- एक नए अध्ययन से पता चला है कि भारत के तटीय इलाकों में उमस भरी गर्मी तेजी से बढ़ रही है, जो इसे सहन करने की सीमाओं को पार कर रही है।
- मछुआरों का कहना है कि उनके काम के घंटे कम होते जा रहे हैं, क्योंकि ऐसी गर्मी में काम करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है।
- गर्म होता समुद्र जोखिम बढ़ा रहा है, जिसके लिए तत्काल पूर्वानुमान और अनुकूलन की जरूरत बढ़ गई है।
अरब सागर पर सूरज के चमकने से पहले ही मछुआरे मारियानी मियेलपिल्लई (73) अपनी कट्टमराम नाव को वापस घर की ओर मोड़ चुके होते हैं। उन्हें गर्म सुबह से बचना होता है, जो इतनी ज्यादा गर्म और उमस भरी हो जाती है कि उनके लिए इसे सहन करना मुश्किल हो जाता है।
तिरुअनंतपुरम और कन्याकुमारी जिलों की सीमा के पास अकेले मछली पकड़ते हुए, उनके काम के दिन अब सहनशक्ति की परीक्षा बन गए हैं। उन्हें नाव को अपनी पूरी ताकत से आगे बढ़ाना पड़ता है, जिससे पहले से ही मुश्किल-भरी गर्मी में चुनौती और भी बढ़ जाती है। उन्होंने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “मैं सुबह 5 बजे मछली पकड़ने जाता हूं, लेकिन 8 बजे तक वापस आ जाता हूं, चाहे मुझे पर्याप्त मछली मिले या नहीं। मैं इस गर्मी को सहन नहीं कर पा रहा हूं।”
जैसे ही सूरज कर्क रेखा को पार करता है, गर्मियों शुरू हो जाती हैं। मियेलपिल्लई जैसे अनुभवी मछुआरों को अपनी त्वचा और सांस में अजीब-सा भारीपन महसूस होने लगता है। 54 साल की मछुआरन टर्सिला थ्रेस्या के साथ भी यही हो रहा है। “मैं सड़क किनारे मछली बेचने के लिए सुबह-सुबह निकल जाती हूं। मैं शाम 5:30 या 6 बजे तक लौट आती हूं। पहले तो ठीक था, लेकिन अब गर्मी बहुत ज़्यादा बढ़ गई है। कभी-कभी मैं अपने सिर पर तौलिया रख लेती हूं, लेकिन उससे भी फायदा नहीं होता।”
तेज होती उमस भरी गर्मी
बार-बार और अधिक तेज चलने वाली लू के बीच, दक्षिण-पश्चिमी तट एक और शांत, लेकिन खतरनाक बदलाव का सामना कर रहा है। यह है बढ़ती हुई उमस भरी गर्मी। हवा इतनी ज्यादा नमी से भरी होती है कि पसीना अब शरीर को ठंडा नहीं कर पाता। अध्ययनों से पता चलता है कि उष्णकटिबंधीय तटों पर खासकर मॉनसून से ठीक पहले, यह स्थिति खतरनाक स्तर के करीब पहुंच रही है। मानव शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए संघर्ष कर रहा है और अनुकूलन की अपनी क्षमता तक लगभग पहुंच जाता है।
अपने देश की बात करें, तो भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के वैज्ञानिकों की अगुवाई में किए गए एक नए लंबी अवधि के अध्ययन से पता चलता है कि 1981 के बाद से भारत के तटों पर लू गर्मी से जुड़ी दिक्कतें (हीट स्ट्रेस) बहुत बढ़ गई हैं, जिसकी मुख्य वजह तापमान और नमी में एक साथ होने वाली बढ़ोतरी है।
साल 1981 से 2020 तक के डेटा का विश्लेषण करते हुए आईएमडी पुणे की वैज्ञानिक पी. रोहिणी और उनके साथियों ने दिखाया है कि वेट-बल्ब तापमान (नमी के साथ तापमान का माप) सभी मौसमों में बढ़ा है। यह जोखिम असमान रूप से फैल रहा है और इस पर देश के नमीयुक्त तटीय क्षेत्रों में अब भी काफी हद तक कम काम हुआ है।

