- अलीगढ़, उत्तर प्रदेश की शेखा झील बर्ड सैंक्चुअरी को रामसर साइट का दर्जा मिला है। इसके बाद भारत में रामसर स्थलों की संख्या 99 और उत्तर प्रदेश में 12 हो गई है।
- विशेषज्ञों का कहना है कि यह झील पक्षियों के लिए मीठे पानी का एक अहम ठिकाना है। यह गंगा नहर से जुड़े बड़े जल तंत्र का भी हिस्सा है।
- यह जगह सेंट्रल एशियन फ्लायवे पर पड़ती है, इसलिए यहां प्रवासी और स्थानीय दोनों तरह के पक्षी आते हैं। सर्दियों में बार-हेडेड गूज, पेंटेड स्टॉर्क और कई तरह की बतखें यहां देखी जाती हैं।
- शोधकर्ताओं का कहना है कि नई मान्यता मिलने के बाद भी झील पर कई तरह का दबाव बना हुआ है। इनमें गंदे पानी का आना, जलकुंभी फैलना, इंसानी दखल और अतिक्रमण जैसी समस्याएं शामिल हैं।
उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ की शेखा झील बर्ड सैंक्चुअरी को रामसर साइट का दर्जा मिला है। इसके साथ भारत में रामसर स्थलों की संख्या 99 और उत्तर प्रदेश में 12 हो गई है। भारत की रामसर फाइल के मुताबिक, शेखा झील ऊपरी गंगा मैदान में करीब 40 हेक्टेयर में फैली मीठे पानी वाली आद्रभूमि (वेटलैंड) है। यहां पक्षियों की 249 प्रजातियां दर्ज की गई हैं, जिसमें 62 पानी वाले पक्षी और वेटलैंड पर निर्भर प्रजातियां शामिल हैं।
दस्तावेज के अनुसार, सर्दियों में यहां नियमित रूप से 20,000 से ज्यादा जलपक्षी आते हैं। साल 2022-23 में इनकी संख्या 21,462; 2023-24 में 19,827 और 2024-25 में 22,366 दर्ज की गई। सूखे महीनों में जब आसपास की कई दूसरी आर्द्रभूमियां सूख जाती हैं या उनकी हालत बिगड़ जाती है, तब यह झील पक्षियों के लिए सहारा बनी रहती है।
प्रबंधन योजना में शेखा झील को एक बड़े प्राकृतिक इलाके का हिस्सा बताया गया है। इस इलाके में वेटलैंड, ग्रासलैंड, जंगल और खेती की ज़मीन शामिल है। दस्तावेजों के मुताबिक, यह झील सिर्फ पक्षियों के लिए ही नहीं, बल्कि भूजल रिचार्ज, सिंचाई, प्रकृति पर्यटन, शिक्षा और शोध के लिए भी महत्वपूर्ण है।
दस्तावेजों में यह भी कहा गया है कि इस झील पर कई तरह के दबाव हैं। इनमें बाहरी आक्रामक प्रजातियों का फैलाव, ज्यादा गर्मी और शोर, तापमान की चरम स्थिति, चराई और खरपतवार फैलना शामिल हैं।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि शेखा झील “सेंट्रल एशियन फ्लायवे (प्रवासी पक्षियों का मार्ग) पर एक अहम पड़ाव” है। उन्होंने कहा कि सर्दियों में यहां बार-हेडेड गूज, पेंटेड स्टॉर्क और कई तरह की बतखों जैसे प्रवासी पक्षियों को आवास मिलता है।

रामसर दस्तावेज के अनुसार, शेखा झील कई महत्वपूर्ण प्रजातियों के लिए भी अहम है। इनमें सारस, कॉमन पोचार्ड, ग्रेटर स्पॉटेड ईगल और रिवर टर्न शामिल हैं। इसके अलावा फेरीजिनस डक और एशियन वूली-नेक्ड स्टॉर्क जैसी प्रजातियां भी यहां दर्ज की गई हैं। यह झील सिर्फ सर्दियों में बड़ी संख्या में आने पक्षियों के लिए ही नहीं, बल्कि कई अहम प्रजातियों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
अंतरराष्ट्रीय पहचान
