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खनन परियोजनाओं की पर्यावरण मंजूरी के लिए अब नहीं देने होंगे भूमि अधिग्रहण के प्रमाण

एक माइनिंग इंजीनियर क्रोमियम ओडिशा के जाजपुर जिले की एक खदान में अयस्क की परत की ओर इशारा करते हुए। अब कुछ खास गैर-कोयला खनन परियोजनाओं के डेवलपर्स को पर्यावरण मंजूरी लेने से पहले जमीन अधिग्रहण का प्रमाण दिखाने की आवश्यकता नहीं है। तस्वीर- एपी/अनुपम नाथ

एक माइनिंग इंजीनियर क्रोमियम ओडिशा के जाजपुर जिले की एक खदान में अयस्क की परत की ओर इशारा करते हुए। अब कुछ खास गैर-कोयला खनन परियोजनाओं के डेवलपर्स को पर्यावरण मंजूरी लेने से पहले जमीन अधिग्रहण का प्रमाण दिखाने की आवश्यकता नहीं है। तस्वीर- एपी/अनुपम नाथ

  • पर्यावरण मंत्रालय का कहना है कि अब कुछ चुनिंदा ‘गैर-कोयला’ खनन परियोजनाओं के डेवलपर्स को पर्यावरणीय मंजूरी लेने से पहले भूमि अधिग्रहण का प्रमाण या उसकी प्रक्रिया शुरू करने का सबूत दिखाना अनिवार्य नहीं होगा।
  • हाईवे, खनिज खनन, स्लरी पाइपलाइन और तेल एवं गैस परियोजनाओं जैसी कुछ श्रेणियों को जमीन अधिग्रहण की सहमति लेने से छूट दी गई है, भले ही ये परियोजनाएं पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील इलाकों से होकर गुजरती हों।
  • यह बदलाव तब किया गया जब परियोजना डेवलपर्स ने तर्क दिया कि कोयला खनन के पट्टे देते समय ज़मीन मालिकों से सहमति नहीं मांगी जाती, तो अन्य परियोजनाओं के लिए भी यह अनिवार्य नहीं होना चाहिए।

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने एक महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव करते हुए कुछ चुनिंदा ‘गैर-कोयला’ खनन परियोजनाओं के डेवलपर्स को बड़ी राहत दी है। अब इन परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय मंजूरी लेते समय भूमि अधिग्रहण का प्रमाण या उसकी प्रक्रिया शुरू करने का सबूत देना अनिवार्य नहीं होगा।

मंत्रालय द्वारा जारी एक आधिकारिक पत्र के अनुसार, यह निर्णय विभिन्न औद्योगिक निकायों के उस अनुरोध के बाद लिया गया है, जिसमें उन्होंने पुरानी शर्तों को हटाने की मांग की थी। पहले के नियमों के तहत, डेवलपर्स के लिए मंजूरी के लिए आवेदन करते समय ज़मीन अधिग्रहण के कागजात दिखाना अनिवार्य था। मंत्रालय का यह कदम परियोजनाओं को मंजूरी मिलने की प्रक्रिया को सरल बनाने की दिशा में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

इस बदलाव के तहत अब हाईवे, खनिज खनन, स्लरी पाइपलाइन, और तेल व गैस की खोज (तटीय और मैदानी इलाकों में) जैसी परियोजनाओं को भूमि अधिग्रहण की सहमति लेने से छूट दे दी गई है, भले ही ये परियोजनाएं नेशनल पार्क या पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील इलाकों से होकर गुजरती हों। तेल और गैस परिवहन पाइपलाइन परियोजनाओं को भी इस दायरे से बाहर रखा गया है। सरल शब्दों में कहें तो, नेशनल पार्क, कोरल रीफ, अभयारण्यों और संवेदनशील क्षेत्रों से गुजरने वाली परियोजनाओं को अब भूमि अधिग्रहण या उसकी सहमति मिलने से पहले ही पर्यावरणीय मंजूरी दी जा सकेगी।

पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री और कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस बदलाव पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “यह समझना बहुत मुश्किल है कि जब तक किसी क्षेत्र के बारे में पूरी जानकारी न हो कि वहां कौन-सी गैर-कोयला खनन परियोजना शुरू होने वाली है, तब तक उसका सार्थक पर्यावरण प्रभाव आकलन कैसे किया जा सकता है।”

इस बदलाव के बाद, अब गैर-कोयला खनन परियोजनाओं को भी लगभग उन्हीं छूटों के दायरे में ला दिया गया है, जो पहले केवल कोयला खनन परियोजनाओं को मिलती थीं।

जम्मू के बाहरी इलाके में निर्माणाधीन एक राजमार्ग। तस्वीर- एपी/चन्नी आनंद
जम्मू के बाहरी इलाके में निर्माणाधीन एक राजमार्ग। तस्वीर- एपी/चन्नी आनंद

