- मध्य प्रदेश में बचाए गए एक सिनेरियस गिद्ध को एक ट्रैकिंग डिवाइस लगाकर छोड़ा गया था। बाद में यह गिद्ध पाकिस्तान में घायल अवस्था में मिला।
- विशेषज्ञों का कहना है कि इस गिद्ध की उड़ान उसकी प्रजाति के मौसमी प्रवास से मेल खाती है। सर्दियों के बाद ये गिद्ध भारतीय उपमहाद्वीप से हिमालय और मध्य एशिया के अपने प्रजनन क्षेत्रों की ओर लौटते हैं।
- कजाकिस्तान, नेपाल और भारत में हुई ट्रैकिंग से पता चलता है कि गिद्ध नियमित रूप से भारत, पाकिस्तान, नेपाल और मध्य एशिया के बीच आवाजाही करते हैं।
भोपाल के वन विहार राष्ट्रीय उद्यान से इलाज के बाद छोड़ी गई एक मादा सिनेरियस गिद्ध कुछ ही दिनों में भारत की सीमा पार कर पाकिस्तान पहुंच गई जहां बाद में वह घायल हालत में मिली।
यह घटना दिखाती है कि गिद्धों की दुनिया इंसानी सीमाओं से कहीं बड़ी है। वे मौसम के हिसाब से भारत, पाकिस्तान, नेपाल और मध्य एशिया के बीच लंबी दूरी तय करते हैं। वैज्ञानिक अब ट्रैकिंग डिवाइस की मदद से उनके रास्तों, सर्दियों के ठिकानों और रास्ते में आने वाले खतरों को बेहतर ढंग से समझने की कोशिश कर रहे हैं।
भारत से पाकिस्तान पहुंचने वाली यह गिद्ध करीब दो साल की मादा सिनेरियस गिद्ध थी जो 22 जनवरी को मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले की सुसनेर रेंज के पारसुलिया गांव में घायल अवस्था में मिली। वन विभाग के अनुसार, गिद्ध के पैर में चोट थी। वहां से रेस्क्यू (बचाए जाने) किए जाने के बाद उसे इलाज के लिए भोपाल के वन विहार राष्ट्रीय उद्यान ले जाया गया। इलाज के बाद उसे नौ फरवरी को वन विहार के वल्चर कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर में पुनर्वास के लिए भेजा दिया गया।
पुनर्वास के बाद इस गिद्ध को रायसेन जिले के हलाली डैम क्षेत्र में 25 मार्च को छोड़ा गया, लेकिन एक ट्रैकिंग डिवाइस लगाकर। इस पूरी प्रक्रिया में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी ने विभाग की मदद की। इस डिवाइस के ट्रैकिंग डेटा से पता चला कि यह गिद्ध उत्तर-पश्चिम दिशा में उड़ते हुए राजस्थान से गुजरी और छह अप्रैल तक अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर पाकिस्तान पहुंच गई। इसके कुछ समय बाद डिवाइस से सिग्नल मिलाना बंद हो गया।

भारत में संरक्षण टीमों ने इसके बाद डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-पाकिस्तान और वहां के अधिकारियों से संपर्क किया। रिपोर्टिंग के दौरान मिली जानकारी के अनुसार, पाकिस्तान के खानेवाल जिले में स्थानीय लोगों ने इस गिद्ध को जमीन पर देखा और वन्यजीव अधिकारियों को सूचना दी। इसके बाद उसे वहां से बचाया गया। प्राथमिक उपचार के बाद उसे इलाज और निगरानी के लिए एक कैप्टिव ब्रीडिंग केंद्र में भेजा गया जहां फिलहाल यह गिद्ध ठीक हो रही है।
खानेवाल और मुल्तान क्षेत्र में उस समय तेज ओलावृष्टि की खबरें भी आई थीं और आशंका है कि इसी दौरान यह गिद्ध घायल हुई होगी।
सिनेरियस गिद्ध को आईयूसीएन रेड लिस्ट में खतरे के करीब वाली श्रेणी में रखा गया है। यह कंवेन्शन ऑन माइग्रेटरी स्पीशीज के परिशिष्ट-दो में शामिल है और भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-एक के तहत संरक्षित है।
प्रवास, रास्ते और खतरे
