- उत्तर प्रदेश के विंध्य के जंगलों में एक ही जगह पर एक स्लॉथ बेयर कंज़र्वेशन रिज़र्व और एक थर्मल पॉवर प्लांट का प्रस्ताव है।
- एनजीटी की प्रधान पीठ ने अब मिर्जापुर थर्मल एनर्जी परियोजना की पर्यावरण मंजूरी को चुनौती देने वाली अपील पर नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, ट्रिब्यूनल परियोजना से जुड़े कथित उल्लंघनों और गतिविधियों पर रोक लगाने की मांग पर भी सुनवाई करेगा।
- स्लॉथ बेयर पहले से मिर्ज़ापुर के सूखे पतझड़ वाले जंगलों और पहाड़ी इलाकों में रहते आए हैं। उनके रहने की जगहों को बचाना इस प्रजाति के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए ज़रूरी है।
उत्तर प्रदेश में स्लॉथ बेयर, यानी मैदानी इलाकों में रहने वाला भालू जिसे रीछ के नाम से भी जाना जाता है, के लिए प्रस्तावित संरक्षण क्षेत्र (कंज़र्वेशन रिज़र्व) एक थर्मल पॉवर प्लांट के साथ लंबी लड़ाई में फंसा हुआ है। वैज्ञानिक अध्ययनों और वन अधिकारियों द्वारा मिर्ज़ापुर में विंध्य के जंगलों में इस स्लॉथ बेयर रिज़र्व के प्रस्ताव का समर्थन करने और कई कानूनी चुनौतियों के बावजूद भी इस प्लांट का काम आगे बढ़ गया है। कोयले से चलने वाला या पॉवर प्लांट 1,600 मेगावाट क्षमता का होगा।
रीछ ऐतिहासिक रूप से मिर्ज़ापुर के सूखे पतझड़ वाले जंगलों और पहाड़ी इलाकों में रहते आए हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाने वाला रीछ, उर्सिड की अकेली ऐसी प्रजाति है जो चींटियों, दीमकों और फलों को खाने के लिए खुद को ढाल लेती है। इसकी यह खासियत इसके छोटे आवास क्षेत्रों (हैबिटैट) में, अक्सर मुश्किल हालात में और इंसानी दिक्कतों को कुछ हद तक सहने के लिए बहुत ज़रूरी है। इस भालू के रहने की ख़ास जगहों को बचाना इसके अस्तित्व को बचाए रखने के लिए बहुत ज़रूरी है।
विंध्य इकोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री फाउंडेशन (VENHF) के को-फाउंडर और विंध्य के जंगल से सटे हुए बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) के साउथ कैंपस से ग्रेजुएट देबादित्य सिन्हा ने कहा, “अगर (थर्मल पावर प्लांट) प्रोजेक्ट बताई गई जगह पर लगाया जाता है, तो इसके लिए रेल्वे लाइन, पानी की पाइप लाइन, ट्रांसमिशन लाइन और आवाजाही के लिए रोड की ज़रूरत होगी, ये सभी पूरे जंगल से होकर गुज़रेंगे। यह जंगल के लिए बहुत बुरा होगा।”
ताजा घटनाक्रम में, एनजीटी की प्रधान पीठ ने मिर्जापुर थर्मल एनर्जी परियोजना की पर्यावरण मंजूरी को चुनौती देने वाली अपील पर नोटिस जारी किया है। यह परियोजना मिर्जापुर थर्मल एनर्जी (UP) प्राइवेट लिमिटेड की है, जो अडानी पावर की सहायक कंपनी है। याचिकाकर्ता के अनुसार, ट्रिब्यूनल परियोजना से जुड़े कथित उल्लंघनों और गतिविधियों पर रोक लगाने की मांग पर भी सुनवाई करेगा। एनजीटी का विस्तृत आदेश अभी वेबसाइट पर अपलोड होना बाकी है।

वन्यजीवों की विरासत
