- यह स्टडी दिखती है कि कैसे एलपीजी का उपयोग बढ़ने से झारखण्ड की हरियाली में बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, इस दौरान राज्य के अन्य पर्यावरणीय कारक, जैसे बारिश, तापमान और जंगलों में लगने वाली आग स्थिर रहे।
- साल 2015 और 2020 के बीच, राज्य में एलपीजी के उपयोग में तेजी से वृद्धि देखी गई। यह वृद्धि 2015 में 25% से बढ़कर 2020 में 75% हो गई।
- इस स्टडी से पता चलता है कि प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) का “राज्य स्तर पर साफ़ असर हुआ है।” यह भी पता चलता है कि ऐसी योजनाएं न सिर्फ़ लोगों के लिए मददगार हैं, बल्कि पर्यावरण की बेहतरी को भी बढ़ावा देती हैं।
देश में बड़े वन आवरण वाले राज्यों की सूचि में आने वाले झारखण्ड में घरेलू गैस (एलपीजी) का उपयोग बढ़ने से पूरे राज्य में हरियाली का क्षेत्र बढ़ सकता है। यह आकलन सैटेलाइट डेटा और ज़मीनी सर्वे पर आधारित एक नई स्टडी में किया गया है।
एलपीजी को लंबे समय से जलाऊ लकड़ी पर निर्भरता कम करके जंगलों की कटाई रोकने के एक विकल्प के तौर पर बताया जाता रहा है। झारखंड में की गई यह स्टडी दिखती है कि कैसे एलपीजी का उपयोग बढ़ने से राज्य की हरियाली में बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, इस दौरान राज्य के अन्य पर्यावरणीय कारक, जैसे बारिश, तापमान और जंगलों में लगने वाली आग स्थिर रहे।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस, बैंगलोर और बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी एंड साइंस, पिलानी के शोधकर्ताओं की इस स्टडी से पता चलता है कि प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) का “राज्य स्तर पर साफ़ असर हुआ है।” यह भी पता चलता है कि ऐसी योजनाएं न सिर्फ़ लोगों के लिए मददगार हैं, बल्कि पर्यावरण की बेहतरी को भी बढ़ावा देती हैं। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले ग्रामीण परिवारों को मुफ़्त एलपीजी कनेक्शन और सब्सिडी पर सिलेंडर देती है।
पिछले साल सितंबर में एक पीयर-रिव्यूड जर्नल ‘ट्रीज़, फॉरेस्ट्स एंड पीपल’ में प्रकाशित हुई यह स्टडी एक अन्य रिसर्च को बल देती है जिसमें पाया गया है कि एलपीजी के इस्तेमाल से जलाऊ लकड़ी पर निर्भरता कम होती है।
हरियाली और एलपीजी का सम्बन्ध
झारखंड को इस अध्ययन के लिए चुनने के तीन मुख्य कारण थे: बड़ी ग्रामीण आबादी; वन आवरण का बड़ा क्षेत्र (भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 30%); और अन्य राज्यों की तुलना में ग्रामीण आबादी में एलपीजी का कम उपयोग।
अध्ययन के सह-लेखक राजीव कुमार चतुर्वेदी ने कहा, “मैं 2015 से झारखंड वन विभाग के संपर्क में हूं, और एलपीजी और वन आवरण के बीच संबंध का अध्ययन करने में मेरी रुचि 2020 में एक आईएफएस अधिकारी के साथ हुई बातचीत से जागी, जिन्होंने कहा कि उन्होंने राज्य में हरियाली में वृद्धि देखी है।”

यह अध्ययन मुख्य रूप से नॉर्मलाईज़्ड डिफरेंस वेजिटेशन इंडेक्स (एनडीवीआई) से प्राप्त सेटेलाइट डेटा पर आधारित है। इस डेटा की मदद से झारखंड में 2000 के बाद के हरित आवरण की मात्रा निर्धारित की गई। एनडीवीआई इंफ्रारेड रेडिएशन के माध्यम से किसी भी क्षेत्र में हरित आवरण के घनत्व को निर्धारित करता है।
इस डेटा से मिले परिणामों की गहन जांच के लिए, शोधकर्ताओं ने हजारीबाग जिले में क्षेत्रीय सर्वेक्षण किए। इस दौरान उन्हें झारखंड में बदलाव की एक अनोखी तस्वीर दिखी। यहां एक ओर घने जंगल हैं तो दूसरी ओर बड़े पैमाने पर कोयला खनन होता है। इन क्षेत्रों में हरियाली बढ़ाने वाले कारकों का पता लगाने के लिए, वन क्षेत्रों से सटे तीन समूहों के 20 गांवों में क्षेत्रीय सर्वेक्षण किए गए।
साल 2015 और 2020 के बीच, राज्य में एलपीजी के उपयोग में तेजी से वृद्धि देखी गई। यह वृद्धि 2015 में 25% से बढ़कर 2020 में 75% हो गई। अध्ययन के अनुसार, इसी अवधि में प्रदेश के वन आवरण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। हालाँकि, इस वृद्धि में तापमान, वर्षा या जंगल की आग जैसे कारकों में बदलाव का योगदान नहीं दिखाई देता है।
