- साल 2018 में केरला में आई बाढ़ के दौरान इससे निपटने की तैयारी, पहले से चेतावनी देने वाले सिस्टम और संस्थाओं की मदद में बड़ी कमियाँ सामने आईं।
- इसके बाद केरला में बाढ़ की आशंका वाले इलाकों में लोग सिटीजन साइंटिस्ट बनकर बारिश को ट्रैक कर रहे हैं, डेटा शेयर कर रहे हैं, और पहले से चेतावनी जारी कर रहे हैं।
- बारिश की मॉनिटरिंग के शुरुआती दिनों में, सामुदायिक पहल से मिली रीडिंग और जानकारी पर अधिकारियों ने ध्यान नहीं दिया था। लेकिन, आज इस जानकारी को आधिकारिक प्रक्रिया में शामिल करने पर बातचीत चल रही है।
केरला के कोट्टायम जिले के कुमारनल्लूर की रहने वाली एलिज़ाबेथ कोशी, एक शिक्षिका, ट्रांसलेटर और कवयित्री हैं। एलिज़ाबेथ को उनकी ज़िंदगी में ज़्यादातर समय कविता लिखने की प्रेरणा हर साल आने वाले मानसून से मिलती थी। लेकिन, 2018 की बाढ़ के बाद यह हमेशा के लिए बदल गया। वह याद करती हैं, “हर साल, पानी सड़क तक आ जाता था और बारिश रुकने पर कम हो जाता था। उस साल ऐसा नहीं हुआ। मैं बरामदे में बैठकर बारिश देख रही थी, और शाम तक पानी मेरे पैरों तक आ गया था।”
अगस्त 2018 में, दक्षिण भारत के केरला ने अपनी सबसे भयावह प्राकृतिक आपदाओं में से एक का सामना किया। बहुत भारी मॉनसूनी बारिश की वजह से नदियाँ उफान पर आ गईं और तालाब अपनी क्षमता से ज़्यादा भर गए, जिससे सरकार को अचानक कई बांधों से पानी छोड़ना पड़ा। इस बाढ़ में लगभग 500 लोगों की मौत हुई, घरों, सड़कों, खेती और आमदनी का भारी नुकसान हुआ, और लाखों लोग बेघर हो गए। इस आपदा से निपटने में लोगों की मदद के लिए पूरे भारत में नागरिक, स्वयंसेवी और सिविल सोसाइटी ग्रुप बचाव और राहत कार्यों के लिए साथ आए। लेकिन, यह आपदा इतनी बड़ी थी कि इससे निपटने की तैयारी, पहले से चेतावनी देने वाले सिस्टम और संस्थाओं की मदद में बड़ी कमियाँ सामने आईं।
बचपन में पोलियो की वजह से व्हीलचेयर इस्तेमाल करने वाली एलिज़ाबेथ के घर में जब पानी घुसा तब वे उनके घर पर काम करने वाली सहायिका मीनाक्षी के साथ थीं। इस जलभराव के दौरान उनके पड़ोसी जल्द ही नाव लेकर पहुँचे और उन्हें सुरक्षित जगह पर ले गए। इसके बाद, उन्होंने घर की पहली मंजिल पर एक कमरा बनवाया जिसमें रैंप था और बाद में, मीनाचिल रेन मॉनिटरिंग ग्रुप में शामिल हो गईं। यह ग्रुप एक नागरिक पहल है जो रियल-टाइम में बारिश को ट्रैक करता है। वह कहती हैं, “उनके बारिश के अपडेट मुझे चेतावनी और आराम दोनों देते हैं।”
