- मिजोरम में झूम खेती की जगह स्थायी और बाजार से जुड़ी फसलों को अपनाने के लिए तुंग (एक प्रकार बीज जिससे तेल निकाला जाता है) के बागान लगाए जा रहे हैं।
- तुंग का तेल इसके पेड़ से मिलने वाले बीज से निकाला जाता है जिसे खान-पान में इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इसका इस्तेमाल पेंट, वार्निश और दूसरे औद्योगिक कामों में होता है।
- हालांकि, जानकार चेतावनी देते हैं कि नाजुक ढलानों पर एक ही तरह के बागान लगाने से मिट्टी का कटाव और जैव-विविधता को नुकसान होगा। इसके बजाय वे कृषि-वानिकी (एग्रोफॉरेस्ट्री) आधारित खेती के तरीकों का सुझाव देते हैं।
साल 2023 की बात है। मिजोरम के सैतुअल जिले के किसानों ने साथ मिलकर ‘सैतुअल जिला तुंग उत्पादक संगठन’ बनाया। इसका मकसद तुंग के पेड़ से मिलने वाले तेल के ऐसे बीज की खेती और उन्हें जमा करने के बाद उसकी मार्केटिंग की संभावना को बेहतर बनाना था। इस तेल के कई अहम औद्योगिक इस्तेमाल होने से इसकी व्यापारिक संभावनाएं बहुत हैं। शुरुआत में जो छोटा-सा समूह था, वह अब तेजी से बड़ा हो गया है। आज पूरे जिले के 600 से ज्यादा किसान इस संगठन से जुड़ चुके हैं। वे ऐसी फसल से अपना आय बढ़ने की उम्मीद कर रहे हैं, जिसके बारे में भारत के अधिकतर लोग अब भी बहुत कम जानते हैं।
किसान अब कई हेक्टेयर जमीन पर तुंग के पेड़ लगा रहे हैं। इसमें मुख्य रूप से वर्निशिया फोर्डी और वर्निशिया मोंटाना हैं जो दो नजदीकी प्रजातियां हैं। इनके बीजों से तुंग का तेल निकलता है, जो खान-पान में काम नहीं आता है, लेकिन औद्योगिक इस्तेमाल के लिए बहुत ज्यादा कीमती है।
हालांकि, जानकार इस पहाड़ी राज्य की नाजुक ढलानों पर एक ही फसल की खेती के विस्तार के जोखिमों के बारे में चेतावनी देते हैं।
तुंग का तेल और इसका औद्योगिक इस्तेमाल
तुंग का तेल मुख्य रूप से वर्निशिया फोर्डी से निकाला जाता है और इसमें कभी-कभी थोड़ी मात्रा में वर्निशिया मोंटाना का तेल भी मिलाया जाता है।
अगर परिस्थितियां सही रहती हैं, तो तुंग के पेड़ों में तीसरे साल से ही फल लगने शुरू हो जाते हैं। हालांकि, अधिकतर अनुमानों के अनुसार पहली भरोसेमंद फसल लगभग पांचवें साल से मिलती है। ये पेड़ आम तौर पर 24 साल तक उपज देते हैं और 10 से 12 साल की उम्र के बीच इनसे सबसे ज्यादा पैदावार मिलती है। आम तौर पर तुंग के तेल की उपज 300 से 450 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के बीच होती है और इसके बीज में लगभग 30-40% तेल होता है।
इस तेल का इस्तेमाल हमेशा से दरारें भरने वाले पदार्थ से लेकर इंसुलेटिंग यौगिकों तक कई तरह के उत्पादों में किया जाता रहा है। यह तेल हवा के संपर्क में आने पर मजबूत और जलरोधक परत में बदल जाने की खासियत रखता है। इस वजह से इसका इस्तेमाल पेंट, वार्निश, सीलेंट, लिनोलियम, ऑयलक्लॉथ, प्रिंटिंग इंक और लकड़ी की फिनिशिंग में व्यापक रूप से होता है। इसका उपयोग उन खास औद्योगिक कामों में भी किया जाता है जहां मजबूत पकड़ और टिकाऊपन की जरूरत होती है। हाल के समय में, तुंग के तेल को बायोडीजल उत्पादन के लिए संभावित, बिना खान-पान वाले कच्चे माल के तौर पर भी आजमाया गया है।