पर्यावरणीय मंजूरी और भूमि अधिग्रहण

इस बदलाव से पहले, गैर-कोयला खनन परियोजनाओं के प्रस्तावक के लिए पर्यावरण मंजूरी की आवेदन प्रक्रिया के तहत कुछ प्रमाण जमा करना जरूरी था। उन्हें यह दिखाना होता था कि उन्होंने शुरुआती स्तर पर जमीन हासिल कर ली है, जमीन मालिकों की सहमति ले ली है या राज्य सरकार ने जमीन अधिग्रहण की पुष्टि की है।

यह नियम मंत्रालय द्वारा 2014 में जारी एक आधिकारिक ज्ञापन में स्पष्ट किया गया था। ज्ञापन में यह गौर किया गया कि पर्यावरण मंजूरी मिलने से पहले कितनी जमीन का अधिग्रहण किया जाना जरूरी है, इसके लिए राज्य-स्तरीय मूल्यांकन एजेंसियां अपने हिसाब से अलग-अलग मानक अपना रही थीं।

मंत्रालय ने उस समय तर्क देते हुए कहा था, “पर्यावरण मंजूरी पर विचार करने के लिए पूरी जमीन का अधिग्रहण होना अनिवार्य नहीं है, लेकिन जब मामले को मूल्यांकन के लिए संबंधित विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति/राज्य विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति के सामने रखा जाए, तो भूमि अधिग्रहण की स्थिति को दर्शाने वाला कोई विश्वसनीय दस्तावेज जरूरी है।”

अगर यह सरकारी परियोजना है, तो भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत जारी कोई अधिसूचना भूमि अधिग्रहण का सबूत माना जा सकता था। वहीं, अगर यह कोई निजी परियोजना है, तो मालिकों की जमीन बेचने की इच्छा दिखाने वाला कोई भी विश्वसनीय दस्तावेज इसका प्रमाण हो सकता था।

फरवरी 2025 में, मंत्रालय ने कहा कि अगर परियोजना के पर्यावरण प्रभाव आकलन में राज्य सरकार या किसी अधिकृत एजेंसी द्वारा जमीन अधिग्रहण का उल्लेख किया गया है, तो इसे भी इस शर्त को पूरा करने के लिए पर्याप्त माना जाएगा।


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हालाँकि, यह नया बदलाव परियोजना डेवलपर्स के आग्रह के बाद किया गया है। डेवलपर्स का तर्क था कि जब कोयला खनन के पट्टे देते समय जमीन मालिकों से सहमति नहीं ली जाती, तो गैर-कोयला खनन के लिए यह जरूरी क्यों है। इस प्रावधान को हटाया जाना चाहिए। खदान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम के अनुसार, खनिजों पर केवल सरकार का मालिकाना हक होता है। इससे राज्यों को यह अधिकार मिलता है कि वे निजी जमीन पर भी खनन पट्टे जारी कर सकें और जमीन मालिक की पूर्व सहमति के बिना उसे निष्पादित कर सकें। हालाँकि, खदान शुरू करने से पहले पट्टा पाने वालों को जमीन के ऊपरी हिस्से का अधिकार या मालिकों की सहमति लेना ज़रूरी होता है।

यह मामला गैर-कोयला खनन विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति के पास भेजा गया था। समिति ने इसे तर्कसंगत मानते हुए स्वीकार कर लिया और कहा कि जमीन अधिग्रहण की यह शर्त ‘कोयला खनन, तेल एवं गैस की खोज और हाईवे जैसी कुछ अन्य परियोजनाओं के लिए व्यावहारिक नहीं हो सकती।

कोयला खनन के नियमों की तर्ज पर, इस नए बदलाव में यह भी कहा गया है कि जब ऐसी परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी दी जाएगी, तो उसमें एक खास शर्त शामिल की जा सकती है। इसके अनुसार, काम शुरू करने की अनुमति केवल उन्हीं जमीन के टुकड़ों या खसरा नंबरों पर दी जाएगी, जिन्हें परियोजना प्रस्तावक ने अधिग्रहित कर लिया हो या जिनके लिए जमीन मालिकों या संबंधित राज्य सरकार या उनकी अधिकृत एजेंसी से सहमति प्राप्त कर ली गई हो।


यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 12 जनवरी 2026 को प्रकाशित हुई थी।


बैनर तस्वीर:  एक माइनिंग इंजीनियर क्रोमियम ओडिशा के जाजपुर जिले की एक खदान में अयस्क की परत की ओर इशारा करते हुए। अब कुछ खास गैर-कोयला खनन परियोजनाओं के डेवलपर्स को पर्यावरण मंजूरी लेने से पहले जमीन अधिग्रहण का प्रमाण दिखाने की आवश्यकता नहीं है। तस्वीर- एपी/अनुपम नाथ

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