- पश्चिमी नेपाल के बर्दिया जिले में पिछड़े समुदायों के किसान अब पारंपरिक फसलों के बजाय हल्दी उगा रहे हैं। हाथियों को हल्दी की गंध पसंद नहीं है, इसलिए वे इन खेतों से दूर रहते हैं। इससे इंसानों और हाथियों के बीच होने वाला टकराव काफी कम हो गया है।
- संरक्षण समूहों के समर्थन और वैज्ञानिक अध्ययनों द्वारा अनुमोदित, समुदाय के नेतृत्व में हल्दी की खेती वाला यह बदलाव सह-अस्तित्व का एक ऐसा मॉडल पेश करता है जिसे दूसरी जगहों पर भी दोहराया जा सकता है।
- यह पहल पारंपरिक ज्ञान, वैज्ञानिक अनुसंधान और लक्षित समर्थन को मिलाकर एक लंबे समय से चली आ रही संरक्षण चुनौती को पारिस्थितिक और आर्थिक लचीलेपन के अवसर में बदल रही है।
नयाराम सुनार को 2019 के मानसून के आखिरी दिनों की वह घटना आज भी अच्छी तरह याद है। उस दिन पश्चिमी नेपाल के बर्दिया जिले के मधुवन गांव में मूसलाधार बारिश हो रही थी। वहीं उनकी बहन के मक्के के खेत भी थे। तभी एक जंगली हाथी उनके खेतों की तरफ बढ़ा। उसने न सिर्फ पूरी फसल चट कर ली, बल्कि उनके छोटे से घर को भी तहस-नहस कर दिया। उनकी बहन और बच्चों को अपनी जान बचाने के लिए पड़ोसियों के घर सहारा लेना पड़ा था।
नयाराम याद करते हुए कहते हैं, “मुझे बहुत बुरा लगा। तभी मैंने सोचा कि अब कुछ तो करना ही होगा।”
करीब 48 साल के नयाराम नेपाल के लुंबिनी प्रांत के कैलाशी गांव में रहते हैं। यह गांव बर्दिया नेशनल पार्क और एक सामुदायिक जंगल के बिल्कुल बीच में बसा है। यहां जंगली जानवरों और इंसानों के बीच संघर्ष रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। वह बताते हैं, “हम अपनी पांच कट्ठा जमीन से 5,000 रुपए (नेपाली रुपए) भी नहीं कमा पाते थे। फसलें बचती ही नहीं थीं। हाथी, जंगली सूअर, हिरण और बंदर सब कुछ बर्बाद कर देते थे।”
बर्दिया के खाता कॉरिडोर में 2023 में हुए एक अध्ययन से पता चला कि कुछ बस्तियों में सालाना फसल का 45% तक हिस्सा जानवरों के हमलों में बर्बाद हो जाता है। यह समस्या उन इलाकों में ज्यादा थी जो नदियों और जंगलों के पास थे। लेकिन जो घर नेशनल पार्क के मुख्यालय के करीब थे या जहां सुरक्षाकर्मी गश्त कर रहे होते हैं, वहां नुकसान काफी कम हुआ था।

उस हादसे के एक साल बाद, सुनार ने अपने पड़ोसियों को इकट्ठा किया और ‘सहारा किसान समूह’ बनाया। आज इस समूह में 40 सदस्य हैं, जिनमें ज्यादातर मधुवन और ठाकुरबाबा नगर पालिकाओं के दलित और आदिवासी परिवार शामिल हैं। एक स्थानीय संस्था ‘दलित महिला उत्थान संघ’ ने उन्हें ट्रेनिंग दी और हल्दी के बीज मुहैया कराए। इसके बाद उन्होंने ऐसी फसलें उगाना शुरू किया जिसे जंगली जानवर नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।
