- एशियाई शेरों की वर्तमान आबादी 891 हो गई चुकी है। हालांकि, इनमें से केवल 394 शेर ही गिर राष्ट्रीय उद्यान, गिर वन्यजीव अभयारण्य और इसके आसपास के क्षेत्रों वाले मुख्य क्षेत्र में पाए गए।
- अधिकांश शेर मुख्य क्षेत्र से बाहर के कई अन्य क्षेत्रों में फैले पाए गए। शेरों की आबादी बढ़ने के साथ-साथ उनका भौगोलिक वितरण क्षेत्र भी बढ़ा है।
- इस जनसंख्या में वृद्धि का श्रेय कानून प्रवर्तन, पर्यावास संरक्षण, शिकार की उपलब्धता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और वैज्ञानिक योगदान के मिले-जुले प्रयासों को जाता है।
गुजरात वन विभाग द्वारा राज्य में शेरों की संख्या के एक सर्वेक्षण से पता चला है कि एशियाई शेरों की बढ़ती आबादी के कारण वे अलग-अलग इलाकों में फैल रहे हैं।
ग्लोबल इकोलॉजी एंड कंजर्वेशन मैगज़ीन में प्रकाशित इस सर्वे के अनुसार, साल 2020 से 2025 के बीच एशियाई शेरों की आबादी 674 से बढ़कर 891 हो गई। हालांकि, इनमें से केवल 394 शेर ही गिर राष्ट्रीय उद्यान, गिर वन्यजीव अभयारण्य और इसके आसपास के क्षेत्रों वाले मुख्य क्षेत्र में पाए गए। अधिकांश शेर मुख्य क्षेत्र से बाहर के कई अन्य क्षेत्रों में फैले पाए गए।
एशियाई शेर गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में पाए जाते हैं, जो एक अर्ध-शुष्क भूभाग है। इस इलाके में छह संरक्षित क्षेत्र हैं और जिनमें घास के मैदान, शुष्क पर्णपाती वन और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र सहित विभिन्न प्रकार के आवास शामिल हैं। शेरों की आबादी बढ़ने के साथ-साथ उनका भौगोलिक वितरण क्षेत्र भी बढ़ा है, जो 2020 में 30,000 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 2025 में 35,000 वर्ग किलोमीटर हो गया है। यह आंकड़ा पांच सालों में 16.67% की वृद्धि दर्शाता है। गुजरात वन विभाग के वरिष्ठ वन अधिकारी और इस अध्ययन के प्रमुख लेखक मोहन राम ने कहा, “हम देख रहे हैं कि शेर अपने मूल आवासों पर फिर से कब्ज़ा कर रहे हैं।”
शोध पत्र में कहा गया है एशियाई शेरों की इस छितरी हुई आबादी (सेटेलाइट पॉपुलेशन) का विकास दुनिया के अन्य हिस्सों में अन्य बड़े मांसाहारी जीवों, जैसे यूरोप में भेड़िए और उत्तरी अमेरिका में कूगर, की बढ़ती आबादी के समान है। हालांकि, भारत में शेरों की बढ़ती आबादी के प्रभाव अलग हैं, खासकर तेजी से विकसित हो रहे सौराष्ट्र क्षेत्र में। शोध पत्र में कहा गया है कि नए आवासों के लिए “सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने के लिए सामुदायिक भागीदारी, संघर्ष-मुक्त फसल प्रणालियाँ, और जागरूकता कार्यक्रमों को शामिल करने वाले एक समग्र प्रबंधन दृष्टिकोण की आवश्यकता है।”

बदलता आवास क्षेत्र
गुजरात वन विभाग के अध्ययन के अनुसार, इस जनसंख्या में वृद्धि का श्रेय कानून प्रवर्तन, पर्यावास संरक्षण, शिकार की उपलब्धता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और वैज्ञानिक योगदान के मिले-जुले प्रयासों को जाता है। भारत में एशियाई शेरों के संरक्षण के कारण ही अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने 2008 में इस प्रजाति को “अत्यंत संकटग्रस्त” से “संकटग्रस्त” श्रेणी में पुनः वर्गीकृत किया।
गिर संरक्षित क्षेत्र, जिसमें गिर राष्ट्रीय उद्यान और गिर वन्यजीव अभयारण्य शामिल हैं, वह मुख्य क्षेत्र है जहाँ शेर हमेशा से पाए जाते रहे हैं। अध्ययन में इस मुख्य क्षेत्र के बाहर शेरों की नौ उप-आबादियों का विकास पाया गया। गिर संरक्षित क्षेत्र के बाहर, सबसे अधिक शेर अमरेली के सावरकुंडला-लिलिया क्षेत्र (125 शेर) और भावनगर में पाए गए। ये दोनों ही क्षेत्र इंसानी बस्तियां अधिक हैं।
