- अरुणाचल प्रदेश के ईगलनेस्ट वन्यजीव अभयारण्य में 3,266 मीटर की ऊंचाई पर हाथियों की मौजूदगी दर्ज की गई है।
- यह जानकारी राज्य में मानव-हाथी संघर्ष पर बनी पहली व्यापक रणनीति और कार्ययोजना (एक्शन प्लान) में सामने आई है।
- इस एक्शन प्लान में फसल सुरक्षा, अर्ली वार्निंग सिस्टम, बेहतर मुआवजा और हाथी कॉरिडोर की सुरक्षा जैसे उपाय सुझाए गए हैं।
अरुणाचल प्रदेश में हाथियों की मौजूदगी अब नई ऊंचाइयों पर दर्ज की गई है। मई 2026 में जारी नए एक्शन प्लान के मुताबिक, राज्य के ईगलनेस्ट वन्यजीव अभयारण्य में 3,266 मीटर की ऊंचाई पर हाथियों के निशान मिले हैं। एक्शन प्लान इसे दुनिया में एशियाई हाथियों की सबसे अधिक ऊंचाई पर दर्ज मौजूदगी बताता है।
केन्या के माउंट केन्या में हाथियों (अफ्रीकन हाथी) की मौजूदगी का ज्ञात रिकॉर्ड इससे अधिक, करीब 4,000 मीटर तक मिलता है। अरुणाचल प्रदेश के ईगलनेस्ट वन्यजीव अभयारण्य में 3,266 मीटर पर दर्ज मौजूदगी दुनिया में हाथियों की ऊंचाई से जुड़े अहम रिकॉर्ड में से एक हो सकती है और एशियाई हाथियों के लिए सबसे ऊंचे दस्तावेजी रिकॉर्ड में शामिल है।
यह जानकारी अरुणाचल प्रदेश में मानव-हाथी संघर्ष को समझने और उससे निपटने के लिए तैयार नई रणनीति और कार्ययोजना में सामने आई है। इस एक्शन प्लान को अरुणाचल प्रदेश के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया ने मिलकर तैयार किया है।
इस योजना को बनाने के लिए दिसंबर 2024 से मार्च 2026 के बीच पूरे अरुणाचल प्रदेश में जानकारी जुटाई गई। वन विभाग और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया की टीमों ने यह देखा कि राज्य में हाथी किन इलाकों में मौजूद हैं, कहां लोगों और हाथियों के बीच संघर्ष ज्यादा है और किन जगहों पर फसल या संपत्ति को नुकसान हुआ है। अध्ययन में यह भी समझने की कोशिश की गई कि हाथियों के आवास पर किस तरह का दबाव बढ़ रहा है और उनके आने-जाने के रास्ते कितने सुरक्षित बचे हैं।
इसे जारी करते हुए अरुणाचल प्रदेश सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री के सलाहकार वांगलिन लोवांगडोंग ने कहा कि मानव-वन्यजीव संघर्ष, खासकर हाथियों के साथ संघर्ष, राज्य में एक गंभीर मुद्दा है। उन्होंने इस प्रकाशन को इस संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया।

ऊंचाई का रिकॉर्ड क्यों अहम है?
अरुणाचल प्रदेश में हाथियों की मौजूदगी पहले मुख्य रूप से निचले इलाकों और हिमालयी तराई क्षेत्रों में मानी जाती थी। लेकिन इस आकलन में उनकी मौजूदगी 150 मीटर से लेकर 3,266 मीटर तक दर्ज की गई है। एक्शन प्लान के मुताबिक, राज्य में हाथियों की मौजूदा वितरण सीमा 12,446 वर्ग किलोमीटर आंकी गई है, जबकि 2017 के आकलन में यह करीब 7,001 वर्ग किलोमीटर थी, जो कि 78% बढ़त है।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया के एलीफेंट कंजर्वेशन प्रोग्राम से जुड़े अरित्रो खेत्री के अनुसार, हाथी आमतौर पर इतनी ऊंचाई वाले इलाकों में नहीं पाए जाते। उन्होंने बताया कि कैमरा लगाने से पहले हाथियों के इस्तेमाल किए जाने वाले रास्तों पर सर्वे किया गया। इसके बाद 2025-26 की गर्मियों के आखिर और सर्दियों में कैमरा ट्रैप के जरिए हाथियों के एक परिवार की मौजूदगी की पुष्टि हुई। एक्शन प्लान में 3,226 मीटर पर एक जुवेनाइल हाथी की कैमरा-ट्रैप तस्वीर का भी जिक्र है।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया के एलीफेंट कंजर्वेशन प्रोग्राम से जुड़े अनिरुद्ध धमोरेकर ने कहा, “ईगलनेस्ट के ऊंचाई वाले इलाकों में हाथियों की आवाजाही के बारे में स्थानीय बुगुन और शेरदुकपेन समुदायों के लोग, साथ ही ईगलनेस्ट वन्यजीव अभयारण्य के कर्मचारी पहले से जानते थे। अनवरुद्दीन चौधरी ने 2000 के शुरुआती वर्षों में भी इसका दस्तावेजीकरण किया था। हालांकि, इतनी अधिक ऊंचाई से पहले कोई रिकॉर्ड नहीं था।”