रामसर साइट का दर्जा मिलने से शेखा झील को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है। यह मान्यता उन आर्द्रभूमियों को दी जाती है जो पर्यावरण के लिहाज से अहम मानी जाती हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि शेखा झील की अहमियत सिर्फ भारत की 99वीं रामसर साइट बनने तक सीमित नहीं है। यह झील ऐसे इलाके में मौजूद है जहां इंसानी दबाव भी है, और इसी वजह से इसकी पारिस्थितिक भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाइल्डलाइफ साइंसेज विभाग की प्रोफेसर ओरुस इलियास ने कहा, “शेखा झील पारिस्थितिक रूप से मीठे पानी की एक महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि है, जो खासकर पक्षियों की बड़ी विविधता को सहारा देती है। यह पोषक तत्त्वों के चक्र, भूजल रिचार्ज, बाढ़ के असर को कम करने और कार्बन को संचित रखने जैसी अहम पारिस्थितिक सेवाएं देती है। यह स्थानीय और प्रवासी पक्षियों के लिए प्रजनन, भोजन और विश्राम का स्थल भी है, इसलिए यह शहरी इलाके में एक महत्वपूर्ण वेटलैंड रेफ्यूज (सुरक्षित ठिकाना) की तरह काम करती है।”
वेटलैंड्स इंटरनेशनल साउथ एशिया के निदेशक रितेश कुमार ने कहा कि यह वेटलैंड गंगा नहर से जुड़े एक बड़े जलतंत्र का हिस्सा है। उन्होंने कहा, “यह एक महत्वपूर्ण मानसूनी वेटलैंड है और यही विविधता इसे जलपक्षियों के लिए एक बेहतरीन आवास बनाती है।”
फ्लायवे में इसकी भूमिका पर उन्होंने कहा, “यह सेंट्रल एशियन फ्लायवे पर पक्षियों के जुटान वाले महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है, इसलिए यहां जलपक्षियों के आवास का प्रबंधन करते हुए आजीविका से जुड़े सवालों को भी साथ में देखना जरूरी है।”

दबाव में एक फ्लायवे स्थल
दोनों विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ रामसर का टैग मिलने से झील सुरक्षित नहीं हो जाएगी। इसके लिए लगातार और सही प्रबंधन जरूरी होगा।
रितेश कुमार ने कहा, “रामसर टैग अपने आप में यह प्रतिबद्धता है कि आर्द्रभूमियों को समझदारी से इस्तेमाल करते हुए उनकी मूल पारिस्थितिक पहचान को बनाए रखा जाए।” उन्होंने कहा कि सिर्फ दर्जा मिल जाना काफी नहीं है। इसके बाद ऐसा प्रबंधन जरूरी है, जो लंबे समय तक झील की पारिस्थितिक और जल संबंधी स्थितियों को बनाए रखे, ताकि यह पक्षियों के आवास और अपनी दूसरी प्राकृतिक भूमिकाओं को निभाती रहे।
कुमार ने यह भी कहा कि ऐसी उथली आर्द्रभूमियां बाहरी आक्रामक प्रजातियों के फैलाव के लिए बहुत संवेदनशील होती हैं। उन्होंने कहा, “ये इलाके खेती वाले परिदृश्य में स्थित हैं, इसलिए पोषक तत्वों की अधिकता जैसी समस्या पहले से मौजूद रहती है।”
उनके मुताबिक, “शेखा को पूरे परिदृश्य को ध्यान में रखकर संभालना होगा और यह देखना होगा कि यह तंत्र कितना इंसानी दबाव झेल सकता है। साथ ही आजीविका और जैव विविधता, दोनों को साथ लेकर चलने वाला नज़रिया अपनाना होगा।”

वाइल्डलाइफ बायोलॉजिस्ट फैयाज खुदसर ने कहा, “शेखा झील को काफी पहले से एक अहम स्थल माना जाता रहा है। आर्द्रभूमि, घासभूमि और जंगल जैसे अलग-अलग आवासों का मेल इसे जैव विविधता के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाता है, जहां स्थानीय और प्रवासी दोनों तरह के पक्षियों को सहारा मिलता है।” उन्होंने कहा, “अलीगढ़ जिले की दूसरी छोटी झीलों के साथ मिलकर शेखा झील सेंट्रल एशियन फ्लायवे पर एक महत्वपूर्ण जगह बनती है,” क्योंकि यह “प्रवासी पक्षियों को आराम और भोजन की जगह देती है, जबकि स्थानीय पक्षियों को प्रजनन का मौका मिलता है।”
