- निकोबार द्वीप समूह पर बोतलों और कंटेनरों में फंसे हर्मिट केकड़े यानी एकांतवासी केकड़े का एक अध्ययन में दस्तावेजीकरण किया गया है।
- छोटे केकड़ों पर इसका असर ज्यादा दिखता है, क्योंकि बोतलों के मुंह में खास तौर पर वही केकड़े फंस जाते हैं जिनके खोल इतने छोटे होते हैं कि वे उनमें से अंदर जा सकें।
- शोधकर्ता बोतल की डिजाइन में ऐसे बदलावों का सुझाव देते हैं, जिससे केकड़े आसानी से बाहर निकल सकें। साथ ही, वे ऐसी व्यापक नीतियां लागू करने पर जोर देते हैं, जो प्लास्टिक कचरे के लिए इसे बनाने वालों को जवाबदेह ठहराती हैं।
अगर आप अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के नीले-हरे समुद्र तटों की चांदी जैसी नरम रेत पर खड़े हैं, तो अक्सर आपको किनारे पर बहकर आया प्लास्टिक कचरा दिखाई देगा। जब आप झुककर ध्यान से देखते हैं, तो हो सकता है कि आपको छोटा-सा केकड़ा किसी बोतल के अंदर फंसा हुआ मिले। आप उसे बचाने के लिए बोतल को हिलाकर बाहर निकालने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन हो सकता है कि उसकी जान चली गई हो। यह कोई अपवाद नहीं है।
जनवरी 2026 में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, शोधकर्ताओं ने जनवरी से जुलाई 2024 के बीच 4,783 ऐसे मामले दर्ज किए। इन मामलों में निकोबार द्वीप समूह के 28 तटों पर हर्मिट केकड़े समुद्री कचरे में फंस गए थे। यह अध्ययन भारतीय वन्यजीव संस्थान के मयूर फुलमाली और नेहरू प्रबाकरन ने किया था। इस दौरान शोधकर्ताओं ने दो द्वीप उप-समूहों नानकोवरी और ग्रेट निकोबार के तटों का सर्वेक्षण किया।
फुलमाली ने कहा, “ये छोटे केकड़े तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बहुत अहम हैं और समुद्री कचरे से जुड़े अधिकतर अध्ययनों में इनकी अनदेखी की जाती है।”

हर साल लगभग 40 लाख से लकेर 1.2 करोड़ मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा महासागरों में पहुंचता है, जिससे व्यापक नुकसान होता है। अध्ययन में बताया गया है कि निकोबार द्वीप समूह खास तौर पर समुद्री कचरे के प्रति संवेदनशील हैं, क्योंकि वे मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित हैं। यह दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है। अलग-अलग समुद्री धाराएं पड़ोसी देशों से भारी मात्रा में प्लास्टिक कचरा लाकर इन तटों पर जमा कर देती हैं।
हर्मिट केकड़े छोटे, मृतभक्षी जीव होते हैं। इनमें रीढ़ की हड्डी नहीं होती। ये समुद्र तटों की सेहत को बनाए रखते हैं और पानी व जमीन दोनों पर कई जीवों के भोजन का स्रोत हैं। ये तट को साफ रखते हैं, पोषक तत्वों के चक्र को बनाए रखते हैं और बीजों के प्रसार में मदद करते हैं। तटीय समुदाय भी पोषण और आजीविका के लिए इन जीवों पर निर्भर हैं। प्रबाकरण ने बताया कि निकोबार द्वीप समूह के कुछ हिस्सों में इन्हें स्वादिष्ट व्यंजन के तौर पर खाया जाता है और मछली पकड़ने के चारे के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है।
कूड़े की जांच