भावनगर के तटों, सौराष्ट्र के दक्षिण-पश्चिम में सुत्रपाड़ा और वेरावल के बीच और दक्षिण-पूर्व में राजुला, जाफराबाद और नागेश्री क्षेत्रों में भी शेरों की आबादी में वृद्धि हुई है। शोध पत्र में कहा गया है, “यह वृद्धि घने वनस्पति आवरण (प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा के घने जंगल और कैसुआरिना के वृक्षारोपण) की उपलब्धता, नीलगाय और जंगली सूअर जैसी शिकार प्रजातियों की उपस्थिति और इन वन क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप में आई अपेक्षाकृत कमी के कारण हुई है।”
उल्लेखनीय है कि बरदा वन्यजीव अभयारण्य में शेरों की आबादी एक बार फिर से स्थापित हो सकी है। इस अभयारण्य में आखिरी बार शेरों को 1879 में देखा गया, लेकिन अब यहां 17 शेरों की आबादी है। “यह बेहतर पारिस्थितिक स्थितियों का संकेत देता है, विशेष रूप से संरक्षण, शिकार की उपलब्धता (नीलगाय और जंगली सूअर सहित) और संभावित गलियारों के संदर्भ में, जिन्होंने बरदा वन्यजीव अभयारण्य में प्राकृतिक फैलाव को सुगम बनाया है।”
जेतपुर और बाबरा-जसदान क्षेत्रों में भी पहली बार शेरों की नई आबादी दर्ज की गई, जिनमें क्रमशः छह और चार शेर शामिल हैं। शोध पत्र में कहा गया है, “यह समझना महत्वपूर्ण होगा कि सैटेलाइट आबादी स्थिर जनसांख्यिकीय इकाइयाँ हैं या अस्थायी सिंक क्षेत्र, ताकि भविष्य की जनसंख्या संरचना और फैलाव का पूर्वानुमान लगाया जा सके।”
मेटास्ट्रिंग फाउंडेशन के सीईओ और शेरों के विशेषज्ञ रवि चेल्लम के अनुसार, गिर की मुख्य आबादी से सैटेलाइट आबादी को अलग नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा, “इन स्थानों के बीच भौगोलिक दूरी बहुत कम है। शेर बहुत गतिशील होते हैं, और किसी स्थान पर उनकी उपस्थिति का यह अर्थ नहीं है कि वे वहीं तक सीमित रहते हैं।”
इस शोध पत्र में कहा गया है कि गिर क्षेत्र से शेरों का फैलाव “उनके मूल आवासों के लगभग ख़त्म होने का संकेत देता है”। चेल्लम सहित कई विशेषज्ञों ने भारत में शेरों के दीर्घकालिक अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए उन्हें इस क्षेत्र से बाहर स्थानांतरित करने सिफारिश की है।

आबादी में वृद्धि के प्रभाव
शोध पत्र में कहा गया है कि शेर मुख्य रूप से वन आवासों को पसंद करते हैं, उसके बाद “बंजर भूमि” को। “बंजर भूमि”, घने जंगलों से रहित विभिन्न प्रकार की भूमि का वर्णन करने के लिए प्रयुक्त एक प्रशासनिक शब्द है। ऐसी भूमि को इसलिए प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि “ये अपेक्षाकृत कम मानवीय हस्तक्षेप प्रदान करती हैं और नीलगाय और जंगली पशुधन जैसी शिकार प्रजातियाँ उपलब्ध कराती हैं, जिससे ये शेरों के लिए दिन और रात दोनों समय उपयुक्त होती हैं,” शोध पत्र में कहा गया है। शेर कृषि क्षेत्रों जैसे भू-भागों में भी पाए गए, और कुछ हद तक शहरी क्षेत्रों में भी।
जैसे-जैसे शेर मिश्रित उपयोग वाले आवासों, विशेष रूप से इंसानी भू-भागों में ज़्यादा पाए जा रहे हैं, इससे “इंसानों और शेरों के आमने-सामने आने की संभावना बढ़ सकती है,” शोध पत्र में कहा गया है। इसमें आगे कहा गया है कि शेरों की आबादी के उच्च घनत्व से “क्षेत्र का आकार कम हो सकता है, झुंडों और नर समूहों के बीच अधिक ओवरलैप हो सकता है, और प्रजनन करने वाली मादाओं और उच्च घनत्व वाले शिकार क्षेत्रों तक पहुँच के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।”
भारतीय वन्यजीव संस्थान के शोधकर्ताओं द्वारा 2024 में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि गुजरात में शेरों के साथ मानव संघर्ष बढ़ रहा है। साल 2012 और 2017 के बीच, पालतू जानवरों पर हमलों की रिपोर्ट करने वाले गांवों की कुल संख्या में प्रति वर्ष 105 की वृद्धि हुई, जो “शेरों की बढ़ती आबादी का संकेत” देती है। शेरों का डर और आर्थिक नुकसान शेरों के प्रति असहिष्णुता के प्रमुख कारण थे।
