- मौजूदा चुनाव प्रचार के दौरान चाय बागानों की बातें उत्पादन और मेहनताने तक सीमित दिखाई देती हैं। ऐसे में इस क्षेत्र के भूमि उपयोग में बदलाव का मुद्दा अछूता रह जाता है।
- पश्चिम बंगाल सरकार ने 2019 में बनाई गई नीति के अंतर्गत चाय बागान की 15% ज़मीन दूसरे उद्देश्यों के लिए देने का प्रावधान किया था। साल 2025 में इस सीमा को 30% तक बढ़ा दिया गया है।
- जानकारों का कहना है कि नीति में इंगित पर्यावरणीय नियमों का पालन नहीं होता है और ऐसे व्यवसायों को बढ़ाने के लिए हरे-भरे बागानों को उजाड़ा जा रहा है।
पश्चिम बंगाल में इन दिनों चुनावी सरगर्मियां तेज हैं। इस दौरान राज्य के उत्तरी हिस्से में युवाओं की एक टोली गांव-कस्बे घूम रही है। आमतौर पर राजनैतिक पार्टियों के उम्मीदवार मतदाताओं को अपने चुनावी घोषणापत्र देते हैं, लेकिन उसके ठीक उलट युवाओं की यह टीम अलग-अलग पार्टियों के उम्मीदवारों से मुलाकात कर उन्हें अपना चुनावी एजेंडा या मांगपत्र सौंप रही है।
इस टोली के सदस्य चाय बागान कर्मियों के परिवारों से हैं और एक गैर-राजनीतिक चाय मजदूर संगठन पश्चिम बंग चा मजूर समिति (पीबीसीएमएस) से जुड़े हैं। यह टीम चाय बागान कर्मियों के साथ बैठक कर उन्हें उनके वोट के महत्व, अधिकार और मांगों को लेकर भी जागरूक करती है। इनकी कोशिशें वोट के लिए चाय बागान घूमते, पत्ते तोड़ते और चाय मजदूरों से हमदर्दी जताते नेताओं से अलग हैं।
राज्य में 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में 294 विधानसभा सीटों के लिए मतदान होना है। पहले चरण में 152 सीटों पर वोट डाला जाना है, जिसमें उत्तर बंगाल की 54 सीटें शामिल हैं। उत्तर बंगाल का यह इलाका तीन क्षेत्रों में बंटा है, जिसमें पहाड़ (दार्जिंलिंग, कल्मिपोंग), तराई (सिलीगुड़ी, जलपाईगुड़ी, उत्तर दिनाजपुर का हिस्सा) और डुअर्स (अलीपुरद्वार व कूचबिहार) शामिल हैं। इनमें से अधिकतर इलाका चाय बागान पर आश्रित समुदायों के प्रभाव वाला है। उत्तर बंगाल की 10 सीटें पूरी तरह से चाय बागान वाले इलाकों में ही हैं और इनमें से सात सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं।
मौजूदा चुनाव प्रचार के दौरान पश्चिम बंगाल के चाय बागानों और मजदूरों को लेकर बातें चाय के उत्पादन और मजदूरों के मेहनताने तक ही सीमित दिखाई देती हैं। ऐसे में इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी, पर्यावरण और जनसांख्यिकी को निकट भविष्य में बदल देने वाला एक बहुत बड़ा मुद्दा, भूमि उपयोग में बदलाव अछूता रह जाता है।

बदलता भूमि उपयोग
सिलीगुड़ी शहर से करीब 22 किमी दूर सिलीगुड़ी-कोलकाता हाइवे पर स्थित घोषपुकुर चौराहे के सामने कमला चाय बागान के एक बड़े हिस्से में एक निजी अस्पताल का निर्माण किया जा रहा है। कुछ ऐसी ही हालत इस इलाके के अन्य चाय बागानों की भी है जहां की ज़मीनों का इस्तेमाल टाउनशिप, रिसॉर्ट, और कई अन्य उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है या उसकी तैयारी है।
