- मिशमी ताकिन हिमालय में पाया जाने वाला एक दुर्लभ जीव है, जो बकरी और हिरण जैसा दिखता है। उसे जीवित रहने के लिए नमी वाले पहाड़ी जंगलों और निर्बाध प्रवास गलियारों की जरूरत होती है।
- अरुणाचल प्रदेश में जलवायु परिवर्तन, सड़कों के विस्तार और बढ़ते पर्यटन की वजह से इसके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।
- यहां तक कि स्वदेशी इदु-मिशमी समुदाय के लोग, जो परंपरागत रूप से ताकिन जैसे जानवरों को जंगल का सह-निवासी मानते आए हैं, अब वन्यजीवों के प्रति अपना नजरिया और व्यवहार बदल रहे हैं।
अरुणाचल प्रदेश की धुंध से ढकी ऊंची पहाड़ियां, जहां भारत, तिब्बत और म्यांमार की सीमाएं आपस में मिलती हैं। इसी जगह पाया जाता है हिमालय के सबसे दुर्लभ जीवों में से एक मिशमी ताकिन (बुडोरकास टैक्सिकोलर)। यह प्रजाति इतनी अनोखी है कि शुरुआती प्रकृतिवादियों को इसे वर्गीकृत करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। इसकी कद-काठी देखकर ऐसा लगता है जैसे कुदरत ने किसी बैल के मजबूत शरीर पर एक बकरी का सिर लगा दिया हो। इसके शरीर पर घने और झबरीले बाल हैं। यह हजारों सालों से इन ढलानों पर घूम रहा है और यहां के मुश्किल और दूरदराज के दुर्गम इलाकों में पूरी तरह से ढल चुका है।
भूटानी और तिब्बती लोक कथाओं के अनुसार,15वीं शताब्दी के बौद्ध भिक्षु द्रुक्पा कुनले ने एक गाय के धड़ पर बकरी का सिर जोड़कर ‘ताकिन’ की रचना की थी। बीसवीं सदी की शुरुआत में कैप्टन एफ. एम. बेली ने भी अपनी किताब ‘जर्नी थ्रू ए पोर्शन ऑफ साउथ-ईस्टर्न तिब्बत एंड द मिशमी हिल्स’ में मिशमी ताकिन का जिक्र किया और उनके 300 तक की संख्या वाले बड़े झुंड देखे जाने की बात कही थी।
मिशमी ताकिन, ‘ताकिन’ की चार उप-प्रजातियों में से एक है। यह पूर्वी हिमालय में पाया जाने वाला एक दुर्लभ जीव है, जो बकरी और मृग प्रजाति से संबंधित है। मजबूत पैरों, बड़े सिर और सुनहरे-पीले से लेकर गहरे भूरे रंग के बालों वाले इस जीव की ऊंचाई कंधे तक 1.3 मीटर और वजन 300 किलोग्राम से भी ज्यादा होता है। इसकी मुड़ी हुई नाक और बड़ी श्वसन नलिकाएं फेफड़ों तक पहुंचने से पहले बर्फीली हवा को गर्म कर देती हैं, जो इसे ऊंचे इलाकों में रहने के अनुकूल बनाती है।
चीन के युन्नान स्थित दाली यूनिवर्सिटी में ‘मैमल बिहेवियर और डायवर्सिटी’ के एसोसिएट प्रोफेसर ची मा ने मिशमी ताकिन पर काफी शोध किया है। वह कहते हैं, “यह जीव पूर्वी हिमालय का एक महत्वपूर्ण बड़ा शाकाहारी जीव है। यह वनस्पतियों के स्वरूप को बनाए रखने और बीजों को फैलाने में मदद करता है। इसके अलावा, यह स्थानीय शिकारी जानवरों के लिए उनके भोजन का एक जरिया भी है। इसका अस्तित्व नमी वाले पहाड़ी जंगल, खनिज स्रोतों तक इनकी पहुंच और निर्बाध प्रवास गलियारों पर निर्भर करता है।”