हालांकि भारत के असम राज्य में अधिकांश किसान हाथियों को खेतों से दूर रखने के लिए नींबू के पेड़ लगाना पसंद करते हैं। लेकिन सुनार ने कहा कि उनके समुदाय ने हल्दी को चुना, क्योंकि नींबू जल्दी खराब हो जाता है और हल्दी के मुकाबले उसका बाजार भी छोटा है। दूसरी ओर, हाथियों को हल्दी की गंध और स्वाद बिल्कुल पसंद नहीं है। सुनार ने मोंगाबे को बताया, “हल्दी की तुलना में नींबू को लंबे समय तक स्टोर करके नहीं रखा जा सकता है। हमने हल्दी को चुना क्योंकि यह फसल सालों तक खराब नहीं होती और लगभग हर घर में इस्तेमाल की जाती है।”
बदलाव की ओर बढ़ते कदम
इन किसानों की कोशिशों ने कई बड़े संगठनों का ध्यान खींचा, जिनमें नेशनल ट्रस्ट फॉर नेचर कंजर्वेशन (एनटीएनसी), ज़ूलॉजिकल सोसाइटी ऑफ लंदन, उज्यालो नेपाल और बर्दिया नेशनल पार्क शामिल थे। इन संस्थाओं ने किसानों को खेती की ट्रेनिंग दी और हल्दी के बीज उपलब्ध कराए।
साल 2021 में एनटीएनसी ने “हाथी बेसार” नाम से एक प्रोग्राम शुरू किया। इसका मकसद किसानों को उन जोखिम भरी फसलों के बजाय हल्दी उगाने के लिए प्रेरित करना था, जिन्हें जानवर खा जाते थे। नयाराम सुनार की अगुवाई वाले ‘सहारा किसान समूह’ को इस पहल के तहत ट्रेनिंग, सोलर ड्रायर, ग्राइंडर और पैकिंग का सामान मुहैया कराया जाता है। संस्था की मदद से उन्होंने एक प्रोसेसिंग सेंटर भी बनाया और अब वे आस-पास के गांवों से भी हल्दी खरीदने लगे हैं।
सुनार कहते हैं, “हम सबने मिलकर यह फैसला लिया कि हम वे फसलें उगाना बंद कर देंगे जिन्हें जंगली जानवर नुकसान पहुंचाते हैं। आखिर हम ऐसी चीज़ें क्यों उगाएं जिनसे हमें सिर्फ मुसीबत ही मिलती है?”
किसानों ने पहले लेमनग्रास और कैमोमाइल उगाने की कोशिश की थी, लेकिन बाजार तक सही पहुंच न होने के कारण वे इसमें सफल नहीं हो पाए। इसके मुकाबले हल्दी की फसल अधिक टिकाऊ निकली, इसका बाजार भी अच्छा है और हाथी भी इसकी गंध की वजह से खेतों से दूर रहते हैं। बर्दिया नेशनल पार्क के वरिष्ठ संरक्षण अधिकारी अशोक कुमार राम कहते हैं, “अदरक और हल्दी जैसी फसलें बहुत असरदार साबित हुई हैं।” राम के मुताबिक, जंगली एशियाई हाथी किसी भी माहौल में ढल जाते हैं और उनकी भूख बहुत ज्यादा होती है। वे रोजाना तकरीबन 150 से 200 किलोग्राम तक खाना खा सकते हैं।

एक समय था जब हाथी नेपाल के दक्षिणी मैदानी इलाकों में 900 किलोमीटर से भी लंबे गलियारे में आजादी से घूमते थे। नेपाल की तीन प्रमुख नदियों (कोशी, गण्डकी और कर्णाली) के मैदानी इलाकों में उन्हें भरपूर खाना मिलता था और विशाल निर्जन भूमि होने के कारण उनके रास्ते में कोई रुकावट नहीं थी। लेकिन पहाड़ों से आकर दक्षिणी मैदानों में बसने वाले लोगों की बढ़ती संख्या, सड़कों के विस्तार और नई बस्तियों ने उनके इन गलियारों को खंडित कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि हाथियों की आबादी अब पूर्व और पश्चिम के दो अलग-अलग हिस्सों में बंट गई है। आज, पश्चिम में ये संकटग्रस्त हाथी मुख्य रूप से बर्दिया और शुक्लाफांटा नेशनल पार्क और उनके आसपास के इलाकों तक ही सीमित रह गए हैं। हालांकि जंगल अब भी उनके भोजन का मुख्य स्रोत हैं, लेकिन आवास की कमी और इंसानी बस्तियां बढ़ने के कारण वे अक्सर गांवों की ओर आने को मजबूर हो जाते हैं।
