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नेपाल के मधेस के जल संकट में कृत्रिम तालाबों से राहत, विशेषज्ञों ने खराब डिजाइन पर चेताया

नेपाल के मधेस के सप्तरी में चावल के खेत में एक महिला किसान। तस्वीर - फ़्लिकर के माध्यम से द एडवोकेसी प्रोजेक्ट (CC BY-NC-SA 2.0) द्वारा। 

नेपाल के मधेस के सप्तरी में चावल के खेत में एक महिला किसान। तस्वीर - फ़्लिकर के माध्यम से द एडवोकेसी प्रोजेक्ट (CC BY-NC-SA 2.0) द्वारा। 

  • नेपाल के मैदानी इलाकों में भयंकर सूखे की वजह से, लोग पीने, सिंचाई और दूसरे कामों के लिए पानी की कमी से निपटने के लिए कृत्रिम तालाब बना रहे हैं।
  • ये तालाब “नेचर-बेस्ड सॉल्यूशन” के तौर पर प्रचलित हैं और स्थानीय लोग और सरकार दोनों इन्हें बनाने में मदद कर रहे हैं।
  • शोध और लोगों की बातों से पता चलता है कि ये तालाब भूजल स्तर बढ़ाने के साथ-साथ इंसानों और वन्यजीवों के बीच टकराव को कम करने में भी सहायक हैं।
  • हालांकि, विशेषज्ञ जानकारी में बड़ी कमी की चेतावनी देते हैं, और कहते हैं कि कई तालाब खराब तरीके से डिज़ाइन किए गए हैं, बिना वैज्ञानिक तरीके से बनाए गए हैं या गलत जगहों पर हैं।

नेपाल के दक्षिण पूर्वी मधेस प्रदेश के राजाबास गांव के लोग 2024 की गर्मियों तक आठ साल से अधिक समय तक पानी की कमी से जूझते रहे। इसका कारण भीषण गर्मी के कारण इस क्षेत्र के कुओं और झरनों का सूख जाना था।

इस गांव के किसान कुल बहादुर अधिकारी ने उन दिनों को याद करते हुए कहा, “नहाने, कपड़े धोने या खेतों की सिंचाई करने की तो बात ही छोड़िए, हमारे पास पीने तक के लिए पानी नहीं था।” “हम एक समाधान ढूंढ रहे थे, तभी हमें यह विचार आया कि अगर हम बरसाती मौसम में पानी देने वाले एक झरने से पानी इकट्ठा करके एक तालाब बना लें, तो हम उसे सूखे मौसम में इस्तेमाल कर सकते हैं,” उन्होंने मोंगाबे को बताया।

नेपाल के मैदानी इलाकों में भीषण सूखे की स्थिति को देखते हुए, राजाबास के लोगों, जैसे समुदाय और सरकार जल संकट के प्राकृतिक समाधान के रूप में कृत्रिम तालाबों की ओर रुख कर रहे हैं। हालांकि, इस निर्माण को लेकर विशेषज्ञ यह चेतावनी दे रहे हैं कि अवैज्ञानिक निर्माण और खराब शासन लम्बे समय में उनकी प्रभावशीलता को सीमित कर सकते हैं।

साल 2024 में जब गर्मी के मौसम में बारिश हुई तो लगभग 83 घरों वाले राजाबास गांव ने सरकार द्वारा वित्त पोषित 15,000 अमेरिकी डॉलर की लागत से निर्मित 51,030 वर्ग फुट के तालाब में पानी इकट्ठा किया। उसके बाद सूखे के मौसम में, गांववालों ने न केवल इस तालाब के पानी से अपनी मक्का और धान की फसलों की सिंचाई की, बल्कि हर घर के हैंडपंप से हर दिन लगभग 70 लीटर पीने का पानी भी निकाल सके।

“इस साल पूरे मधेस प्रदेश में सूखे की मार झेलने के बावजूद हमें पानी की कमी महसूस नहीं हुई,” महोत्तरी के राजाबास स्थित मरकौरा सामुदायिक वन के सदस्य शिव कुमार राना ने कहा।

राना जिस सूखे की बात कर रहे थे, वह 2025 में विशेष रूप से गंभीर रहा है। क्षेत्र में मानसून की बारिश में देरी के कारण किसान समय पर अपनी मुख्य फसल धान की बुवाई नहीं कर पाए। इसी वजह से नेपाल की केंद्र सरकार ने मधेस को सूखाग्रस्त क्षेत्र घोषित कर दिया। कृषि विभाग के अनुसार, 25 जुलाई तक मधेश प्रांत की 5,