मिजोरम के व्यापार और वाणिज्य विभाग ने ऑयल टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (OTRI) के नतीजों का हवाला देते हुए कहा कि राज्य की जलवायु कई अन्य क्षेत्रों की तुलना में तुंग की खेती के लिए ज्यादा मुफीद है। सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (CFTRI) की ओर से किए गए आकलनों में पाया गया कि मिजोरम में उगाए गए तुंग के तेल की मात्रा और उसके भौतिक-रासायनिक गुण संतोषजनक हैं।
मिजोरम में साल 2000-01 के दौरान 120 मीट्रिक टन बीजों से निकाला गया 24 मीट्रिक टन तुंग का तेल ₹50 प्रति किलोग्राम की दर से बेचा गया। साल 2001-02 में, लगभग 25 मीट्रिक टन तेल प्रोसेस किया गया। हालांकि, चीन से सस्ते आयात के कारण इसे लाभकारी कीमतों पर नहीं बेचा जा सका।

तुंग के तेल की बढ़ती मांग
हाल के सालों में तुंग के बागानों पर भले ही सबका ध्यान जा रहा हो, लेकिन मिजोरम के लिए यह कोई नई बात नहीं है।
साइटुअल जिला तुंग उत्पादक संघ के अध्यक्ष जाइरेमथांगा ने कहा “1992 में मैंने लगभग दस एकड़ (करीब चार हेक्टेयर) में तुंग की खेती की थी।” “कृषि विभाग ने बीज उपलब्ध कराए थे और हमने बागान के लिए वन भूमि साफ की थी। लेकिन, जब पेड़ों ने तीन से पांच साल बाद फल देना शुरू किया, तो कीमत बहुत कम लगभग ₹5 प्रति किलो थी। हमें बताया गया था कि बीजों की मार्केटिंग की जाएगी, लेकिन अच्छी पैदावार होने के बावजूद ऐसा कभी नहीं हुआ।”
उन्होंने आगे कहा, “कुछ सालों बाद, अधिकतर किसानों ने दूसरी फसलें उगाने के लिए अपने 70-80% बागान साफ कर दिए।” “तुंग की खेती को फिर से बढ़ावा मिलने पर, मैंने 2023 में पांच एकड़ (लगभग दो हेक्टेयर) जमीन पर फिर से खेती शुरू की। नए पेड़ों पर अभी बीज नहीं आए हैं, लेकिन मैंने 2025-26 में पुराने पेड़ों से एक क्विंटल बीज ₹55 प्रति किलो के हिसाब से बेचे। इस बार, मुझे उम्मीद है कि नतीजा अलग होगा, क्योंकि 1990 के दशक के मुकाबले बाजार तक पहुंच कहीं ज्यादा बेहतर है।”
मिजोरम के कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक आर. लालरामहलुनी ने भी बताया कि 1990 के शुरुआती दशक में तुंग की खेती बड़े पैमाने पर शुरू की गई थी। उन्होंने कहा, “यह राज्य सरकार की प्रमुख ‘न्यू लैंड यूज पॉलिसी’ (NLUP) का अहम हिस्सा था। मिजोरम की जलवायु, बारिश का पैटर्न और ऊंचाई इस पेड़ के लिए अनुकूल थे। हालांकि, बाजार तक कम पहुंच, प्रसंस्करण सुविधाओं की कमी और उद्यमिता में मदद नहीं मिलने से न तो बीज और न ही तेल को बेचा जा सका।” समय के साथ, जो पेड़ कभी मूल्यवान माना जाता था, उसे स्थानीय रूप से ‘डूम्स ट्री’ (अशुभ पेड़) कहा जाने लगा।