निकोबार द्वीप समूह में काम करते हुए फुलमाली ने देखा कि हर्मिट केकड़े प्लास्टिक की बोतलों में फंसे हुए हैं। उन्होंने कहा, “मैंने एक पैटर्न देखा कि कुछ केकड़े ऐसे हैं जो खास आकर की बोतलों में ही पाए जाते हैं।” उन्होंने एक अध्ययन के जरिए इसकी जांच करने का फैसला किया।
आगे आने वाले महीनों तक फुलमाली ने समुद्री कछुओं के घोंसले बनाने वाली जगहों का आकलन करने के अपने रोजाना के काम के साथ-साथ इन केकड़ों के फंसने पर गहराई से काम किया। उन्होंने प्रबाकरण के साथ सहयोग किया, जो तटीय और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के जानकार हैं और 2009 से निकोबार द्वीप समूह में काम कर रहे हैं। प्रबाकरण ने मोंगाबे-इंडिया से कहा, “इन सभी समुद्र तटों पर हमेशा बहुत ज्यादा मात्रा में प्लास्टिक जमा होता है। इस कचरे का भारत से बहुत कम संबंध है, क्योंकि इस प्लास्टिक का ज्यादातर हिस्सा अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्रों से आता है।”
जब शोधकर्ताओं ने इन समुद्र तटों से इकट्ठा किए गए आंकड़ों को देखा, तो उन्हें पता चला कि समस्या कितनी गंभीर है। अध्ययन में पाया गया कि 10 में से 8 से ज्यादा केकड़े प्लास्टिक और कांच की बोतलों और बाकी बचे हुए केकड़े स्टायरोफोम के बक्से, हेलमेट और मछली पकड़ने वाले फ्लोट जैसे दूसरे कंटेनरों में फंसे थे। फंसे हुए सभी जीवों में से, एक प्रतिशत से भी कम जीवित पाए गए। इससे पता चलता है कि उनके जीवित बचने की संभावना बहुत कम थी।

जब बोतल का मुंह जानलेवा बन जाए
इस अध्ययन का मुख्य नतीजा यह है कि बोतल का मुंह किस तरह आकार के हिसाब से चुनने वाले फिल्टर की तरह काम करता है। जिन हर्मिट केकड़ों के खोल का आकार बोतल के मुंह से छोटा होता है, वे अंदर जा सकते हैं, क्योंकि वे अपने खोल के साथ चलते हैं। बड़े खोल वाले केकड़े छोटी बोतलों में नहीं फंसते हैं। फुलमाली ने कहा, “छोटे आकार के केकड़े एक से दो लीटर की बोतलों में सबसे ज्यादा असुरक्षित होते हैं।” टीम ने पाया कि सबसे अधिक केकड़े डेढ़ लीटर, दो लीटर और पांच लीटर की बोतलों में फंसे मिले। यह नतीजा फुलमाली के लिए चौंकाने वाला था, क्योंकि शुरुआत में उन्हें उम्मीद थी कि बड़ी बोतलें ज्यादा खतरनाक साबित होंगी।
हालांकि, यह संवेदनशीलता प्रजातियों के अनुसार अलग-अलग होती है। कोइनोबिटा वंश के हर्मिट केकड़ों की चार प्रजातियां (C. perlatus, C. rugosus, C. cavipes और C. violascens) इन कंटेनरों में पाई गईं । इनमें से C. rugosus खास तौर पर अधिक संख्या में पाया गया और ज्यादा संवेदनशील था, क्योंकि यह समुद्र तट की वनस्पतियों के पास रहता है, जहां प्लास्टिक कचरा अधिक मात्रा में जमा होता है।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि प्लास्टिक की बोतलें ही अकेली दोषी नहीं हैं। अलग-अलग तरह के कंटेनर हर्मिट केकड़ों के लिए खतरा पैदा करते हैं; इनमें वे कंटेनर भी शामिल हैं जिन्हें लोगों ने सामान रखने या मछली पकड़ने के लिए काम में लिया। इनमें प्लास्टिक की परत वाली कागज की प्लेटें भी शामिल हैं, जिनकी सतह चिकनी होती है और जिससे केकड़ों का बाहर निकल पाना मुश्किल हो जाता है।