रुझान पूरी तरह स्पष्ट है। लगातार गर्म और ज्यादा नमी वाली हवा बढ़ रही है। आईएमडी के अध्ययन से पता चलता है कि बहुत अधिक गर्मी और नमी से जुड़ी घटनाएं और तेज हो गई हैं। ऐसा नई सदी की शुरुआत से हुआ से। जैसे-जैसे जलवायु गर्म होती है, वातावरण में अधिक नमी जमा हो जाती है, जिससे गर्मी से जुड़ी दिक्कतें बढ़ जाती है। आईएमडी के अध्ययन के मुताबिक, यह असर पूर्वी तट पर ज्यादा स्पष्ट दिखता है, जहां हर एक डिग्री तापमान बढ़ने के साथ नमी पश्चिमी तट की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रही है।
बेंगलुरु स्थित एट्रिया विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के पूर्व सचिव राजीव माधवन नायर ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि हाल के दशकों में गर्मी से जुड़ी दिक्कतों में “स्पष्ट और चिंताजनक बढ़ोतरी” हुई है। नायर ने आईएमडी के इस अध्ययन को सह-लेखक के तौर पर लिखा और इसकी निगरानी की है।
उन्होंने बताया कि आईएमडी के अध्ययन से पता चलता है कि गर्मी से जुड़ी दिक्कतें बार-बार हो रही हैं और इनकी अवधि भी काफी बढ़ गई है। इससे अधिकतम और न्यूनतम दोनों तरह के तापमान में जबरदस्त बढ़ोतरी का भी पता चलता है। साथ ही, भीड़भाड़ वाले तटीय इलाकों में गर्मी से होने वाली असुविधा भी बढ़ी है। उन्होंने कहा, “इसका असर लोगों की सेहत, श्रमिकों की उत्पादकता और शहरी नियोजन पर पड़ेगा।”
उन्होंने आगे कहा, “इन नतीजों के बाद ये चीजें तत्काल करना जरूरी है: तटीय सूक्ष्म-जलवायु के अनुरूप तैयार किए गए ‘हीट ऐक्शन प्लान’; जलवायु के हिसाब से शहरों का डिजाइन; ‘समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणाली’ और बढ़ती गर्मी के हिसाब से श्रम नीतियां।”
पसीने वाली गर्मी को मापना
वैज्ञानिक पसीने वाली गर्मी को मापने के लिए वेट-बल्ब तापमान (WBT) का इस्तेमाल करते हैं। यह ऐसा माप है जो गर्मी और नमी दोनों को मिलाकर दिखाता है, जबकि ज्यादा परिचित ड्राई-बल्ब तापमान (DBT) सिर्फ हवा का तापमान मापता है। केरल विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान विभाग में सहायक प्रोफेसर पी विजयकुमार बताते हैं कि लकड़ी के सफेद बक्से के अंदर रखे गए थर्मामीटर WBT और DBT को मापते हैं। वेट-बल्ब थर्मामीटर में एक गीली बत्ती (wick) होती है; जब पानी वाष्पित होता है, तो यह बल्ब से गुप्त ऊष्मा खींचता है, जिससे तापमान की रीडिंग कम हो जाती है। उन्होंने यह भी समझाया कि चूंकि, आस-पास की नमी ही पानी के भाप बनने की दर तय करती है, इसलिए नमी का स्तर अधिक होने पर ठंडक कम होती है।”
विजयकुमार ने आगे कहा, “थ्योरी कहती है कि वैश्विक तापमान में हर 1° सेल्सियस की बढ़ोतरी से वायुमंडल में नमी को बनाए रखने की क्षमता में लगभग 7% की बढ़ोतरी होती है।” इसका मतलब है कि नमी और गर्मी दोनों का बोझ एक साथ बढ़ जाता है।
उन्होंने कहा, “हालांकि स्टेशनों का असमान वितरण और दोनों तटों के बीच भौगोलिक अंतर सीधे तौर पर तट से तट के बीच की तुलना की विश्वसनीयता को सीमित करते हैं, फिर भी आईएमडी के इस अध्ययन में कुछ मुख्य रुझानों की पहचान की गई है। समुद्र की सतह का तापमान और नमी का प्रवाह जैसे री-एनालिसिस डेटा को शामिल करके, यह अध्ययन दशकों में WBT में आए बदलावों का पता लगाता है।”
