- केरला और तमिलनाडु की सीमा से सटे सिरुवानी हिल्स में शील्डटेल सांप की एक नई प्रजाति खोजी गई है। इसका नाम राइनोफिस सिरुवानिएन्सिस रखा गया है, जिसे खोजने में स्थानीय नागरिकों ने काफी मदद की है।
- शोध बताते हैं कि ये सांप जमीन के अंदर रहते हैं और इनकी शारीरिक बनावट बहुत खास होती है, जिसकी वजह से ये पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के प्रति बहुत संवेदनशील हैं।
- चूंकि ये सांप सुरक्षित और ऊंचाई पर स्थित जंगलों के बाहर भी पाए गए हैं, इससे पता चलता है कि बिना सुरक्षा वाले इलाकों में भी इनकी कई और अनजानी प्रजातियां हो सकती हैं।
वर्ष 2015 में मानसून का एक दिन था। आसमान में काले बादल छाए हुए थे। केरला के पालक्कड़ जिले के जेल्लीपारा गांव में टूरिस्ट गाइड बेसिल पी. दास और उनके पिता अपने कॉफी के बागान में काम करने निकले थे। अपने साढ़े तीन एकड़ के खेत की मिट्टी खोदने के दौरान मिट्टी के अंदर से काले और दूधिया रंग का एक छोटा सा सांप बाहर निकला। उन्होंने ऐसा सांप पहले कभी नहीं देखा था।
दास ने उस सांप की एक फोटो ली और उसे अपने दोस्त डेविड वी. राजू को भेजी। राजू जो एक प्रकृतिवादी हैं, वह भी उस प्रजाति को पहचान नहीं पाए। राजू की सलाह पर दास ने एक लकड़ी की मदद से बड़ी ही सावधानी के साथ सांप को पकड़ा और उसे थोड़ी मिट्टी के साथ एक गमले में रख दिया। अगले कुछ दिनों में उन्हें वैसा ही एक और सांप मिला। बाद में, सांप के इस नमूने को विवेक सिरिएक को सौंपा गया, जो शील्डटेल मैपिंग प्रोजेक्ट (एसएमपी) चलाते हैं। यह एक सिटिजन साइंस पहल है, जिसका काम शील्डटेल सांपों का दस्तावेजीकरण करना है।
इसके एक दशक बाद पता चला कि दास परिवार ने सांप की एक नई प्रजाति खोज निकाली थी। इसका नाम राइनोफिस सिरुवानिएन्सिस रखा गया है। दास कहते हैं, “जब मुझे पता चला कि यह एक नई प्रजाति है, तो मुझे बहुत खुशी हुई क्योंकि अब मैं इसके इतिहास का एक हिस्सा बन गया हूं।”
शील्डटेल सांप की इस नई प्रजाति ‘आर. सिरुवानिएन्सिस’ के बारे में अक्टूबर 2025 में इवोल्यूशनरी सिस्टमैटिक्स जर्नल में प्रकाशित हुआ। इसे भारतीय विज्ञान संस्थान वायनाड वाइल्ड, रेनफॉरेस्ट लॉज और कलिंगा फाउंडेशन के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने तैयार किया है। यह अध्ययन केरला और तमिलनाडु में स्थित पश्चिमी घाट की सिरुवानी पहाड़ियों से इकट्ठा किए गए तीन नमूनों पर आधारित है।
यह सांपों की बाकी प्रजाति से कैसे अलग है? इसका पता इसके अनोखे स्केल (शल्क) पैटर्न, रंगों और डीएनए विश्लेषण से चला। यह एक चमकदार सांप है, जो भूरे-काले और दूधिया-सफेद रंग का होता है और इस पर गहरे रंग के बड़े धब्बे होते हैं। इसकी पूंछ का सिरा गुंबद के आकार का है।
अध्ययन के अनुसार, स्थानीय किसानों को इस सांप के व्यवहार और सीजनल पैटर्न के बारे में पहले से ही पारंपरिक जानकारी थी, भले ही अब तक इसे वैज्ञानिक रूप से दर्ज नहीं किया गया था। दास ने बताया, “जब मैंने अपने पड़ोसियों को बताया कि मुझे यह नया सांप मिला है, तो उन्होंने कहा कि उन्होंने इसे पहले भी कई बार देखा है।”

भारत और श्रीलंका तक सीमित
शील्डटेल छोटे आकार का बिना जहर वाले सांपों का एक समूह है, जो जमीन के अंदर बिल बनाकर रहते हैं। ये यूरोपेलटिडाई परिवार से संबंधित हैं, इसलिए इन्हें ‘यूरोपेलटिड्स’ भी कहा जाता है। इनका नाम ‘शील्डटेल’ इसलिए पड़ा क्योंकि इनकी पूंछ का आखिरी हिस्सा एक ढ़ाल या शील्ड की तरह दिखता है।
