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बंगाल चुनाव: पर्यावरण पर भारी नागरिकता की बहस

  • पश्चिम बंगाल की 294 विधान सभा सीटों पर इस बार दो चरणों में मतदान हो रहा है। वोटों की गिनती 4 मई को होगी।
  • राज्य में पर्यावरण से जुड़ी कई चिंताओं के बावजूद चुनाव अभियान या घोषणापत्रों में ये मुद्दे लगभग गायब हैं।
  • पश्चिम बंगाल के जंगलमहल, उत्तर बंगाल और सुंदरबन में पर्यावरण से जुड़ी कई समस्याएं हैं।

पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों के लिए दो चरणों में वोट डाले जा रहे हैं। इस बार प्रचार में चुनावी बहस नागरिकता जैसे मुद्दों पर ही केंद्रित रही और पर्यावरण से जुड़े मुद्दे काफी हद तक हाशिए पर चले गए।

तेईस अप्रैल को पहले चरण में राज्य में रिकॉर्ड मतदान हुआ। अगला चरण 29 अप्रैल को होना है और वोटों की गिनती 4 मई को होगी।

चुनाव में पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के बारे में बात करते हुए वन्यजीव जीवविज्ञानी और ‘द फिशिंग कैट प्रोजेक्ट’ की सह-संस्थापक टियासा आध्या ने मोंगाबे-इंडिया से कहा, “पश्चिम बंगाल में पारिस्थितिकी और पर्यावरण से जुड़ी समस्याएं हैं। दलदली भूमि का सिमटना, सुंदरबन में ताजे पानी के बहाव में कमी, अंधाधुंध रेत खनन, खनिजों और अयस्कों का खनन और उत्तरी व दक्षिणी बंगाल में हाथियों के साथ संघर्ष। ये मसले प्रकृति और समाज दोनों पर असर डालते हैं और इन्हें नीतिगत घोषणापत्रों में मजबूती के साथ शामिल किया जाना चाहिए। यह अभूतपूर्व समय है, जिसमें ‘विकास’ को समझने के तरीके में बदलाव और पारिस्थितिकी से जुड़ी जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है जो मानव स्वास्थ्य और कल्याण से जुड़ी है।”

कोलकाता स्थित गैर-लाभकारी संस्था ‘ह्यूमन एंड एनवायरनमेंट अलायंस लीग’ (HEAL) के सह-संस्थापक और पर्यावरणविद् सुव्राज्योति चटर्जी ने कहा कि राज्य में इंसानों और वन्यजीवों के बीच होने वाला संघर्ष से भी चिंता बढ़ती जा रही है। उन्होंने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “राज्य के दक्षिणी हिस्से में इंसानों और हाथियों के बीच होने वाले टकराव में कई लोगों की जान जाती है।” “कई जगहों पर रात में रोशनी की व्यवस्था नहीं है और लोगों में खुले में शौच करने की आदत भी मौत की वजह है। राज्य के उत्तरी हिस्से में पड़ने वाले जिलों में भी हाथियों के हमलों से होने वाली मौतों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ रही है। इन जिलों में तेंदुओं के साथ भी टकराव देखने को मिल रहा है। सुंदरबन में सांपों के काटने और बाघों के हमलों में बहुत से लोगों की जान जाती है और इनमें से कई मौत दर्ज भी नहीं हो पाती। बुनियादी ढांचे की कमी, अंदरूनी द्वीपों में सांप के जहर से बचाव वाले टीके की अनुपलब्धता और झाड़-फूंक करने वालों पर निर्भरता ही सांप के काटने से होने वाली कई मौतों के लिए जिम्मेदार है।”

वन विभाग की ओर से दुआर्स में इंसानी बस्तियों से पकड़ा गया जंगली तेंदुआ। पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्सों में हाथियों के हमलों से इंसानों की मौत के कई मामले दर्ज किए गए हैं। साथ ही, तेंदुओं के साथ भी टकराव की घटनाएं सामने आई हैं। तस्वीर: अर्धेन्दु बनिक।
वन विभाग की ओर से दुआर्स में इंसानी बस्तियों से पकड़ा गया जंगली तेंदुआ। पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्सों में हाथियों के हमलों से इंसानों की मौत के कई मामले दर्ज किए गए हैं। साथ ही, तेंदुओं के साथ भी टकराव की घटनाएं सामने आई हैं। तस्वीर: अर्धेन्दु बनिक।

राज्य के शहरों और कस्बों में दलदली भूमि का खत्म होना भी चिंता बढ़ा रहा है। हावड़ा के रहने वाले पशुओं को बचाना वाले चित्रक प्रमाणिक ने बताया कि रियल एस्टेट डेवलपर अक्सर दलदली भूमि को निर्माण सामग्री के मलबे से भर देते हैं। उन्होंने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “ये दलदली भूमि पश्चिम बंगाल के राजकीय पशु यानी मछली पकड़ने वाली बिल्लियों का मुख्य आवास हैं। बिल्ली की इस प्रजाति को बचाने के लिए हमें आर्द्रभूमि को बचाना होगा।”