सिलीगुड़ी के बागडोगरा एयरपोर्ट से पांच किलोमीटर दूर हंसकुआं चाय बागान की 120 बीघा या 39.669 एकड़ जमीन (फुटबॉल के करीब 30 मैदानों के बराबर) पर एक आधुनिक टाउनशिप विकसित किया गया है। टाउनशिप के मैनेजर वीरेंद्र राय के अनुसार करीब पांच-छह साल पहले इस बागान की ज़मीन पर प्लॉट काटे गए और अब सभी प्लॉट बिक चुके हैं। उन्होंने बताया, उन्होंने बताया कि पिछले पांच-छह सालों में यहां की ज़मीन की कीमतों में करीब तीन गुना का उछाल आया है।
पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने 2019 में जारी की गई ‘चाय पर्यटन व संबद्ध व्यवसाय नीति’ के अंतर्गत चाय बागान की 15% या अधिकतम 150 एकड़ ज़मीन टी-टूरिज्म व एलाइड बिजनेस (चाय पर्यटन व संबद्ध व्यवसाय) के लिए देने का प्रावधान किया। राज्य सरकार ने 7 फरवरी 2025 को एक अधिसूचना जारी कर इस नीति में संशोधन करते हुए 15% की सीमा को 30% कर दिया। हालाँकि, ऐसे व्यवसाय के लिए दी जा सकने वाली जमीन की अधिकतम सीमा 150 एकड़ तक ही सीमित राखी गई है।

सिलीगुड़ी व उसके आसपास के चाय बागानों में आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए सक्रिय संगठन यूनाइटेड फोरम फॉर आदिवासी राइट्स (UFAR) के अध्यक्ष राजकुमार कश्यप मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं, “2019 से पहले ऐसे कार्याें के लिए बागान की अधिकतम तीन प्रतिशत जमीन वह भी सिर्फ गैर प्लांटेंशन वाला व अनुपयोगी भूमि के उपयोग का प्रावधान था।” एक दशक के अंदर इसमें 10 गुना की वृद्धि हो गई है।
कश्यप कहते हैं, “यहां के आदिवासी चाय के पत्ते को तोड़ना छोड़ कोई और काम नहीं जानते हैं, ऐसे में बागानों की जमीन का हस्तांतरण और उसका व्यावसायिक उपयोग उनके हितों पर हमला है।”
श्रमिक संगठन सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन (सीटू) समर्थित दार्जिंलिंग जिला चिया कमान मजदूर यूनियन के अध्यक्ष व सीपीएम के पूर्व राज्यसभा सदस्य समन पाठक कहते हैं, “हम बागान की जमीन का 30 प्रतिशत उद्योग जगत को देने की नीति का पूरी तरह से विरोध करते हैं, पश्चिम बंगाल में एक मोटा अनुमान है कि एक एकड़ भूमि पर एक मजदूर आजीविका के लिए निर्भर है और अगर आप किसी बागान की 100 एकड़ जमीन अन्य कार्य के लिए स्थानांतरित कर देते हैं तो आप 100 चाय मजदूरों की हकमारी कर रहे हैं।”
राज्य की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के श्रमिक संगठन इंडियन नेशनल तृणमूल ट्रेड यूनियन कांग्रेस के दार्जिलिंग जिले के अध्यक्ष निर्जल डे ने मोंगाबे-हिंदी से बातचीत में कहा, “नियम के तहत सिर्फ वैसी जमीन का स्थानांतरण हो सकता है जिसमें बागान नहीं लगे हों और वह अनुपयोगी हो, ऐसे में चाय बागान प्रबंधन जानबूझ कर भूमि के स्वरूप में बदलाव करता है, जैसे चाय के पौधों (टी बुश) को उखाड़ देना या नए बुश नहीं लगाना।” वे कहते हैं, “ऐसा वैसी जगहों पर अधिक किया जाता है, जहां की जमीन की कीमत काफी अधिक होती है।”