इदु-मिशमी समुदायों के इलाकों के पास बड़ी संख्या में मिशमी ताकिन पाए जाते हैं। वहां इन्हें सिर्फ ‘जंगली जानवर’ नहीं, बल्कि जंगल में इंसानों के साथ रहने वाला एक साथी (सह-निवासी) माना जाता है। इदु-मिशमी अरुणाचल प्रदेश में रहने वाली एक प्रमुख उप-जनजाति है। जंगल के साथ उनका जुड़ाव और शिकार करने का तरीका कुछ खास रीति-रिवाजों और नियमों से बंधा है, जो यह तय करते हैं कि कब, कहां और कैसे जानवरों का शिकार किया जा सकता है। हालांकि, बाहरी दुनिया से बढ़ते संपर्क और प्रभाव की वजह से अब ये पारंपरिक रिश्ते धीरे-धीरे बदल रहे हैं।
आज मिशमी ताकिन कई खतरों का सामना कर रहा है, जैसे उनके प्राकृतिक आवासों का खंडित होना, जंगलों की कटाई, सड़कों का निर्माण, इंसानी गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन। अरुणाचल प्रदेश में हाल ही में कैमर-ट्रैप और फील्ड सर्वे से मिली जानकारी के अनुसार, ये जीव अब या तो अकेले या फिर बहुत छोटे समूहों में देखे जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने अपनी ‘रेड लिस्ट’ में इस प्रजाति को ‘असुरक्षित’ श्रेणी में रखा है।
कम अध्ययन की गई एक दुर्लभ प्रजाति
अपनी दिलचस्प शारीरिक बनावट और सांस्कृतिक महत्व के बावजूद, मिशमी ताकिन के बारे में आज भी बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। इस वजह से इनके संरक्षण के लिए असरदार योजनाएं बनाना मुश्किल हो रहा है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि सड़कों के विस्तार, मिशमी पहाड़ियों में बढ़ते पर्यटन और स्थानीय लोगों की बदलती जीवनशैली के कारण इस प्रजाति पर दबाव और बढ़ सकता है।
मिशमी ताकिन 1,800 से 4,000 मीटर की ऊंचाई पर रहता है। गर्मियों के महीनों में यह ऊंचे घास के मैदानों की ओर चला जाता है, जबकि सर्दियों में भोजन की तलाश में नीचे की ओर जंगली ढलानों पर आ जाता है। अपने शर्मीले स्वभाव और बेहद दुर्गम इलाकों में रहने के कारण, यह बहुत कम ही दिखाई देता है।

साल 2019 में ‘ग्लोबल इकोलॉजी एंड कंजर्वेशन’ में प्रकाशित एक अध्ययन ने इस प्रजाति के लिए फील्ड डेटा की भारी कमी की बात कही और इस पर विशेष शोध की जरूरत पर जोर दिया। तो वहीं 2024 में अरुणाचल प्रदेश वन विभाग ने इस दिशा में कदम उठाते हुए वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूटीआई) के साथ मिलकर ‘अशोक ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट’ (ATREE) की मदद से एक बड़ा सर्वे शुरू किया। इस सर्वे का उद्देश्य अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम के कुछ हिस्सों में इस प्रजाति की आबादी और उनके आवासों का पता लगाना है।
सर्वे चार क्षेत्रों, दिबांग घाटी, सियांग, सुबनसिरी और लोहित-चांगलांग में किया जा रहा है, जिसमें नामदफा और मौलिंग नेशनल पार्क भी शामिल हैं। डब्ल्यूटीआई के निदेशक राहुल कौल ने इसे ‘अपनी तरह का पहला सर्वे’ बताया और उम्मीद जताई कि इससे मिशमी ताकिन के रहन-सहन और पारिस्थितिकी के बारे में नई और महत्वपूर्ण जानकारी मिलेगी, जो भविष्य में इनके संरक्षण के लिए योजना बनाने में मददगार साबित होगी।
आवास पर जलवायु परिवर्तन का असर
