- सिगुर पठार के चोकनहल्ली गांव ने पिछले कई दशकों में पर्यावरण में बड़े बदलाव देखे हैं। इन बदलावों ने इरुला आदिवासियों की जिंदगी का आधार रही ‘सिक्कोल नदी’ का स्वरूप पूरी तरह बदल दिया है।
- जंगलों की कटाई, भूमि उपयोग में बदलाव, जलविद्युत बांधों और अनियमित बारिश के कारण नदी का बहाव कम हुआ है, जिससे वन्यजीवों की आवाजाही, कृषि और जल सुरक्षा पर असर पड़ा है।
- इन बदलावों ने आदिवासियों की आजीविका को भी एक नया रूप दिया है। इरुला समुदाय अब अपनी पारंपरिक खेती, वन उत्पादों, मछलियों और साफ पानी से दूर होता जा रहा है।
- यह लेख चोकनहल्ली गांव की इरुला समुदाय से आने वाली बी. विजयारानी के अनुभवों पर आधारित है।
तमिलनाडु के सिगुर पठार के आदिवासी समुदायों के लिए सिक्कोल नदी पानी का सिर्फ एक स्त्रोत नहीं है, बल्कि उनके जीने का आधार रही है। लेकिन पिछले पांच दशकों में इस नदी में आए बदलावों ने यहां के आदिवासियों के जीवन और सदियों पुराने पारिस्थितिकी तंत्र को पूरी तरह बदल दिया है।
नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व का अहम हिस्सा माने जाने वाला सिगुर पठार एक महत्वपूर्ण वन्यजीव आवास और पारिस्थितिक गलियारा है। यह इलाका हाथियों के प्रवास के लिए एक मुख्य कॉरिडोर के रूप में जाना जाता है। यहां के सूखे पर्णपाती जंगलों में हाथियों के झुंड, हिरण, दुर्लभ गिद्ध और कई लुप्तप्राय प्रजातियों सहित अनोखी वनस्पति और जीव पाए जाते हैं। इसके साथ ही यह क्षेत्र इरुला, जेनु कुरुंबा और सोलिगा जैसे कई आदिवासी समुदायों का घर भी है।
चोकनहल्ली गांव की 42 वर्षीया बी. विजयारानी अपने इस लेख में उस सुनहरे दौर को याद करती हैं, जब उनके समुदाय के लोगों ने कभी गरीबी और भूख का चेहरा नहीं देखा था।

जब मैं 20 साल की थी, तब तक सिक्कोल नदी (जिसे चोक्कनल्ली नदी भी कहा जाता है) हमें सब कुछ देती थी: पारंपरिक खेतों से अनाज, जंगल से शहद, साग-भाजी, फल, कंद-मूल और नदी से ढेर सारी मछलियां। उस समय हमारे पास आज जैसी आधुनिक सुविधाएं तो नहीं थीं, लेकिन हम कभी भूखे नहीं रहे। हमारा पेट हमेशा भरा रहता था।
हमारी इरुला भाषा में बड़ी नदियों को ‘केरे’ और छोटे झरनों या धाराओं को ‘कोंजिरी’ कहते हैं। सिक्कोल नदी, जिसे महेश्वर नदी भी कहा जाता है, कल्लट्टी, सोलुर और ओडियाल्ला नदियों के संगम से बनती है, साथ ही इसमें कामराज बांध, करुवेप्पिलाई एस्टेट नदी और कई छोटी धाराओं से निकलने वाला पानी भी आकर मिल जाता है। ‘सिक्कोल’ नाम के दो मतलब हैं: कन्नड़ा भाषा में ‘सिक’ का अर्थ है छोटा और ‘कोल’ का अर्थ है नदी, यानी “छोटी नदी”। इसका दूसरा अर्थ “पापों को धोने वाली नदी” भी है। अपने रास्ते के आखरी पड़ाव पर यह नदी मोयार घाटी में जाकर एक खूबसूरत झरना बन जाती है।
हमारे इरुला समुदाय के बड़े-बुजुर्गों को आज भी याद है कि पहले मौसम अलग हुआ करता था। मेरे माता-पिता ने बताया कि 40-50 साल पहले हमारे गांव में जमकर बारिश हुआ करती थी। अगर कल्लट्टी में बारिश होती थी, तो चोकनहल्ली में भी जरूर पानी बरसता था। उस समय, बारिश के बाद छोटे झरनों और धाराओं में लगातार पानी बहता रहता था। लेकिन अब ऐसा नहीं होता। आज, इन धाराओं में पानी सिर्फ कुछ ही दिनों तक रहता है।