“शेरों का बढ़ता वितरण उन्हें मानव-प्रधान आवासों की ओर धकेल रहा है, जो उनके लिए अनुकूल नहीं हैं, क्योंकि अब उन्हें राजमार्गों, रेल्वे लाइनों, खुले कुओं और अवैध रूप से लगाए गए बिजली के बाड़ों जैसी बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इन अवांछित टकरावों का खामियाजा अक्सर गरीब लोगों को भुगतना पड़ता है,” चेल्लम ने कहा।
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मार्च में, सरकार ने संसद में खुलासा किया कि वृद्धावस्था, बीमारियों, लड़ाई में लगी चोटों, शावकों की मृत्यु, खुले कुओं में गिरने, बिजली के झटके और दुर्घटनाओं सहित अन्य कारणों से 2020 और 2025 के बीच 669 शेरों की मौत हुई।
गुजरात वन विभाग के राम के अनुसार, “संघर्ष जनगणना से अलग मुद्दा है।” “इस अभ्यास के आधार पर, स्वास्थ्य निगरानी और शमन उपायों को प्रभावों को कम करने के लिए विशेष रूप से लक्षित किया जा सकता है। उचित योजना से इन सभी कारकों में सुधार किया जा सकता है,” उन्होंने आगे बताया।
कार्यप्रणाली को लेकर चिंताएँ
शेरों की जनगणना में शेरों की पहचान करने के लिए न्यूनतम कुल गणना पद्धति का उपयोग किया गया। वन विभाग ने 13 प्रशासनिक प्रभागों के मानचित्र तैयार किए, जहाँ पहले शेरों की उपस्थिति दर्ज की गई थी, और इन्हें 735 सैंपल इकाइयों में विभाजित किया गया। प्रत्येक सैंपल इकाई में एक गणनाकर्ता (एक बीट गार्ड या वनपाल), दो सहायक गणनाकर्ता और एक वालंटियर थे, जिन्हें 24 घंटे की अवधि में डेटा इकठ्ठा करने की जिम्मेदारी दी गई थी। इसमें तस्वीरों के माध्यम से शेरों को देखे जाने की जानकारी दर्ज करना और लिंग, निशान, शावक की उपस्थिति जैसी जानकारी को दर्ज करने वाले एक फॉर्म को भरना शामिल था। इस प्रक्रिया में 3,000 से अधिक लोग शामिल थे।
शेरों के देखे जाने की जानकारी को क्षेत्रीय और आंचलिक स्तरों पर आपस में सत्यापित किया गया, और जरुरत पड़ने पर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का उपयोग जानकारी की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए किया गया।
हालाँकि, चेल्लम ने कहा कि यह विधि मानवीय त्रुटि की संभावना भी रखती है। “बाघों और तेंदुओं के विपरीत, शेरों के शरीर पर ऐसे विशिष्ट निशान नहीं होते हैं जिनसे कैमरा ट्रैप की तस्वीरों से अलग-अलग शेरों की पहचान की जा सके। यदि किसी गार्ड को 24 घंटे लगातार जागते रहना पड़े, तो इस बात की क्या गारंटी है कि कोई त्रुटि नहीं होगी?” उन्होंने आगे कहा, “अधिकांश वन्यजीव जनसंख्या अनुमान एक सीमा प्रदान करते हैं, लेकिन यह विधि एक निश्चित संख्या प्रदान करती है।”
शोधकर्ताओं ने शेरों की आबादी का सटीक आकलन करने के लिए अन्य तरीके भी सुझाए हैं, जिनमें कैप्चर-रीकैप्चर विधि शामिल है। इस विधि में कुछ जानवरों की तस्वीरें खींची जाती हैं, उन पर निशान लगाए जाते हैं और फिर से वही तस्वीर खींची जाती है ताकि यह देखा जा सके कि पहले से पहचाने गए जानवरों का अनुपात कितना था, जिससे कुल आबादी का अनुमान लगाया जा सके। शेरों को उनकी मूंछों पर मौजूद धब्बों से भी पहचाना जा सकता है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 7 जनवरी, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: गिर में एक झील के किनारे धूप सेकतीं शेरनियां। साल 2020 से 2025 के बीच, गुजरात में एशियाई शेरों की आबादी 674 से बढ़कर 891 हुई है। तस्वीर: Archana96 द्वारा विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0) के माध्यम से।