80,000 हेक्टेयर (14 लाख एकड़) भूमि में से केवल 51% पर ही धान की बुवाई हो पाई थी।

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (इसिमोड) द्वारा किये गए एक आकलन में स्थिति को मौसम संबंधी सूखे (सामान्य से कम वर्षा) और जल संबंधी सूखे (नदियों, झीलों और भूजल का सूखना) के संयोजन के रूप में वर्णित किया गया है। इन दोनों के कारण कृषि सूखा पड़ा है, जिसमें फसलों को पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है, जिससे फसलें खराब हो रही हैं और किसानों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है।

जल तथा मौसम विज्ञान विभाग द्वारा नेपाल के जलवायु रुझान विश्लेषण पर जारी रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि इस आकलन के निष्कर्ष दीर्घकालिक रूप से भी प्रासंगिक हो सकते हैं। रिपोर्ट में नेपाल के मधेस क्षेत्र में तापमान में वृद्धि और औसत वार्षिक वर्षा में कमी का रुझान दर्शाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 40 वर्षों में मधेस क्षेत्र में औसत तापमान 1.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है और औसत वार्षिक वर्षा 72 मिलीमीटर कम हो गई है।

नेपाल के एक तालाब में बैठा बगुला (आर्डेओला ग्रेई)। तस्वीर - मिलदीप द्वारा विकिमीडिया कॉमन्स (CCB 4.0) के माध्यम से।
नेपाल के एक तालाब में बैठा बगुला (आर्डेओला ग्रेई)। तस्वीर – मिलदीप द्वारा विकिमीडिया कॉमन्स (CCB 4.0) के माध्यम से।

प्रत्यक्ष अनुभव भी इन निष्कर्षों का समर्थन करते हैं। अमेरिका के न्यू मैक्सिको स्टेट यूनिवर्सिटी में वाटरशेड मैनेजमेंट में पीएचडी कर रहे कौस्तुभ राज न्यौपाने, जो जल प्रबंधन के लिए पुनर्भरण विकल्पों पर शोध कर रहे हैं, ने कहा, “सामान्य मानसून का मौसम आए काफी समय हो गया है। तीस साल पहले, एक या दो सप्ताह तक बारिश होती थी, जिससे जल भंडार भर जाता था।”

“अब, थोड़े समय के लिए भारी बारिश होती है, और सारा पानी तेजी से समुद्र में बह जाता है,” उन्होंने बताया।

राजाबास जैसे गांवों को तालाबों द्वारा मिलने वाला जल संचयन सेवा का काम परंपरागत रूप से मधेस के उत्तर में स्थित चुरे पर्वतमाला द्वारा किया जाता था। नदियों के जमाव से बनी यह “नाजुक” पर्वतमाला, सिंधु-गंगा के मैदानों में भूजल संचयन और पुनर्भरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पहले, चुरे पर्वतमाला के घने वृक्षों के कारण पानी मिट्टी में रिसकर भूजल स्तर को बढ़ाता था। अब, बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और तेज बारिश के कारण अचानक बाढ़ और मिट्टी का कटाव होता है, जिससे भूजल स्तर में कोई वृद्धि नहीं होती है।

प्रकृति आधारित समाधान

राजाबास की कहानी नेपाल के मैदानी इलाकों में सूखे और भूजल स्तर में गिरावट से निपटने के लिए प्रकृति पर आधारित समाधान के रूप में कृत्रिम तालाबों की बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाती है।

मोंगाबे ने जिन स्थानीय समुदायों से बात की, उनमें से कई ने बताया कि तालाब जल संकट को दूर करने और कम करने में कारगर साबित हुए हैं। उदाहरण के लिए, पश्चिमी नेपाल के दांग जिले में स्थित घोराही उपमहानगर ने पिछले पांच वर्षों में 45 तालाबों का निर्माण किया है। शहर के मेयर नरुलाल चौधरी ने कहा, “कृत्रिम तालाबों से हमें कई लाभ मिल रहे हैं। एक तालाब पर लगभग 5,00,000 डॉलर से 1,50,000 डॉलर खर्च करके हम किसानों की न केवल कृषि में, बल्कि मत्स्य पालन में भी मदद कर पाए हैं।” उन्होंने आगे कहा कि इन तालाबों से जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने में भी मदद मिली है।