मौजूदा समय में, भारत और श्रीलंका में शील्डटेल की 73 प्रजातियां मौजूद हैं। ‘राइनोफिस’ इनका दूसरा सबसे बड़ा समूह है, जिसमें 26 प्रजातियां शामिल हैं। यह इकलौता ऐसा समूह है जो भारत और श्रीलंका दोनों जगह पाया जाता है। हालांकि राइनोफिस की सबसे अधिक विविधता श्रीलंका में (20 प्रजातियां) है, लेकिन भारत में भी इसकी छः प्रजातियाँ अब तक मिल चुकी हैं।
हरपेटोलॉजिस्ट और इवोल्यूशनरी इकोलॉजिस्ट विवेक फिलिप सिरिएक इस अध्ययन के लेखकों में से एक हैं। वह एक दशक से भी अधिक समय से शील्डटेल पर शोध कर रहे हैं और उन्होंने 2021 में तीन अन्य साथियों के साथ मिलकर ‘शील्डटेल मैपिंग प्रोजेक्ट’ (एसएमपी) की शुरुआत की थी। शुरुआत के बाद से ही इस प्रोजेक्ट को आम लोगों की मदद से शील्डटेल के 1,200 से अधिक सटीक स्थानों की जानकारी मिली है। यह उस डेटा से छः गुना अधिक है, जिसे विवेक अकेले 10 साल के फील्डवर्क में इकट्ठा कर पाए थे।
संरक्षित इलाकों के बाहर की संभावना
विवेक सिरिएक ने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “हमारा पिछला शोध मुख्य रूप से पश्चिमी घाट के ऊंचे पहाड़ी जंगलों, आरक्षित वनों और संरक्षित क्षेत्रों पर केंद्रित था। लेकिन बागानों में आर. सिरुवानिएन्सिस के पाए जाने से यह संकेत मिलता है कि इन संरक्षित इलाकों के बाहर भी कई अनजानी प्रजातियां हो सकती हैं।”
सिरिएक ने आगे कहा, “बड़ी बात यह है कि जमीन के अंदर रहने वाले ये सांप खतरे में हैं। और हमें अभी यह ठीक से नहीं पता है कि इनके संरक्षण के लिए क्या कदम उठाने चाहिए।” उनके द्वारा 2018 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, जमीन के अंदर बिल बनाकर रहने वाले इन सांपों का सिर बहुत अलग तरह का होता है और इनका आहार भी बहुत सीमित है। ये अपनी मिट्टी वाले वातावरण के हिसाब से पूरी तरह ढले होते हैं। ऐसी विशेष शारीरिक बनावट के कारण, पर्यावरण में होने वाले बदलावों के साथ तालमेल बैठा पाना इनके लिए बहुत मुश्किल है।

सिरिएक के अनुसार, शील्डटेल सांपों की पारिस्थितिकी के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। उन्होंने कहा, “वे जमीन के नीचे क्या करते हैं, कैसे प्रजनन करते हैं, कब जमीन के ऊपर आते हैं और उनका सामान्य व्यवहार कैसा है, इस बारे में बहुत सीमित जानकारी है। इसी वजह से इन सांपों के लिए खतरे के स्तर और उनकी संरक्षण स्थिति का आकलन करना मुश्किल हो जाता है।”
खेत से प्रयोगशाला तक का सफर
इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने सबसे पहले बागानों में हल्की खुदाई के दौरान मिले सांपों के नमूने इकट्ठे किए और उन्हें इथेनॉल में सुरक्षित रखा। इसके बाद, इन नमूनों को बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान ले जाया गया, जहां वैज्ञानिकों ने स्टीरियो माइक्रोस्कोप का उपयोग करके उनके शारीरिक लक्षणों, जैसे शल्क और रंगों का अध्ययन किया और डिजिटल तरीके से उनकी माप ली। डीएनए विश्लेषण के लिए एक नमूने से ऊतक का एक छोटा सा हिस्सा भी लिया गया। टीम ने लैब में मॉलिक्युलर जीवविज्ञान की एक तकनीक पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन (पीसीआर) का इस्तेमाल किया। इसके जरिए उन्होंने माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए के विशिष्ट हिस्सों की कई कॉपियां तैयार कीं, ताकि उनका और गहराई से विश्लेषण किया जा सके।