पर्यावरण संबंधी जोखिम

पर्यावरण से जुड़े जोखिम वाले कई इलाकों में से जंगलमहल, उत्तरी पश्चिम बंगाल और सुंदरबन में ये समस्याएं सबसे ज्यादा हैं।

राज्य के दक्षिण-पश्चिमी भाग में स्थित जंगलमहल अपने वन आवरण और आदिवासी समुदायों की बड़ी आबादी के लिए जाना जाता है। यहां पर्यावरण से जुड़ी कई चुनौतियां हैं। इस क्षेत्र में पुरुलिया, बांकुरा, झाड़ग्राम और पश्चिम मेदिनीपुर जैसे जिलों की 46 विधानसभा सीटें हैं।

इलाके में इंसानों और हाथियों के बीच होने वाले टकराव को कम करने में मदद करने वाले झारग्राम के स्थानीय निवासी रॉबिन महतो ने कहा, “यहां टकराव पैदा करने वाले हाथी अक्सर ओडिशा और झारखंड जैसे पड़ोसी राज्यों से आते हैं। 2017 से यहां इंसानों और हाथियों के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। पूरे जंगलमहल इलाके में हर साल कम से कम 25 लोगों की मौत इस टकराव से होती है। जहां किसी इंसान की मौत होने पर 72 घंटों के भीतर पांच लाख रुपए का मुआवजा दे दिया जाता है, वहीं घर और फसलों को हुए नुकसान का मुआवजा नियमित रूप से नहीं मिलता।”

इस क्षेत्र में अवैध खनन की वजह से पर्यावरण भी तेजी से खराब हो रहा है। प्रकृति बचाओ ओ आदिवासी बचाओ मंच नामक संगठन से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ता सौरव प्रकृतिवादी ने कहा, “कई जगहों पर खनन बेरोकटोक जारी है। पुरुलिया जिले के नितुरिया ब्लॉक में ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ECL) ने कोयला खदान के लिए तीन सौ एकड़ जमीन अधिग्रहित की है। अब ECL इस खदान का विस्तार करने की योजना बना रहा है, इसलिए 12 गांवों के लोगों को विस्थापित होना पड़ेगा। इन गांवों के लोग ‘जोमी अधिकार मंच’ (भूमि अधिकार मंच) नामक संगठन के बैनर तले इसका विरोध कर रहे हैं। पुरुलिया की कई छोटी पहाड़ियां जैसे कि तिलाबोनी में बेसाल्ट पत्थर का खनन किया जा रहा है। इसके अलावा, बीरभूम के देउका पचामी में कोयला खदान के खिलाफ आंदोलन चल रहा है, जिसके कारण 36 गांवों के लोगों को विस्थापित होना पड़ सकता है। बीरभूम और झाड़ग्राम में सुवर्णरेखा नदी के किनारों पर रेत खनन धड़ल्ले से जारी है।”

हावड़ा में दलदली भूमि। राज्य के शहरों और कस्बों में आर्द्रभूमि को खत्म करने का काम बेरोकटोक चल रहा है। हावड़ा के रहने वाले पशु बचावकर्ता चित्रक प्रमाणिक ने बताया कि रियल एस्टेट डेवलपर अक्सर दलदली भूमि को भर देते हैं। तस्वीर: चित्रक प्रमाणिक।
हावड़ा में दलदली भूमि। राज्य के शहरों और कस्बों में आर्द्रभूमि को खत्म करने का काम बेरोकटोक चल रहा है। हावड़ा के रहने वाले पशु बचावकर्ता चित्रक प्रमाणिक ने बताया कि रियल एस्टेट डेवलपर अक्सर दलदली भूमि को भर देते हैं। तस्वीर: चित्रक प्रमाणिक।

दूसरी तरफ, जंगल, नदियों और चाय बागान के लि पहचाना जाने वाला उत्तरी पश्चिम बंगाल में भी पर्यावरण से जुड़ी कई समस्याएं हैं। इस क्षेत्र का फैलाव कूच बिहार, अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग, कलिम्पोंग, उत्तरी दिनाजपुर, दक्षिणी दिनाजपुर और मालदा जिलों की 54 विधानसभा सीटों में है।

पानीझोरा में रहने वाले पर्यावरणविद आमिर छेत्री ने तेजी से हो रहे निर्माण कार्य को पर्यावरण के लिए खतरा बताया। उन्होंने कहा, “तीस्ता नदी पर पहले से ही 13 बांध बने हुए हैं। सेवोक से रोंगपो तक 5.3 किलोमीटर लंबी रेलवे सुरंग का निर्माण चल रहा है। पर्यावरण के नजरिए से संवेदनशील इस क्षेत्र में इन कामों की वजह से अचानक आने वाली बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। मॉनसून के दौरान हर साल प्राकृतिक आपदाओं के कारण 150 से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है और कई परिवार विस्थापित हो जाते हैं।”