मिजोरम में NLUP (1991–1997) के तहत ‘तुंग’ को लोकप्रिय बनाया गया और उस दौरान लगभग 7,785 हेक्टेयर क्षेत्र में सत्तर लाख से ज्यादा पेड़ दर्ज किए गए।
लालरामहलुनी ने कहा कि मिजोरम सरकार पारंपरिक झूम खेती से दूर जाने के लिए काम कर रही है, जिसे वन कटाई, मिट्टी के कटाव और आग के बढ़ते खतरे से जोड़ा जाता है। नीति बनाने वालों ने लंबी अवधि में टिकाऊपन बढ़ाने के लिए आर्थिक रूप से व्यावहारिक और बाजार से जुड़ी फसलों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया है।
इस हालात में और भारत में तुंग के तेल की बढ़ती मांग के बीच राज्य में इस पेड़ को लगाने की कोशिशें फिर से तेज हो गई हैं। साथ ही, इस पेड़ से मिलने वाले तिलहन को संभावित विकल्प के रूप में पेश किया गया है। उन्होंने आगे कहा, “यह पहल ‘राष्ट्रीय खाद्य तेल-तिलहन मिशन’ (NMEO-OS), 2024 के तहत लागू की जा रही है, जो ‘पेड़ों से मिलने वाले तिलहन’ (TBOs) पर भी खास ध्यान देता है। हर किसान को प्रति एकड़ बुवाई के लिए एक किलो बीज दिए जाते हैं। साथ ही, आर्थिक सहायता (₹8,000 प्रति एकड़) भी दी जाती है। हमने मार्च-अप्रैल 2026 के बुवाई के मौसम के लिए, पूरे राज्य में बांटने के लिए सैतुअल से 50 क्विंटल बीज खरीदे हैं।”

नया जीवन और अंतरफसली खेती
साल 2023 में जब सेरछिप जिले की एक तुंग तेल प्रसंस्करण कंपनी ने बाजार तक बेहतर पहुंच और बेहतर कीमतों की पेशकश की, तो सैतुअल के किसान रॉबर्ट लालनुंतलुआंगा उन कई लोगों में शामिल थे जिन्होंने अपने पहले से साफ किए गए तुंग के बागानों को फिर से लगाया। उन्होंने कहा, “हालांकि तुंग मिजोरम का मूल पौधा नहीं है, लेकिन पिछली बार के बचे हुए कुछ पेड़ों से हमने मिट्टी को किसी तरह का नुकसान या इसके आक्रामक बनने के संकेत नहीं देखे हैं।” उन्होंने आगे कहा, “छाया पसंद करने वाली फसलों के साथ अंतरफसली खेती करना संभव है, क्योंकि यह पेड़ 20 मीटर तक बढ़ सकता है। हम कॉफी की खेती करने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ किसान हल्दी और पान के पत्ते की सफलतापूर्वक खेती कर चुके हैं।”
इसके बीज नवंबर और दिसंबर के बीच गिरते हैं। उत्पादक संघ इसकी कटाई करता है और इन्हें जमा करता है। फिर इन्हें सेरछिप स्थित प्रोसेसिंग प्लांट को भेजा जाता है। जहां एक ओर नए लगाए गए पेड़ों पर अभी फल आने बाकी हैं, वहीं सैतुअल के किसानों ने 2025-26 में पुराने पेड़ों से सामूहिक रूप से लगभग 20 मीट्रिक टन फल बेचे हैं।
“कृषि विभाग ने पुराने बागानों की निराई-गुड़ाई और रखरखाव के लिए हर एकड़ ₹8,000 की मदद दी है। अधिकारियों के साथ मिलकर, हम ‘तुंग’ की खेती को बढ़ावा देने के लिए नियमित रूप से गांवों का दौरा कर रहे हैं। हमने सैतुअल में एक प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने के लिए योजना एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन विभाग को प्रस्ताव भी सौंपा है,” संघ के सलाहकार वी. लालहरुइतलुआंगा ने यह जानकारी दी।
