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केरल में मिली नई फिशिंग स्पाइडर, इसकी मौजूदगी बताती है पानी साफ है

एक वयस्क मादा फिशिंग स्पाइडर। तस्वीर- उमेश पावुकांडी।

एक वयस्क मादा फिशिंग स्पाइडर। तस्वीर- उमेश पावुकांडी।

  • शोधकर्ताओं ने केरल की एक जल धारा में फिशिंग स्पाइडर की एक नई प्रजाति की खोज की है।
  • यह मकड़ी केवल साफ और धीमी गति से बहने वाले पानी में ही जीवित रह सकती है। इसलिए, इन्हें ‘बायोइंडिकेटर’ माना जाता है, क्योंकि इनकी उपस्थिति से पता चलता है कि वह क्षेत्र कितना स्वच्छ और सुरक्षित है।
  • यह खोज बताती है कि पश्चिमी घाट में अभी भी मकड़ियों की ऐसी कई प्रजातियां मौजूद हैं जिनके बारे में हमें जानकारी नहीं है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इन अनजानी प्रजातियों को खोजने के लिए वैज्ञानिकों को मिलने वाली फंडिंग बढ़ानी चाहिए और आम लोगों को भी इस काम में शामिल करना चाहिए।

रिसर्च इंटर्न अर्जुन चेरुकुट्टी को एक विशेषज्ञ के साथ चर्चा के दौरान मकड़ियों की एक प्रजाति ‘फिशिंग स्पाइडर्स’ की अनोखी विशेषताओं के बारे में पता चला था। यह बड़े आकार की पानी के आस-पास रहने वाली मकड़ियां हैं, जो पानी पर चल सकती हैं, शिकार पकड़ सकती हैं और पानी के अंदर भी सांस ले सकती हैं। लेकिन लोगों को इनके बारे में बहुत कम जानकारी है। कुछ समय बाद ही केरल के वायनाड के पास पश्चिमी घाट के सदाबहार वर्षावनों की एक फील्ड ट्रिप के दौरान उन्हें इन खास मकड़ियों से मिलने का मौका मिला। वह केरल वन अनुसंधान संस्थान (KFRI) में कीटविज्ञानी जितु उन्नी कृष्णन के साथ काम कर रहे थे।

हालाँकि उस समय, टीम के पास रिसर्च के लिए जंगल से नमूने इकट्ठा करने की अनुमति नहीं थी। लेकिन छः महीने बाद ये मकड़ियां वायनाड के एक इकोटूरिज्म रिसॉर्ट में दोबारा देखी गईं। वहां रिसॉर्ट के जनरल मैनेजर डेविड राजू ने इन फिशिंग स्पाइडर्स के नमूने इकट्ठा करने में टीम की मदद की, ताकि उन पर अध्ययन किया जा सके। राजू एक सिटीजन साइंटिस्ट, प्रकृतिवादी और लेखक हैं।

आमतौर पर ये मकड़ियां अकेले रहना पसंद करती हैं, लेकिन उस जगह पर इन्हें दर्जनों की संख्या में एक साथ देखे जाने का मतलब था कि उस रिसॉर्ट का इलाका इन मकड़ियों के लिए एक सुरक्षित ‘माइक्रो-निश’ (अनुकूल छोटा वातावरण) बन गया है, जो वहां के पर्यावरण संरक्षण की सफलता को भी दर्शाता है।

चेरुकुट्टी ने नर और मादा, दोनों तरह की मकड़ियों के नमूने इकट्ठे किए और कृष्णन के साथ मिलकर इस नई प्रजाति का विस्तार से अध्ययन करना शुरू कर दिया। उन्होंने इसे डोलोमीड्स इंडिकस नाम दिया। वैसे तो ये मकड़ियां भारत के कुछ हिस्सों में पहले भी देखी गई थीं, लेकिन यह पहला अध्ययन है जिसमें इनका औपचारिक वैज्ञानिक वर्गीकरण किया गया।

मछली पकड़ने और तैरने में माहिर

फिशिंग स्पाइडर या राफ्ट स्पाइडर को जीवित रहने के लिए बहुत ही खास और अनुकूल परिस्थितियों की जरूरत होती हैं। ये मुख्य रूप से साफ और धीमी गति से बहने वाले पानी के झरनों या धाराओं के पास पाई जाती हैं, जहां तापमान 18 से 24 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। दूसरी मकड़ियों की तरह ये जाल नहीं बुनतीं, बल्कि रेशम के एक धागे का इस्तेमाल करती हैं। इस धागे की मदद से ये खुद को पानी के पास मौजूद छोटी चट्टानों, पत्तों या टहनियों से बांधकर (एंकर की तरह) रखती हैं।

