- यह सम्मान ‘यूके चैरिटी व्हिटली फंड फॉर नेचर’ द्वारा उनके भारत की नदियों के किनारे खतरे में पड़े इंडियन स्किमर पक्षियों को बचाने के प्रयासों के लिए दिया गया है।
- इंडियन स्किमर की पहचान उसकी कैंची जैसी दिखने वाली चटक नारंगी चोंच और मछली पकड़ने के लिए पानी की सतह के बहुत करीब तैरने की आदत से होती है।
- शेख के काम शुरू करने के बाद इस पक्षी की आबादी करीब आठ साल में 400 से बढ़कर लगभग 1,000 हो गई।
भारत में पक्षियों पर काम करने वाली शोधकर्ता परवीन शेख को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार ‘व्हिटली अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान ‘यूके चैरिटी व्हिटली फंड फॉर नेचर’ द्वारा उनके भारत की नदियों के किनारे खतरे में पड़े इंडियन स्किमर पक्षियों को बचाने प्रयासों के लिए दिया गया है। इस अवॉर्ड के साथ ही, उनके द्वारा चलाए जा रहे संरक्षण मॉडल को चंबल नदी से प्रयागराज तक बढ़ाने के लिए फंडिंग भी दी गई है।
इंडियन स्किमर की पहचान उसकी कैंची जैसी दिखने वाली चटक नारंगी चोंच और मछली पकड़ने के लिए पानी की सतह के बहुत करीब तैरने की आदत से होती है। दुनिया में इस पक्षी की 90% से ज़्यादा आबादी भारत में है, जिसमें लगभग 3,000 पक्षी हैं। इस वजह से इस प्रजाति के भविष्य के लिए भारत की भूमिका बेहद अहम हो जाती है।यह पक्षी मौसमी रेत के टीलों और नदी के बीच बने द्वीपों पर प्रजनन करते हैं, जिससे उनके घोंसले नदी के बहाव में बदलाव, शिकारियों और इंसानी दखल के कारण प्रभावित होते हैं।
साल 2017 में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के साथ काम करने वाली शेख ने जब चंबल नदी पर अपना “गार्जियंस ऑफ़ द स्किमर” कार्यक्रम शुरू किया तब इस पक्षी की आबादी लगभग 400 थी। करीब आठ साल बाद, 2025 तक, यह आबादी बढ़कर लगभग 1,000 हो गई। इस दौरान इनके घोंसलों में बचे रहने की दर लगभग दोगुनी हो गई, जो 14 प्रतिशत से बढ़कर 27 प्रतिशत हो गई। ये नतीजे स्थानीय समुदाय की भागीदारी और वैज्ञानिक मॉनिटरिंग का सीधा नतीजा है।
“लोकल गार्डियन (स्थानीय रक्षक) रेत के नए टीलों को पहचानने, घोंसलों पर नज़र रखने और ब्रीडिंग के मौसम में गड़बड़ी रोकने में मदद करते हैं। कुछ लोग अब गर्व से स्किमर्स को “हमारे पक्षी” कहते हैं, जो इस प्रजाति के साथ उनके बढ़ते जुड़ाव को दिखाता है,” शेख ने बताया।
इस अवॉर्ड से मिली राशि की मदद से उनकी टीम अब उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में काम करेगी। प्रयागराज का यह इलाका सांस्कृतिक तौर पर अहम जगह है और इंडियन स्किमर्स, रिवर लैपविंग्स और लिटिल टर्न की ब्रीडिंग पॉपुलेशन का घर भी है। इस इलाके में व्याप्त चुनौतियों में बड़ी नावों की आवाजाही, मछली पकड़ना, नदी के किनारे धार्मिक गतिविधियां और शहरी प्रदूषण शामिल हैं। इन सभी से इनकी नेस्टिंग कॉलोनियों पर दबाव बढ़ता है। शेख की टीम नए लोकल गार्डियन या स्थानीय रक्षकों को नियुक्त करने, प्रीडेटर-प्रूफ फेंसिंग लगाने और घोंसलों की मॉनिटरिंग के लिए जीपीएस मैपिंग का इस्तेमाल करने का प्लान बना रही है।
व्हिटली अवॉर्ड, जिसे ग्रीन ऑस्कर भी कहा जाता है, हर साल उन लोगों को दिया जाता है जो खतरे में पड़ी प्रजातियों और उनके हैबिटैट के लिए ज़मीनी स्तर पर समुदाय के नेतृत्व में सफलता हासिल करते हैं। इस साल, इस अवॉर्ड के छः विजेताओं में दो भारतीय भी शामिल हैं। शेख के अलावा, भारत की दूसरी विजेता बरखा सुब्बा हैं, जो पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में हिमालयन सैलामैंडर और उसके नाजुक वेटलैंड हैबिटैट को बचाने के लिए पहले ज़मीनी आंदोलन का नेतृत्व कर रही हैं।
चंबल नदी पर परवीन शेख के काम और उन कम्युनिटी चैंपियंस, जिनके साथ वह काम करती हैं, के बारे में आप हमारी 2021 की इस कहानी में पढ़ सकते हैं।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 30 अप्रैल, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: परवीन शेख/व्हिटली अवॉर्ड के सौजन्य से।