धमोरेकर ने बताया कि कैमरा ट्रैप लगाने का मकसद हाथियों की आवाजाही को और बेहतर ढंग से समझना था। उन्होंने कहा, “हम यह जानना चाहते थे कि हाथी कहां तक जाते हैं और किस मौसम में जाते हैं। यह इलाका सर्दियों में काफी ठंडा हो जाता है और हाथी आमतौर पर ऐसे तापमान में नहीं पाए जाते। इसलिए यह समझना जरूरी था कि क्या यह सिर्फ गर्मियों की मौसमी आवाजाही है।”
उनके अनुसार, कैमरा ट्रैप से यह भी पता चला कि हाथी मुख्य रूप से बांस पर निर्भर दिखे। धमोरेकर ने कहा, “हाथी मुख्य रूप से बांस खाते दिखे और संभव है कि वे पहाड़ पर मौजूद साल्टलिक साइट्स तक भी जाते हों।”
इसी ऊंचाई वाले क्षेत्र के आसपास मानव-हाथी संपर्क के संकेत भी मिले हैं। एक्शन प्लान के अनुसार, ईगलनेस्ट के आगे शेरगांव फॉरेस्ट रेंज की टेंगा घाटी में हाथियों की मौजूदगी और फसल नुकसान की घटनाएं दर्ज की गई हैं। यहां 5-6 हाथियों के झुंड और अकेले हाथियों के खेतों में आने की घटनाओं का जिक्र है।

बेहतर सर्वे या हाथियों का फैलता दायरा?
एक्शन प्लान में हाथियों के वर्तमान वितरण को 2017 के आकलन से काफी बड़ा बताया गया है। इस पर क्षेत्री ने कहा, “यह निश्चित रूप से बेहतर सर्वेक्षण का नतीजा है। साल 2025 में हाथी वाले सभी वन प्रभागों में हाथियों के संकेतों, जैसे गोबर और पैरों के निशान, का गहन सर्वे किया गया। 2017 के पिछले आकलन में सैंपलिंग डिजाइन ज्यादा सीमित था।”
हालांकि क्षेत्री के अनुसार इसे केवल बेहतर सर्वेक्षण का असर मानना भी पूरी तस्वीर नहीं होगी। उन्होंने कहा, “अरुणाचल प्रदेश में कुछ जगहों पर हाथियों के दायरे में छोटे स्तर पर विस्तार के संकेत भी मिले हैं, जहां कई वर्षों से हाथियों की मौजूदगी दर्ज नहीं की गई थी।”
एक्शन प्लान के अनुसार, हाथियों की मौजूदगी राज्य के 17 जिलों में फैली हुई है। अधिकतर हाथी अभी भी निचले इलाकों, नदी घाटियों और जंगलों से जुड़े क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
संघर्ष के आंकड़े और हॉटस्पॉट
मानव-हाथी संघर्ष के मामले भी राज्य के लिए चिंता के रूप में सामने आए हैं। एक्शन प्लान के अनुसार, 2007 से 2024 के बीच अरुणाचल प्रदेश में मानव-हाथी संघर्ष की 1,503 घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें सबसे अधिक मामले फसल नुकसान से जुड़े थे। इसके बाद घरों और संपत्ति को नुकसान, मानव मौत और घायल होने की घटनाएं दर्ज की गईं। एक्शन प्लान बताता है कि इन घटनाओं में से लगभग 85 प्रतिशत मामले पिछले 10 वर्षों में दर्ज हुए हैं।
पाक्के केसांग, पापुम पारे, ईस्ट सियांग, लोहित, चांगलांग और तिराप को राज्य में मानव-हाथी संघर्ष के प्रमुख हॉटस्पॉट के रूप में पहचाना गया है। इन जिलों में फसल नुकसान, संपत्ति नुकसान और मानव हताहत के मामले अधिक दर्ज हुए हैं।
धमोरेकर के अनुसार, अरुणाचल प्रदेश में हाथियों से जुड़ी मानव मौतों के मामले भारत के दूसरे हाथी-बहुल राज्यों की तुलना में कम हैं। लेकिन फसल नुकसान एक बड़ी समस्या है। उनके अनुसार, कई समुदायों के लिए इस तरह का नुकसान झेलना मुश्किल होता है।