कूचबिहार में रहने वाले HEAL के सहायक सचिव अर्धेन्दु बनिक ने यहां वन्यजीवों के साथ होने वाले संघर्ष पर पर कहा, “हाल के दिनों में हमने तेंदुओं के हमलों में इजाफा देखा है, खासकर जलपाईगुड़ी, मैनागुड़ी और मालबाजार के आस-पास के चाय बागानों में। वे ज्यादातर बच्चों और बुजुर्गों पर हमला करते हैं। जंगल में आबाद गांवों में रहने वाले लोग अब मक्का और चावल जैसी फसलें उगाते हैं जिन्हें हाथी चाव से खाते हैं। दूसरी ओर, सड़क दुर्घटनाओं और ट्रेनों से टकराकर भी वन्यजीव मर रहे हैं। इसमें भी राजाभातखावा लाइन हाथियों के लिए जानलेवा साबित हो रही है।”

दुनिया के सबसे बड़ा मैंग्रोव के जंगल से भरपूर सुंदरबन अपने जलमार्गों, द्वीपों और रॉयल बंगाल टाइगर के लिए मशहूर है। इसमें दक्षिण और उत्तर 24 परगना के 10 निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं।

सुंदरबन में लगभग चार लाख लोगों की आजीविका मछली पकड़ने से चलती है और उन्हें मत्स्य संपदा में कमी तथा बाघों के बढ़ते हमलों जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

दक्षिण 24 परगना के गोसाबा ब्लॉक के मछुआरे और दक्षिण बंग मत्स्यजीवी फोरम के सदस्य तपन मंडल ने कहा, “समुद्र का जलस्तर बढ़ने से खारापन बढ़ रहा है, जिससे मछलियों की उपलब्धता कम हो रही है। मछुआरों को सिर्फ जंगल के बफर जोन में मछली पकड़ने की अनुमति है, जिससे उनके काम का इलाका सीमित हो गया है। 1972 से वन विभाग मछुआरों को बोट लाइसेंस सर्टिफिकेट जारी करता आ रहा है। हालांकि, नाव वाले मछुआरों की संख्या लगभग पैंतालीस हजार है, जबकि विभाग सालाना सिर्फड 923 लाइसेंस ही जारी करता है। इसलिए, बाकी मछुआरों को अपनी आजीविका के लिए अक्सर अवैध रूप से प्रवेश करना पड़ता है।”

बासंती ब्लॉक के सोनाखाली में रहने वाले जफर इकबाल बताते हैं कि सुंदरबन में बाघों के हमलों से होने वाली मौतों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। “हर साल सुंदरबन में बाघों के हमलों से लगभग पच्चीस लोगों की मौत हो जाती है और कई मौतें तो दर्ज भी नहीं हो पातीं। मछुआरे और मौले (शहद इकट्ठा करने वाले) ही बाघों के हमलों के मुख्य शिकार होते हैं। इन द्वीपों में स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार हुआ है जो अच्छी बात है। लगभग 10-12 साल पहले बाघ के हमले या सांप काटने के शिकार व्यक्ति को कोलकाता ले जाना पड़ता था, और ज्यादातर मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते थे।”

बीरभूम जिले के देवचा-पचामी में कोयला खदान का विरोध करने के लिए बैरकपुर में इकट्ठा हुए लोग। तस्वीर सौरव प्रकृतिबाड़ी द्वारा।
बीरभूम जिले के देवचा-पचामी में कोयला खदान का विरोध करने के लिए बैरकपुर में इकट्ठा हुए लोग। तस्वीर सौरव प्रकृतिबाड़ी द्वारा।

घोषणापत्र में पर्यावरण

पश्चिम बंगाल के इस चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है। जहा सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस चौथी बार सत्ता में आने की कोशिश कर रही है, वहीं भाजपा पहली बार राज्य में सरकार बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। कभी इस राज्य को अपना अभेद्य किला बना लेने वाली सीपीएम अब खोई हुई जमीन वापस पाने की कोशिश में है।

हालांकि, इस निर्णायक चुनाव में पर्यावरण से जुड़े मुद्दे प्रमुख राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों से लगभग नदारद हैं। इससे मौजूदा राजनीतिक विमर्श में इन मुद्दों के सीमित महत्व का पता चलता है।

