- पिछले साल सितंबर में कोलकाता नगर निगम ने शहर में आने वाली बाढ़ के संभावित समाधान के रूप में आदि गंगा के मुहाने पर बैराज बनाने का फैसला लिया।
- ऐसे में इस नदी में बढ़ता अतिक्रमण जो हर साल आने वाली बाढ़ का मुख्य कारण है, उस पर कोलकाता नगर निगम बिलकुल चुप है।
- जानकार मानते हैं कि इस कदम से नदी के पुनर्जीवन की संभावनाएं खत्म हो जाएँगी और शहर में बाढ़ व प्राकृतिक आपदा का खतरा और बढ़ जाएगा।
कोलकाता महानगर के बाहरी इलाके में स्थित राजपुर-सोनारपुरा नगरपालिका कार्यालय के सामने बहता टॉली नाला पहली नजर में किसी बड़े शहर के सिवेज सिस्टम का हिस्सा लगता है। ऐसा लगता है कि इसे शहर की बड़ी आबादी के अपशिष्ट जल को महानगर से बाहर निकालने के लिए बनाया गया हो। हालाँकि, असल में यह गंगा, जिसे पश्चिम बंगाल में हुगली कहा जाता है, से निकलने वाली ही एक धारा है जो कोलकाता में गंगा के मुहाने से शुरू होकर दक्षिण में विद्याधरी नदी में मिलती है।
पिछले साल सितंबर में कोलकाता नगर निगम (केएमसी) ने कोलकाता में आने वाली शहरी बाढ़ (अर्बन फ्लड) के एक संभावित समाधान के रूप में इसके मुहाने पर एक बैराज बनाने का फैसला लिया। कई पर्यावरणविदों, विशेषज्ञों व नदी अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि इस कदम से नदी के पुनर्जीवन की बची संभावनाएं भी खत्म हो जाएँगी। साथ ही शहर में बाढ़ व प्राकृतिक आपदा का खतरा और बढ़ जाएगा। वहीं इस नदी में बढ़ता अतिक्रमण जो कोलकाता में हर साल आने वाली बाढ़ का मुख्य कारण है, उस पर केएमसी बिलकुल चुप पाई जाती है।
बदलते कोलकाता में बदलती आदि गंगा
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, कोलकाता दुनिया का नौवां सबसे अधिक आबादी वाला शहर है, जहां प्रति वर्ग किमी में 24 हजार लोग रहते हैं। कोलकाता की बड़ी आबादी की जरूरतों ने यहां के प्राकृतिक संसाधनों व संरचनागत निर्माण को प्रभावित किया है। आदि गंगा या टॉली नाला भी इससे अछूता नहीं है।
कोलकाता महानगर में गड़िया (दक्षिण 24 परगना जिले में स्थित दक्षिण कोलकाता का इलाका) से हेस्टिंग (सेंट्रल कोलाकाता में हुगली के निकट) तक 15.5 किमी का आदि गंगा का दायरा अतिक्रमण, संरचनागत निर्माण और पशुशाला आदि के कारण बुरी तरह प्रभावित है।

दिलचस्प यह कि इस नदी में कोलकाता मेट्रो के न सिर्फ 300 खम्बे बनाए गए हैं, बल्कि कोलकाता मेट्रो की ब्लू लाइन के पांच स्टेशन का निर्माण भी इसके ऊपर ही किया गया है। इस अतिक्रमण का उल्लेख नमामी गंगे कार्यक्रम की एक रिपोर्ट में भी है। इस नदी के रास्ते में चेतला नामक स्थान पर एक सड़क और उसके किनारे बसी झुग्गियों के बीच एक पुराना लॉकगेट नजर आता है। यह लॉकगेट नदी और सक्रिय जलमार्ग के रूप में इसके अस्तित्व की पुष्टि करता है।
बढ़ते अतिक्रमण और रखरखाव के आभाव में इस नदी में प्रदूषण भी तेज रफ़्तार से बढ़ रहा है और इसका असर इसके आसपास बसी झुग्गी बस्तियों में रहने वाले गरीब परिवारों पर पड़ता है।
कोलकाता के चेतला में आदि गंगा के तट पर स्थित बस्ती में रहने वाली पूर्णिमा पाइक इसके प्रदूषण व इसकी सफाई नहीं होने से बढ़ती परशानियों के बारे में बताती हैं। आर्थिक दिक्कतों की वजह से तट के बिलकुल करीब झोपड़ी नुमा घर में जीवन गुजारना उनकी मजबूरी है। पूर्णिमा बताती हैं, “यहां अच्छे से सफाई नहीं होती, नदी में गंदगी का जमाव है, इसके बीच ही हमलोग रहते हैं”। पूर्णिमा उनकी बस्ती के पीछे बनी बहुमंजिली इमारत में रहने वाले परिवारों के यहां घरेलू काम करती हैं।
कालीघाट के दिहाड़ी मजदूर शंकर सरदार कहते हैं, “भाटा के समय पानी कम गंदा रहता है, ज्वार के समय ज्यादा गंदा हो जाता है और पानी चार-पांच सीढ़ी ऊपर तक चढ जाता है।”