भारतीय मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक, 1 जून से 19 अगस्त, 2018 के बीच राज्य में 2,346.6 मिलीमीटर बारिश हुई जो सामान्य से 42% ज़्यादा है। इस बारिश में केरला के 14 में से 13 जिले बाढ़ में डूब गए थे। अगस्त 2018 में आई बाढ़ पर सेंट्रल वॉटर कमीशन की स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक, IMD का तैयार किया गया बारिश का डेटा केरला के मैदानी और पहाड़ी इलाकों में फैले 67 रेन गेज स्टेशनों के रिकॉर्ड पर आधारित था। हालाँकि, इससे बारिश के पैटर्न की एक बड़ी तस्वीर तो मिली, लेकिन एक बड़ी कमी भी सामने आई: कई स्टेशनों पर, खास तारीखों के रिकॉर्ड गायब थे और बारिश का अंदाजा लगाने के लिए आसपास की जगहों के डेटा का इस्तेमाल किया गया था।
बाढ़ के बाद, नदी बेसिन के किनारे रहने वाले लोगों ने बारिश को मापने और रियल-टाइम डेटा साझा करने के लिए स्थानीय ग्रुप बनाए। कोट्टायम में मीनाचिल रेन एंड रिवर मॉनिटरिंग ग्रुप (MRRM) और एर्नाकुलम में इक्विनोक्ट का रेन मॉनिटरिंग ग्रुप ऐसी ही कुछ कोशिशों में से हैं।

डेटा की कमी का समाधान
इस रेन मॉनिटरिंग ग्रुप की मुख्य संस्था मीनाचिल रिवर प्रोटेक्शन काउंसिल (MRCP), जो तीन दशकों से ज़्यादा समय से कार्यरत है, ने इसमें अहम भूमिका निभाई। भूमिका चैरिटेबल सोसाइटी और MRCP दोनों के सचिव एबी इमैनुअल कहते हैं, “2019 में, हमने वागामोन से कुमारकोम तक 30 रेन गेज लगाए।” “वॉलंटियर रोज़ सुबह 8:30 बजे बारिश रिकॉर्ड करते हैं और एक साझा गूगल शीट में इन आंकड़ों को अपडेट करते हैं।”
शुरुआत में उन्होंने स्कूल के प्रयोगों में इस्तेमाल होने वाले ₹350 के साधारण रेन गेज इस्तेमाल किए। जैसे-जैसे इस कोशिश को पहचान मिली, मीनाचिल नदी के किनारे बसी पंचायतें भी इसमें शामिल हो गईं, जिससे यह नेटवर्क बढ़ गया। आज, लगभग 78 किलोमीटर लंबी मीनाचिल नदी, जो इडुक्की जिले के वागामोन से कोट्टायम जिले के कुमारकोम में वेम्बनाड झील तक बहती है, पर 170 गेज लगे हैं।
एर्नाकुलम जिले के पुथेनवेलिककारा पंचायत में भी ऐसी ही कहानी सामने आई, जहाँ पेरियार और चालकुडी नदियाँ अरब सागर में मिलने से पहले मिलती हैं। पुथेनवेलिककारा के कम्युनिटी रिसोर्स सेंटर के उपाध्यक्ष शाजन एम.पी. कहते हैं, “हम 2018 में सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाकों में से एक थे। लोग इसे सदी में एक बार होने वाली घटना कहते थे, और अगले साल, हमारे यहाँ फिर से बाढ़ आ गई।” “हमें खतरा कम करने का कोई तरीका खोजना था।”
राज्य सरकार के ‘रीबिल्ड केरला’ कार्यक्रम के तहत, पंचायतों को अपने प्लान में आपदा के खतरे को कम करने में मदद करने के लिए नम्मल नमुक्कई (हम, हमारे लिए) नाम की एक पहल शुरू की गई थी। केरला इंस्टीट्यूट ऑफ लोकल एडमिनिस्ट्रेशन (KILA) से मिली ट्रेनिंग और इक्विनोक्ट कम्युनिटी सोर्स्ड मॉडलिंग सॉल्यूशंस नाम के स्टार्टअप से मिले सहयोग से, पुथेनवेलिककारा पंचायत ने बारिश, नदी और ग्राउंडवाटर मॉनिटरिंग प्रोजेक्ट्स को लागू किया, जिससे समुदाय-आधारित एक नया मॉडल बना।