बर्दिया में एनटीएलसी के वरिष्ठ संरक्षण अधिकारी अजीत तुम्बाहाम्फे कहते हैं, “मक्का और चावल जैसी फसलें हाथियों के लिए आसान लक्ष्य हैं क्योंकि इनमें भरपूर कैलोरी होती है। ये फसलें खेतों में बिना किसी सुरक्षा के और भारी मात्रा में उपलब्ध रहती हैं, इसलिए हाथी इनकी ओर खिंचे चले आते हैं।”
हाथियों को इंसानी बस्तियों से दूर रखने के लिए नेशनल पार्क के बफर जोन (मध्यवर्ती क्षेत्र) के कुछ हिस्सों में 60 किलोमीटर लंबी बिजली की बाड़ लगाई गई, लेकिन यह कई बार नाकाम साबित हो जाती है। अजीत बताते हैं, “अगर बाड़ पर ज्यादा घास उग जाए या वह कहीं से खराब हो जाए, तो उसमें शॉर्ट-सर्किट हो जाता है। कभी-कभी हाथी खुद ही बाड़ को तोड़ देते हैं और उसकी मरम्मत करने में काफी समय लगता है।”
राम के मुताबिक, यह समस्या सिर्फ भूख की नहीं, बल्कि उनके व्यवहार की भी है। उन्होंने कहा, “अनुभवी और बूढ़े हाथी अक्सर युवा हाथियों को खेतों पर धावा बोलना सिखाते हैं। यह एक ‘सीखा हुआ व्यवहार’ है। वे जानबूझकर कम उम्र के हाथियों को मानवीय बस्ती और खेतों की ओर ले जाते हैं ताकि उन्हें आसानी से भोजन मिल सके।”

हल्दी की खेती से फायदा
बर्दिया नेशनल पार्क के पास 2017 में हुए एक अध्ययन ने उस बात की पुष्टि की जिसे स्थानीय किसान पहले ही समझ चुके थे: हाथी हल्दी से दूर रहते हैं। हालांकि जानवर कभी-कभार हल्दी के खेतों से होकर गुजर जाते हैं, लेकिन उन्होंने कभी भी इस फसल को नुकसान नहीं पहुंचाया। इसके विपरीत, पास के धान के खेतों पर हाथियों ने बार-बार हमला किया। वैज्ञानिकों का मानना है कि हल्दी की तेज गंध और इसमें मौजूद कड़वे तत्वों की वजह से हाथी इसे खाना पसंद नहीं करते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दो साल के इस अध्ययन के दौरान हल्दी से धान की तुलना में कहीं ज्यादा मुनाफा हुआ। आंकड़ों के माने तो उस अवधि में हल्दी की खेती से प्रति हेक्टेयर 1,78,168 रुपए की आय प्राप्त हुई, जबकि धान से महज 72,945 रुपए प्रति हेक्टेयर की ही कमाई हो पाई थी।

साल 2021 के एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि हाथियों द्वारा किया गया नुकसान सामाजिक असमानता को ओर बढ़ा रहा है। 240 किसानों और 31 स्थानीय प्रतिनिधियों के साक्षात्कार पर आधारित इस अध्ययन में पाया गया कि नेशनल पार्क के सबसे करीब रहने वाले गरीब परिवार, जिनके पास जमीन के छोटे टुकड़े थे, उन्हें सबसे ज्यादा नुकसान झेलना पड़ा। वे अक्सर अपनी सालाना धान की फसल का 17% तक हिस्सा हाथियों के कारण खो रहे थे।
