- मालाबार पिट वाइपर के काटने को आम तौर पर मामूली माना जाता है, लेकिन नए सबूत बताते हैं कि इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
- मौजूदा एंटीवेनम पिट वाइपर के ज़हर को बेअसर करने में कम असर दिखाते हैं, जिससे खास तरह के या ज़्यादा पॉलीवैलेंट एंटीवेनम का मामला मज़बूत होता है।
- पहचान में कमी, छिपने की प्रकृति और रात में काटने के हालात मालाबार पिट वाइपर के ज़हर के बारे में कम रिपोर्टिंग और कम समझ की वजह बनते हैं।
मालाबार पिट वाइपर के बारे में हमें कितनी जानकारी है? शायद बहुत ही कम। वो भी तक जब यह पश्चिमी घाट का एक प्रसिद्ध सरीसृप है। मालाबार पिट वाइपर (क्रैस्पेडोसेफालस मालाबारिकस) अपने कई अनोखे रंगों या पॉलीमॉर्फिज्म के लिए जाना जाता है। यह सांप बहुत कम दिखाई देता है और बादामी भूरे और सरसों के पीले से लेकर हरे, कोरल और भी कई रंगों में पाया जाता है। बहुत कम सांपों में इतने बड़े बदलाव होते हैं, और इसी कारण यह प्रजाति पश्चिमी घाट के सबसे खूबसूरत जीवों में से एक बन जाती है। हालांकि, चिकित्सकीय तौर पर एक महत्वपूर्ण प्रजाति होने के बावजूद भी मालाबार पिट वाइपर के ज़हर के बारे में बहुत कम जानकारी है क्योंकि इसके काटने को आमतौर पर मामूली माना जाता है।
वैज्ञानिकों की एक टीम ने एक शोध किया जिसमें सांप के काटने से ज़हर कैसे फैलता है और इसके अलग-अलग पहलुओं की जांच की गई। यह शोध जानकारी की कमी को पूरा करने और क्लीनिक मैनेजमेंट को बेहतर बनाने के लिए किया गया है। कर्नाटका के मणिपाल में कस्तूरबा मेडिकल कॉलेज में सेंटर फॉर विल्डरनेस मेडिसिन के एसोसिएट प्रोफेसर, फ्रेस्टन मार्क सिरुर, जिन्होंने इस शोध की अगुवाई की, बताते हैं, “इन (मालाबार पिट वाइपर) जैसे पिट वाइपर से ज़हर फैलने का एक कारण यह है कि इसके बारे में ज़्यादा पता नहीं है, और हम इस पर काम कर रहे हैं। क्योंकि काटने पर सांप की पहचान में बहुत बड़ा अंतर होता है।” उन्होंने विस्तार से बताया, “कुछ मामलों में, मरीज़ ने सांप को नहीं देखा होता है। कभी-कभी काटने की घटना रात में होती है। कभी-कभी यह घास या झाड़ियों में होता है और सांप दिखाई नहीं देता है।”
मालाबार पिट वाइपर पेड़ पर रहते हैं और छिपने में माहिर होते हैं। सिरूर कहते हैं कि अधिकतर मामलों में जब लोग झाड़ियों में काम कर रहे होते हैं तब ये सांप उन्हें पेड़ की डालियों से काटते हैं। वे कहते हैं, “दिलचस्प बात यह है कि हमारे पास ऐसे मामले भी आए हैं जब लोगों को चेहरे या शरीर के ऊपरी हिस्से पर काटा गया।”

शोधकर्ताओं ने मई 2018 से मार्च 2024 के बीच तटीय कर्नाटका के एक उच्च स्तरीय स्वास्थ्य केंद्र में आए मालाबार पिट वाइपर के ज़हर के 16 कन्फर्म और माने हुए मामलों का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि सभी 16 मरीज़ों को शरीर के जिन भागों में काटा गया था, उन जगहों पर ज़हर का असर साफ़ था। इसके अलावा, 50% में कोगुलोपैथी (खून का थक्का जमने में दिक्कत) हो गई, और 25% में किडनी की हल्की दिक्कतें दिखीं। कुछ मामलों में कम्पार्टमेंट सिंड्रोम भी शामिल है, यह एक गंभीर स्थिति है जिसमें मांसपेशियों में बढ़ा हुआ दबाव खून के बहाव को रोक देता है, जिससे ऑक्सीजन की कमी, दर्द, और तंत्रिकाओं या मांसपेशियों को नुकसान होता है।
सिरूर का कहना है कि सबूत इस बात को सपोर्ट करने के लिए काफी हैं कि हमें प्रजातिओं के अनुसार एंटीवेनम की ज़रूरत है। वे कहते हैं, “हम इन कम जाने-पहचाने लेकिन चिकित्सा की दृष्टि से ज़रूरी ज़हरीले सांपों के बारे में जागरूकता बढ़ा रहे हैं ताकि एंटीवेनम बनाने वाले उन्हें अपने प्रतिरक्षण समूह में शामिल करने पर सोच सकें।”