पुथेनवेलिककारा के रिटायर्ड ड्राइंग टीचर बैजू पी.एस. के लिए बारिश की मॉनिटरिंग रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गई है। वे कहते हैं, “मैंने 9 मई, 2019 को बारिश मापना शुरू किया। हमने अथिराप्पिल्ली से पल्लीपुरम तक 27 गेज लगाए।” वे हर दिन एक बड़े रजिस्टर में रीडिंग रिकॉर्ड करते हैं। वे रजिस्टर के पन्ने पलटते हुए मुस्कुराते हुए कहते हैं, “मुझे (मोबाइल) ऐप्स और टेक्नोलॉजी के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है, इसलिए यह (रजिस्टर) मेरे लिए आसान है।” यह डेटा एक सरल रिकॉर्ड है जिसमें एक समुदाय बारिश से डरना नहीं, बल्कि उसके साथ रहना सीख रहा है।

चिंता को प्रयोग में बदलना
बारिश, जो कभी केरला की नदियों के किनारे रहने वाले समुदायों में डर पैदा करती थी, आज सतर्कता और तैयारी को बढ़ावा देती है। बाढ़ की आशंका वाले इलाकों में, लोग सिटीजन साइंटिस्ट बन गए हैं — बारिश को ट्रैक कर रहे हैं, डेटा शेयर कर रहे हैं, और पहले से चेतावनी जारी कर रहे हैं। उनके द्वारा साझा प्रयासों से किए गए काम ने चिंता को प्रयोग में बदल दिया है। एबी इमैनुअल कहते हैं, “2022 में, हमने कोट्टायम जिले के नट्टासेरी में कोशामट्टम कॉलोनी से 100 से ज़्यादा परिवारों को बचाया।” “एक वॉलंटियर, गोपू नट्टासेरी ने बारिश के खतरनाक आंकड़े देखे और लोगों से जगह खाली करने की अपील की। हालांकि आसमान साफ था, फिर भी उन्होंने ज़ोर दिया और कोट्टायम फायर एंड रेस्क्यू अधिकारियों से मदद मांगी। उस रात, इलाका पूरी तरह से डूब गया था। उनके समय पर किए गए काम ने अनगिनत जानें बचाईं।”
इक्विनोक्ट के को-फ़ाउंडर और सीईओ सी.जी. मधुसूदनन बताते हैं, “भारत में, बाढ़ का अनुमान लगाने और सूखे की निगरानी के मौजूदा सिस्टम काफ़ी नहीं हैं और अक्सर बेअसर होते हैं। इस वजह से, जब इमरजेंसी आती है तो हम तैयार नहीं रह पाते।” “इस कमी को पूरा करने के लिए, हमें हाइपरलोकल सिस्टम की ज़रूरत है जो समय पर, सही जानकारी दे सकें। ऐसी लोकलाइज़्ड मॉनिटरिंग बड़े पैमाने पर आपदा के खतरों को काफ़ी कम कर सकती है। यहीं पर समुदायों की पहल अहम भूमिका निभाती है।”
एर्नाकुलम के पुथेनवेलिककारा में कनक्कनकाडवु पुल एक रेगुलेटर और शटर का काम करता है। इसे आमतौर पर चालकुडी नदी में खारे पानी को जाने से रोकने के लिए बंद रखा जाता है। हालाँकि, जब त्रिशूर में पेरिंगलकुथु जलाशय अपने शटर खोलता है, तो छोड़ा गया पानी तीन घंटे के अंदर पुथेनवेलिककारा पहुंच जाता है।
शाजन याद करते हैं, “यह 2021 की बात है। बहुत ज़्यादा बारिश हो रही थी, और पेरिंगलकुथु डैम खोल दिया गया था। सुबह करीब 2 बजे, चालकुडी रिवर प्रोटेक्शन काउंसिल के सचिव एस.पी. रवि ने फ़ोन करके बताया कि पानी बढ़ रहा है और पूछा कि क्या हमारे इलाके के पास के (कनक्कनकाडवु पुल के) शटर खोले गए हैं। जब मैं चेक करने गया, तो वे अभी भी बंद थे।”