मध्य प्रदेश से पाकिस्तान तक इस गिद्ध की यात्रा देखने में असामान्य लग सकती है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह सिनेरियस या ब्लैक वल्चर के सामान्य मौसमी व्यवहार से मेल खाती है। गिद्ध विशेषज्ञ विभु प्रकाश ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि यह प्रजाति भारत में मुख्य रूप से सर्दियों में आती है। उन्होंने कहा, “सिनेरियस या ब्लैक वल्चर भारत में मुख्य रूप से सर्दियों में आने वाला पक्षी है। यह उत्तर पाकिस्तान, बलूचिस्तान और मध्य एशिया से भारत आता है। इसकी एक छोटी आबादी हिमाचल प्रदेश में भी प्रजनन करती है। यह आमतौर पर अक्टूबर तक भारत आ जाता है और मार्च-अप्रैल में वापस लौटता है।”
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के पूर्व उपनिदेशक और अब वडोदरा में स्वतंत्र शोधकर्ता प्रकाश के अनुसार, मध्य प्रदेश वाला यह गिद्ध संभवतः हिमालय और मध्य एशिया में अपने प्रजनन क्षेत्रों की ओर लौट रहा था। उन्होंने कहा, “यह आवाजाही सामान्य है।” उनके अनुसार, बचाए जाने और पुनर्वास के बाद भी प्रवास की सहज प्रवृत्ति खत्म नहीं होती। “इस प्रजाति के वापस लौटने का समय था, इसलिए यह गिद्ध वापस उड़ने की कोशिश कर रहा था। प्रवास करने वाले सभी पक्षियों में यह प्रवृत्ति होती है, चाहे वे घायल हों, पुनर्वास के बाद छोड़े गए हों या जंगल में पूरी तरह स्वस्थ हों।”
इसलिए इस मामले को छोड़े जाने के बाद हुई कोई असामान्य लंबी यात्रा मानने के बजाय, इसे प्रजाति के सामान्य मौसमी व्यवहार के रूप में देखा जा सकता है। प्रकाश के अनुसार, ऐसे मामले प्रवास के रास्तों को समझने में भी मदद करते हैं। उन्होंने कहा, “इससे हमें कुछ अंदाजा मिलता है कि यह प्रजाति प्रवास के दौरान किस रास्ते से गुजरती है।”

ट्रैकिंग से खुलती सीमाओं के पार की तस्वीर
मध्य प्रदेश से पाकिस्तान पहुंचा यह गिद्ध अकेला उदाहरण नहीं है। वन विभाग के अधिकारी राज्य से छोड़े गए एक पुराने टैग किए गए गिद्ध का भी उदाहरण देते हैं। साल 2025 में एक घायल यूरेशियन ग्रिफॉन गिद्ध का इलाज कर उसे हलाली डैम के पास छोड़ा गया था। बताया गया कि वह 4,300 किलोमीटर से ज्यादा उड़कर कजाकिस्तान पहुंचा और बाद में फिर भारत लौट आया। इससे यह समझने में मदद मिली कि इलाज के बाद छोड़े गए गिद्ध कहां जाते हैं और जंगल में लौटने के बाद उन्हें किन खतरों का सामना करना पड़ता है।
मध्य प्रदेश के इस मामले को जब कजाकिस्तान और नेपाल के ट्रैकिंग डेटा के साथ देखा जाता है, तो यह साफ होता है कि यह केवल एक गिद्ध की अलग घटना नहीं, बल्कि एक बड़े प्रवासी पैटर्न का हिस्सा है। साल 2024 में कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान में शुरू हुए एक अध्ययन में 2024-2025 के दौरान नौ सिनेरियस गिद्धों में जीपीएस-जीएसएम टैग लगाए गए। इनमें से छह गिद्ध भारत आए, दो ने पाकिस्तान के दक्षिणी हिस्से में सीमा के पास सर्दियां बिताईं और एक गिद्ध ताजिकिस्तान में रहा। अध्ययन में यह भी पाया गया कि ये गिद्ध लगातार दो मौसमों में उन्हीं सर्दियों वाले ठिकानों पर लौटे।
कजाकिस्तान के अस्ताना स्थित बायोडायवर्सिटी रिसर्च एंड कंजर्वेशन सेंटर की पक्षी विशेषज्ञ एलियोना कैप्ट्योंकिना ने कहा, “भारत और पाकिस्तान मध्य एशिया के सिनेरियस गिद्धों की आबादी के लिए, और कुल मिलाकर गिद्धों के लिए, बेहद जरूरी हैं।” उनके अनुसार, राजस्थान का बीकानेर जैसे इलाके अचानक पड़ने वाले ठहराव नहीं हैं। वहां पशुओं के शवों के रूप में नियमित भोजन मिलता है, जो खासकर युवा और कम अनुभव वाले पक्षियों के जीवित रहने के लिए जरूरी है। उनके मुताबिक, टैग किए गए गिद्धों का हर साल उन्हीं जगहों पर लौटना दिखाता है कि ये इलाके उनके जीवन चक्र का जरूरी हिस्सा हैं।

