- वायु गुणवत्ता मापने का प्रशिक्षण लेकर, स्थानीय महिलाओं ने झारखंड के बोकारो और धनबाद के ग्रामीण इलाकों में 69 जगहों पर हवा की गुणवत्ता की निगरानी की और प्रदूषण फैलाने वाले 26 प्रमुख स्थानों की पहचान की।
- उनके अध्ययन में पाया गया कि वायु प्रदूषण से स्वास्थ्य पर होने वाले प्रभावों के बारे में जानकारी होने के बावजूद, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली इस समस्या को लेकर सुस्त और नाकाफी है।
- शोध के नतीजे सामने आते ही कोयला कंपनी ने धूल को नियंत्रित करने के लिए पानी का छिड़काव करना शुरू कर दिया, कोयला ले जाने वाले ट्रकों को ढंकने की व्यवस्था की और सार्वजनिक स्थानों पर एयर क्वालिटी मॉनिटर लगाए।
झारखंड के बोकारो जिले के जारांगडीह गांव में जब कोयला खदानों में काम करने वाले मजदूर अपने दिन की शुरुआत करते हैं, तो उन्हें सबसे पहली आवाज भारी मशीनों की आती है। उसके बाद, यहाँ की खदानों से कोयला लदे ट्रक सड़कों पर दौड़ने लगते हैं। बोकारो जिले की निवासी रेखा देवी कहती हैं, “दोपहर होते-होते हवा खराब हो जाती है। सुबह जो आंगन साफ किए जाते हैं, वे फिर से धूल से भर जाते हैं। सर्दियों में तो हालत और भी बदतर हो जाती है।”
रेखा देवी एक पर्यावरण सखी हैं और उन स्थानीय महिला नेताओं में से एक हैं, जिन्होंने पिछले साल मार्च में कैनेडियन जर्नल ऑफ एक्शन रिसर्च में प्रकाशित एक सामुदायिक भागीदारी वाले शोध अध्ययन का नेतृत्व किया था। यह अध्ययन झारखंड के दो प्रमुख कोयला खनन जिलों, धनबाद और बोकारो के ग्रामीण इलाकों में वायु प्रदूषण के सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को उजागर करता है।
असर सोशल इम्पैक्ट एडवाइजर्स में जेंडर और जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम का नेतृत्व करने वालीं नेहा सहगल और सौम्या श्रीवास्तव ने इस रिसर्च के लिए पहल की थी। इसमें देशज अभिक्रम नामक स्थानीय सामुदायिक संगठन के साथ काम करने वाली दस ‘पर्यावरण सखियों’ ने भी योगदान दिया। ‘पर्यावरण सखी’ एक ऐसा मॉडल है जिसमें महिलाएं अपने इलाकों में पर्यावरण संबंधी प्रयासों का नेतृत्व करती हैं।
पहले इन महिलाओं को वायु गुणवत्ता मापने का प्रशिक्षण दिया गया। उसके बाद इन्होंने धनबाद और बोकारो के ग्रामीण इलाकों में 69 जगहों की निगरानी की। इनमें से उन्होंने 26 स्थानों की पहचान ‘वायु प्रदूषण हॉटस्पॉट’ के रूप में की थी। वायु गुणवत्ता मापने के अलावा, इस अध्ययन में 200 लोगों के साथ सर्वे, समूह चर्चा और स्वास्थ्य प्रणाली की मैपिंग भी शामिल थी। यह डेटा 2022 और 2023 के दौरान नौ महीनों में इकट्ठा किया गया था।
आज, भारत के कई राज्य हवा की खराब गुणवत्ता का सामना कर रहे हैं। देश में वायु प्रदूषण के कारण हर साल 21.8 लाख (2.18 मिलियन) लोगों की मौत हो जाती है। भारत का एक-तिहाई कोयला भंडार झारखंड में है, जिसमें धनबाद और बोकारो प्रमुख खनन जिले हैं। इन दोनों जिलों में पीएम 2.5 का स्तर (हवा में मौजूद वे सूक्ष्म कण जिन्हें केवल माइक्रोस्कोप से देखा जा सकता है) विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय की गई सीमा से लगभग सात से नौ गुना ज्यादा है।