हमारी नदी कैसे बदल गई
ऐतिहासिक रूप से, नदी के किनारों पर बसे गांव हमेशा फलते-फूलते रहे हैं और चोकनहल्ली भी इसका अपवाद नहीं था। चूंकि हमारा गांव नदी के बिल्कुल बगल में बसा है, इसलिए पानी का इस्तेमाल सिर्फ पीने के लिए ही नहीं, बल्कि कपड़े धोने, नहाने, तैरने, मछली पकड़ने, कंद-मूल साफ करने और मवेशियों की देखभाल के लिए भी किया जाता रहा है। ये सभी काम बड़ी खुशी और आसानी से पूरे होते थे।
हमारे पूर्वज नदी के किनारे झोपड़ियां बनाकर रहा करते थे और अपना अधिकांश समय पशुपालन में व्यतीत किया करते थे। सिगुर इलाके के इरुला आदिवासियों और बड़गा समुदाय के बीच बहुत ही मेल-मिलाप वाले रिश्ते थे। वे मुख्य रूप से बडागा समुदाय के मवेशियों को पास के जंगलों में चराने के लिए ले जाया करते और उनकी देखभाल किया करते थे। यह सिलसिला तब तक चला, जब तक वन विभाग के निर्देशों के बाद बडागा लोगों ने अपने मवेशियों को अपनी ही रिहायशी बस्तियों में रखना शुरू नहीं कर दिया।
नदी और उसके आसपास के इलाकों में पहले वन्यजीवों और पक्षियों की भरमार हुआ करती थी। खासतौर पर ‘बया’ पक्षी यहां बहुत अधिक संख्या में पाए जाते थे। लेकिन आज उनके घोंसले सिर्फ मसिनागुड़ी इलाके तक ही सीमित रह गए हैं। उनकी जगह अब पक्षियों की नई प्रजातियां दिखाई देने लगी हैं।
इरुला समुदाय अपनी आजीविका के लिए मुख्य रूप से छोटे पैमाने पर बाजरे की खेती पर निर्भर रहा है। हमारे गांव का जीवन पारंपरिक फसलें उगाने के इर्द-गिर्द घूमता था, जैसे: रागी, कुटकी (लिटिल मिलेट), अलग-अलग दालें, कद्दू और मक्का। नदी से हमें ‘केंडे मीन’, ‘इंग्लिश मीन’, ‘मेक्का मीन’ और ‘वेन्ने सत्ती मीन’ जैसी कई तरह की मछलियां मिलती थीं। हमारे बुजुर्गों का तो यह भी कहना है कि ‘वेन्ने सत्ती मीन’ नाम की मछली पूरी दुनिया में सिर्फ हमारी सिक्कोल नदी में ही पाई जाती है।


जंगलों की कटाई और कम बारिश के कारण नदी का बहाव धीरे-धीरे कम होने लगा। करीब 10 से 15 साल पहले, नदी का चोकनहल्ली वाला हिस्सा पूरी तरह सूख गया। इस इलाके की सभी 24 नदियां मोयार बेसिन में जाकर मिलती हैं, जिसका पानी आगे चलकर भवानी जलाशय में गिरता है। हालांकि मोयार नीलगिरी की उन गिनी-चुनी नदियों में से एक है जो साल भर बहती है और जिसके किनारों पर घनी वनस्पति पाई जाती है। लेकिन अब इस नदी का बहाव भी कम हो गया है।
नीलगिरी के जल-पारिस्थितिकी विज्ञानी गोकुल हालन से जब मेरी मुलाकात हुई, तो उन्होंने इस गिरावट के पीछे के कई वैज्ञानिक कारण गिनाए। उन्होंने कहा, “भूमि उपयोग में बदलाव, जलविद्युत बांध, खेती व उद्योगों के लिए पानी का रास्ता मोड़ना और चाय बागानों में होने वाली सिंचाई इसके मुख्य कारण हैं। हाल के कुछ सालों में यहां बड़ी संख्या में रिसॉर्ट्स भी बने हैं, जो भारी मात्रा में पानी खींच रहे हैं। ऊपर से जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली अनिश्चित बारिश ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है।”