एक वयस्क नर फिशिंग स्पाइडर। नर की लंबाई 13 सेमी तक हो सकती है, जबकि मादा 16 सेमी तक बड़ी हो सकती है। तस्वीर- अर्जुन चेरुकुट्टी
एक वयस्क नर फिशिंग स्पाइडर। नर की लंबाई 13 सेमी तक हो सकती है, जबकि मादा 16 सेमी तक बड़ी हो सकती है। तस्वीर- अर्जुन चेरुकुट्टी

एक चट्टान पर बैठी मकड़ी अपने हरे-भूरे रंग और शारीरिक बनावट के कारण वहां की पृष्ठभूमि में आसानी से अपने आपको ढाल लेती है। पूरी तरह से विकसित नर मकड़ियों की लंबाई 13 सेंटीमीटर तक हो सकती है, जबकि मादाएं उनसे थोड़ी बड़ी, करीब 16 सेंटीमीटर तक लंबी होती हैं। नर मकड़ी के शरीर के ऊपरी हिस्से का अगला भाग बर्फ जैसा सफेद दिखता है। वहीं, मादाओं के सिर के ऊपरी कठोर आवरण (जिसे ‘कैरापेस’ कहते हैं) और चेहरे के कुछ हिस्सों पर सफेद धब्बे होते हैं। इन मकड़ियों की आंखें और इनके बालों से भरा शरीर इन्हें पानी के पास के माहौल में रहने के लिए अनुकूल बनाता है। इन्हीं खूबियों की वजह से ये मकड़ियां पानी पर चल सकती हैं, शिकार पकड़ सकती हैं और पानी के अंदर भी सांस ले सकती हैं।

फिशिंग स्पाइडर की एक और खासियत इसका घात लगाकर शिकार करना है। इनके पास ‘पेडिपैल्प्स’ नाम के अंगों की एक अतिरिक्त जोड़ी होती है, जो देखने में बिल्कुल बॉक्सिंग ग्लव्स जैसी लगती है। मादा मकड़ियों में ये अंग चलने, शिकार को पकड़ने और भोजन करने में मदद करते हैं, तो वहीं नर मकड़ियों में ये प्रजनन अंगों का काम करते हैं, जहां वे संबंध बनाते समय शुक्राणु को जमा करते और छोड़ते हैं।

पेडीपैल्प्स की मदद से फिशिंग स्पाइडर धीमे बहते पानी में होने वाली हलचल से शिकार की मौजूदगी का अहसास कर लेती है। कृष्णन बताते हैं, “यह पानी में तेजी से गोता लगाती है, मछली पकड़ती है और फिर अपने शिकार को वापस उसी स्थान पर ले आती है जहां से इसने छलांग लगाई थी।” उनके मुताबिक, रेशम का धागा इस मकड़ी की ‘लाइफलाइन’ हैं, जो न केवल शिकार को वापस लाने में मदद करता है, बल्कि खतरे के समय मकड़ी को दुश्मनों से बचाता भी है।

विकासवादी वंशावली

आगे की अनुवांशिक जांच में शोधकर्ताओं ने पाया कि ‘डोलोमीड्स इंडिकस’ एक अलग प्रजाति है। यह काफी हद तक ‘डोलोमीड्स मिज़ोआनस’ से मिलती-जुलती है, जो चीन, लाओस, ताइवान, मलेशिया और भारत में पाई जाती है। कृष्णन ने कहा, “परिणाम बताते हैं कि डोलोमीड्स इंडिकस आनुवंशिक रूप से बिल्कुल अलग है और अपने भौगोलिक स्थान के आधार पर एक अलग समूह बनाती है। यह इस बात पर जोर देता है कि कैसे क्षेत्रीय अलगाव ने भारत में इन मछली पकड़ने वाली मकड़ियों के विकास को आकार दिया है और साथ ही इस विचार का समर्थन भी करता है कि भारतीय प्रजातियां अपने आप में अनूठा विकासवादी इतिहास रखती हैं, जिस पर अभी तक बहुत कम शोध हुआ है।”

शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह अध्ययन बस एक शुरुआत है और इस मकड़ी के विकास को गहराई से समझने के लिए ‘मल्टी-जीन मार्कर’ तकनीक के इस्तेमाल की जरूरत है। बेंगलुरु स्थित नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज के रिसर्च एसोसिएट और पक्षी व कीट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ अश्विन वारुदकर ने कहा, “जब आप कई माइटोकॉन्ड्रियल और न्यूक्लियर जीन्स को शामिल करते हैं, तो दूसरी करीबी प्रजातियों के साथ इनके विकासवादी संबंधों का सही आकलन करने के लिए एक उचित फाइलोजेनेटिक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है।”