ये किसान इतने गरीब थे कि वे फसल बीमा योजनाओं का खर्च भी नहीं उठा सकते थे। अध्ययन का निष्कर्ष यह था कि अगर वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों को सही और बराबरी के साथ लागू नहीं किया गया, तो यह समाज के सबसे कमजोर वर्ग के लिए एक बड़ा आर्थिक बोझ बन सकता है।
हल्दी की खेती ने किसानों की जिंदगी बदल दी है। नयाराम सुनार अब उसी जमीन से सालाना 70,000 रुपए कमा रहे हैं, जो मक्के से होने वाली उनकी पिछली कमाई से लगभग 10 गुना ज्यादा है। उनके समूह ने पिछले दो वर्षों में 66 क्विंटल (करीब 7.3 टन) हल्दी पाउडर बेचा है, जिससे उन्हें 16 लाख रुपए की आमदनी हुई है। अब वे काठमांडू, पोखरा, नेपालगंज और धनगढ़ी जैसे बड़े शहरों में हल्दी पाउडर की सप्लाई कर रहे हैं।
सुनार कहते हैं, “यह सिर्फ पैसों की बात नहीं है, बल्कि मानसिक शांति की भी है। अब हमने हाथियों से डरने के बजाय उनके साथ रहने (सह-अस्तित्व) का एक रास्ता खोज लिया है।”
इस समूह की सचिव और अकेले अपने बच्चों का पालन-पोषण करने वाली 37 वर्षीय सावित्री सुनार को इस बदलाव ने सुरक्षा और आत्मनिर्भरता दोनों दी है। पंद्रह साल पहले, एक जंगली हाथी ने उनकी मक्के की पूरी फसल बर्बाद कर दी थी। लेकिन आज, हल्दी की खेती उनके बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने में मदद कर रही है। साल 2024 में उन्होंने हल्दी से 12,500 रुपए कमाए। इससे उन्हें बच्चों की स्कूल फीस भरी और अपने खर्च पूरे किए।
सावित्री कहती हैं, “अगर हम धान और मक्का उगाते रहते, तो जंगली जानवर सब कुछ उजाड़ देते। लेकिन जब से हमने हल्दी और सब्जियां उगाना शुरू किया है, हाथी दोबारा हमारे खेतों की तरफ नहीं आए हैं।”
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जैसे-जैसे नेपाल के पारंपरिक वन गलियारे सिकुड़ रहे हैं, फसलों पर हमले और इंसानों की जान जाने का खतरा बढ़ने की आशंका है। बर्दिया में हल्दी की खेती की यह पहल, जिसमें सामुदायिक ज्ञान और संरक्षण संस्थाओं की साझेदारी का मेल है, हाथियों और इंसानों के साथ-साथ रहने (सह-अस्तित्व) का एक बेहतरीन मॉडल पेश करती है।
अपने खेतों को देखते हुए सुनार कहते हैं, “हाथी हमारी राष्ट्रीय धरोहर हैं। अगर हम उन्हें सुरक्षित रखेंगे, तो हम भी सुरक्षित रहेंगे। अगर हम उन्हें नहीं बचाएंगे, तो हम भी नहीं बच पाएंगे।”
इस खबर के लिए बर्दिया से रिपोर्टिंग में प्रेम बिशोकर्मा ने सहयोग किया है।
यह खबर मोंगाबे टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 13 अगस्त 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: सहारा किसान समूह की सचिव सावित्री सुनार अपने हल्दी के खेत में। तस्वीर- प्रेम बिशोकर्मा