जैसे-जैसे आनुवंशिक विश्लेषण आगे बढ़ा, शोधकर्ताओं को एक दिलचस्प जानकारी मिली। पालक्कड़ में पाए गए आर. सिरुवानिएन्सिस, आर. मेलानोल्यूकस नाम की एक और प्रजाति से बहुत निकटता से संबंधित है, जिसका वर्णन पहली बार 2020 में वायनाड में किया गया था। सिरिएक ने बताया, “जब हमने इनके डीएनए की तुलना की, तो उनमें सिर्फ 2-4% का अंतर ही मिला” शोधकर्ताओं ने दोनों सांपों की बाहरी बनावट की भी तुलना की और पाया कि उनके शरीर के ऊपरी हिस्से (पीठ) और निचले हिस्से (पेट) पर मौजूद शल्कों की संख्या में काफी अंतर है। अक्सर वैज्ञानिक शल्कों की संख्या का उपयोग सांपों की प्रजातियों की पहचान करने के लिए करते हैं।
हरपेटोलॉजिस्ट अनीता मल्होत्रा ने मोंगाबे-इंडिया को दिए एक ईमेल इंटरव्यू में कहा, “सरीसृप विज्ञान में प्रजातियों की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए ये सभी मानक तरीके हैं और इस लिहाज से यह शोध पत्र काफी बेहतर तरीके से तैयार किया गया है।” वह यू.के. की वेल्स में स्थित बैंगोर यूनिवर्सिटी में मॉलिक्यूलर इकोलॉजी और इवोल्यूशन पढ़ाती हैं। मल्होत्रा इस अध्ययन में शामिल नहीं थीं।
यह अध्ययन पूरी तरह से माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए पर निर्भर था, जिसे सिरिएक एक बड़ी कमी मानते हैं। उन्होंने बताया कि अधिकांश जीवों में माइटोकॉन्ड्रिया का डीएनए माँ से आता है और इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इसी का इस्तेमाल किया है। जबकि एक न्यूक्लियर डीएनए भी होता है, जो माँ और पिता दोनों से विरासत में मिलता है। सिरिएक ने कहा, “जब हम सिर्फ माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए को देखते हैं, तो हम वास्तव में उस आबादी का पूरा विकासवादी इतिहास नहीं जान पाते। हम उस वंशावली के सिर्फ एक ही पक्ष को देख रहे होते हैं।”

मल्होत्रा भी सिरिएक की बात से सहमत हैं। अगस्त 2025 में वर्टिब्रेट जूलॉजी में प्रकाशित एक पेपर में उनके सहयोगी और हरपेटोलॉजिस्ट वोल्फगैंग वूस्टर ने भी सिर्फ माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए के इस्तेमाल किए जाने की आलोचना की थी, क्योंकि यह गुमराह करने वाला हो सकता है। उन्होंने कहा, “इसलिए, इस प्रजाति को अभी भी एक संदेहास्पद स्थिति में माना जाना चाहिए, जिसकी पुष्टि के लिए और अधिक सटीक वैज्ञानिक तरीकों की आवश्यकता है।” उन्होंने यह भी कहा कि अगर संभव हो तो और अधिक नमूने खोजने के प्रयास किए जाने चाहिए क्योंकि वर्तमान में नमूनों की संख्या बहुत कम है, हालांकि उन्होंने यह भी माना कि जमीन के अंदर रहने वाले सांपों को खोजना काफी चुनौतीपूर्ण काम है।
सिरिएक के मुताबिक, आर. सिरुवानिएन्सिस के जेनेटिक विश्लेषण को और बेहतर बनाने में ‘फंडिंग’ एक बड़ी बाधा है। इसके समाधान के रूप में मल्होत्रा ने लो-कवरेज जीनोम सीक्वेंसिंग का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया। यह एक उभरती हुई तकनीक है, जो कम खर्चीली है और इससे जीनोम के बड़े हिस्से का विश्लेषण करना और अधिक नमूने लेना संभव हो जाता है। उन्होंने कहा, “इस तकनीक से इन सांपों के आपसी संबंधों का निश्चित रूप से पता लगाया जा सकेगा, जिससे प्रजातियों के वर्गीकरण को लेकर लिए गए निर्णय और अधिक मजबूत और विश्वसनीय होंगे।” उन्होंने आगे बताया, “भारतीय सरीसृप विज्ञान में अभी ये तरीके व्यापक रूप से उपयोग नहीं किए जाते हैं, हालांकि हमारे पास ऐसा करने की क्षमता मौजूद है।”
जलवायु परिवर्तन से खतरा