चार दशकों 1981–2000 और 2001–2020 और इन दो अवधियों में रोज़ाना के ऑब्जर्वेशन पर आधारित अध्ययनों की दुर्लभता इन नतीजों में नएपन के बारे में बताती है; ये नतीजे भविष्य की तटीय लू की स्थितियों को समझने के लिए बहुत जरूरी हैं।

सेहत पर असर
वैज्ञानिकों का कहना है कि उमस भरी गर्मी के स्वास्थ्य, सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरण के स्तर पर गंभीर दुष्प्रभाव होते हैं। विजयकुमार ने बताया, “WBT का स्तर, गर्मी से होने वाली थकावट और लू के लिए अहम कारक है; ये नतीजे मानव स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए बहुत ज्यादा अहम हैं।”
बहुत ज़्यादा गर्मी सिर्फ असहज ही नहीं करती है, बल्कि यह खतरनाक भी होती है। शोध से पता चलता है कि जब गर्मी के साथ-साथ नमी भी अधिक हो, तब गर्मी और भी ज्यादा खतरनाक हो जाती है। ऐसी स्थितियों में, इंसान के शरीर को अपना तापमान नियंत्रित करने में काफी मुश्किल होती है। आम तौर पर, पसीना शरीर को ठंडा रखने में मदद करता है, लेकिन जब हवा में पहले से ही नमी से भरी होती है, तो यह प्रक्रिया काम नहीं करती।
यह इंसानों की सेहत पर हल्की लू से लेकर जानलेवा लू तक कई तरह से असर डालता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जैसे-जैसे लू का चलना बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे इससे जुड़े खतरे भी बढ़ रहे हैं; खास तौर पर उन लोगों के लिए, जिनके पास रहने की जगह नहीं है, स्वास्थ्य सेवाओं या ठंडक पहुंचाने वाले साधन बहुत कम हैं।
आर्द्रता एक अहम भूमिका निभाती है। जैसे-जैसे हवा में नमी बढ़ती है, वाष्पीकरण के जरिए शरीर की खुद को ठंडा करने की क्षमता कम हो जाती है; जिससे सामान्य तापमान भी असहनीय और कभी-कभी खतरनाक, यहाँ तक कि जानलेवा भी लगने लगता है।
नमी की भूमिका अहम होती है। जैसे-जैसे हवा में नमी बढ़ती है, वाष्पीकरण के जरिए शरीर को खुद से ठंडा करने की क्षमता कम हो जाती है; जिससे सामान्य तापमान भी असहनीय और कभी-कभी खतरनाक और जानलेवा महसूस होने लगने लगता है।
दुनिया भर में मौसम की वजह से होने वाली मौत का मुख्य कारण ‘गर्मी से जुड़ी दिक्कतें’ हैं। इससे पहले से ही मौजूद स्वास्थ्य समस्याएं यानी हृदय रोग और मानसिक स्वास्थ्य और भी बदतर हो सकते हैं। साथ ही, कमजोर समूहों खास तौर पर बुजुर्गों, पहले से बीमार लोगों और बाहर काम करने वाले लोगों पर दबाव कई गुणा बढ़ा सकता है।
शारीरिक अध्ययनों में चेतावनी दी गई है कि बढ़ते तापमान और बढ़ती नमी मिलकर मानव सहनशीलता को खतरनाक सीमाओं से पार ले जा रही हैं। जैसा कि 60 साल के मछुआरे सिमोन सुरिंजु बताते हैं जो विझिंजम बंदरगाह से सुबह चार बजे अपनी कट्टमराम नाव लेकर निकलते हैं और अच्छे दिनों में दक्षिण की ओर थेंगापट्टिनम तक जाते हैं। यह काम उनकी सहनशक्ति की कड़ी परीक्षा लेता है। “कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे मेरी त्वचा जल रही हो। मेरा शरीर लगातार पसीने से भीगा रहता है। मैं अपने ऊपर पानी डालता हूं और तेजी से नाव चलाता हूं। अक्सर मुझे चक्कर आते हैं।” अब वे 10 बजे से पहले लौट आने का ध्यान रखते हैं। “मैं अपने सिर और शरीर पर पानी डालता हूं। इससे थोड़ी देर राहत मिलती है, फिर मैं और तेजी से नाव चलाने लगता हूं।”
