- इस अध्ययन का एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष इलाज मिलने में देरी है। लगभग एक तिहाई मरीज़ों ने अस्पताल पहुँचने से पहले पारंपरिक तरीकों की मदद ली, जिससे उनका कीमती समय बर्बाद हो गया।
- यह अध्ययन दर्शाता है कि कुछ माध्यमिक चिकित्सा केंद्र भी सांप के काटने से फैलने वाले विष पर आगे के चिकित्सा अनुसंधान के लिए उपयोगी डेटा प्रदान कर सकते हैं।
- लगभग 70-80% मामले विषैले नहीं होते हैं, जिनका इलाज पारंपरिक चिकित्सा से हो जाता है, जिससे लोगों का गैर-चिकित्सकीय उपचारों पर विश्वास बढ़ता है।
कर्नाटका के रायचूर जिले में हुए एक हालिया अध्ययन के अनुसार, ग्रामीण भारत में सांप के काटने से फैलने वाला विष एक गंभीर चुनौती है। इसके बावजूद भी इसका जिक्र लोक स्वास्थ्य के मुद्दों में कम ही होता है। जनवरी 2020 से अप्रैल 2023 तक एक माध्यमिक स्वास्थ्य केंद्र से सांप के काटने के मामलों के रिकॉर्ड का विश्लेषण करते हुए, यह अध्ययन इस बात पर प्रकाश डालता है कि सबसे अधिक जोखिम में कौन हैं, सांप के काटने की घटनाएं कैसे होती हैं और चिकित्सा देखभाल में क्या कमियां मौजूद हैं।
जांच किए गए 366 मामलों में से एक तिहाई विषैले सांप के काटने के मामले थे, जिनमें युवा वयस्क अधिक प्रभावित हुए। रोगियों की औसत आयु 30 वर्ष से थोड़ी कम थी, और इसमें लगभग 60% पुरुष थे, जो कृषि और बाहरी कार्यों से जुड़े व्यावसायिक जोखिम को दर्शाता है। अधिकांश घटनाएं सुबह के समय हुईं, जब लोग खेतों में या अपने घरों के आसपास सक्रिय थे।
कॉमन क्रेट (बंगरूस कैरुलियस), जो एक न्यूरोटॉक्सिक विष वाला सांप है और चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण चार प्रमुख सांप प्रजातियों में से एक माना जाता है, विष के मामलों का प्रमुख कारण बनकर उभरा है। न्यूरोटॉक्सिक सांपों के काटने से होने वाली बीमारियां विशेष रूप से खतरनाक होती हैं क्योंकि शुरुआती लक्षण भले ही हल्के हों, लेकिन इलाज न मिलने पर ये तेजी से श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकता है।

आईसीएमआर-राष्ट्रीय पारंपरिक चिकित्सा संस्थान के डॉ. चंदन एन. इस अध्ययन के लेखकों में से एक हैं। उनके अनुसार, इस अध्ययन की एक खासियत यह है कि हट्टी गोल्ड माइंस अस्पताल जैसे माध्यमिक स्वास्थ्य केंद्र, जहां यह अध्ययन किया गया था, सांप के काटने के मामलों का मजबूत रिकॉर्ड रखते हैं। इस रिकॉर्ड का उपयोग सर्पदंश से निपटने में मौजूद कमियों का अध्ययन करने के लिए किया जा सकता है। वे कहते हैं, “कर्नाटका सरकार ने सर्पदंश को एक अधिसूचित बीमारी घोषित करने का काम 2024 में ही किया था। विष के मामलों से संबंधित अधिकांश डेटा मेडिकल कॉलेजों से प्राप्त होता है। हालांकि, यह अध्ययन दर्शाता है कि कुछ माध्यमिक चिकित्सा केंद्र भी सांप के काटने से फैलने वाले विष पर आगे के चिकित्सा अनुसंधान के लिए उपयोगी डेटा प्रदान कर सकते हैं।”
इस अध्ययन का एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष इलाज मिलने में देरी है। लगभग एक तिहाई मरीज़ों ने अस्पताल पहुँचने से पहले पारंपरिक तरीकों की मदद ली, जिससे उनका कीमती समय बर्बाद हो गया। स्वास्थ्य सुविधाओं में प्रभावी उपचार उपलब्ध होने के बावजूद, इस तरह की देरी से जटिलताओं और मृत्यु का खतरा काफी बढ़ जाता है। वे बताते हैं, “लगभग 70-80% मामले विषैले नहीं होते हैं, जिनका इलाज पारंपरिक चिकित्सा से हो जाता है, जिससे लोगों का गैर-चिकित्सीय उपचारों पर विश्वास बढ़ता है।”
अध्ययन में पाया गया कि अस्पताल में इलाज से लगभग 78% रोगियों की स्थिति में सुधार हुआ, जबकि लगभग 17% को उच्च चिकित्सा केंद्रों में रेफर करने की आवश्यकता पड़ी। मृत्यु दर 1.6% रही, जो सांप के काटने की घातक प्रकृति और समय पर उपचार से जीवन बचाने की क्षमता को रेखांकित करती है।
लेखकों ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि सांप के काटने को एक आपातकालीन चिकित्सा घटना के बजाय सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में लिया जाना चाहिए। उन्होंने जागरूकता बढ़ाने, समय पर एंटीवेनम दवा देने और सांप के काटने से होने वाले शारीरिक नुकसान और मृत्यु दर को कम करने के लिए बेहतर दस्तावेज़ीकरण की मांग की है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 24 दिसंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: एक वयस्क रसेल्स वाइपर। तस्वीर- सुप्रतिम देब द्वारा विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0) के माध्यम से।