केरला और तमिलनाडु दोनों राज्यों में फैली सिरुवानी पहाड़ियां तितलियों और पक्षियों की कई प्रजातियों का घर हैं। शोध के अनुसार, हाल ही में इन पहाड़ियों से सरीसृप और उभयचरों की आठ नई प्रजातियां खोजी गई हैं, जिनमें मेंढक, छिपकली और शील्डटेल सांप शामिल हैं। जिस इलाके में आर. सिरुवानिएन्सिस पाई गई, वहां कॉफी और मसालों के बागान बहुत अधिक हैं। अध्ययन में यह भी कहा गया है कि चूंकि यह प्रजाति संरक्षित क्षेत्रों या रिज़र्व के बाहर मिली है, इसलिए सिरुवानी पहाड़ियों में बचे हुए जंगलों को बेहतर सुरक्षा देने की सख्त जरूरत है।
सिरिएक के 2017 में प्रकाशित एक पुराने अध्ययन में गणितीय मॉडलिंग का इस्तेमाल किया गया था, ताकि शील्डटेल सांपों के 5.6 करोड़ साल पुराने विकासवादी इतिहास के दौरान उनकी विविधता की दर का पता लगाया जा सके। यह अध्ययन बताता है कि अतीत में हुए जलवायु परिवर्तनों ने इस बात को प्रभावित किया है कि कितनी तेजी से नई प्रजातियां बनीं और कितनी तेजी से विलुप्त हुईं। भूवैज्ञानिक अतीत में पृथ्वी के तापमान में आए अचानक बदलावों के दौरान, शोधकर्ताओं ने बड़े पैमाने पर विलुप्ति के संकेत देखे थे। सिरिएक ने कहा, “यह शोध बताता है कि ये सांप जलवायु परिवर्तन के प्रति बहुत अधिक संवेदनशील हैं।” उनका मानना है कि शील्डटेल की नई प्रजातियों को खोजना बहुत महत्वपूर्ण है। यह न सिर्फ शील्डटेल के जीव विज्ञान के बारे में हमारी समझ को बढ़ाता है, बल्कि यह भी बताता है कि उनके संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए जाने की जरूरत है।

जागरूकता और अध्ययन की जरुरत
भविष्य के शोध के लिए सिरिएक और उनकी टीम का लक्ष्य आर. सिरुवानिएन्सिस और अन्य शील्डटेल प्रजातियों के न्यूक्लियर डीएनए को अनुक्रमित करना है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि किन कारकों ने इन नई प्रजातियों के बनने की प्रक्रिया को प्रभावित किया होगा। इसके अलावा, मल्होत्रा ने राइनोफिस समूह की सभी प्रजातियों की शारीरिक विशेषताओं की तुलना करने के लिए एक सांख्यिकीय विश्लेषण करने का भी सुझाव दिया है।
हालाँकि, शील्डटेल मैपिंग प्रोजेक्ट में स्थानीय लोगों की भागीदारी से एक नई प्रजाति खोजी गई है, लेकिन शील्डटेल पर काम अभी खत्म नहीं हुआ है। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य शील्डटेल के बारे में जागरूकता फैलाना और उनके पारिस्थितिक महत्व को समझाना है। वे इस प्रोजेक्ट का डेटा सभी शोधकर्ताओं के लिए खुला रखना चाहते हैं ताकि आपसी सहयोग को बढ़ावा मिले। उन्होंने कहा, “इन सांपों को बेहतर ढंग से समझने के लिए शोधकर्ताओं, प्रकृति प्रेमियों और आम जनता, सभी को एक साथ आने की जरूरत है।”
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सिरिएक शील्डटेल पर एक और रोमांचक प्रोजेक्ट पर भी काम कर रहे हैं। पिछले कुछ समय से वे लंदन के नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम में पोस्ट-डॉक्टरल फेलो के रूप में शील्डटेल नमूनों के स्कल का अध्ययन कर रहे हैं। समय-समय पर, वह म्यूजियम में मौजूद 800 से अधिक शील्डटेल नमूनों में से एक को चुनते हैं, उसे जार से बाहर निकालते हैं और एक माइक्रो-सीटी स्कैनर में डालते हैं। उनकी रिसर्च इस सवाल पर आधारित है कि: क्या अलग-अलग पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण शील्डटेल के सिर की बनावट में बदलाव आता है? इसका जवाब आने वाले सालों में सामने आएगा।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 9 दिसंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: राइनोफिस सिरुवानिएन्सिस। तस्वीर- उमेश पी.के.