भाजपा ने अपने घोषणापत्र में सुंदरबन की जैव-विविधता को बचाने और इसे पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन स्थल बनाने की बात कही है। पार्टी ने रॉयल बंगाल टाइगर और उनके आवास की रक्षा पर खास ध्यान देने का वादा किया है। घोषणापत्र में ‘मिष्टी’ नामक योजना का भी जिक्र किया गया, जिसका उद्देश्य राज्य के मैंग्रोव वनों की रक्षा करना और उस क्षेत्र को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना है।

भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष अमितव रॉय ने मोंगाबे-इंडिया से कहा, “सत्ताधारी दल के सीधे संरक्षण में बिल्डरों द्वारा आर्द्रभूमियों को नष्ट किया जा रहा है। एक बार जब हमारी सरकार सत्ता में आएगी, तो हम इस मुद्दे पर ध्यान देंगे। इसके अलावा, हम पर्यटन के विकास और वन्यजीवों की रक्षा करने के साथ-साथ गायों जैसे घरेलू मवेशियों की देखभाल के लिए भी कदम उठाएंगे।”

सीपीएम के घोषणापत्र में जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा की बात भी कही गई है, जिसमें अवैध खनन के खतरे को रोकना, जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटना, बेहतर कचरा प्रबंधन और टिकाऊ औद्योगीकरण शामिल हैं।

पूर्व सांसद और सीपीएम के महासचिव अलाकेश दास ने कहा, “पर्यावरण हमेशा से हमारी प्राथमिकताओं में से शुमार रहा है और यह चुनाव भी अपवाद नहीं है। अपने घोषणापत्र में, हमने नदियों को बचाने और अवैध खनन को रोकने जैसे अहम मुद्दों को शामिल किया है। अगर हमारी सरकार बनती है, तो हम पेड़ों की कटाई भी रोकेंगे और हरित पट्टी बनाएंगे। साथ ही, लोगों को पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर काम करने के लिए सशक्त बनाया जाना चाहिए। हम सभी खनन गिरोहों को खत्म कर देंगे।”

साल 2015 की इस प्रतिनिधि तस्वीर में कोलकाता के पश्चिम में स्थित घाटाल में बाढ़ के पानी में मछली पकड़ता हुआ एक व्यक्ति। (एपी फोटो/बिकास दास)
साल 2015 की इस प्रतिनिधि तस्वीर में कोलकाता के पश्चिम में स्थित घाटाल में बाढ़ के पानी में मछली पकड़ता हुआ एक व्यक्ति। (एपी फोटो/बिकास दास)

तृणमूल ने अपने घोषणापत्र में 15 साल के शासन के दौरान पर्यावरण के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियां गिनाई हैं जिसमें वन क्षेत्र का 14,214 वर्ग किमी से बढ़कर 16,962 वर्ग किमी हो जाना, 1,40,000 हेक्टेयर जमीन पर वनीकरण और राज्य के तटीय इलाकों में 15 करोड़ मैंग्रोव के पौधे लगाना शामिल है।

अगले पांच सालों के लिए तृणमूल ने अपने घोषणापत्र में मालदा और मुर्शिदाबाद जिलों के लिए ‘नदी संरक्षण मास्टरप्लान’ का वादा किया है। पार्टी ने सर्वेक्षण कराकर दलदली जमीन और सहायक नदियों को संवारने, आर्द्रभूमियों में कचरा फेंकने पर रोक, जैव-विविधता जीन पार्क और मैंग्रोव संरक्षण केंद्र की स्थापना का भी वादा किया है।

हावड़ा ग्रामीण में तृणमूल के जिला अध्यक्ष और बागनान के विधायक अरुनावा सेन ने चुनाव प्रचार के दौरान पर्यावरण प्रदूषण के मुद्दे पर बात की। इसमें प्लास्टिक के इस्तेमाल और पेड़ों में कीलें ठोकने जैसे मामले शामिल थे। उन्होंने मोंगाबे-इंडिया से कहा, “मेरे चुनाव क्षेत्र में कई दलदली भूमि हैं जो मछली पकड़ने वाली बिल्लियों का आवास है और इसलिए मैं उन्हें बचाने की कोशिश कर रहा हूं। इसके अलावा, ‘शिकार उत्सव’ या शिकार से जुड़े त्योहारों के बारे में भी जागरूकता फैलाई गई है। अगर मैं फिर से सत्ता में आता हूं, तो वन्यजीव को बेहतर माहौल देने की कोशिश करूंगा जहां मछली पकड़ने वाली बिल्ली, जंगली बिल्ली, कस्तूरी बिल्ली और सुनहरे सियार जैसे जानवर फल-फूल सकें।”

बैनर तस्वीर: पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव के पहले चरण के दौरान 23 अप्रैल को नंदीग्राम के एक मतदान केंद्र पर मतदाता। (एपी फोटो/भास्कर मलिक)।

यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 27 अप्रैल, 2026 को प्रकाशित हुई थी।

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