जमीन के मालिकाना हक़ की मांग
घोषपुकुर चौराहे पर 45-वर्षीय जीतवाहन बड़ाईक चाय की दुकान चलाते हैं। उनके पूर्वज करीब 170 साल पहले वर्तमान के झारखंड राज्य में पड़ने वाले छोटानागपुर के खूंटी जिले से चाय की खेती के लिए अंग्रेजों द्वारा लाकर बसाए गए थे। उनके माता-पिता कमला चाय बागान में काम करते थे और उनके जाने के बाद जीतवाहन के तीन छोटे भाइयों में से एक को बागान में ही स्थाई काम मिला जबकि बाकी दो भाई अस्थायी श्रमिक के रूप में काम करते हैं। पूरा परिवार बागान में मिले एक क्वार्टर में एक साथ रहता है।
“हमारी स्थिति गिरिमिटिया मजदूरों जैसी है। हम अपने पुरखों की जमीन से भी उखड़ गए और चाय बागान की जमीन को सजाते-संवारते हुए पीढियां गुजर जाने के बाद भी यहां हमें जमीन का मालिकाना हक नहीं दिया गया,” जीतवाहन बताते हैं।
टी बोर्ड के 2015 के एक सर्वे के अनुसार, पश्चिम बंगाल में 3.37 लाख (2.41 लाख स्थायी और 96 हजार अस्थायी) कर्मचारी काम करते हैं। हालांकि चाय बागान से जुड़े कई जानकार मोटे तौर पर यह संख्या पांच लाख तक होने का दावा करते हैं। टी बोर्ड के वर्ष 2025 के आंकड़े के अनुसार, पश्चिम बंगाल में बड़े-छोटे कुल 40,103 चाय बागान हैं जो 139762 हेक्टेयर (3 लाख 45 हज़ार एकड़ से ज़्यादा) के क्षेत्र में फैले हैं। यह क्षेत्र बेंगलुरु महानगर का करीब दो गुना है। असम के बाद देश में चाय बागान का यह दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्रफल है।
चाय बागान कर्मियों को भूमि का स्वामित्व देने व बागान की जमीन का अन्य कार्याें में उपयोग रोकने जैसे प्रमुख मुद्दे को लेकर बागडोगरा के सिंघियाझोरा चाय बागान के निवासी अमित कुमार लकड़ा फांसीदेवा विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे हैं।

अमित कहते हैं, “हमारा सबसे बड़ा मुद्दा हमें निजी भूमि स्वामित्व देना और बागान की 30 प्रतिशत जमीन का अन्य कार्याें के लिए उपयोग रोकना है, इस जमीन को हमने जंगल साफ बसाया है, व्यापारियों ने न इसे साफ किया है, न यहां हल चलाया है, वे अब सिर्फ मुनाफा कमाने यहां आ रहे हैं। वे कहते हैं, “पश्चिम बंगाल में कांग्रेस, सीपीएम, टीएमसी तीनों पार्टियां सरकार में रही लेकिन किसी ने हमें भूमि अधिकार नहीं दिया। भूमि के अलावा हमारा अन्य प्रमुख मुद्दा मजदूरी में सुधार, गैर आदिवासियों द्वारा अनुसूचित जनजाति का नकली सर्टिफिकेट बनवा कर नौकरी व अन्य सुविधाओं का लाभ लेना व परीक्षाओं में बांग्ला-नेपाली के साथ हिंदी को भी व्यापक मान्यता देने की मांग शामिल है।”
पर्यावरण और पारिस्थिकी पर प्रभाव