कुछ तालाबों की सफलता को वैज्ञानिक रूप से भी प्रमाणित किया गया है। पूर्वी नेपाल के सिराहा जिले में स्थित खुट्टी खोला जलक्षेत्र में भूजल संसाधनों के वैज्ञानिक आकलन से पता चला है कि कृत्रिम तालाब जल संकट को कम करने का एक स्थायी समाधान हो सकते हैं। इसमें यह भी पाया गया कि तालाब स्थानीय समुदायों की आजीविका और जीवन शक्ति को बेहतर बनाने में सहायक होते हैं। एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि जब रतु खोला जलक्षेत्र में एक कृत्रिम तालाब बनाया गया, तो सूखे के मौसम में भूजल स्तर 1.5-3 मीटर (4.9-9.8 फीट) तक बढ़ गया।

कुछ सामुदायिक वन उपयोगकर्ता समूहों का कहना है कि उनके वनों में बने तालाबों से न केवल भूजल का पुनर्भरण हुआ है, बल्कि मानव-वन्यजीव संघर्षों को कम करने में भी मदद मिली है। बरदिबास-3 स्थित रतु महिला सामुदायिक वन उपयोगकर्ता समूह ने अपने सामुदायिक वन में एक तालाब का निर्माण किया है। बरदिबास-3 के कालापानी गांव के निवासी केदार भंडारी ने बताया कि तालाब बनने के बाद मानव-वन्यजीव संघर्ष कम हो गया है। उन्होंने कहा, “गर्मी के मौसम में वन्यजीव पानी की तलाश में गांव में आते थे। तालाब बनने के बाद वे अब उतनी बार गांव में नहीं आते। हम सूखे के मौसम में जंगल की आग को बुझाने के लिए भी तालाब के पानी का उपयोग करते हैं।”

इस क्षेत्र में जल संकट से जुड़ी वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए, कई गैर-सरकारी संगठनों और प्रांतीय एवं संघीय सरकारों ने किसानों को सूखे से निपटने में मदद करने के लिए एक अनुकूलन उपाय के रूप में पुनर्भरण तालाबों में जल संग्रहण को शामिल किया है। मधेस की राज्य सरकार ने अपने आधिकारिक बजट में पुनर्भरण तालाब कार्यक्रमों को शामिल किया है, जबकि नेपाल की केंद्र सरकार ने ग्रीन क्लाइमेट फंड द्वारा वित्त पोषित चुरिया को क्लाइमेट रेसिलिएंट बनाने वाले कार्यक्रम को लागू किया है। इस कार्यक्रम के तहत पुनर्भरण तालाबों के निर्माण के लिए लगभग 39.4 मिलियन डॉलर का अनुदान दिया गया है। कार्यक्रम के तकनीकी सलाहकार बिष्णु हरि पौड्याल ने बताया कि पुनर्भरण तालाबों का निर्माण इसका एक प्रमुख घटक है। “पुनर्भरण तालाब वर्षा जल और अपवाह को रोकते हैं और भूजल को फिर से भरते हैं। इससे मृदा अपरदन को नियंत्रित करने में भी मदद मिलती है,” उन्होंने समझाया।

सप्तरी जिले के एक तालाब में बत्तखों का झुंड। तस्वीर - पंकज देव द्वारा विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0) के माध्यम से।
सप्तरी जिले के एक तालाब में बत्तखों का झुंड। तस्वीर – पंकज देव द्वारा विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0) के माध्यम से।

सही ज्ञान का अभाव

हालांकि समुदायों का कहना है कि तालाब भूजल पुनर्भरण में सुधार करते हैं, लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि खराब डिजाइन, कमजोर शासन और तालाबों पर अत्यधिक निर्भरता उनके दीर्घकालिक लाभों को सीमित कर सकती है।

भूजल पुनर्भरण बढ़ाने और सिंचाई के लिए बनाए गए स्थानीय तालाब कई बार वन्यजीवों के लिए जाल बन गए हैं। देश के कई हिस्सों में ऐसे तालाबों में गिरने से बंदरों की मौत हो चुकी है। उदाहरण के लिए, 2 अक्टूबर 2022 को अर्घाखांची के संधिखारका में 27 बंदर डूब गए। गोरखा, ओखलढुंगा और सिंधुपालचोक जिलों में भी इसी तरह की घटनाएं सामने आई हैं।

