- एक नए शोध पत्र में पाया गया है कि चीन में तैयार की गई हिमनद झील प्रबंधन प्रणाली, कुछ संशोधनों के साथ, हिमालय में हिमनद से बनने वाली झीलों के फटने (जीएलओएफ) के प्रभावों को कम करने के लिए एक कारगर उपाय हो सकती है।
- ग्लेशियल झीलें (जो ग्लेशियरों के तल, किनारे या भीतर बनती हैं) उनकी ढ़लान के खिसकने, पानी के अतिप्रवाह या अन्य कारणों से फटती हैं। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, भारत में चीन के बाद हिमनद झीलों की संख्या सबसे अधिक है। भारत में ऐसी झीलें 508 हैं और 2011 से 2023 के बीच लगभग 50% बड़ी झीलों का आकार 20% से अधिक बढ़ गया है।
- अध्ययन में कहा गया है, “हालांकि पिछले तीन दशकों में ग्लेशियल झीलों के फटने की घटनाओं (जीएलओएफ) में मामूली गिरावट देखी गई है। लेकिन इसके बावजूद निचले इलाकों में रहने वाले समुदायों और बुनियादी ढांचे को होने वाला नुकसान बढ़ गया है।”
चीन की हिमनद झील प्रबंधन प्रणाली (जीएलएमएस) तीन मुख्य कार्यों के माध्यम से संचालित होती है: पहला, निगरानी डेटा पर आधारित एक स्वचालित प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, जिसे मोबाइल नेटवर्क और अलार्म के माध्यम से प्रसारित किया जाता है। दूसरा, झील वाली जगहों पर इंजीनियरिंग संबंधी हस्तक्षेप, जैसे कि रिसाव से जल निकासी, तटबंध को मजबूत करना और स्पिलवे का निर्माण। तीसरा, इन झीलों के प्रबंधन के लिए ख़ास लोगों या विभाग का होना, जो केंद्र सरकार, स्थानीय एजेंसियों और समुदायों के बीच समन्वयक के रूप में कार्य करें।
इस प्रबंधन प्रणाली के चालू होने से पहले, 2005 से 2019 के बीच चीन में जीएलओएफ की 31 घटनाएं हुईं, जिनमें से छह ने भारी नुकसान पहुंचाया। इनमें कम से कम 88 इमारतें, लगभग 71 किलोमीटर सड़कें और 30 पुल नष्ट हो गए, वहीं दो लोगों की जानें भी गईं। साल 2019 से 2023 के बीच, प्रबंधन प्रणाली के लागू होने के बाद, चीन में चार घटनाएं हुईं, लेकिन इनमें न्यूनतम नुकसान हुआ और कोई जानमाल का नुकसान नहीं हुआ। इस अध्ययन में कहा गया है, “सामुदायिक भागीदारी और समय पर प्रारंभिक चेतावनी तंत्र जिसमें स्थानीय प्रबंधकों ने इन झीलों के फटने की घटनाओं की चेतावनी सफलतापूर्वक जारी की, यह इस प्रबंधन प्रणाली में ‘एक झील, एक प्रमुख’ वाले सिद्धांत के लाभों को दिखाता है।”
तुलनात्मक रूप से, इसी अवधि में चीन के बाहर हुई 16 भूस्खलन घटनाओं में से सात घटनाओं में 58 पुल, 30 किलोमीटर सड़कें और 26,354 इमारतें क्षतिग्रस्त हुईं, वहीं 60 से अधिक लोग की मृत्यु हुई। इसमें सिक्किम में दक्षिण लोनाक झील का फूटना भी शामिल है।

हिमनदी झीलों का आकार भविष्य में लगभग 377 किलोमीटर बढ़ने का अनुमान है, जो 2000 में अनुमानित आकार से लगभग तीन गुना अधिक है। अध्ययन के अनुसार, भारत में स्थित मध्य हिमालय इस अनुमानित विस्तार का लगभग 40% हिस्सा है। इसमें कहा गया है, “प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों, इंजीनियरिंग हस्तक्षेपों और सामुदायिक तैयारी उपायों के संयोजन से हिमनदी झीलों के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। विशेष रूप से, नियंत्रित तरीके से जलस्तर में कमी लाकर बाढ़ की तीव्रता को 24% तक कम किया जा सकता है।”
और पढ़ेंः बांध सुरक्षा और पूर्व चेतावनी प्रणाली की अनदेखी ने बनाया सिक्किम की बाढ़ को घातक
सिक्किम में जीएलओएफ की घटना के बाद, भारत सरकार ने 2024 में चार राज्यों में नेशनल ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट रिस्क मिनिमाइजेशन प्रोग्राम (एनजीआरएमपी) शुरू किया। इस कार्यक्रम के तहत राज्यों को निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली स्थापित करने के लिए 150 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया गया है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी वेबसाइट पर 3 दिसंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: नेपाल में कपुचे ग्लेशियर झील। तस्वीर – सरोजपांडेय द्वारा विकिमीडिया कॉमन्स [CC BY-SA 4.0] के माध्यम से।