नेपाल का ट्रैकिंग डेटा भी यही दिखाता है कि दक्षिण एशिया में गिद्धों के लिए सीमाएं पार करना सामान्य व्यवहार है। नेपाल में गिद्धों पर काम कर रहे शोधकर्ता कृष्ण प्रसाद भुसाल ने कहा, “टेलीमेट्री से साफ पता चला है कि गिद्ध सामान्य रूप से भारत-नेपाल सीमा पार करते रहते हैं। यह उनके सामान्य रहन-सहन और भोजन खोजने के व्यवहार का हिस्सा है, न कि कभी-कभार होने वाली भटकने की घटना।” उनके अनुसार, नेपाल में अब तक जंगली और पुनर्वास के बाद छोड़े गए करीब 100 गिद्धों की टैगिंग से पता चला है कि ये पक्षी किसी एक तय रास्ते या संकरे कॉरिडोर पर निर्भर नहीं रहते। वे भोजन की तलाश में सैकड़ों किलोमीटर तक फैले बड़े इलाकों में घूमते हैं।
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प्रवासी रास्तों पर छिपे जोखिम
इन रास्तों पर खतरे भी सीमाओं से बंधे नहीं हैं। प्रकाश ने बताया कि ऐसे गिद्धों को डाइक्लोफेनाक, कीटोप्रोफेन और निमेसुलाइड जैसी जहरीली दवाओं से दूषित पशु शवों से खतरा हो सकता है। बिजली के तारों से करंट लगने और पाकिस्तान या प्रवास मार्ग के दूसरे देशों में शिकारियों द्वारा गोली मारे जाने का जोखिम भी रहता है। कैप्ट्योंकिना ने भी कहा, “जीपीएस ट्रैकिंग ने यहां मौजूद खतरों को समझने का हमारा तरीका बदल दिया है। भारतीय उपमहाद्वीप में पक्षी डाइक्लोफेनाक, कीटोप्रोफेन और निमेसुलाइड जैसी जानलेवा दवाओं के सबसे ज्यादा संपर्क में आते हैं।” उनके अनुसार, सर्दियों वाले इलाकों में बिजली की घनी लाइनें और ऊर्जा ढांचा भी टकराने और करंट लगने का जोखिम बढ़ाते हैं।
भुसाल के अनुसार, टेलीमेट्री से यह समझने में भी मदद मिली है कि संरक्षित इलाकों से बाहर जाने के बाद गिद्ध कहां और क्यों मरते हैं। उन्होंने दूषित शव, जहर और कुछ मामलों में सीधे नुकसान पहुंचाने या टैग हटाने को बड़े खतरे बताया। उनके अनुसार, मौतें अक्सर सुरक्षित क्षेत्रों से बाहर, खासकर सीमा पार जाने के बाद होती हैं।

इसीलिए विशेषज्ञ संरक्षण को भी गिद्धों की आवाजाही के पैमाने पर देखने की बात करते हैं। कैप्ट्योंकिना के अनुसार, सीमा पार जाने वाले इन गिद्धों के पूरे जीवन चक्र को समझने के लिए देशों के बीच सहयोग और शोधकर्ताओं के नेटवर्क की जरूरत है। भुसाल ने नेपाल के वल्चर सेफ जोन, सुरक्षित भोजन, समुदाय की भागीदारी और वैज्ञानिक निगरानी वाले मॉडल का उदाहरण दिया। उनके अनुसार, पशुओं में डाइक्लोफेनाक जैसी दवाओं को हटाने से गिद्धों की आबादी की वापसी में मदद मिली है। उन्होंने कहा, “दक्षिण एशिया में गिद्ध संरक्षण के लिए उनके पूरे उड़ान क्षेत्र के स्तर पर मजबूत तालमेल और साझा समझ बहुत जरूरी है।”
प्रकाश ने हालांकि छोड़े गए पक्षियों के जंगल में बचने की संभावना को लेकर सावधानी भी जताई। उन्होंने कहा, “जंगल में सिर्फ बहुत फिट पक्षी ही लंबे समय तक बच पाते हैं। जिन पक्षियों को बचाकर बाद में जंगल में छोड़ा जाता है, वे आमतौर पर बहुत लंबे समय तक जीवित नहीं रह पाते, क्योंकि वे अक्सर पूरी तरह फिट नहीं होते।”
बैनर तस्वीर- कजाकिस्तान में अध्ययन के दौरान रेस्क्यू किया गया सिनेरियस गिद्ध। ऐसी ट्रैकिंग से वैज्ञानिक गिद्धों के प्रवासी रास्तों, सर्दियों के ठिकानों और रास्ते में आने वाले खतरों को समझने की कोशिश कर रहे हैं।तस्वीर साभार: एलियोना कैप्ट्योंकिना