एक्शन प्लान के मुताबिक, संघर्ष की ज्यादातर घटनाएं बारिश और सर्दी के मौसम में दर्ज की गईं। यह वही समय होता है जब खेतों में फसलें होती हैं और हाथी भोजन की तलाश में खेती वाले इलाकों के करीब पहुंचते हैं।

संघर्ष हर जगह एक जैसा नहीं है। कुछ इलाकों में यह पुराना मुद्दा है, जबकि लोहित, चांगलांग और तिराप जैसे जिलों में यह हाल के वर्षों में बढ़ता हुआ दिखता है। लोहित में स्थानीय लोगों के हवाले से एक्शन प्लान कहता है कि हाथियों से नुकसान हाल का मुद्दा है और धीरे-धीरे बढ़ रहा है। चांगलांग में भी संघर्ष की घटनाएं 2021 के बाद अधिक दर्ज हुई हैं। तिराप में देओमाली शहर के आसपास संघर्ष ज्यादा देखा गया है, जहां फसल नुकसान के साथ संपत्ति नुकसान और मानव हताहत के मामले भी सामने आए हैं।
संघर्ष की ज्यादातर घटनाएं बारिश और सर्दी के मौसम में दर्ज हुईं। यह वही समय होता है जब खेतों में धान, मिलेट और दूसरी फसलें होती हैं या फसलें पकने लगती हैं। हाथियों के लिए फसल वाले खेत आसान भोजन का स्रोत बन जाते हैं।
बदलते भू-उपयोग का दबाव
एक्शन प्लान के अनुसार, अरुणाचल प्रदेश में मानव-हाथी संघर्ष की एक बड़ी वजह निचले जंगलों का बस्तियों, खेती और बुनियादी ढांचे में बदलना है। सड़क, जलविद्युत परियोजनाएं, रेत खनन और बस्तियों का विस्तार हाथियों की आवाजाही वाले रास्तों पर दबाव बढ़ा सकता है।
क्षेत्री कहते हैं, “राज्य में बुनियादी ढांचे और जमीन के इस्तेमाल से जुड़ी सभी योजनाओं में पारिस्थितिक सुरक्षा उपायों को शामिल करना जरूरी है। यह सिर्फ हाथियों के लिए नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिक सुरक्षा के लिए जरूरी है।”
एक्शन प्लान के अनुसार, 2019 से 2024 के बीच हाथियों से जुड़े नुकसान के लिए 70.035 लाख रुपए का मुआवजा दिया गया। इसी दौरान संघर्ष और बदलते लैंडस्केप की कीमत हाथियों ने भी चुकाई। 2018 से 2024 के बीच राज्य में 17 हाथियों की मौत दर्ज हुई, जिनमें पांच अप्राकृतिक मौतें बिजली के करंट से जुड़ी थीं।
समाधान और सावधानियां
एक्शन प्लान में स्थानीय फसल सुरक्षा दल, गांव स्तर की प्रतिक्रिया टीम, अर्ली वार्निंग सिस्टम, सोलर फेंसिंग, बेहतर मुआवजा व्यवस्था, रैपिड रिस्पॉन्स टीम और हाथी कॉरिडोर की सुरक्षा जैसे उपाय सुझाए गए हैं।
अरुणाचल प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक और वन बल प्रमुख पी. सुब्रमण्यम ने कहा कि राज्य में मानव-हाथी संघर्ष चिंता का विषय बन गया है, इसलिए सह-अस्तित्व के तरीकों को बढ़ावा देना जरूरी है। उनके अनुसार, यह कार्ययोजना संघर्ष कम करने में मदद करेगी।
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एक्शन प्लान इस बारे में भी आगाह करता है कि बाड़, खाई या दूसरे अवरोध गलत जगह लगाए गए, तो वे हाथियों के रास्ते रोक सकते हैं और संघर्ष को दूसरे इलाकों में धकेल सकते हैं। इसलिए योजना खेतों और बस्तियों की सुरक्षा के साथ हाथियों की आवाजाही को ध्यान में रखकर बनानी होगी।
क्षेत्री ने कहा, “मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के लिए आवासों के बीच कनेक्टिविटी बनाए रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि टूटे हुए लैंडस्केप हाथियों को इंसानी इलाकों में आने के लिए मजबूर कर सकते हैं, जिससे संघर्ष की संभावना बढ़ जाती है।”
बैनर तस्वीरः नदी किनारे भोजन करता एक एशियाई हाथी। अरुणाचल प्रदेश में हाथियों के आवास जंगलों, नदी घाटियों और मानव बस्तियों के पास फैले हुए हैं। तस्वीर साभार- चंदन री/पाक्के टाइगर रिजर्व