लालरामहलुनी ने आगे कहा, “हमने 2024 में सेरछिप और ख्वाजॉल जिलों में तुंग को बढ़ावा देना शुरू किया और किसानों से प्रतिक्रिया उत्साहजनक रही है। 2026 में हम राज्य के 11 में से 8 जिलों में लगभग 1,000 हेक्टेयर क्षेत्र तक इसे ले जाने की योजना बना रहे हैं। पश्चिमी पट्टी के तीन जिले मामित, कोलासिब और लॉन्गतलाई इसमें शामिल नहीं हैं, क्योंकि उनका निचला भूभाग ऑयल पाम की खेती के लिए ज्यादा सही माना जाता है।”

आत्मनिर्भरता बनना, आयात कम करना
एम/एस वोर्या इंटरप्राइजेज (तुंग तेल बनाने वाली इकाई) के संस्थापक और फिनमोर कॉर्पोरेट कम्युनिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड. (आयातक) के निदेशक हिमांशु बंसल के अनुसार भारत में तुंग तेल की मौजूदा सालाना मांग लगभग 400-500 मीट्रिक टन है। “घरेलू उत्पादन नहीं के बराबर है, इसलिए इसका ज्यादातर हिस्सा चीन से आयात किया जाता है, जो वैश्विक बाजार के 95% से ज्यादा हिस्से पर नियंत्रण रखता है।” उन्होंने बताया कि कीमतें उत्पादन और बाजार मांग के आधार पर लगभग 2,500 से 4,000 अमेरिकी डॉलर प्रति टन के बीच रहती हैं। “कीमत को देखते हुए फिलहाल आयात करना ज्यादा सही है। हालांकि, हम भारत में बागानों को बढ़ावा दे रहे हैं, ताकि समय के साथ हम चीन की कीमतों के बराबर पहुंच सकें और किसानों के लिए टिकाऊ आय पक्की कर सकें। लगाए जाने के बाद तुंग के पेड़ लगभग 30 सालों तक लाभ दे सकते हैं।” खेती का विस्तार करके, पेड़ों के आवरण को बढ़ाकर कार्बन फुटप्रिंट कम करने में भी मदद मिल सकती है।
प्रमुख वनस्पति तेलों की तुलना में तुंग के तेल का वैश्विक बाजार बहुत छोटा है, लेकिन यह लगातार बढ़ रहा है। बाजार अनुसंधान स्रोतों के अनुसार, 2025 में इसका वैश्विक बाजार लगभग $223 मिलियन का था और 2034 तक इसके बढ़कर लगभग $283 मिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है।
आरजेड फाउंडेशन के जनरल मैनेजर लालमाचुआना ने बताया, “मेरे पिता, पुऊ रुअलजाखुमा ने 1994 में एक प्रोसेसिंग प्लांट शुरू किया था। हालांकि, उस समय कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश या मार्केटिंग में कोई मदद उपलब्ध नहीं थी। हमारे परिवार के पास लगभग 30 हेक्टेयर जमीन पर बागान थे। हालांकि, यह बड़ी कोशिश बाद में असफल हो गई, फिर भी हम हर साल किसानों से जितने भी बीज मिल पाते थे, उनका इस्तेमाल करके तुंग का तेल निकालते रहे।” आरजेड फाउंडेशन सेरछिप में स्थित मिजोरम का एकमात्र तुंग के तेल का प्रोसेसिंग प्लांट है। भारत में तुंग के तल की प्रोसेसिंग के लिए खास मशीनें उपलब्ध नहीं होने से, वे पारंपरिक सीड ऑयल एक्सपेलर का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें तुंग का तेल निकालने के लिए थोड़ा-बहुत बदला गया है।
