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सीवेज, जलकुंभी और सौंदर्यीकरण के बीच फंसी पुणे की पाषाण झील

झील के ज्यादातर हिस्से पर जलकुंभी का जाल फैला हुआ है जिसके चलते पानी तक सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती और ऑक्सीजन के स्तर में भी भयानक कमी आती है। तस्वीर- स्वाति बक्शी

झील के ज्यादातर हिस्से पर जलकुंभी का जाल फैला हुआ है जिसके चलते पानी तक सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती और ऑक्सीजन के स्तर में भी भयानक कमी आती है। तस्वीर- स्वाति बक्शी

  • अप्रैल में पाषाण झील में बड़ी संख्या में मछलियों की मौत ने झील में सीवेज, जलकुंभी और ऑक्सीजन की कमी जैसे पुराने संकट को फिर सामने ला दिया।
  • रामनदी और आसपास के इलाकों से आने वाला अनुपचारित गंदा पानी झील में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ा रहा है, जिससे जलकुंभी तेजी से फैल रही है।
  • विशेषज्ञों के मुताबिक झील की बहाली और सौंदर्यीकरण के नाम पर किए गए कई हस्तक्षेप, जैसे गाद निकालना, कृत्रिम द्वीप बनाना, पत्थर के किनारे और गैर-स्थानीय पेड़, झील के प्राकृतिक ईकोसिस्टम के लिए नुकसानदेह रहे।
  • पाषाण झील को बचाने के लिए सीवेज रोकना, जलकुंभी को वैज्ञानिक तरीके से हटाना, एसटीपी की निगरानी, प्राकृतिक किनारों की बहाली और स्थानीय समुदाय की भागीदारी जरूरी है।

“मैं पिछले 18 साल से पाषाण झील और उसके आस-पास रहने वाले पक्षी देखने आता हूं, लेकिन अबकी बार करीब चार महीने बाद लौटा। झील का जो बुरा हाल अब दिख रहा है, वो पिछले सालों में कभी देखने को नहीं मिला,” पुणे के निवासी आकाश कुलकर्णी बताते हैं। “पक्षी छोड़िए, अब तो यहां पानी ही नहीं दिखता है,” यह कहते हुए हाथों में दूरबीन उठाए, करीब 50 बरस के कुलकर्णी जलकुंभी से पटी हुई पुणे की ऐतिहासिक पाषाण झील के किनारे चलते हुए पक्षियों की तलाश में आगे बढ़ जाते हैं। पाषाण झील का परिसर शहर के केंद्र से करीब 12 किलोमीटर दूर स्थित है। झील की ओर बढ़ते ही हवा में घुली गंध और पानी की सतह पर फैली जलकुंभी, उस संकट का अहसास करा देती है जो इस साल अप्रैल में मछलियों की मौत के बाद सुर्खियों में आया।

अप्रैल में झील की सतह पर बड़ी संख्या में मरी हुई मछलियां तैरती हुई पाई गई थीं। इसके बाद पुणे महानगरपालिका (पीएमसी) ने नजदीकी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) के काम न करने को इसके पीछे एक प्रमुख कारण बताया। एक आरटीआई से यह भी सामने आया कि एसटीपी तक सीवेज पहुंचाने वाली ड्रेनेज लाइन निर्माण गतिविधियों के दौरान क्षतिग्रस्त हुई थी।

भौगोलिक स्थिति और सीवेज की समस्या

पुणे की नदियों और पानी के स्रोतों के इतिहास और वर्तमान का ब्यौरा रखने वाली साइट पुण्याची पानी के मुताबिक ब्रिटिश शासन के दौरान, 19वीं सदी में रामनदी पर बनाए गए बैराज के जरिए पाषाण झील का जन्म हुआ। उस दौर में यह झील पानी इकट्ठा करने और गवर्नर एस्टेट तक पानी पहुंचाने के काम में लाई जाती थी। बाद में, नजदीकी इलाकों की पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए इसका उपयोग किया जाने लगा, लेकिन 1990 के दशक के आखिरी बरसों में पीएमसी ने इस पर रोक लगा दी।