हाल के शोध से पता चलता है कि 35°सेल्सियस WBT की जिस ‘सर्वाइवेबिलिटी थ्रेशोल्ड’ (जीवित रहने की ताकत) का अक्सर जिक्र किया जाता है, वह भी शायद इस बात को बढ़ा-चढ़ाकर बताती हो कि शरीर कितना सहन कर सकता है। ऐसा खासकर बुज़ुर्गों और उन लोगों के लिए मायने रखता है जो सीधी धूप में रहते हैं या लगातार शारीरिक श्रम करते हैं। लेकिन इसके असर एक जैसे नहीं होते और इसमें उम्र, सेहत, शारीरिक तंदरुस्ती और व्यवहार का बड़ा योगदान होता है। ये सभी मिलकर तय करते हैं कि कोई व्यक्ति गर्मी को कैसे महसूस करता है और उससे कैसे बच पाता है।

जलवायु में बदलाव
इन रुझानों के पीछे व्यापक जलवायु परिवर्तन छिपा हुआ है। हिंद महासागर गर्म हो रहा है, जिससे वायुमंडल में अधिक नमी पहुँच रही है और तटीय क्षेत्रों में गर्म व पसीने वाली परिस्थितियां बनी रह रही हैं। जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, हवा में पानी की मात्रा बढ़ जाती है। इसका नतीजा ना सिर्फ ज्यादा गर्म दिन हैं, बल्कि अलग तरह की गर्मी है जो लंबे समय तक बनी रहती है, हर चीज को नमी से भर देती है और इसका दबाव भीतर तक महसूस होता है।
अब अध्ययन बताते हैं कि बहुत ज्यादा पसीने वाली गर्मी दुनिया भर में तेजी से बढ़ रही है। कुछ स्थानों पर तो यह इंसान के जीवित रहने की सीमाओं के करीब पहुंच रही है या उन्हें पार भी कर रही है। मछुआरे, मजदूर, और ठेले वाले जैसे बाहर काम करने वाले लोगों और बुज़ुर्गों के लिए इसके खतरे तुरंत और शारीरिक रूप से गंभीर हैं।
लैसेट काउंटडाउन की रिसर्च से पता चलता है कि गर्मी के संपर्क में आने से काम करने की क्षमता सीमित हो जाती है और सेहत पर बुरा असर पड़ता है। 2022 में, भारत को गर्मी के कारण अनुमानित 191 अरब संभावित काम के घंटों का नुकसान हुआ, जो आधार वर्ष 1991–2000 की तुलना में 54% की बढ़ोतरी है। इसका मतलब है कि देश को संभावित रूप से अनुमानित $219 अरब का नुकसान हुआ, जो जीडीपी का 6.3% है।
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एक अन्य अध्ययन के अनुसार, इस सदी के आखिर तक बढ़ती गर्मी से जुड़ी दिक्कतों के कारण भारत में काम की उत्पादकता में 30-40% तक की गिरावट आ सकती है। ऐसे में, उन लोगों की सुरक्षा के तरीकों पर फिर से विचार करना जरूरी हो जाएगा जो लगातार तेज गर्मी के बीच काम करते हैं।
आईएमडी के इस अध्ययन में भारत के लिए अलग-अलग क्षेत्रों के लिए खास वेट-बल्ब तापमान (WBT) पर आधारित गर्मी से जुड़ी दिक्कतों का इंडेक्स विकसित करने पर जोर दिया गया है। इसके लेखकों ने कहा, “इसे हासिल करने के लिए पूर्वानुमान प्रणाली में समय और जगह के अनुसार नमी के हाई-रिजॉल्यूशन वाले आंकड़ों को शामिल करना जरूरी होगा। पूर्वानुमान में रियल-टाइम WBT प्रोडक्ट और प्रभाव-आधारित चेतावनियां शामिल होनी चाहिए, ताकि खतरनाक WBT स्तरों को आम जनता के लिए उपयोगी और लागू करने योग्य सुझाव में बदला जा सके।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 2 अप्रैल, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: तस्वीर 2023 में मार्च में गर्मियों की शुरुआत से ठीक पहले की है। केरल के एर्नाकुलम स्थित चेल्लानम में मछुआरे दिन भर पकड़ी गई मछलियों को किनारे पर लाते हुए। यह प्रतीकात्मक तस्वीर है। (AP Photo)