है। कुछ लोग इसकी वजह बढ़ती ग्रामीण आबादी से जंगलों पर बढ़ते दबाव को मानते हैं। वहीं, कुछ लोगों की राय है कि इसका संबंध बदलते मौसम से हो सकता है। अनिल हरपुडे कहते हैं, “तूफानों और चक्रवातों के कारण आम और जांभुल के कई पेड़ गिर रहे हैं। जब तना टूट जाता है या मुड़ जाता है, तो बारिश का पानी तने के अंदर या उसके नीचे की मिट्टी में चला जाता है, जिससे पेड़ सड़ने लगता है।”
महिलाओं ने बताया कि इस साल महुआ के फल की फसल अच्छी नहीं हुई, क्योंकि मॉनसून जल्दी आ गया था। हरपुडे समझाते हैं: “फूल, भाजी, तेल (फूल, फल, फिर तेल) महुआ निकालने का यही क्रम है। लेकिन, यह चक्र बिगड़ गया, क्योंकि फूल आने के समय ही बारिश हो गई। इस साल महुआ के तेल की मात्रा भी कम हो गई है।” ऐसी घटनाओं और बदलावों का उनकी आमदनी पर बुरा असर पड़ता है और कई महिलाओं को घर चलाने के लिए मजदूरी करनी पड़ती है।

आदिवासियों के निजी वनों का भविष्य
जंगल और समुदाय के साथ सांस्कृतिक और भावनात्मक जुड़ाव नहीं होने से नई पीढ़ी इस क्षेत्र में जमीन की लगातार बढ़ती मांग के चलते अपने निजी जंगल बेच सकती है। हालांकि, रायगढ़ की आदिवासी महिलाएं निजी जंगलों, जंगली चीजें इकट्ठा करने के तरीकों और जंगली खाने की रेसिपी के बारे में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जानकारी पहुंचाने की कोशिश में सबसे आगे हैं। जीजा की तरह, मोगराज की एक किसान इंदु अग्निवाले भी गांव की कुछ युवा महिलाओं के एक छोटे समूह की अगुवाई करती हैं, जो अपनी जंगल की जमीन पर पेड़ लगाने और उनकी रक्षा करने का काम करती हैं। उन्होंने दूसरी महिलाओं को उनके निजी जंगलों में लगाने के लिए जंगली पेड़ों के बीज भी बांटे हैं।
कुछ किलोमीटर दूर गवांडवाड़ी गांव में सविता गवांडा महिलाओं के एक अन्य समूह की अगुवाई करती हैं, जो जंगल से वनोपोज एकत्र करती हैं और उन्हें मिलकर बेचती हैं। वे अक्सर दूसरों से अपनी निजी वन भूमि की अहमियत के बारे में बात करती हैं। वह कहती हैं, “हमें लोगों को अपनी जमीन बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। ये खरीदार हमें पैसे का लालच दे सकते हैं, लेकिन वह पैसा बहुत जल्दी खत्म हो जाएगा और हमारी जमीन हमेशा के लिए चली जाएगी।” सविता को यह भी अहसास है कि बच्चे अपना अधिकांश समय गांव से दूर स्कूल में बिताते हैं, इसलिए वे अपने जंगलों के महत्व को समझने के अवसर से चूक सकते हैं। इसलिए जब महिलाएं पौधारोपण जैसे काम करती हैं, तो वे कभी-कभी बच्चों को भी जंगल ले जाती हैं और उन्हें दिखाती हैं कि अलग-अलग बीज और पौधे लगाने के लिए मिट्टी में कितनी गहराई तक गड्ढा खोदा जाना चाहिए।
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कर्जत और रायगढ़ जिले के दूसरे शहर अमीर लोगों के लिए घर और रिसॉर्ट बनाने और आगंतुकों की मेहमाननवाजी करने की मशहूर जगहें हैं। लेकिन, इस शहरीकरण और विकास की कीमत अधिकतर मेहमानों को दिखाई नहीं देती। रायगढ़ के इलाके का पेचीदा राजनीतिक और पर्यावरणीय इतिहास इस बात की जरूरत की ओर इशारा करता है कि इस इलाके की आदिवासी औरतें, जिन्हें अब अपनी ही जमीन पर बाहरी समझा जा रहा है, जलवायु से जुड़े असर के लिए जगह के हिसाब से और समाज के लिए जरूरी समाधान तैयार करने में सबसे आगे रहें। जैसे-जैसे जीजा, इंदु और सविता जैसी आदिवासी औरतें अपने जंगलों को बचाने, अपने नेतृत्व को मजबूत करने और बाजारों तक पहुंच बनाने के लिए काम कर रही हैं, जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और सामाजिक अन्याय के खिलाफ लंबे समय तक टिकने वाली मजबूती बनाने के लिए स्थानीय संस्थाओं को सही समय पर मदद मिलना बहुत जरूरी है।
नयनतारा सिरुगुरी संरक्षण और विकास के क्षेत्र में काम करने वाली पेशेवर हैं, जिनकी दिलचस्पी राजनीतिक पारिस्थितिकी, मानव-प्रकृति संबंधों और स्थान-आधारित शिक्षा में है। यामिनी खेड़कर स्वतंत्र पेशेवर हैं जो महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में आदिवासी समुदायों के साथ काम कर रही हैं; वे कीस्टोन फाउंडेशन के सहयोग से कृषि-पारिस्थितिकी और भूमि-अधिकारों से जुड़ी जमीनी पहलों का समन्वय करती हैं। यह टिप्पणी रायगढ़ क्षेत्र में कीस्टोन फाउंडेशन द्वारा किए गए कामों पर आधारित है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 5 मार्च, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: आम के पत्तों का गुच्छा इकट्ठा करती हुई आदिवासी महिला। कई बुजुर्ग महिलाओं ने अपने जंगलों में पौधों की कुछ प्रजातियों में कमी देखी है। विशेषज्ञों का कहना है कि तूफानों और चक्रवातों के कारण आम और जामुन के कई पेड़ गिर रहे हैं। तस्वीर: नयनतारा सिरुगुरी।