जिन गांवों का सर्वे किया गया, उनमें एलपीजी का उपयोग 66% तक बढ़ गया, लेकिन उज्ज्वला योजना के कार्यान्वयन के दौरान प्रति परिवार लकड़ी के उपयोग में हर साल औसतन लगभग 210 किलोग्राम की कमी आई। वहीं ज्यादा हरियाली वाले गांवों में यह कमी और भी अधिक स्पष्ट थी, जहां लकड़ी के उपयोग में कमी औसत से करीब 103 किलोग्राम प्रतिवर्ष ज़्यादा थी।
प्रभाव का आकलन
होलेमथी नेचर फाउंडेशन के संरक्षण जीवविज्ञानी और कार्यक्रम प्रमुख संजय गुब्बी के अनुसार, यदि इस समाधान को बड़े पैमाने पर लागू किया जाता है, तो एनडीवीआई में दिखाई देने वाले वन आवरण में वृद्धि असंभव नहीं है। हालांकि, उन्होंने मोंगाबे-इंडिया को भेजे गए एक ईमेल में कहा कि एनडीवीआई कई कारकों से प्रभावित होता है, और ऐसे आंकड़े हमेशा अल्पकालिक हस्तक्षेपों से जंगलों में होने वाले दीर्घकालिक परिवर्तनों को नहीं दर्शाते हैं।
उनके अनुसार अगर प्रति व्यक्ति जलाऊ लकड़ी के उपयोग का आकलन किया जाए तो ये एक अधिक विश्वसनीय संकेतक प्रदान करेगा।
झारखंड में हुए इस अध्ययन की एक बहुत बड़ी कमी यह है कि साल 2020 के बाद हरियाली से संबंधित आंकड़े उपलब्ध ही नहीं हैं।

गुब्बी ने 2018 में कर्नाटका के एमएम हिल्स में एक परियोजना का नेतृत्व किया। इस परियोजना का उद्देश्य वनवासियों को एलपीजी मिलने में आने वाली दिक्कतों और जलाऊ लकड़ी संग्रहण पर एलपीजी के उपयोग के प्रभाव को समझना था। इस परियोजना में शामिल अधिकांश लोग भूमिहीन कृषि श्रमिक थे, जिनके लिए एलपीजी का कनेक्शन लेने और उसे इस्तेमाल करते रहने के लिए पैसा और उनके इलाके तक एलपीजी की डिलीवरी प्रमुख चुनौतियां थीं।
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इन चुनौतियों का समाधान होने पर, परिवारों ने जलाऊ लकड़ी की खपत में 65% की कमी की। एलपीजी के साथ-साथ ईंधन-कुशल वॉटर हीटरों के उपयोग से जलाऊ लकड़ी की खपत में 85 से 90% तक की कमी देखी गई।
“घरेलू ईंधन के उपयोग और जंगलों एवं वन्यजीवों पर इसके प्रभावों के बीच सीधा संबंध स्थापित करने के लिए लकड़ी इकट्ठा करने के तरीकों और काटे जा रहे पेड़ों की प्रजातियों के बारे में विश्वसनीय जानकारी आवश्यक है। किसी भी नए उपाय से पहले और बाद में लकड़ी के उपयोग का मात्रात्मक मूल्यांकन उस उपाय की प्रभावशीलता का सटीक आकलन करने के लिए महत्वपूर्ण है,” गुब्बी ने कहा। “ऐसी परियोजनाओं के लिए पर्याप्त वित्त पोषण आवश्यक है। कई पारिस्थितिक और व्यवहारिक नतीजे परियोजना की सामान्य समय सीमा के बाद ही स्पष्ट होते हैं,” उन्होंने आगे बताया।
लम्बी अवधि की चुनौतियाँ
झारखंड जैसे राज्यों में एलपीजी के उपयोग में बढ़ोतरी के बावजूद, इसकी उपलब्धता एक बड़ी बाधा बनी हुई है। चतुर्वेदी ने कहा, “हजारीबाग में हमने देखा कि एक-दूसरे के बहुत करीब होने के बावजूद, पात्रा कलां गांव में हरियाली बढ़ रही थी, जबकि घने जंगल में स्थित नीरी गाँव में वन आवरण कम हो रहा था। हमने महसूस किया कि पात्रा कलां के पास स्थित राजमार्ग से गांव को एलपीजी आसानी से मिल जाती है। वहीं नीरी में, एलपीजी की उपलब्धता महंगी होने के कारण इसका उपयोग आर्थिक रूप से लाभदायक नहीं था।”
गुब्बी और चतुर्वेदी दोनों ने कहा कि एलपीजी के सिलेंडर को भरवाने की प्रक्रिया को किफायती बनाना लाभार्थियों की एलपीजी तक पहुंच बनाए रखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। सरकार ने हाल ही में उज्ज्वला योजना का दायरा 25 लाख अतिरिक्त लाभार्थियों तक बढ़ाने और प्रति सिलेंडर 300 रुपए की सब्सिडी प्रदान करने की घोषणा की है। यह सब्सिडी प्रति वर्ष नौ सिलिंडर तक मान्य होगी।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 5 दिसंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: राजस्थान में एक महिला जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करती हुए। प्रतीकात्मक तस्वीर – इंजीनियरिंग फॉर चेंज द्वारा विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 2.0) के माध्यम से।