उन्होंने कहा कि स्थानीय पक्षियों, खासकर सारस, के लिए साल भर पानी का बना रहना जरूरी है। उनके मुताबिक, पड़ोसी किसान सिंचाई के लिए झील से पानी लेते हैं, इसलिए इस पानी निकासी और आसपास की खेती पर कड़ी निगरानी और नियमन जरूरी है, ताकि जरूरत से ज्यादा पानी न निकले और पक्षियों व जलीय जैव विविधता के लिए जरूरी जलस्तर बना रहे।
ओरुस इलियास ने कहा कि इस स्थल पर यूट्रोफिकेशन, बिना साफ किया गया सीवेज पानी और अतिक्रमण जैसी वजहों से आवास बिगड़ रहा है। उन्होंने कहा, “सबसे बड़ी चिंता आक्रामक जलीय वनस्पति, खासकर जलकुंभी, के तेजी से फैलने की है, जो खुले पानी का क्षेत्र कम करती है, पानी में घुली ऑक्सीजन घटाती है और जलीय जैव विविधता को नुकसान पहुंचाती है।” उन्होंने यह भी कहा कि मानवीय दखल, ठोस कचरा फेंकना और बिना नियंत्रण वाला पर्यटन भी अतिरिक्त दबाव बनाते हैं।
हाल के वर्षों की मीडिया रिपोर्टों में भी शेखा झील पर दबाव की बात सामने आई है। इनमें कम जलस्तर, झील के बड़े हिस्से में जलकुंभी फैलना, और जलकुंभी हटाने या दूसरी शोर वाली गतिविधियों के दौरान पक्षियों का परेशान होना शामिल है। वन अधिकारियों ने एक मौसम में पक्षियों की संख्या कम होने की बात भी कही थी और यह भी बताया था कि सफाई का काम अलग बजट के बिना किया जा रहा था।
साल 2009 के एक अध्ययन में कल्पवृक्ष ने कहा था कि शेखा झील सिर्फ जलपक्षियों के लिए ही नहीं, बल्कि स्थानीय आजीविका के लिए भी अहम थी। वहां सिंघाड़ा की खेती, मछली पकड़ना और चराई जैसी गतिविधियां होती थीं। इस अध्ययन में शिकारियों की पहुंच, गाद जमना और जलकुंभी का ज्यादा फैलाव जैसी पुरानी समस्याओं का भी जिक्र है। इससे पता चलता है कि इस झील के प्रबंधन से जुड़ी चिंताएं नई नहीं हैं।
रामसर फाइल के साथ जमा प्रबंधन योजना में भी कहा गया है कि इस आर्द्रभूमि की भूमिका सिर्फ पक्षियों के आवास तक सीमित नहीं है। यह भूजल रिचार्ज, सिंचाई और दूसरी पारिस्थितिक सेवाओं में भी योगदान देती है। योजना में यह भी दर्ज है कि यहां मवेशियों की चराई, जलकुंभी जैसी जलीय खरपतवार, लंबे समय तक पानी रोके रखने का विरोध, ईंट भट्टे और कम जागरूकता जैसी चुनौतियां मौजूद हैं।
योजना में यह भी बताया गया है कि स्थल पर कुछ प्रबंधन उपाय पहले से किए गए हैं या प्रस्तावित हैं। इनमें पक्षियों के बैठने और घोंसला बनाने के लिए टीले, नेचर ट्रेल, दो वॉच टावर, कुछ हिस्सों में खरपतवार हटाना, पौधारोपण, जागरूकता अभियान और स्थानीय लोगों को संरक्षण से जोड़ना शामिल है।
बैनर तस्वीर: शेखा झील में सांप को खाते हुए एक ब्लैक नेक्ड क्रेन (काली गर्दन वाला सारस)। विशेषज्ञों के अनुसार, यह आर्द्रभूमि उच्च जैव विविधता का समर्थन करती है और स्थानीय और प्रवासी पक्षियों की प्रजातियों के लिए प्रजनन, भोजन और विश्राम स्थल के रूप में कार्य करती है। तस्वीर – विराग शर्मा द्वारा विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0 के माध्यम से।