मिर्ज़ापुर लंबे समय से गंगा नदी पर एक ज़रूरी एडमिनिस्ट्रेटिव और ट्रेडिंग सेंटर रहा है। इसके जंगल वन्य जीवन से भरे हुए हैं, और ख़बरों के अनुसार लगभग एक सदी पहले तक यहाँ के सवाना के इलाकों में चीते भी दिखते थे।
साल 2019 में, एक कैमरा ट्रैप सर्वे में रीछ और एशियाई जंगली बिल्ली को रिकॉर्ड किया गया, जो उत्तर प्रदेश में इस बिल्ली का पहला रिकॉर्ड था। यह स्टडी, जिसे डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (मिर्जापुर) और सिन्हा वगैरह ने मिलकर लिखा था, स्लॉथ बेयर को मुख्य प्रजाति के तौर पर रखते हुए कंजर्वेशन रिजर्व के प्रस्ताव का आधार बनी। यह रिजर्व तीन फॉरेस्ट रेंज, मरिहान, सुकृत और चुनार में फैला होगा, जो अपने आस-पास के सुरक्षित इलाकों के लिए भी ज़रूरी कॉरिडोर हैं।
स्लॉथ बेयर के अलावा, स्टडी में तेंदुआ, बंगाल फॉक्स, धारीदार लकड़बग्घा, एशियाई जंगली बिल्ली, रस्टी स्पॉटेड कैट, सांभर, चिंकारा, काला हिरण और मगरमच्छ की मौजूदगी का भी ज़िक्र है। स्थानीय मीडिया में कैमूर और चंद्रप्रभा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी जैसे आस-पास के सुरक्षित इलाकों से बाघों के आने-जाने की भी खबरें आई हैं।

जंगल में कोयला पॉवर प्लांट
यह प्लांट जो पहले वेलस्पन प्राइवेट लिमिटेड के स्वामित्व था, मिर्ज़ापुर थर्मल एनर्जी (UP) प्राइवेट लिमिटेड द्वारा खरीदा गया। मिर्ज़ापुर थर्मल एनर्जी (UP) प्राइवेट लिमिटेड अडानी पावर लिमिटेड (APL) की एक सब्सिडियरी है जो यहां पर कोयले से चलने वाले 800 मेगावॉट के दो प्लांट लगाना चाहती है। यह प्लांट हर साल 64 लाख टन कोयले का इस्तेमाल करेंगे। इसकी अनुमानित लागत ₹18,300 करोड़ है। जानकारों के अनुसार, पॉवर प्लांट की जमीन मरिहान रेंज के पास है, जो प्रस्तावित स्लॉथ बेयर संरक्षित क्षेत्र की ज़रूरी तीन जंगल रेंज में से एक है।
पत्रकार और विंध्य इकोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री फाउंडेशन के सदस्य संतोष गिरी ने आरोप लगाया, “जिस ज़मीन पर कंपनी प्लांट लगा रही है, उसे 2011-2012 में दादरी खुर्द गांव के किसानों से स्थानीय भू-माफिया ने बहुत कम दामों पर बेईमानी से ले लिया था।” उनका दावा है कि ज़मीन को ज़्यादा कीमत पर वेलस्पन, जिसके पास असल में प्लांट का मालिकाना हक था, को बेच दिया गया था।
वेलस्पन एनर्जी के प्रस्तावित 1,320 मेगावॉट प्लांट के लिए पहले मिली पर्यावरण मंजूरी या एनवायर्नमेंटल क्लीयरेंस (ईसी) को सिन्हा और दो अन्य लोगों ने अदालत में चुनौती दी थी। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने दिसंबर 2016 में एनवायर्नमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट (EIA) में गंभीर गड़बड़ियों और ज़रूरी जानकारी छिपाने का हवाला देते हुए ईसी को आखिरकार रद्द कर दिया। इसने वेलस्पन को प्रोजेक्ट साइट पर कोई भी डेवलपमेंट का काम करने से रोक दिया और उसे उस जगह को उसकी असली हालत में वापस लाने को कहा।

लगभग आठ साल बाद, जून 2024 में, अडानी की सब्सिडियरी कंपनी ने नई पर्यावरण मंजूरी के लिए आवेदन किया।