भारतीय वन्यजीव संस्थान के हाल के शोध में ताकिन के देखे जाने की लगभग 200 घटनाओं का विश्लेषण किया गया। इसमें जलवायु, वनस्पतियों, भूभाग और मानवीय हस्तक्षेप जैसे कारकों को आधार बनाया गया। इसके निष्कर्ष बताते हैं कि मौजूदा समय में उत्तरी और पूर्वी अरुणाचल प्रदेश का केवल 11% हिस्सा ही इनके रहने के लिए सबसे उपयुक्त है। जलवायु परिवर्तन की गंभीर स्थितियों में, साल 2070 तक इनमें से 45% प्राकृतिक आवास खत्म हो सकते हैं, जिससे इस प्रजाति को और भी ऊंचाई वाले और बिखरे हुए इलाकों में जाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
मिशमी ताकिन के लिए ठंडे, नम और ऊबड़-खाबड़ ढलानों पर फैले घने जंगल और घास के मैदान अनुकूल होते हैं। लेकिन वे सड़कों, मानव बस्तियों और असुरक्षित क्षेत्रों के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं।
पिछले साल 2025 में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) में दर्ज एक शिकायत में सड़क निर्माण के कारण होने वाले मानवीय हस्तक्षेप को ताकिन और अन्य लुप्तप्राय प्रजातियों के लिए खतरा बताया गया था।

मैदानी इलाकों में काम करने वाले शोधकर्ता इन क्षेत्रों में होने वाले बदलावों के गवाह रहे हैं। सिक्किम यूनिवर्सिटी में भूगोल के डॉक्टरेट रिसर्चर मोहन शर्मा मिशमी पहाड़ियों में मानव और वन्यजीवों के संबंधों पर अध्ययन कर रहे हैं। उन्होंने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि पहले उन्हें चीन की सीमा के पास स्थित ताकिन के प्राकृतिक आवास के करीब बसे ‘ब्रूनी’ गांव तक पहुंचने में पांच दिन लगा करते थे। “जब मैं 2016 में पहली बार ब्रूनी गया था, तो वहां पहुंचने के लिए पांच दिन पैदल चलना पड़ा था। लेकिन 2023 तक असेचो से ब्रूनी को जोड़ने वाली सड़क बन गई। अब वहां गाड़ी से केवल दो घंटे में पहुंचा जा सकता है।” यह सड़क जैव-विविधता से भरपूर इलाकों से होकर गुज़रती है, जहां पहाड़ी घास के मैदान, चीड़ और देवदार के जंगल और झरने मौजूद हैं। ये इलाके मिशमी ताकिन, रेड पांडा, क्लाउडेड लेपर्ड और अन्य दुर्लभ प्रजातियों के रहने के मुख्य स्थान हैं।
सड़क बनने से पहले, इस इलाके की यात्राएं केवल कुछ खास मौसमों में ही संभव थीं, जिससे वन्यजीवों के जीवन में कोई खास दखल नहीं होता था। शर्मा ने कहा, “अब हर मौसम के अनुकूल सड़कें बन जाने से यहां पर्यटकों और गाड़ियों की आवाजाही बढ़ गई है, जो भविष्य में और भी बढ़ेगी। भविष्य में ये विकास कार्य ताकिन और अन्य दुर्लभ प्रजातियों के प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुंचा सकते हैं।”
शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि ‘सियांग घाटी बांध परियोजना’ जैसी बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं मिशमी ताकिन और अन्य जीवों के लिए संभावित खतरा पैदा कर सकती हैं।
इदु-मिशमी समुदाय और जंगल के साथ उनके बदलते रिश्ते
इदु-मिशमी जनजाति सदियों से ईयू-एना परंपरा का पालन करती आई है, जो वन्यजीवों के साथ मानवीय व्यवहार को नियंत्रित करने वाली धार्मिक पाबंदियों (जिन्हें ‘जेना’ कहा जाता है) और वर्जनाओं की एक जटिल प्रणाली है। इस व्यवस्था के तहत, कुछ खास जानवरों, स्थानों या मौसम में शिकार को वर्जित माना जाता है, जिससे उनकी आध्यात्मिक मान्यताओं का सम्मान और प्राकृतिक संसाधनों का टिकाऊ उपयोग सुनिश्चित होता है। हालाँकि, जैसे-जैसे ऊपरी दिबांग घाटी का संपर्क बाहरी दुनिया से बढ़ रहा है, इन समुदायों की पारंपरिक जीवनशैली और मान्यताओं में बदलाव आने लगा है।