साल 1956 से 1964 के बीच, सिंचाई और पानी की कमी को दूर करने के लिए शांतिनल्ला नदी पर ‘कामराजार सागर बांध’ (इसे शांतिनल्ला जलाशय भी कहते हैं) बनाया गया था। ऊटी बस स्टैंड से गुडालूर रोड पर 10 किलोमीटर दूर स्थित यह बांध अब सैलानियों के घूमने और फिल्मों की शूटिंग की पसंदीदा जगह बन गया है। लेकिन इस बांध के बनने के बाद से नदी के साथ हमारे समुदाय का जो पुराना रिश्ता था, वह भी काफी हद तक बदल गया।

पानी की अंतहीन तलाश
नीलगिरी स्थित गैर-लाभकारी संस्था कीस्टोन फाउंडेशन की 2007 की सिगुर वॉटर रिसोर्सेज प्रोजेक्ट रिपोर्ट बताती है कि सिगुर पठार में हमेशा से पानी की किल्लत रही है क्योंकि यह इलाका कम बारिश वाले क्षेत्र में आता है। सालों से वन विभाग और स्थानीय लोग यहां चेक डैम और छोटे तालाब बनाकर भूजल स्तर को सुधारने का प्रयास करते रहे हैं।
जब सिक्कोल नदी सूख गई, तो हम गांव वालों के लिए रोजमर्रा की जरूरतों के लिए पानी जुटाना भी मुश्किल हो गया। पहले हम झरनों और धाराओं से पानी लिया करते थे, लेकिन इस इलाके में बड़ी संख्या में रिसॉर्ट्स खुलने के बाद से सब कुछ बदल गया। हालन ने मुझे समझाया कि इन रिसॉर्ट्स ने बोरवेल खोदकर काफी पानी निकाल लिया, जिससे भूजल स्तर गिर गया और यही मुख्य कारण था कि नदी भी सूख गई। सूखे की स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि हमें पानी खरीदकर इस्तेमाल करना पड़ा। यह ऐसी स्थिति थी, जिसके बारे में न तो हमने और न ही वन विभाग ने कभी सोचा था।
कामराजर सागर बांध पहली बार 1963 में खुला था। उसे 2018 में, इस पानी की कमी वाले क्षेत्र को राहत देने के लिए फिर से खोला गया। लेकिन, इस समाधान ने नई मुश्किलें खड़ी कर दीं। हालन बताते हैं, “बांध में पानी बहुत लंबे समय से जमा था। जब इसे नीचे की ओर छोड़ा गया, तो ऊपर के इलाकों की बस्तियों की गंदगी और खेती में इस्तेमाल होने वाले रसायनों का कचरा इस पानी में मिल गया था।”
हालत यह हो गई थी कि कुओं से जो पानी हम रोजाना के इस्तेमाल के लिए निकालते, वह एकदम मटमैला और गंदा होता था। जब हम उसे बर्तनों में भरकर रखते, तो उसमें जमी गंदगी साफ दिखाई देती थी। उस पानी से बना हमारा खाना तक पीला पड़ने लगा था। पानी की तलाश में हमें अब और भी ज्यादा गहराई तक खुदाई करनी पड़ रही थी।

हालान ने सिगुर इलाके में काफी समय तक काम किया है, इसलिए उन्हें मेरे गांव चोकनहल्ली की वे परेशान करने वाली बातें आज भी याद हैं। जब गांव वालों ने पानी की जांच करवाई, तो पता चला कि पानी में आयरन की मात्रा बहुत अधिक थी। कई लोगों को त्वचा की बीमारियां और शरीर पर फोड़े-फुंसी होने की शिकायतें मिलने लगी थीं।
यह समस्या तब और बढ़ गई जब ऊटी शहर की गंदगी और नालियों का पानी कामराज सागर बांध के पास के वेटलैंड में बहकर आने लगा। यह गंदा पानी रिसकर पीने के पानी के स्रोतों में मिल गया और वहीं जमा रहा।
हालन और उनकी टीम ने लोगों को पानी के सुरक्षित इस्तेमाल के बारे में जागरूक किया। उन्होंने लोगों को पानी उबालकर पीने और खुले में शौच न करने की सलाह दी। लेकिन समस्या सिर्फ पानी की गुणवत्ता तक ही सीमित नहीं थी।