बैराज का प्रस्ताव और विरोध की वजह
कोलकाता नगर निगम (केएमसी) गंगा से लगे आदि गंगा के मुहाने पर 134.85 करोड़ रुपए की लागत से 42 मीटर लंबा बैराज बनाएगा । इसमें एक स्टॉर्म वाटर पंपिंग स्टेशन भी होगा। केएमसी इसका निर्माण राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के नेशनल डिजास्टर मिटिगेशन फंड (राष्ट्रीय आपदा शमन कोष) से मिलने वाले 500 करोड़ रुपए के एक हिस्से से करेगा। यह बैराज अतिवृष्टि व हाइटाइड की स्थिति में पानी को गंगा से आदि गंगा में जाने से रोकेगा। साथ ही स्टॉर्म वाटर पंपिंग स्टेशन से अतिरिक्त पानी को गंगा में वापस डाला जाएगा।
कोलकाता नगर निगम के पूर्व महानिदेशक (प्लानिंग एंड डेवपलमेंट) दींपाकर सिंहा ने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “नेशनल डिजास्टर मिटिगेशन फंड के पैसे से बैराज बनाने का प्रस्ताव है, जबकि डिजास्टर मैनेजमेंट विंग के द्वारा बैराज नहीं बनाया जाता है।” वे कहते हैं, “एक ओर नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के तहत नदी के नेचुरल फ्लो (स्वाभाविक प्रवाह) को रिस्टोर (पुनर्बहाल) करने की बात हो रही है, दूसरी ओर बैराज बनाकर आप उसे नष्ट करेंगे?” वे कहते हैं कि इससे नदी का टाइडल फ्लो रुक जाएगा और उसका इको सिस्टम नष्ट हो जाएगा, उसमें साफ़ पानी नहीं आएगा।

पर्यावरण वैज्ञानिक व कोलकाता की नदियों, आर्द्रभूमियों व भौगोलिक संरचना के जानकार और इंस्टीट्यूट ऑफ एनवॉयरमेंटल स्टडीज एंड वेटलैंड मैनेजमेंट में सीनियर साइंटिस्ट पद पर रह चुके तपन साह कहते हैं, “बैराज बनाना नगर निगम का काम नहीं है, यह सिंचाई विभाग का काम है।” वे कहते हैं, “कालीघाट में मुख्यमंत्री का घर है और आदि गंगा से जुड़े कई फैसले इस बात को ध्यान में रख कर लिया जाता रहा है।”
तपन साह कहते हैं, “मेट्रो रेल परियोजना ने पहले ही आदि गंगा को बहुत नुकसान पहुंचाया है। दूसरी बात, गंगा में गाद बहुत जमा होती है, कोलकाता महानगर के कई ड्रेनेज सिस्टम व कनाल का भी डिसिल्टेशन सालों से नहीं हुआ है, जबकि तीन से पांच साल पर ऐसा करना जरूरी है।”

साह कहते हैं, “पिछले साल कोलकाता में जो बाढ़ आई थी, उसमें आदि गंगा का कोई रोल नहीं था।” वे समझाते हैं कि कोलकाता शहर की ढाल (स्लोप) गंगा के विपरीत दिशा में है और इसी वजह से कोलकाता में जलनिकासी ठीक से न होने की समस्या है। इसको ध्यान में रखते हुए 1928 में केएमसी के चीफ इंजीनियर बीएन डे ने कोलाकाता के ड्रेनज सिस्टम को प्लान किया था। साह के अनुसार, कोलकाता शहर के ईस्ट कोलकाता वेटलैंड की ओर जल निकासी व्यवस्था को दुरुस्त करना जरूरी है।
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आदि गंगा बचाओ आंदोलन के संयोजक तापस दास कहते हैं, “कोलकाता के 28 वार्ड और दक्षिण 24 परगना के के तीन वार्ड आदि गंगा के कैचमेंट एरिया में आते हैं। हमारा संगठन व कोलकाता के कई पर्यावरणविद व विशेषज्ञ इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि बैराज बना देने से नदी की डिसिल्टेशन क्षमता (गाद को बहा कर ले जाना) खत्म हो जाएगी और गाद जमा होने से जलस्तर ऊपर आ जाएगा।”
बैनर तस्वीर: काली घाट के पास आदि गंगा का दृश्य। अतिवृष्टि होने से यहां अक्सर जल जमाव की ख़बरें आती हैं। तस्वीर – राहुल सिंह/मोंगाबे