शर्मा याद करते हुए बताते हैं कि 2016 में समुदाय के लोग जंगल और वन्यजीवों से जुड़े कई ‘जेना’ का पालन करते थे। वो अक्सर कहा करते थे, “जेना लगा है, इसलिए एक साल तक जंगल नहीं जा पाएंगे” या “आज किसी की मौत हो गई है, तो आज जंगल नहीं जा सकते।”
पिछले एक दशक में बाहरी लोगों से बढ़ते संपर्क ने इन पाबंदियों के प्रति नई पीढ़ी के नजरिए को बदलना शुरू कर दिया है। शर्मा ने कहा, “20 साल से कम उम्र की नई पीढ़ी के पास जंगल के बारे में वैसा ज्ञान या जंगल के साथ वैसा गहरा रिश्ता नहीं है, जैसा उनके बुजुर्गों के पास था।”
इदु-मिशमी समुदाय के एक बुजुर्ग बुगेई मेना इस बात से सहमत हैं। वह कहते हैं, “ये ‘जेना’ हमारी मान्यताओं का हिस्सा हैं। हमारी नई पीढ़ी के बहुत से लोग पूर्वजों से मिली इन मान्यताओं के महत्व को शायद अब उतना नहीं समझते।”
शर्मा बताते हैं कि धर्म परिवर्तन और अन्य धर्मों के प्रभाव से समुदाय का जंगल और वन्यजीवों के साथ रिश्ता धीरे-धीरे बदल रहा है, और वे अपनी पारंपरिक ‘इदु-मिशमी’ मान्यताओं से दूर होते जा रहे हैं।
पारंपरिक रीति-रिवाज़ लंबे समय से लोगों को गलत काम करने से रोकने के लिए एक ‘नैतिक शक्ति’ के रूप में काम करते रहे हैं। करीब 25 साल पहले, इदु-मिशमी जनजाति के एक डेविड पुलु ने अनजाने में एक हूलॉक गिब्बन (एक प्रकार का बंदर) को शिकार समझकर गोली मार दी थी। इस घटना के बाद उन्हें इतना गहरा पछतावा और मानसिक दुख हुआ कि उन्होंने शिकार करना ही छोड़ दिया। ईयू-एना नियमों के अनुसार इस प्रजाति के शिकार की सख्त मनाही है। पुलु ने 2019 के एक इंटरव्यू में कहा था, “वह एक ऐसा डरावना सपना था जिसे मैं याद भी नहीं करना चाहता। ऐसा किसी भी इदु-मिशमी व्यक्ति के साथ कभी नहीं होना चाहिए।”
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हालांकि शिकार अभी भी ईयू-एना परंपरा के नियमों के दायरे में है, लेकिन बाहरी दुनिया से बढ़ते संपर्क और प्रभाव के कारण ये पारंपरिक सुरक्षा नियम धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहे हैं।
शर्मा चेतावनी देते हैं कि बढ़ते बुनियादी ढांचे और मानवीय उपस्थिति का ताकिन और अन्य वन्यजीवों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। शर्मा ने कहा, “इदु-मिशमी जैसी जनजातियां उन्हें पारंपरिक रूप से एक सचेत प्राणी की तरह देखते आए हैं यानी ऐसी प्रजाति जिनका अपना समाज हैं। और जब तक हम उन जानवरों को इसी नजर से देखेंगे, तभी तक हम उस बंधन को बनाए रख सकते हैं जो स्थानीय लोगों ने उनके साथ सदियों से साझा किया है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 28 नवंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: एक मिशमी ताकिन। एक चिड़ियाघर से ली गई प्रतिकात्मक तस्वीर, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-NC-ND 2.0).