और शोध की जरूरत
फील्ड वर्क के दौरान हर सुबह फुलमाली और उनके स्थानीय सहायक सुबह पांच बजे उठते थे। तट के किनारे कुछ घंटे पैदल चलते थे और कभी-कभी किसी तट तक पहुंचने के लिए पहाड़ी पर भी चढ़ते थे। वहां पहुंचने पर, वे अपना शिविर लगाते और काम शुरू कर देते। सबसे पहले, वे समुद्र तट पर मौजूद पौधों के बीच डंडियों और रस्सियों की मदद से छोटे-छोटे आयताकार प्लॉट बनाते थे, जहां लहरों के साथ बहकर आया बहुत सारा समुद्री कचरा फंस जाता था। इसके बाद, वे उस कचरे में कंटेनर खोजने के लिए अच्छी तरह से छानबीन करते थे। फुलमाली ने मोंगाबो-इंडिया को बताया, “सबसे पहले आप उन बोतलों को ढूंढ़ें जिनके ढक्कन गायब हों, फिर उस बोतल को उठाकर जोर से हिलाएं। और अगर आपको कोई आवाज सुनाई देती है, तो अंदर झांककर देखें; हो सकता है कि आपको वहां कुछ छोटे-छोटे हर्मिट केकड़े मिल जाएं।”
हालांकि, दूर-दराज के तटों पर जाना आसान नहीं था। फुलमाली ने बोरियों में बोतलें जमा की, ताकि बाद में शिविर में उनका माप लिया जा सके। इन बोतलों के अंदर सैकड़ों बहुत छोटे हर्मिट केकड़ों के खोल थे, जिससे उनकी माप लेना और पहचान करना मुश्किल हो गया था।
कभी-कभी रात के समय अन्य प्रजाति के केकड़े रेंगते हुए शिविर में घुस आते थे। वे नमूनों से भरे थैलों की ओर आकर्षित होते और उन्हें घसीटकर ले जाने की कोशिश करते। नए ठिकाने की तलाश में, वे प्लास्टिक के थैलों को फाड़ डालते थे, ताकि उनमें रखे सीपियों को ढूंढ सकें।

हर्मिट केकड़ों को सफाईकर्मी के रूप में जाना जाता है और इसकी अच्छी वजह भी है। वे रात में तंबू के बाहर बचे-खुचे भोजन से भरे बर्तनों को भी साफ कर देते थे।
एक बार जब टीम ने सभी नमूने इकट्ठा कर लिए और सीपियों व बोतलों को माप लिया, तो वे लैब में आ गए। वहां उन्होंने कंटेनरों को उनके आयतन के आधार पर छोटे से लेकर बहुत बड़े तक अलग-अलग समूहों में बांटा। इसके बाद, उन्होंने डेटा का विश्लेषण करके यह पता लगाया कि किस आयतन वाले कंटेनर में सबसे ज़्यादा केकड़े फंसते हैं। इसके साथ ही सीपियों के आकार व बोतल के मुंह के व्यास के बीच के संबंध की भी जांच की।
बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले जंतु-विज्ञानी वसंतकुमार रबारी तटीय जीवों पर प्लास्टिक प्रदूषण के दुष्प्रभावों में महारत रखते हैं। उन्होंने इस अध्ययन की व्यवस्थित कार्यप्रणाली की तारीफ की। शोधकर्ताओं ने बोतल के मुंह के व्यास पर ध्यान केंद्रित किया, लेकिन यह भी माना कि सामग्री, रंग और बोतल की ढलान जैसे अन्य कारकों पर और अधिक शोध करना होगा। रबारी ने कहा, “यह अवलोकन-आधारित अध्ययन है। यह समझने के लिए नियंत्रित प्रायोगिक शोध किया जाना चाहिए कि क्या हर्मिट केकड़े अलग-अलग आकार की बोतलों में जान-बूझकर प्रवेश करते हैं और वे उनसे बाहर क्यों नहीं निकल पाते।”