नेहा सहगल ने कहती हैं, “यह अध्ययन काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ‘ऊपर से थोपा गया’ अध्ययन नहीं है, जैसा कि वायु प्रदूषण पर होने वाले ज्यादातर शोध होते हैं। यह समुदाय के नेतृत्व में किया गया अध्ययन है और उन जगहों पर है जहां सरकार को यह भी नहीं लगता कि वहां वायु गुणवत्ता मॉनिटर लगाने की जरूरत है।” उन्होंने आगे कहा कि ऐसे स्थानीय स्तर के अध्ययन स्थानीय सरकारों को समाधान खोजने के लिए मजबूर कर सकते हैं।

इस अध्ययन में प्रदूषण के हॉटस्पॉट उन जगहों पर भी मिले जहां इसकी उम्मीद नहीं थी। कुल 69 स्थानों में से 26 जगहों पर पीएम2.5 का स्तर बहुत अधिक पाया गया, जो ‘खराब’ (91-120 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर), ‘बहुत खराब’ (121-250 μg/m³) या ‘गंभीर’ (250 μg/m³ से ऊपर) श्रेणी में था। कुछ स्थानों पर तो प्रदूषण का स्तर बेहद चिंताजनक था; जैसे बोकारो का एक बाजार (252 μg/m³) और एक मुख्य सड़क (261 μg/m³)। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सुझाई गई 5 μg/m³ की सुरक्षित सीमा से 50 गुना से भी ज्यादा है।
प्रदूषण के इन हॉटस्पॉट में केवल खनन क्षेत्र ही नहीं, बल्कि आंगनवाड़ी, अस्पताल, स्कूल और तालाब भी शामिल थे, जहां अक्सर महिलाएं, बच्चे और बुजुर्गों जैसे संवेदनशील लोग जाते हैं। रेखा देवी ने कहा, “मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि बाजार जैसी जगहों पर, जिनके बारे में हम सोचते थे कि वहां कोई प्रदूषण नहीं है, वहां प्रदूषण का स्तर बहुत अधिक था।” नेहा सहगल ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि यह बात शोधकर्ताओं के लिए भी चौंकाने वाली थी, क्योंकि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि शहरों की तुलना में दूर-दूराज में बसे गांवों में इतना अधिक प्रदूषण होगा, जबकि शहरों में भीड़भाड़ अधिक होने के कारण प्रदूषण की आशंका ज्यादा रहती है।
जहरीली हवा का सेहत पर असर
अध्ययन में पाया गया कि लोगों में प्रदूषण को लेकर जागरूकता तो बहुत है, लेकिन इसके स्वास्थ्य पर गंभीर परिणाम भी दिख रहे हैं। करीब 80% से अधिक प्रतिभागियों ने कहा कि उन्हें वायु प्रदूषण से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं हैं और सभी ने एक स्वर में माना कि उनके क्षेत्र की हवा प्रदूषित है। स्थानीय लोगों ने सर्दी-खांसी, सांस लेने में तकलीफ, सिरदर्द और आंखों से पानी आने जैसी कई तात्कालिक समस्याओं की शिकायत की। सर्दी और सांस फूलने की समस्या से जूझने वालों में ज्यादातर महिलाएं थीं।
गर्भवती महिलाओं ने बताया कि चूल्हे पर खाना बनाते समय या बाहर प्रदूषण में कदम रखते ही वे बीमार महसूस करने लगती हैं। जुलाई 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, जब गर्भवती महिलाएं वायु प्रदूषण की चपेट में आती हैं, तो उनके बच्चों के कम वजन के साथ पैदा होने या समय से पहले जन्म लेने की संभावना बढ़ जाती है।