एक झरने में देखी गई एक नर किशोर फिशिंग स्पाइडर। यह प्रजाति ज्यादातर 18-24°C तापमान वाले साफ और धीमी गति से बहने वाले पानी के स्रोतों के किनारे पाई जाती है। अन्य मकड़ियों के विपरीत, फिशिंग स्पाइडर रेशम का एक ही धागा बुनती है और उसके सहारे खुद को झरने के पास के पत्थरों, पत्तियों या टहनियों से बांधकर रखती है। तस्वीर- उमेश पावुकांडी
एक झरने में देखी गई एक नर किशोर फिशिंग स्पाइडर। यह प्रजाति ज्यादातर 18-24°C तापमान वाले साफ और धीमी गति से बहने वाले पानी के स्रोतों के किनारे पाई जाती है। अन्य मकड़ियों के विपरीत, फिशिंग स्पाइडर रेशम का एक ही धागा बुनती है और उसके सहारे खुद को झरने के पास के पत्थरों, पत्तियों या टहनियों से बांधकर रखती है। तस्वीर- उमेश पावुकांडी

अध्ययन के दौरान चुनौतियां

विशेषज्ञों का मानना है कि मकड़ियों की पहचान की प्रक्रिया काफी चुनौतीपूर्ण है। अश्विन वारुदकर के अनुसार, “इनके व्यवहार और पारिस्थितिकी का अध्ययन करने के अलावा, आपको मकड़ी को पकड़ना पड़ता है, उसके शरीर के अंगों की बारीकी से जांच करनी पड़ती है और माइक्रोस्कोप की मदद से उसके शरीर पर मौजूद बालों और कांटों को गहराई से जांचना होता है।” इसके लिए आर्थिक सहायता और आधुनिक उपकरणों की भी आवश्यकता होती है, जो पूरी तरह से ‘फंडिंग’ पर निर्भर है। इतना ही नहीं, शोध के लिए नमूने इकट्ठा करना भी एक लंबी प्रक्रिया का हिस्सा है। सरकारी मंजूरी मिलना आसान नहीं होता है।

ऋषिकेश त्रिपाठी ने एक ईमेल में बताया, “पीएचडी के दौरान राजस्थान में रहते हुए, मुझे माइक्रोस्कोपी सुविधाओं का इस्तेमाल करने के लिए केरल तक का सफर करना पड़ा था। यह व्यावहारिक चुनौती तब और बढ़ जाती है जब मॉलिक्यूलर स्टडीज करनी होती है। इसका खर्च बहुत अधिक होता है और अक्सर सीमित फंडिंग के कारण काम रुक जाता है।” त्रिपाठी बेंगलुरु स्थित अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट (ATREE) में पोस्टडॉक्टोरल रिसर्च एसोसिएट हैं। वे मकड़ियों के विशेषज्ञ हैं और उन्होंने इस शोध में मकड़ी की शारीरिक बनावट और वर्गीकरण के अध्ययन में मदद की थी।


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भविष्य की राह

चूंकि यह फिशिंग स्पाइडर बहुत ही साफ और खास वातावरण में जीवित रहती है, इसलिए शोधकर्ता अब इस बात पर अध्ययन करना चाहते हैं कि कैसे इन मकड़ियों का इस्तेमाल पर्यावरण की सेहत बताने वाले ‘इंडिकेटर स्पीशीज’ के रूप में किया जा सकता है।

वारुदकर ने सुझाव दिया, “हमें यह देखना होगा कि ये फिशिंग स्पाइडर कहां और कितनी संख्या में मौजूद हैं। इसके लिए हमें अलग-अलग स्तरों पर उनके रहने की जगह की गुणवत्ता (जैसे पानी की शुद्धता, शिकार की उपलब्धता और आसपास का वातावरण) का आकलन करना होगा, ताकि यह पता चल सके कि इन पारिस्थितिक तंत्रों में उनके जीवित रहने की सीमाएं क्या हैं।”

यह अध्ययन स्नातक स्तर पर इस विषय पर शोध की संभावनाओं को भी उजागर करता है। शोधकर्ताओं, पारिस्थितिकीविदों, छात्रों और नागरिक वैज्ञानिकों के बीच आपसी सहयोग नई प्रजातियों की पहचान करने और संरक्षण के प्रयासों को तेज करने में बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता है। त्रिपाठी ने कहा, “फिशिंग स्पाइडर्स पर शोध के भौगोलिक और पारिस्थितिक दायरे को बढ़ाना बहुत जरूरी है। इसमें विभिन्न प्रकार के आवासों में और अधिक व्यापक सर्वेक्षण करना शामिल है, ताकि उनके वितरण और पारिस्थितिक भूमिका को बेहतर ढंग से समझा जा सके।”

 


यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 13 जनवरी, 2026 को प्रकाशित हुई थी।


बैनर तस्वीर: एक वयस्क मादा फिशिंग स्पाइडर। तस्वीर- उमेश पावुकांडी।

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