नेपाल जल संरक्षण फाउंडेशन के अध्यक्ष नगामिंद्र दहल ने कहा कि स्थानीय सरकारों द्वारा निर्मित कई तालाब वैज्ञानिक रूप से डिज़ाइन नहीं किए गए हैं। उन्होंने कहा, “मैंने कुछ तालाबों में कंक्रीट की परत देखी।”

त्रिभुवन विश्वविद्यालय के जैव विविधता विशेषज्ञ और प्रोफेसर एमेरिटस राम प्रसाद चौधरी ने भी कुछ ऐसे उदाहरण साझा किए जहां तालाबों का निर्माण उचित नहीं ठहराया जा सकता। चौधरी ने कहा, “उदाहरण के लिए, सप्तरी और सिंधुली जिलों में तालाब नदी के किनारों से मात्र 15 मीटर (50 फीट) दूर बनाए गए हैं। नदी के इतने करीब तालाब की कोई आवश्यकता नहीं है – यह बजट का सरासर दुरुपयोग है।”

काठमांडू स्थित त्रि-चंद्र बहुमुखी कैंपस के वरिष्ठ जलविज्ञानी और विजिटिंग प्रोफेसर नीर शाक्य ने कहा कि तालाबों की व्यवहार्यता तय करने में स्थल का चयन एक महत्वपूर्ण कारक है। उन्होंने कहा, “यदि प्राकृतिक पुनर्भरण पर्याप्त है, तो अतिरिक्त तालाबों की आवश्यकता नहीं है।”

अन्य विशेषज्ञों के अनुसार, तालाब बनाने के लिए विभिन्न जलवैज्ञानिक और भूवैज्ञानिक कारकों पर भी विचार करना आवश्यक है। अमेरिका के न्यौपाने ने कहा, “जल बजट और सतही जल तथा भूजल के बीच की गतिशीलता को समझना पुनर्भरण क्षेत्रों की पहचान के लिए आवश्यक है। एक जलविभाजक क्षैतिज, लंबवत और पार्श्व रूप से जुड़ा होता है, इसलिए तालाब निर्माण जैसी किसी भी पुनर्भरण रणनीति में भूविज्ञान और अन्य भू-आकृतिक कारकों के आधार पर पुनर्भरण को समर्थन देने के तरीके पर विचार करना चाहिए।”


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उन्होंने बताया कि नेपाल के आर्द्र क्षेत्रों में वर्षा और रिसाव के माध्यम से जलभंडारों में व्यापक रूप से जलभरण होता है, इसलिए कृषि या परती भूमि पर वर्षा जल के बहाव के माध्यम से जल का प्रसार जलभरण में सुधार का एक उपयुक्त तरीका हो सकता है।

शोधकर्ताओं का तर्क है कि देश में तालाबों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ लोगों को इस बारे में जागरूक करना भी आवश्यक है कि वे क्या कर सकते हैं और क्या नहीं कर सकते। इसी संदर्भ में दहल ने कहा, “समझ में बहुत बड़ा अंतर है। हमें स्थानीय लोगों और सरकारों को इस अवधारणा और इसके निहितार्थों से अवगत कराना होगा।”

न्यौपाने ने इस बात पर जोर दिया कि कृत्रिम तालाबों के निर्माण के साथ-साथ चुरे और भाबर क्षेत्रों में पारंपरिक कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देना भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा, “कृषि भूजल पुनर्भरण में सहायक होती है; यह प्रकृति पर आधारित समाधान है। जब कृषि को छोड़ दिया जाता है और भूमि बंजर हो जाती है, तो इससे पुनर्भरण प्रणाली को नुकसान पहुंचता है।”


यह खबर मोंगाबे टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी ग्लोबल वेबसाइट पर 28 अगस्त, 2025 को प्रकाशित हुई थी।


बैनर तस्वीर: नेपाल के मधेस के सप्तरी में चावल के खेत में एक महिला किसान। तस्वीर – फ़्लिकर के माध्यम से द एडवोकेसी प्रोजेक्ट (CC BY-NC-SA 2.0) द्वारा।

 

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