दिल्ली के होली फैमिली अस्पताल में क्रिटिकल केयर मेडिसिन के प्रमुख, डॉ. सुमित रे के मुताबिक, वायु प्रदूषण का बच्चों और बुजुर्गों पर सबसे बुरा असर पड़ता है। वह इस अध्ययन का हिस्सा नहीं थे। उन्होंने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “बुजुर्गों ने अपनी उम्र के कारण कई वर्षों तक प्रदूषण का सामना किया होता है और उनके अंगों की कार्यक्षमता भी कम हो रही होती है, जिससे वे प्रदूषित हवा के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। दूसरी ओर, बच्चे खेलते और दौड़ते रहते हैं, जिस वजह से गहरी और तेज सांस लेते हैं। वायु प्रदूषण उनके विकसित हो रहे फेफड़ों की क्षमता और इम्युनिटी को नुकसान पहुंचाता है। अगर महिलाएं चूल्हे पर खाना बनाते समय घर के अंदर के प्रदूषण के संपर्क में भी रहती हैं, तो यह उनके फेफड़ों को गंभीर और स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है।”

असर और पर्यावरण सखियों द्वारा किए गए इस अध्ययन में लोगों ने अस्थमा, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी), ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों के कैंसर जैसी लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों की भी शिकायत की। लोगों ने यह भी बताया कि बच्चों का शारीरिक विकास रुक रहा है, उनकी याददाश्त और आंखों की रोशनी कमजोर हो रही है और बुजुर्गों की जीवन प्रत्याशा कम हो गई है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने पाया कि वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य पर इसके प्रभावों के बारे में यह जागरूकता एक विरोधाभास के साथ आती है और वह है सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की उदासीनता। अध्ययन में पाया गया कि गांव के उप-स्वास्थ्य केंद्र गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए तैयार नहीं हैं और स्वास्थ्य केंद्रों पर अक्सर डॉक्टर नदारद रहते हैं।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि इन स्वास्थ्य समस्याओं के लिए स्थानीय लोगों को अक्सर जिला अस्पतालों तक लगभग 45 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है, जिससे इलाज काफी महंगा हो जाता है। नेहा सहगल ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में भी ऐसे डॉक्टर या कर्मचारी नहीं हैं जो वायु प्रदूषण से होने वाली फेफड़ों की गंभीर बीमारियों या दिल की समस्याओं का इलाज करने में प्रशिक्षित हों।
स्थानीय महिलाओं के सहयोग से किया गया अध्ययन
सौम्या श्रीवास्तव ने कहा कि यह अध्ययन तीन चरणों में पूरा किया गया। पहला चरण वायु गुणवत्ता की निगरानी था, जिसमें प्रशिक्षित ‘पर्यावरण सखियों’ ने अपने आसपास के इलाकों में कई जगह चुनीं और एक महीने तक दिन में तीन बार हर जगह की हवा जांची। इसके लिए उन्हें पोर्टेबल एक्यूआई मॉनिटर इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण दिया गया था। उनके द्वारा इकट्ठा किया गया डेटा एक ऑनलाइन डैशबोर्ड पर स्टोर किया जाता था। रेखा देवी ने बताया, “जब मैं एक्यूआई मॉनिटर लेकर ओपन कास्ट खदानों में गई, तो मजदूरों ने कहा कि इससे उनकी नौकरी चली जाएगी। लेकिन जब मैंने उन्हें मॉनिटर पर प्रदूषण का स्तर दिखाया, तो उन्हें समझ आने लगा कि हवा कितनी खराब हो चुकी है।”