रुअलजाखुमा ने आगे कहा, “तुंग का एक किलो तेल बनाने के लिए, हमें गुणवत्ता के आधार पर लगभग छह से सात किलो बीज चाहिए। हमारा संयंत्र हर रोज 20-30 क्विंटल बीजों को प्रोसेस कर सकता है। हाल के सालों में, हमने सालाना लगभग 5,000-6,000 किलो तेल राज्य के बाहर की कंपनियों को ₹350-400 प्रति किलो की दर से बेचा है। साथ ही, बचे हुए तेल का केक खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।”
हालांकि, 1990 के दशक में लगाए गए पेड़ अब पुराने हो रहे हैं और उनसे उपज कम हो गई है। चूंकि, 2022 में हमें एक बेहतर बाजार मिला, इसलिए आरजेड फाउंडेशन ने पूरे राज्य में नए पेड़ लगाने को बढ़ावा देने के लिए पंचवर्षीय परियोजना (2022-2026) शुरू की; जिसे 2024 से कृषि विभाग का भी समर्थन मिल रहा है।
लालमचुआना ने बताया कि 2022 से, पूरे राज्य के लगभग 250 गांवों के करीब 3,000 परिवारों ने तुंग की खेती शुरू की है और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। फाउंडेशन ने अपने पिछले अनुभव और शोध के आधार पर वृक्षारोपण के लिए दिशा-निर्देश तैयार किए हैं और रोपाई के लिए बीज ₹200 प्रति किलोग्राम की दर से उपलब्ध करा रहा है। इन नए पौधों से फसल की कटाई नवंबर-दिसंबर 2026 के आसपास शुरू होने की उम्मीद है।
“हम बड़े उपकरण खरीदने की योजना बना रहे हैं, जिससे हमारी क्षमता बढ़कर कम से कम प्रतिदिन 100 क्विंटल हो सके। हालांकि, भारत में अभी भी तुंग के तेल की प्रोसेसिंग के लिए कोई खास मशीनरी उपलब्ध नहीं है, इसलिए हमें अपनी जरूरतों के हिसाब से इन उपकरणों में बदलाव करने होंगे,” लालमचुआना ने कहा।

विदेशी प्रजातियों को बढ़ावा देने के खतरे
आरजेड फाउंडेशन द्वारा प्रस्तुत तुंग खेती की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि मिजोरम के नाजुक पहाड़ी भूभाग और भूमि के मौजूदा इस्तेमाल के तरीकों को देखते हुए, अगर सावधानीपूर्वक योजना नहीं बनाई गई तो बड़े पैमाने पर तुंग के बागान पारिस्थितिकी पर दबाव बढ़ा सकते हैं। इसमें स्थानीय जैव-विविधता पर संभावित दुष्प्रभाव और इस प्रजाति के आक्रामक बनने का जोखिम भी शामिल है। रिपोर्ट में यह भी जोर दिया गया है कि पर्यावरण से जुड़ी सुरक्षा के साथ-साथ लंबी अवधि की आजीविका पक्की करने के लिए टिकाऊ बागान प्रबंधन जरूरी है। इसके लिए उचित जगह का चयन, मिट्टी और ढलान की सुरक्षा, अंतरफसली खेती (इंटरक्रॉपिंग) और समुदाय की सक्रिय भागीदारी को जरूरी बताया गया है।
ग्रीन कमांडोज फोरम के संस्थापक और एफएओ इंडिया के ग्रीन-एग प्रोजेक्ट में कृषि विस्तार के जानकार समीर बोरदोलोई कहते हैं, “मिजोरम की ढलानें कटाव के प्रति संवेदनशील हैं, जहां मुली बांस बहुतायत में है, लेकिन पर्याप्त ‘मातृ वृक्षों’ और देसी वनस्पतियों की विविधता भी अपर्याप्त है। झूम खेती के छोटे-छोटे परती चक्रों ने प्राकृतिक पुनर्जनन को कमजोर कर दिया है।” वे आगे कहते हैं, “आर्थिक सुरक्षा के लिए झूम खेती को गैर-स्थानीय प्रजातियों से बड़े पैमाने पर एकल बागानों से बदलना समाधान नहीं है। हम पहले ही ऑयल पाम से होने वाले पारिस्थितिकी नुकसान को देख चुके हैं। ऐसे मॉडल मिट्टी को और खराब करते हैं और नाजुक पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र को अस्थिर बनाते हैं।”