चाय पर्यटन व संबद्ध व्यवसाय नीति के अनुसार अनुमति प्राप्त भूमि क्षेत्र के अधिकतम 40% क्षेत्र का उपयोग निर्माण कार्याें के लिए किया जा सकता है। नीति में पर्यावरण व पारिस्थितिकी सुरक्षा को महत्व देते हुए चाय पर्यटन, बागान, पशुपालन, जलविद्युत, गैर पारंपरिक ऊर्जा संसाधन, सामाजिक बुनियादी ढांचा और सेवाएं जैसे व्यवसायों को सूचीबद्ध किया गया है। ऐसी सभी परियोजनाओं को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पर्यावरणीय मानदंडों और नियमों का पालन करते हुए तथा जहां आवश्यकता हो वन विभाग के संरक्षित क्षेत्र के पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र से संबंधित नियमों के अनुसार क्रियान्वित किए जाने का प्रावधान है।
हालाँकि, यूनाइटेड फोरम फॉर आदिवासी राइट्स के कश्यप का कहना है कि इन नियमों का पालन नहीं होता है और ऐसे व्यवसायों को बढ़ाने के लिए हरे-भरे बागानों को उजाड़ा जा रहा है।
दार्जिलिंग के प्रमुख पर्यावरण कार्यकर्ता एवं फेडरेशन ऑफ सोसाइटीज फॉर इनवॉयरमेंटल प्रोटेक्शन (FOSEP) के सचिव भारत प्रकाश राय ने मोंगाबे हिंदी से बातचीत में कहा, “चाय बागानों की ज़मीन के 30% भाग के अन्य कार्याें के लिए उपयोग की अनुमति देने का फैसला उत्तर बंगाल की नाजुक पारिस्थितिकी के मद्देनजर ठीक नहीं है। टी गार्डन में व उसके आसपास जो जंगल हैं, वे इकोलॉजिक बैलेंस (पारिस्थितिकी संतुलन) बनाए रखने में महत्वपूर्ण हैं, अगर आप बागान की जमीन पर फाइव स्टार होटल व रिसॉर्ट बनाएंगे तो आपको चौड़े रास्ते व अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर चाहिए जिससे उन जंगलों को भी नुकसान होगा।”

वे इस बात को समझाते हुए कहते हैं, “चाय बागानों में टी बुश के बीच पेड़ होते हैं, आसपास भी पेड़ होते हैं, वे वहां नमी को बनाए रखने व तापमान में बैलेंस बनाए रखने में मददगार होते हैं, उससे न अधिक गर्मी पड़ती है और न अधिक ठंड। वे पानी को सोख कर छोटे-छोटे स्ट्रीम (धारा) तैयार करते हैं, जो पहाड़ व ऊंचाई वाले हिस्से से नीचे की ओर जाते हैं। ये मनुष्य, पशु, पक्षी सभी के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बागान की जमीन मे दूसरी गतिविधियां होने से यह संतुलन बिगड़ जाएगा।”
वे चिंता जताते हुए कहते हैं, दार्जिलिंग की चाय काफी उम्दा होती है और उसे जीआई टैग भी मिला, लेकिन अब मौसमी बदलाव व दूसरी वजहों से उसका फ्लेवर बदल रहा है, ऐसी गतिविधियां उस खतरे को और बढाएंगी। पॉलिसी में पर्यावरणीय व पारिस्थितिकी मानदंडों का ख्याल रखने की शर्त से जुड़े सवाल पर राय कहते हैं, “यह सिर्फ पेपर वर्क है, कोई कारोबारी जब बागान की जमीन लेगा तो उसका उद्देश्य सिर्फ मुनाफा कमाना होगा।”
बैनर तस्वीर- पश्चिम बंग चा मजूर समिति (पीबीसीएमएस) से जुड़े कार्यकर्ता चाय बागान श्रमिकों के साथ बैठक कर उन्हें वोट के महत्व, अधिकारों और अपनी मांगों के प्रति जागरूक करते हुए। तस्वीर- पीबीसीएमएस के माध्यम से