अध्ययन का दूसरा चरण यह समझना था कि प्रदूषण वाले उन ‘हॉटस्पॉट’ के आसपास रहने वाले लोग वायु प्रदूषण को किस तरह देखते हैं। इसके लिए एक सर्वे किया गया और लोगों के समूहों के साथ बातचीत की गई। इन चर्चाओं में अलग-अलग जातियों, व्यवसायों, आयु वर्गों और आर्थिक पृष्ठभूमि के महिलाओं और पुरुषों को शामिल किया गया और साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया कि पिछड़े और वंचित समूह भी इसमें अपनी बात रख सकें। तीसरा और अंतिम चरण ‘स्वास्थ्य प्रणाली की मैपिंग’ था। इसमें महिलाओं ने यह जानने की कोशिश की कि क्या प्रदूषण वाले इलाकों के पास मौजूद सरकारी स्वास्थ्य केंद्र लोगों के लिए मददगार हैं। यह जानकारी सरकारी आंकड़ों, स्वास्थ्य केंद्रों के दौरों और स्वास्थ्य कर्मियों के साथ बातचीत के जरिए जुटाई गई।

महिलाओं ने सुधार के लिए बढ़ाए कदम
जैसे ही अध्ययन के परिणाम सामने आए स्थानीय महिलाओं ने (जिन्होंने इसका नेतृत्व किया था) डेटा की जिम्मेदारी खुद ली और कार्रवाई के लिए पहल की। उन्होंने ‘सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड’ (सीएलएल), कोयला यूनियनों, जिला और ब्लॉक अधिकारियों सहित अन्य संबंधित लोगों से संपर्क किया और उनके साथ बातचीत की।
रेखा देवी ने बताया कि इन प्रयासों के कारण उनके इलाके में क्या-क्या बदलाव आए हैं। कोयला कंपनी ने अब परिवहन के दौरान कोयले को तिरपाल से ढंकना शुरू कर दिया है। उन्होंने उन सड़कों पर कई जगहों पर स्प्रिंकल्स लगाए, जहां से कोयले के ट्रक गुजरते हैं और दिन में तीन बार पानी का छिड़काव किया जाता है। उन्होंने बोकारो में तीन सार्वजनिक जगहों — पोस्ट ऑफिस, खदान और अस्पताल — पर एयर क्वालिटी मॉनिटर भी लगाए हैं ताकि स्थानीय लोग खुद हवा की गुणवत्ता देख सकें। शुरुआत में उन्होंने धूल रोकने के लिए खदानों के चारों ओर हरी जालियां लगाई थीं। ये जालियां कुछ दिनों के बाद फट गईं। इसके बाद रेखा देवी के कहने पर कंपनी ने इन जालियों की जगह मेटल शीट लगाई हैं। अब सड़कों की नियमित रूप से सफाई भी की जाती है और जमा हुई धूल को हटा दिया जाता है।
रेखा देवी ने कहा, “यह सारा काम तीन-चार महीनों के भीतर हो गया क्योंकि स्थानीय लोगों ने हमारा बहुत समर्थन किया।” इसके बाद से धूल में काफी कमी आई है।
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सौम्या श्रीवास्तव ने कहा, “ये भले ही बहुत छोटे कदम लगें, लेकिन ‘पर्यावरण सखियों’ ने विभिन्न हितधारकों के साथ जो बातचीत की, उसी की वजह से ये सब संभव हो पाया। किसी भी शोध के बाद उसका ऐसा असर तुरंत देखने को मिलना बहुत मुश्किल और दुर्लभ होता है। यह इस अध्ययन की एक बड़ी जीत है।”
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस अध्ययन की प्रक्रिया को देश के ऐसे किसी भी हिस्से में अपनाया जा सकता है, जहां लोग अपने स्थानीय स्तर पर हवा की गुणवत्ता को समझना चाहते हैं और स्थानीय अधिकारियों को कार्रवाई के लिए प्रेरित करना चाहते हैं।

भोपाल के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट की सहायक प्राध्यापक और भारत में शहरी व ग्रामीण वायु गुणवत्ता पर शोध करने वाली सौम्या सिंह ने एक ईमेल इंटरव्यू में कहा, “वायु प्रदूषण अब केवल बड़े शहरों की समस्या नहीं रह गई है। हालिया अध्ययन, जिनमें मेरा अपना काम भी शामिल है (जो जल्द ही प्रकाशित होगा), दिखाते हैं कि कस्बे, गांव और छोटे मोहल्ले भी ऐसे ही या इससे भी बदतर प्रदूषण का सामना कर रहे हैं। यह अध्ययन उन खनन क्षेत्रों से प्राप्त प्रदूषण के सबूतों को मजबूत करता है, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।” उन्होंने समुदाय को कोयला कंपनियों और अधिकारियों से बदलाव की मांग करने के लिए ठोस सबूत देने के लिए इस अध्ययन की सराहना की।