उन्होंने बताया कि भारत में अधिकतर शोध जानवरों के शरीर के अंदर मौजूद माइक्रोप्लास्टिक पर केंद्रित हैं और मैक्रो/मेगा प्लास्टिक तथा जानवरों के बीच की आपसी क्रियाओं और उनके पारिस्थितिकीय परिणामों की जांच करने वाले अध्ययनों की कमी है।
इस अध्ययन के नतीजे चिंता का विषय हैं। अगर प्रदूषण पर रोक नहीं लगाई गई, तो छोटे हर्मिट केकड़ों की संख्या में कमी आएगी, जिसका असर तटीय पारिस्थितिकी तंत्र और तटीय खाद्य श्रृंखला पर पड़ेगा।
डिजाइन और नीतिगत बदलाव
हर्मिट केकड़ों की मौत को रोकने के लिए, शोधकर्ताओं ने बोतलों के डिजाइन में बदलाव का सुझाव दिया है। इसमें बोतल का मुंह बड़ा करना और ढलान को कम करना शामिल है, ताकि केकड़ों के लिए बाहर निकलना आसान हो सके। प्रभाकरन ने कहा, “अगर आप ढलान में थोड़ा-सा बदलाव कर दें और उन्हें ऊपर चढ़ने के लिए पकड़ बनाने के मकसद से कुछ और खांचे बना दे, तो इससे कई समस्याओं का हल निकल सकता है।” लेकिन उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सबसे बड़ा समाधान तो यह है कि प्लास्टिक का कचरा समुद्र में जाने से ही रोका जाए।
डिजाइन से जुड़े समाधानों से परे, शोधकर्ता ने व्यापक नीतिगत बदलावों का प्रस्ताव रखा है: प्लास्टिक कचरे के लिए निर्माताओं को जवाबदेह ठहराना, जमा-वापसी प्रणालियों को लागू करना, तटीय क्षेत्रों में सिंगल-यूज प्लास्टिक पर रोक लगाना और समुदाय-संचालित कचरा संग्रहण केंद्र स्थापित करना।

इन छोटे केकड़ों को सुरक्षित रखने के लिए और अधिक मेहनत करने की जरूरत होती है। टीम सुझाव देती है कि भविष्य में इस बात पर शोध किया जाए कि क्या बोतलों की बनावट जानवरों को उसमें फंसाने में कोई भूमिका निभाती है, केकड़ों की प्रभावित प्रजातियों की आबादी का आकलन किया जाए और फंसाने वाली मुख्य जगहों का पता लगाने के लिए वैश्विक नागरिक विज्ञान नेटवर्क स्थापित किया जाए। रबारी ने रिसर्च को दूसरे तटीय इलाकों तक बढ़ाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया: “भारत के पूरे समुद्र तट पर जीवों के साथ मैक्रो, माइक्रो और मेगा प्लास्टिक की आपसी क्रिया पर अध्ययन किए जाने चाहिए।”
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यह अध्ययन निकोबार द्वीपों में हर्मिट केकड़ों पर प्लास्टिक प्रदूषण के दुष्प्रभावों के बारे में बताता है। शोध ऐसे समय में सामने आया है, जब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने ₹810 अरब की ‘ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना’ को मंजूरी दी है और यह सब ऐसे द्वीपों में हो रहा है जो पारिस्थितिकी के लिहाज से संवेदनशील हैं और जहां बड़े विकास कार्यों को लेकर पर्यावरण से जुड़ी चिंताएं बनी हुई हैं।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 10 मार्च, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: कोएनोबिटा ब्रेविमैनस या इंडो हर्मिट केकड़ा जो लिटिल अंडमान के एक झरने पर मौजूद विशाल अफ्रीकी घोंघे के खोल में रह रहा है। प्रतिनिधि तस्वीर: वंदना के.।