इसके बजाय वह FAO-समर्थित ‘मिजोरम स्लोपिंग एग्रीकल्चर लैंड टेक्नोलॉजी’ (MiSALT) की ओर इशारा करते हैं। यह टेक्नोलॉजी, ढलानों पर पानी के बहाव को धीमा करने के लिए आधे जले हुए लट्ठों और फसल के अवशेष बिछाने की स्थानीय ‘चांगखाम’ तरीके को, ‘स्लोपिंग एग्रीकल्चर लैंड टेक्नोलॉजी’ (SALT) के साथ जोड़ती है; SALT में, मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए जमीन की बनावट के हिसाब से नाइट्रोजन-फिक्सिंग पेड़ लगाए जाते हैं। यह मॉडल ‘बहुत महत्वपूर्ण पौधों’ (VIPs) को भी बढ़ावा देता है, जो भोजन और चारे के लिए इस्तेमाल होने वाली स्थानीय प्रजातियां हैं।
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उनकी दलील है, “मिज़ोरम का भविष्य कृषि वानिकी-आधारित एकीकृत खेती में है, जो एग्रोइकोलॉजिकल तरीकों और स्थानीय बारहमासी फसलों पर आधारित है; ये फसलें भोजन, दवा, चारा और बायोमास देती हैं। मिट्टी को बांध कर रखने और उसे फिर से बनाने के लिए आच्छादन वाले पेड़ बहुत जरूरी हैं। इस तरह का विविधीकरण कृषि-जैव विविधता को मजबूत कर सकता है और जंगलों पर पड़ने वाले दबाव को कम कर सकता है, जिससे पहाड़ी कृषि आर्थिक और पारिस्थितिकी दोनों ही तरीकों से बनी रह सकेगी।”
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (गुवाहाटी परिसर) के सामाजिक विज्ञान और मानविकी स्कूल में सहायक प्रोफेसर और एसोसिएट डीन अभिनंदन सैकिया भी चेतावनी देते हैं कि किसी प्रजाति को फिलहाल गैर-आक्रामक माना जाना यह पक्का नहीं करता कि वह भविष्य में आक्रामक व्यवहार नहीं करेगी। उन्होंने कहा, “जैविक आक्रमण आमतौर पर ‘बाद वाली’ प्रक्रिया होती हैं; इनके पारिस्थितिकी दुष्प्रभाव कई दशकों बाद ही स्पष्ट होते हैं। तब तक यह प्रजाति स्थानीय वनस्पतियों और जीवों, यहां तक कि मिट्टी के सूक्ष्मजीवों के साथ जटिल पोषण (ट्रॉफिक) और सहजीवी संबंध स्थापित कर चुकी होती है। उस अवस्था में इसे हटाने की कोशिश द्वितीयक पारिस्थितिक व्यवधान पैदा कर सकती हैं, जो कभी-कभी खुद उस प्रजाति से भी अधिक नुकसानदायक हो सकते हैं।”
सैकिया सुझाव देते हैं कि किसी प्रजाति को लाने या उसे फिर से लगाने का काम नियंत्रित परिस्थितियों में, एक पायलट स्तर पर किया जाना चाहिए। उनका निष्कर्ष है, “यह काम सख्त पारिस्थितिकी मूल्यांकन के साथ धीरे-धीरे और चुनिंदा तरीके से किया जाना चाहिए, ताकि अनिश्चितता और अनचाहे नतीजों को कम किया जा सके।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 5 मार्च, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: सैतुअल जिला तुंग उत्पादक संघ में रखे गए तुंग के बीजों से भरे हुए बोरे। इन्हें जल्द ही सेरछिप जिले में स्थित प्रोसेसिंग प्लांट में भेजा जाएगा। तस्वीर: रॉबर्ट लालनुनतलुआंगा।