हालाँकि, सौम्या सिंह ने इस अध्ययन की कुछ कमियों की ओर भी इशारा किया है। इसमें इस्तेमाल किए गए उपकरणों की तकनीकी जानकारी या क्वालिटी एश्योरेंस प्रोटोकॉल का विवरण नहीं है। साथ ही, केवल एक महीने की निगरानी से मौसम के अनुसार होने वाले बदलावों को नहीं समझा जा सकता और बिना मेडिकल जांच के लोगों द्वारा खुद बताई गई स्वास्थ्य संबंधी जानकारी से किसी बीमारी के कारणों की पुष्टि वैज्ञानिक रूप से नहीं की जा सकती।
सौम्या सिंह ने कहा, “यह अध्ययन स्वास्थ्य संबंधी सभी समस्याओं के लिए बाहरी वायु प्रदूषण को जिम्मेदार मानता है, लेकिन स्थानीय निवासी चूल्हे के धुएं, खदानों में काम के दौरान होने वाले जोखिम और एनीमिया जैसी पहले से मौजूद बीमारियों का भी सामना करते हैं। हम यह अलग से नहीं बता सकते कि किस कारक का कितना प्रभाव रहा है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि ग्रामीणों द्वारा जीवन प्रत्याशा में कमी का जो दावा किया गया है, उसे सही जनसांख्यिकीय डेटा के साथ सत्यापित करने की जरूरत है।
बड़े बदलाव के लिए मॉडल के साथ आगे बढ़ना
शोधकर्ताओं की आगे की योजना इस अध्ययन से मिले डेटा को राज्य स्तर पर की जाने वाली कार्रवाई में बदलने की है। साथ ही, वे इस कार्यप्रणाली का परीक्षण उन अन्य क्षेत्रों में भी करना चाहते हैं जहां वे वायु गुणवत्ता पर काम कर रहे हैं। इस शोध में शामिल स्थानीय महिलाएं भी डेटा का उपयोग करके स्थानीय स्तर पर और अधिक बदलाव लाना चाहती हैं।
सौम्या सिंह ने कहा कि अगला कदम इस अध्ययन के मॉडल को बड़े स्तर पर अपनाकर ‘पर्यावरण विज्ञान केंद्र’ बनाना हो सकता है। ये ऐसे जिला-स्तरीय केंद्र होंगे जो सामुदायिक शोधकर्ताओं को प्रशिक्षण देंगे। उन्होंने कहा, “ये केंद्र उपकरण और तकनीकी सहायता प्रदान कर सकते हैं, जबकि स्थानीय शोधकर्ता, जो अपनी जगह के हालातों को बेहतर समझते हैं, निगरानी का काम कर सकते हैं। इससे खनन जिलों, ईंट-भट्टों वाले क्षेत्रों और औद्योगिक इलाकों में ‘पर्यावरण सखियों’ को प्रशिक्षित किया जा सकता है। इस तरह जिला-स्तरीय स्वास्थ्य डेटाबेस तैयार हो सकेगा जो सरकारी प्रणालियों से जुड़ा होगा।”
फिलहाल रेखा देवी इस बात से बेहद खुश हैं कि उनके प्रयासों का असर न केवल उनके मोहल्ले में, बल्कि लोगों के घरों तक में दिख रहा है। उन्होंने बताया कि कोयले के चूल्हे से होने वाले घरेलू वायु प्रदूषण के बारे में जागरूक होने के बाद से उनके कई परिचित परिवारों ने अब गैस सिलेंडर और इंडक्शन चूल्हों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। उन्होंने यह भी बताया कि लोगों ने खुले में कचरा जलाना बंद कर दिया है और अब वे उसे गांव में रखे सार्वजनिक कूड़ेदानों में डालने लगे हैं।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 11 दिसंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: सुषमा देवी (खड़ी हुई), वायु गुणवत्ता मापने में प्रशिक्षित महिलाओं में से एक हैं। वह धनबाद के महुदा गांव में महिलाओं के साथ वायु प्रदूषण पर एक बैठक कर रही हैं। तस्वीर- देशज अभिक्रम