शहर की ओर से गंदे पाने के झील में निकास के चलते ऐसे तत्वों की मात्रा बेहद ऊंची है जो खर-पतवार को पैदा होने और बढ़ने का मौका देते हैं। तस्वीर साभार- इकोलॉजिकल रिस्टोरेशन और मैनेजमेंट प्लान फॉर पाषाण लेक
शहर की ओर से गंदे पाने के झील में निकास के चलते ऐसे तत्वों की मात्रा बेहद ऊंची है जो खर-पतवार को पैदा होने और बढ़ने का मौका देते हैं। तस्वीर साभार- इकोलॉजिकल रिस्टोरेशन और मैनेजमेंट प्लान फॉर पाषाण लेक

करीब 130 एकड़ में फैली इस झील का कैचमेंट इलाका 40 वर्ग किलोमीटर का है और यह पुणे महानगरपालिका की सीमा में आती है। हालाँकि, इसके मुख्य स्त्रोत, रामनदी, का अधिकारक्षेत्र, पुणे महानगर प्रदेश विकास प्राधिकरण (पीएमआरडी) और भूकुम व भूगांव ग्राम पंचायतों के बीच बंटा है।

भारत में मानव-निर्मित सबसे पुरानी झीलों में शामिल पाषाण झील, पुणे में जैव-विविधता वाला एक वेटलैंड रहा है जहां प्रवासी पक्षियों की कई प्रजातियां जैसे ग्रे हेरॉन, परपल मूरहेन, बोनेलीज़ ईगल आसानी से देखी जा सकती थीं। हालाँकि, इस झील के आस-पास बढ़ते शहरी निर्माण, पेड़-पौधों के सफाए, और नजदीकी इलाकों से आ रहे गंदे पानी के चलते यहां के हालात अब पहले जैसे नहीं रहे।

शहरीकरण के गहरे निशान

साल 2000 से ही, पुणे में पर्यावरण के लिए काम करने वाले गैर-सरकारी संगठनों और अकादमिक शोधकर्ताओं ने समय-समय पर ऐसे अध्ययन किए हैं जिनमें इस झील के पानी की गुणवत्ता, प्रवासी पक्षियों की प्रजातियों और झील के पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहे बदलाव साफतौर पर रेखांकित किए गए हैं।

कनाडा के ग्वेल्फ विश्वद्यालय के सेंटर फॉर बायोडायवर्सिटी जीनॉमिक्स में रिसर्च असोसिएट, समीर पाध्ये ने पाषाण झील के संकट को बहुत नजदीक से देखा है। वह बताते हैं, “मैंने 2008 से 2016 के बीच झील को मॉनीटर किया। इसकी वर्तमान स्थिति पूरी तरह से इंसानी गतिविधियों का नतीजा है। 2008 में जब हमारी टीम ने स्टडी शुरु की तो झील के ईकोसिस्टम में ब्रियोजोन और फ्रेशवॉटर स्पंज जैसी बिना रीढ़ वाली, विविध सूक्ष्मजीवी प्रजातियों की मौजूदगी, इसके ईकोसिस्टम की बेहतर सेहत और संतुलन की परोक्ष गवाह थी।”  “उस वक्त आस-पास निर्माण भी उतना नहीं था। लेकिन, धीरे-धीरे शहरीकरण ने रफ्तार पकड़ी, गंदा पानी झील में छोड़ा जाने लगा। अनियोजित ढंग से बढ़ते जा रहे रिहायशी इलाकों के अलावा झील के पारिस्थितिकी तंत्र के साथ छेड़-छाड़ के भी बहुत बुरे नतीजे निकले,” उन्होंने आगे बताया।

सौंदर्यीकरण परियोजना में झील की तरफ लोगों को आकर्षित करने के लिए बैठने की जगह बनाई गई और बच्चों के खेलने का इंतजाम भी किया गया। तस्वीर- स्वाति बक्शी
सौंदर्यीकरण परियोजना में झील की तरफ लोगों को आकर्षित करने के लिए बैठने की जगह बनाई गई और बच्चों के खेलने का इंतजाम भी किया गया। तस्वीर- स्वाति बक्शी