सिन्हा का आरोप है कि ईसी मिलने से पहले ही, “उन्होंने जंगल की ज़मीन से पेड़-पौधे हटा दिए, बहुत ज़्यादा मिट्टी का काम किया, ज़मीन को समतल किया, बाउंड्री वॉल बनाईं और बिना इजाज़त के एक अप्रोच रोड बनाई जो रिज़र्व फ़ॉरेस्ट से होकर जाती है।” उन्होंने बताया कि चूंकि प्रोजेक्ट की कैपेसिटी 1,320 मेगावॉट से बढ़कर 1,600 मेगावॉट हो गई है, इसलिए प्रोजेक्ट के प्रस्ताव को पर्यावरण मंजूरी देने से पहले, वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम 1980 के तहत कानूनी ज़रूरत के मुताबिक, हर हिस्से के लिए वन मंजूरी या फ़ॉरेस्ट क्लियरेंस लेना ज़रूरी है।
जिन प्रोजेक्ट के लिए वन मंजूरी और पर्यावरण मंजूरी दोनों की ज़रूरत होती है, उनके लिए एनवायर्नमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट नोटिफिकेशन, 2006 के तहत पर्यावरण मंजूरी देने से पहले वन मंजूरी लेना ज़रूरी है।
सिन्हा ने कहा, “1952 के उत्तर प्रदेश गजट नोटिफिकेशन के मुताबिक, दादरी खुर्द में इस पॉवर प्लांट के लिए प्रस्तावित ज़मीन वन विभाग को स्थानांतरित कर दी गई थी।” “फिर भी, पर्यावरण और वन मंत्रालय ने इस प्रोजेक्ट के प्रस्तावक के इस दावे को मान लिया कि यह इलाका वन भूमि से जुड़ा नहीं है क्योंकि यह नोटिफाइड रिजर्व फॉरेस्ट नहीं है। जबकि, सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम 1980 की गाइडलाइंस सिर्फ नोटिफाइड फॉरेस्ट तक ही सीमित नहीं हैं।”

पॉवर प्लांट ने ज़मीन पर कानूनी कब्ज़े का हवाला दिया
एनजीटी को दिए अपने पिछले जवाब में, मिर्ज़ापुर थर्मल एनर्जी (UP) प्राइवेट लिमिटेड (MTEUPPL) ने कहा कि उसके खिलाफ़ लगाए गए सभी आरोप “झूठे, गलत और बेबुनियाद” हैं। जवाब में कहा गया कि ज़मीन पर उसका “कानूनी कब्ज़ा” था और इसलिए उसे उस पर बाउंड्री वॉल बनाने का अधिकार था।
इन्ही दस्तावेजों के साथ संलग्न एक पत्र में कहा गया था कि कंपनी ने सिर्फ़ मौजूदा बाउंड्री वॉल की मरम्मत की थी, जिसे वेलस्पन ने बनाया था, और पॉवर प्लांट बनाने का कोई काम साइट पर शुरू नहीं हुआ था। जवाब में यह भी कहा गया कि देबादित्यो सिन्हा, संतोष गिरी और दूसरे लोगों ने एनजीटी को रिपोर्ट के हिस्से के तौर पर जो तस्वीरें जमा की थीं, उन्हें “जियोटैग नहीं किया गया था इसलिए वो तस्वीरें गुमराह करने वाली हो सकती हैं।”
एक पुराने मीडिया इंटरव्यू में, प्लांट के प्रोजेक्ट मैनेजर दिनेश सिंह ने जंगल की ज़मीन पर प्लांट बनाने के आरोपों को खारिज कर दिया था। उन्होंने कहा था कि “प्लांट बंजर, पथरीली ज़मीन पर है जहाँ न तो नदियाँ हैं और न ही सिंचाई की कोई गुंजाइश है।”
हालाँकि, गिरी ने इस बात को गलत बताते हुए कहा कि प्लांट जंगल के बीच में है और वहां सिर्फ़ एक अप्रोच रोड से पहुंचा जा सकता है। उस रोड पर कड़ी नज़र रखी जाती है और उसे सुरक्षित रखा जाता है। “इसलिए, लोगों के लिए यह जानना मुमकिन नहीं है कि प्लांट की बाउंड्री के अंदर क्या हो रहा है।”