अगर ऐसे समय में वो शटर बंद रहते हैं, तो ऊपर के इलाके जल्दी ही डूब सकते हैं। वह आगे कहते हैं, “मैंने तुरंत एक स्थानीय मछुआरे और शटर चलाने में माहिर, सुंदरन को जगाया और हमने मिलकर बिना किसी अधिकारी की मौजूदगी के उन्हें खोल दिया। उस तुरंत एक्शन ने एक बड़ी मुसीबत को टालने में मदद की।”

आपदा की तैयारी
बारिश की मॉनिटरिंग के शुरुआती दिनों में, सामुदायिक पहल से मिली रीडिंग और जानकारी पर अधिकारियों ने ध्यान नहीं दिया था। लेकिन, आज इस जानकारी को आधिकारिक प्रक्रिया में शामिल करने पर बातचीत चल रही है।
इक्विनोक्ट की रिसर्च डायरेक्टर श्रीजा के.जी. कहती हैं, “लोगों ने आपदा का शिकार होना बंद कर दिया और बदलाव के एजेंट बन गए।” “वे डेटा से लैस हो गए और कारगर उपायों के वाहक बन गए। यह सिटीजन साइंस से कहीं आगे है, क्योंकि साइंस अक्सर साइंटिस्ट, इंस्टीट्यूशन और उनके फ्रेमवर्क के दायरे में काम करता है। हम यहां जो देख रहे हैं वह एक ऐसा प्रोसेस है जहां लोग खुद सिस्टम बन जाते हैं।”
डिज़ास्टर मैनेजमेंट सुइट एक वेबसाइट है जो केरला के वायनाड ज़िले की 25 ग्राम पंचायतों से रियल-टाइम बारिश का डेटा इकट्ठा करती है। यह देश में एक नई पहल है, जो शुरुआती चेतावनी सिस्टम के लिए ज़रूरी डेटा इकट्ठा करती है और संभावित लैंडस्लाइड और बाढ़, जिसका वायनाड में खास तौर पर खतरा रहता है, के लिए पहले से उपाय करने में मदद करती है।
केरला के चीफ़ रेजिलिएंस ऑफ़िसर, शेखर लुकोस कुरियाकोस कहते हैं, “जिस किसी के पास भी मौसम स्टेशन, रेन गेज या टोटलाइज़र है, वह पोर्टल में डेटा डालना शुरू कर सकता है। इसे बाद में हमारे ‘कवचम’ पोर्टल में इस्तेमाल किया जा सकता है, जो अच्छी तरह से इकट्ठा किए गए मौसम डेटा को जोड़ने और मौसम की बारीक समझ के साथ इसे विश्लेषित करने में मदद करेगा।”
कुरियाकोस कहते हैं, “जब आपदा प्रबंधन की बात आती है, तो कम्युनिटी एक्शन बहुत ज़रूरी है, प्लानिंग से लेकर तैयारी और इन सभी स्तर पर नुकसान कम करने की कोशिशों तक।” “हमने नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर से पूरे केरला में डिज़ास्टर मैनेजमेंट सुइट को बेहतर बनाने के लिए एक प्रस्ताव लाने को कहा है।”
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में, बारिश के बदलते पैटर्न क्लाइमेट मॉडल, क्लाइमेट साइंटिस्ट और मौसम की भविष्यवाणी के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए हैं। इस मामले में, MRRM और इक्विनोक्ट जैसी पहल क्लाइमेट साइंस में ज़रूरी डेटा गैप को भरने में मदद करते हैं, जिससे रिस्क कम करने की कोशिशें बेहतर तरीके से काम कर पाती हैं।
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेज़ी वेबसाइट पर 20 जनवरी, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: पुथेनवेलिककारा के रिटायर्ड ड्राइंग टीचर बैजू पी.एस. अपने घर में लगे रेन गेज पर बारिश का डेटा पढ़ते हुए। तस्वीर – अब्राहम इवेंजेलिन जोसेफ।