अब से 25 बरस पहले ही झील की बिगड़ती सेहत के संकेत मिलने शुरु हो गए थे जब इसमें रहने वाली गहरे पानी की बत्तखों पर एक अध्ययन किया गया। आमतौर पर ये बत्तखें झील के केंद्रीय हिस्से में रहना पसंद करती हैं जिसकी गहराई ज्यादा होती है। स्टडी में पाया गया कि झील में गाद जमने से उसकी गहराई कम होने के कारण गहरे पानी की बत्तखों की जगह कम गहरे पानी में रहने वाली बत्तखों ने ले ली। अध्ययन के मुताबिक, 1980 में झील की गहराई 30-40 फीट थी जो 2000-2001 तक आते-आते 15-20 फीट तक रह गई। यही नहीं, मछलियों की कई स्थानीय प्रजातियां भी नष्ट होती चली गईं और वेटलैंड में पाए जाने वाले पक्षियों की प्रजातियों में भी कमी आती गई।

सिर्फ अकादमिक शोधों में ही नहीं, सरकारी दस्तावेजों में भी पाषाण झील की बदहाली दर्ज है। फरवरी 2024 में एक मीडिया रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण की प्रधान बेंच ने महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीसीबी) से जवाब मांगा। एमपीसीबी ने राम नदी, पाषाण झील और आस-पास के इलाकों का आधिकारिक दौरा करने के बाद लिखित जवाब में कहा कि झील में भारी मात्रा में घरेलू गंदा पानी पहुंचता है, पानी का रंग पीला और बदबूदार है। उसमें भारी मात्रा में जलकुंभी फैलने की वजह से सैंपल लेने तक की जगह नहीं है और पीएमसी ने जलकुंभी निकालकर अवैज्ञानिक तरीके से किनारे पर ही छोड़ दी है जो बदबू पैदा होने की वजह बनती है।

सीवेज का गंदा पानी झील में बहाया जाता है जिसका असर सड़ते हुए पानी के रूप में देखा जा सकता है। तस्वीर- स्वाति बक्शी
सीवेज का गंदा पानी झील में बहाया जाता है जिसका असर सड़ते हुए पानी के रूप में देखा जा सकता है। तस्वीर- स्वाति बक्शी

झील के मौजूदा हालात और बढ़ते सीवेज के बारे में बात करते हुए पीएमसी के ड्रेनेज विभाग के चीफ इंजीनियर जगदीश खानोरे कहते हैं,‘‘राम नदी पीएमसी की सीमा में बावधान से प्रवेश करती है लेकिन समस्या वहां से शुरु नहीं होती। पिछले पंद्रह सालों के दौरान भूकुम और भूगांव में रामनदी के इर्द-गिर्द की जमीन पर रिहाइशी और औद्योगिक निर्माण हुआ है, जहां से गंदा पानी रामनदी में बहाया जाता है जो कई सिरों से पाषाण झील में भरता है।” “भूकुम में पीएमआरडी का प्रस्तावित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बन रहा है, जिसे डब्ल्यूटीई नाम की कंपनी बना रही है। इसकी क्षमता 3-5 एमएलडी होगी। भूगांव में 10 एमएलडी एसटीपी का प्रस्ताव है जिसके लिए फंड जुटा लिए गए हैं लेकिन जमीन अधिग्रहण को लेकर कुछ समस्या चल रही है,” उन्होंने बताया।

बहाली के प्रयासों पर विशेषज्ञों के सवाल

फ्रेशवॉटर साइंसेज जर्नल में छपे एक शोध के मुताबिक साल 2005 से 2008 के बीच, पीएमसी ने पाषाण झील की बहाली और सौंदर्यीकरण के समेकित प्रयास किए। पहला चरण 2005 में पूरा किया गया जब झील को सुखाकर, उसके तले में जमी गाद और दूसरी चीजें हटाई गईं। दूसरा और वृहद चरण 2006 से 2008 के बीच, जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन के तहत पूरा हुआ। इसमें और ज्यादा गाद निकालने के साथ ही कई तरह के निर्माण कार्य हुए ताकि लोगों को झील की ओर आकर्षित किया जा सके, जैसे गाद से ही 17 एकड़ का एक टीला बनाकर प्रवासी पक्षियों को आकर्षित करना, झील के किनारों पर पेड़ और झाड़ियां वगैरह लगाना। विशेषज्ञों ने गाद हटाने और सौंदर्यीकरण के कुछ तरीकों पर सवाल उठाए हैं।