पिट वाइपर का चिकित्सा में महत्व
पश्चिमी घाट में पिट वाइपर के चिकित्सा में महत्व पर 2023 में हुई एक स्टडी में तीन पिट वाइपर प्रजातियों — हंप-नोज़्ड पिट वाइपर (हाइपनेल हाइपनेल), मालाबार पिट वाइपर (क्रैस्पेडोसेफालस मालाबारिकस), और बैम्बू पिट वाइपर (क्रैस्पेडोसेफालस ग्रैमिनियस) के ज़हर की बनावट, बायोकेमिकल एक्टिविटी, टॉक्सिसिटी और बीमारी की संभावना का भी मूल्यांकन किया गया। स्टडी में पाया गया कि हालांकि भारत में “चार बड़े” सांप — रसेल वाइपर (डाबोइया रसेली), कॉमन क्रेट (बंगारस कैर्यूलस), इंडियन कोबरा (नाजा नाजा) और इंडियन सॉ-स्केल्ड वाइपर (एचिस कैरिनेटस) — मुख्य रूप से पाए जाते हैं, ये पिट वाइपर सांप के काटने से होने वाली बीमारी में काफी योगदान देते हैं, कभी-कभी खास इलाकों में इनके काटने की फ्रीक्वेंसी चार बड़े सांपों से भी ज़्यादा होती हैं।

पेपर में बताया गया है कि मालाबार पिट वाइपर गंभीर हेमरेजिक और नेक्रोटिक असर पैदा कर सकता है, जिससे गंभीर टिशू डैमेज होने का खतरा रहता है। इसके अलावा, स्टडी में यह भी बताया गया है कि इसके जहर में बाकी तीनों पिट वाइपर के ज़हर से ज़्यादा नेफ्रोटॉक्सिसिटी होती है, जिससे भारत में पिट वाइपर के ज़हर के लिए खास एंटीवेनम की ज़रूरत होती है।
सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज के साइंटिस्ट और प्रोफेसर कार्तिक सुनगर, जिन्होंने इस शोध की अगुवाई की है, ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि स्टडी में यह बात सामने आई कि मालाबार पिट वाइपर और बैम्बू पिट वाइपर में भी बहुत तेज़ ज़हर होता है। हालांकि, वे इतना कम ज़हर बनाते हैं कि उनके काटने से बहुत ज़्यादा नुकसान नहीं होता। “मालाबार पिट वाइपर और बैम्बू पिट वाइपर दोनों में ज़हर की ताकत कई मामलों में हम्प-नोज़्ड पिट वाइपर के बराबर होती है। असल में, हमने हम्प-नोज़्ड की तुलना में मालाबार पिट वाइपर में बहुत ज़्यादा कोएगुलोपैथी देखी, लेकिन बात यह है कि वे बहुत कम ज़हर बनाते हैं जिससे ज़्यादातर मामलों में काटने का असर बहुत ज़्यादा नहीं होता।” हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा एंटी-वेनम असल में ज़हर को बहुत अच्छी तरह से बेअसर नहीं करता है।
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इस हालिया शोध के ज़रिए, सिरुर और टीम का मकसद मालाबार पिट वाइपर के ज़हर के असर के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। “मेडिकल कम्युनिटी और आम लोगों, दोनों के बीच और ज़्यादा रिसर्च और जागरूकता की ज़रूरत है। बहुत से लोग अभी भी जटिलताओं के साथ जीते हैं या शुरू में नॉन-मेडिकल केयर लेते हैं, जिससे इमरजेंसी ट्रीटमेंट में देरी होती है।” जब तक ऐसा नहीं होता, शोधकर्ता चेतावनी देते हैं कि किसी भी सांप के काटने पर तुरंत मेडिकल मदद की ज़रूरत होती है। सुनगर कहते हैं, “आपको किसी इंसान की अंदरूनी कंडीशन के बारे में पूरी जानकारी नहीं होती और आपको नहीं पता होता कि ज़हर कैसे काम करेगा। बिना देर किए अस्पताल जाना हमेशा सबसे अच्छा होता है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 12 दिसंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: पेपर में बताया गया है कि मालाबार पिट वाइपर गंभीर हेमरेजिक और नेक्रोटिक असर पैदा कर सकते हैं, जिससे गंभीर टिशू डैमेज होने का खतरा रहता है। तस्वीर – बोस मादप्पा।