मोंगाबे-इंडिया ने अडानी पावर और मिर्ज़ापुर फ़ॉरेस्ट डिपार्टमेंट से उनके जवाब के लिए संपर्क किया, लेकिन इस कहानी की मूल खबर के प्रकाशित होने तक कोई जवाब नहीं मिला।

कानूनी चुनौतियाँ
पिछले साल 23 सितंबर को मिर्ज़ापुर थर्मल एनर्जी (UP) प्राइवेट लिमिटेड को पर्यावरण मंत्रालय से नई पर्यावरण मंजूरी मिली। डॉक्यूमेंट में बताया गया है कि प्रोजेक्ट की बाउंड्री 8.3 हेक्टेयर (0.8 वर्ग किलोमीटर) है, जिसमें पानी की पाइपलाइन और अप्रोच रोड शामिल हैं। इसके लिए स्टेज-I फॉरेस्ट क्लियरेंस 9 सितंबर, 2025 को मिल गया था।
फील्ड सर्वे और सेकेंडरी सोर्स के दौरान बफर ज़ोन में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 की अनुसूची-I में आने वाले वन्यजीवों की मौजूदगी को मानते हुए, पर्यावरण मंजूरी में कहा गया है कि एक वन्यजीवों के संरक्षण के लिए प्लान तैयार किया गया है और आगे की मंज़ूरी के लिए उसे राज्य के वन विभाग को भेजा गया है।
सिन्हा कहते हैं, “सभी पार्टियों को 17 सितंबर तक जवाब देने के लिए कहा गया था, लेकिन अब तक सिर्फ़ पर्यावरण मंत्रालय ने जवाब दिया है, जिसमें कहा गया है कि उन्होंने हाल ही में प्रोजेक्ट को पर्यावरण मंजूरी और अप्रोच रोड और पानी की पाइपलाइन के लिए स्टेज-I की वन मंजूरी दी है।”
चूँकि मिर्ज़ापुर थर्मल एनर्जी का काम ज़मीन पर पहले ही शुरू हो चुका था, इसलिए इसे बदला नहीं जा सकता। उन्होंने आगे कहा, “इसलिए, हमने हाल की तस्वीरों के साथ एक नई स्टे एप्लीकेशन फाइल की है ताकि उल्लंघनों को सुप्रीम कोर्ट के ध्यान में लाया जा सके।”
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अब मामला फिर एनजीटी के सामने है। याचिकाकर्ता के अनुसार, ट्रिब्यूनल पर्यावरण मंजूरी को चुनौती देने वाली अपील, कथित उल्लंघनों से जुड़े पुराने मामले और परियोजना से जुड़ी गतिविधियों पर रोक लगाने की मांग, तीनों पहलुओं पर सुनवाई करेगा। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को एनजीटी जाने की छूट दी थी और कहा था कि ट्रिब्यूनल मामले की जल्द सुनवाई करे।
सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 11 नवंबर, 2025 को होनी थी, जिसे बाद में आगे बढ़ा दिया गया। सिन्हा ने कहा, “आखिरकार सुप्रीम कोर्ट जो भी फैसला करेगा, उसमें बहुत समय लग सकता है। फिर भी, हमारी टीम इस ज़मीन को किसी भी गैर-वन गतिविधि से बचाने के लिए लड़ाई जारी रखेगी।” उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि विंध्य इकोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री फाउंडेशन की टीम डेवलपमेंट के खिलाफ नहीं है, लेकिन वह उस खास पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील जगह पर प्लांट नहीं चाहती है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 18 दिसंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: महाराष्ट्र में अपने बच्चों के साथ एक रीछ। तस्वीर – रोहित शर्मा द्वारा विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0) के माध्यम से।