शहर की ओर से गंदे पाने की झील में निकासी के चलते ऐसे तत्वों की मात्रा बेहद ऊंची है जो खर-पतवार को पैदा होने और बढ़ने का मौका देते हैं। तस्वीर- स्वाति बक्शी
शहर की ओर से गंदे पाने की झील में निकासी के चलते ऐसे तत्वों की मात्रा बेहद ऊंची है जो खर-पतवार को पैदा होने और बढ़ने का मौका देते हैं। तस्वीर- स्वाति बक्शी

समीर पाध्ये और एक्वेटिक ईकॉलजिस्ट मिहिर कुलकर्णी ने 2021 में एक शोध किया जो जूप्लैंक्टन कहलाने वाले सूक्ष्मजीवियों की कम हुई तादाद के जरिए झील के बदले तंत्र पर रोशनी डालता है। शोधपत्र बताता है कि झील के पानी की गुणवत्ता सुधारने के इरादे से 2004-05 और 2010-2011 में पुनर्उद्धार का काम हुआ। इसके बाद 2008-2013 के बीच झील का सौंदर्यीकरण किया गया जिसके तहत सिल्ट हटाना, कृत्रिम द्वीप बनाना, दीवारें खड़ी करना, जॉगिंग पार्क बनाने जैसे काम हुए। इन सारी गतिविधियों ने झील के सूक्ष्मजीवियों, खाद्य श्रृंख्ला और सालों में स्थापित हुए ईकोसिस्टम की व्यवस्थाओं को तोड़-मरोड़ दिया।

पुणे के गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स एंड ईकॉनॉमिक्स में सतत विकास केंद्र के निदेशक प्रोफेसर गुरुदास नूलकर भी मानते हैं कि सौंदर्यीकरण के नाम पर उठाए गए कई कदम झील के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नुकसानदेह रहे। वह कहते हैं, “सौंदर्यीकरण के नाम पर बाड़ लगाई गई, पत्थर लगाकर किनारा बनाया गया, गाद निकाली गई और झील के एक ओर नीलगिरी पेड़ (यूकेलिप्टस) लगाए गए जो बेहद गलत कदम था।” “पत्थर का किनारा बनाने का असर यह हुआ कि प्राकृतिक तौर पर झील का किनारा जिस तरह की हरियाली, कीड़ों और छोटे जीवों के रहने की परिस्थितियां पैदा करता था, वह खत्म हो गया है। आप देखेंगे कि अब वहां झंकाड़ जैसा कुछ दिखेगा लेकिन जलीय ईकोसिस्टम नहीं जिसमें विविध जीवन को बचाए रखने की संभावना हो। इसी तरह नीलगिरी जैसे पेड़ रोपना जो स्थानीय प्रजाति नहीं है और जंगल का पेड़ है, उसे वेटलैंड वाले इलाके में लगाना, यहां के पारिस्थितिक तंत्र के प्रतिकूल है। असर यह है कि अब आपको आर्द्रभूमि वाले पक्षियों की जगह शहरों वाले चंद पक्षी दिखते हैं,” उन्होंने आगे बताया।


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लंबे वक्त से पाषाण झील के सबसे बड़े आकर्षणों में यहां आने वाले प्रवासी पक्षियों की प्रजातियां रही हैं। प्रोफेसर नूलकर की राय की पुष्टि पक्षियों से जुड़े आंकड़ों से भी होती है। एशियन वॉटरबर्ड सेंसेज 2002-2004 में पाषाण झील और उसके इलाके में रहने वाले पक्षियों की 207 प्रजातियां दर्ज की गईं थी।  लेकिन, सरकारी सौंदर्यीकरण प्रयासों के बरसों बाद, जून 2021 से मई 2022 में किए गए एक अकादमिक अध्ययन में पक्षियों की केवल 81 प्रजातियां पाई गईं।

 

बैनर तस्वीरः झील के ज्यादातर हिस्से पर जलकुंभी का जाल फैला हुआ है जिसके चलते पानी तक सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती और ऑक्सीजन के स्तर में भी भयानक कमी आती है। तस्वीर- स्वाति बक्शी

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