हालन ने कहा, “चोकनहल्ली के लोग लंबे समय से अपनी जरूरतों के लिए जंगलों पर निर्भर रहे हैं। लेकिन जब से पास के मसिनागुड़ी (मुदुमलई) टाइगर रिजर्व में सफारी और वन्यजीव पर्यटन बढ़ा है, लोगों की जीवनशैली बदल गई है। अब वे कमाई के लिए पर्यटन से जुड़ी मजदूरी पर ज्यादा निर्भर हो गए हैं।” पर्यटन के इस बढ़ते दबाव ने पानी की समस्या को और गंभीर बना दिया। वह आगे कहते हैं, “सिगुर पठार दरअसल एक ‘वर्षा-छाया’ (कम बारिश वाले) क्षेत्र में पड़ता है, इसलिए यहां बारिश काफी अनियमित होती है। सिगुर के पश्चिमी हिस्से में साल भर में औसतन 500 मिलीमीटर बारिश होती है, जो ज्यादातर दक्षिण-पश्चिम मानसून से होती है, जबकि पूर्वी हिस्सा उत्तर-पूर्वी मानसून पर निर्भर रहता है।”
हमारा समुदाय इन धीरे-धीरे लेकिन लगातार होने वाले बदलावों का गवाह रहा है। पेड़ और घास गायब होने लगे, जिससे जानवर भूखे रहने लगे और उनकी मौत होने लगी। छोटे पैमाने पर की जाने वाली मोटे अनाज (मिलेट्स) की खेती अब नामुमकिन हो गई। हमारे पालतू मवेशियों के लिए पानी कम पड़ने लगा और जंगली जानवर पानी की तलाश में गांवों की ओर आने लगे। इससे इंसान और जानवरों के बीच टकराव के नए तरीके पैदा हुए, जो आज भी जारी हैं। पेड़, झाड़ियां, बेलें और घास सब सूख गए। कुछ फलदार पेड़ तो पूरी तरह से खत्म हो गए। इन जंगलों के रखवाले होने के नाते, हमारे समुदाय के लोगों ने इन सभी बदलावों को अपनी यादों और कहानियों में सहेज कर रखा है।
और पढ़ेंः स्थानीय सहयोग से एक सहायक नदी को फिर से जीवित करने की कहानी
अतीत में, कभी-कभार होने वाली घटनाओं को छोड़ दें, तो इंसानों और जंगली जानवरों के बीच टकराव बहुत कम हुआ करता था। लेकिन जब नदी पूरी तरह सूख गई, तो हालात बिल्कुल बदल गए। जंगली जानवर पानी के लिए गांव के भीतर आने लगे। अपने पुराने और पारंपरिक रास्ते खो जाने के कारण, जानवर अब पानी तक पहुंचने के लिए गांव और खेतों के बीच से होकर गुजरने लगे और फसलों को नुकसान पहुंचाने लगे। इससे इंसान-वन्यजीव संघर्ष बढ़ गया। अब वन विभाग वन्यजीवों के रास्तों को दूसरी दिशा में मोड़कर इस टकराव को कम करने की कोशिश कर रहा है।
भले ही यह नदी जंगलों के बीच से होकर बहती है, लेकिन इसका पानी कभी भी सिर्फ जंगली जानवरों के लिए नहीं रहा। पीढ़ियों से मेरा समुदाय पीने के पानी, खेती और अपने पशुओं की देखभाल के लिए इसी नदी पर निर्भर रहा है। लेकिन अब, वन विभाग हमें इस पानी का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देता। अपनी ही नदी के अधिकार के लिए हमें लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी है।
लोग भले ही चोकनहल्ली नदी को ‘पापों को धोने वाली’ नदी मानते हों, लेकिन सच तो यह है कि समय के साथ यह बहुत ज्यादा मैली और प्रदूषित हो गई है। हमारे लिए नदी का सूखना और इसकी हालत बिगड़ना सिर्फ पर्यावरण की समस्या भर नहीं है, बल्कि हमारी उस पूरी जीवनशैली का अंत होना है जिसने सदियों से हमारा भरण-पोषण किया था।
यह सीरीज कीस्टोन फाउंडेशन के सहयोग से प्रकाशित की जा रही है। इसमें शामिल लेख नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व के आदिवासी समुदायों के सदस्यों द्वारा ही लिखे गए हैं।
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 26 नवंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर- सिक्कोल नदी। तस्वीर – कीस्टोन फाउंडेशन के सौजन्य से